श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-003
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
तीसरा अध्याय
देवान्तक की देवलोक पर विजय
अथः तृतीयोऽध्यायः
देवलोकविजयं

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] तदनन्तर देवान्तक एवं नरान्तक प्रातः उठकर गुरुजनों का ध्यानकर तथा उनका पूजनकर और सम्पूर्ण देवताओं का स्मरणकर तथा उन्हें प्रणाम करके नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा में गये। मल-मूत्र का त्यागकर और दन्त एवं जिह्वा का शोधनकर उन दोनों ने स्नान करके सन्ध्या – वन्दन एवं इष्टदेवों का पूजन किया ॥ १-२ ॥ तदनन्तर उन दोनों ने ब्राह्मणों का भक्तिपूर्वक पूजनकर उन्हें धन और वस्त्र प्रदान किये। फिर कांस्यपात्रस्थित घी में [अपने मुख का] अवलोकनकर दक्षिणासहित उसे ब्राह्मण को दिया । उसके बाद स्वच्छ दर्पण में मुख देखकर और वस्त्र धारणकर वे दोनों विचार करने लगे ॥ ३-४ ॥

ज्येष्ठ भ्राता ने कहा — मैं महेश्वर के वरदान से स्वर्गादिलोकों की विजय करूँगा और उन्हीं के कृपाप्रसाद से तुम मृत्युलोक और पाताल को विजित करो ॥ ५ ॥

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यासजी!] उन दोनों ने इस प्रकार का निश्चय किया और एक शुभ दिन देखकर उनमें से एक [ ज्येष्ठ भ्राता ] ने वायु के समान वेग से स्वर्गलोक को गमन किया ॥ ६ ॥ अमरावती पहुँचकर उसने उद्यान (नन्दनकानन ) – परिसर को तोड़-फोड़ डाला और फेंटा कसकर वह बलशाली [देवान्तक] इन्द्र के सम्मुख जा खड़ा हुआ ॥ ७ ॥ उस समय शीघ्रतापूर्वक दौड़ते हुए देवताओं का महान् कोलाहल होने लगा । [ वे कहने लगे —] ‘यह कौन है ? यह कौन है ? यह इन्द्र के समीप कैसे आ गया ?’ ॥ ८ ॥ ‘इसका वध करो, इसे कठोर बन्धन में बाँधो, इस मनुष्य को दूर भगाओ’ – ऐसा कहते हुए वे (देवता) दौड़ रहे थे। तब उसने सहसा बार-बार उछल-उछल और कूद-कूदकर उन्हें दूर भगा दिया। उसके [बार- बार] उछलने और कूदने से स्त्रियों के गर्भ और बड़े-बड़े वृक्ष गिर गये। [उस समय ] पर्वतों, वनों और खानों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँपने लगी। उसके शरीर की कान्ति से सारे श्रेष्ठ देवता काले पड़ गये ॥ ९–११ ॥

जिस प्रकार रोगों द्वारा जीता गया व्यक्ति शीघ्र ही विवर्ण (आभारहित) हो जाता है, वैसे ही उसे देखकर सारे देवता विवर्ण हो गये ॥ १२ ॥ हे मुने! उस समय इन्द्र भी विह्वल और विवर्ण हो गये तथा कुछ देवगण तो दशों दिशाओं में भाग चले और कुछ युद्ध के लिये तैयार होने लगे। कुछ अत्यन्त भयभीत और अधीर हुए साधारण देवता उसकी शरण में चले गये। तब इन्द्र हाथ में वज्र लेकर चार दाँतोंवाले [गजश्रेष्ठ ऐरावत] हाथी पर समारूढ़ हुए ॥ १३-१४ ॥ [तदनन्तर] उन्होंने अत्यन्त भयंकर गर्जन किया, जिससे त्रैलोक्य कम्पायमान हो उठा। उन्होंने युद्ध के लिये उद्यत श्रेष्ठ देवताओं को देखकर कहा — ‘तुम सब क्या देखते हो, जब वह असुर यहाँ आया, तो तुम्हारा पौरुष कहाँ चला गया था?’ तब वे (देवगण) संग्राम के लिये उद्यत हो आगे बढ़े ॥ १५-१६ ॥

देवताओं को युद्ध के लिये उत्सुक देखकर देवान्तक ने इन्द्र से कहा — ‘हे शक्र ! क्यों [व्यर्थ] श्रम करते हो ? मुझे प्राप्त वरदानों पर विचार करो । सम्पूर्ण प्राणियों का अन्त कर देने वाले यमराज भी मेरे भय से त्रस्त होकर भाग गये। भगवान् शंकर के वरदान से मैं तुम्हारे वज्र को तिनके के समान मानता हूँ ॥ १७-१८ ॥ मेरे श्वास छोड़ने मात्र से तुम्हारे देखते-देखते देवता सब दिशाओं में पलायन कर जाते हैं, इसलिये हे इन्द्र ! मेरी बात सुनो और शान्तिपूर्वक अपने सभी पद (अधिकार) मुझे सौंप दो और तुम स्वयं यहाँ-वहाँ कहीं जाकर रहो, अन्यथा सब कुछ खोकर व्यर्थ में मृत्यु को प्राप्त करोगे । हे देवराज! क्या तुम नहीं जानते कि मेरा नाम ‘देवान्तक’ है ? ‘ ॥ १९-२०१/२

उसका इस प्रकार का वचन सुनकर इन्द्र का हृदय विदीर्ण हो गया । [ उस समय उन] शतक्रतु इन्द्र के मुख से प्रबल अग्नि इस प्रकार बाहर निकली, जैसे कि अत्यन्त तप्त तैल में जल की बूँदें गिरने पर छींटे बाहर निकलते हैं ॥ २१-२२ ॥

तदनन्तर क्रोध के आवेश में इन्द्र ने उससे कहा — ‘ तुम्हारे – जैसे कितने ही दानव मेरे द्वारा मारे गये हैं । रे नीच असुर ! तुम जो इस समय वरदान के गर्व से यहाँ आ गये हो, तो मेरे वज्र प्रहार से मारे जाकर तुम निश्चित ही धरती पर गिरोगे । रे बलाभिमानी ! तेरे इस नाम का समास अन्यपद-प्रधान (बहुब्रीहि) है, जिसका आशय है देवता से अन्त को प्राप्त होने वाला । [तूने भ्रमवश अपने नाम को तत्पुरुष समासान्त अर्थात् देवताओं का अन्त करने वाला मान लिया है], अगर तुझमें शक्ति है तो उसका प्रदर्शन कर, केवल डींग मत हाँक  ॥ २३-२४१/२  ॥

तदनन्तर [ ऐसा कहकर ] इन्द्र ने उसका वध करने के उद्देश्य से वज्र को मुट्ठी से कसकर पकड़कर उस पर प्रहार किया तो वज्र [उसके शरीर से टकराकर] उसी प्रकार सैकड़ों टुकड़े हो गया, जैसे मिट्टी का बना कोई पात्र हाथ से छूटकर चूर-चूर हो जाता है । देवान्तक [ उस प्रहार से ] बिना व्याकुल हुए रणक्षेत्र में खड़ा रहा, उसके शरीर का रोम भी नहीं टूटा ॥ २५-२६ ॥ तदनन्तर उसने उन देवश्रेष्ठ इन्द्र की पीठ पर मुक्के से प्रहार किया। इससे वे वैसे ही गिर पड़े, जैसे आँधी आने से वृक्ष गिर पड़ते हैं ॥ २७ ॥ उसके इस प्रकार के पराक्रम को जानकर बल दैत्य का वध करने वाले इन्द्र पलायन कर गये । [यह देखकर देवान्तक] उनके पीछे उसी तरह वेगपूर्वक दौड़ा, जैसे मृगसमूहों के पीछे सिंह दौड़ता है ॥ २८ ॥

अपना भयंकर मुख फैलाकर उसने भागते हुए उन इन्द्र से कहा —’ अब तुम क्यों भागे जा रहे हो, तुम्हारी बड़ी-बड़ी बातें कहाँ चली गयीं? ॥ २९ ॥ हे इन्द्र! सम्पूर्ण देवसमूहों के साथ तुम मेरे सामने आओ; क्योंकि श्रेष्ठ वीर पीठ दिखाकर भागने वालों को ‘नहीं मारते’॥ ३० ॥

[ऐसा कहकर] उसने स्वयं उन देवताओं के आगे आकर उन्हें मारा। उसने उनके मुख पर थप्पड़ मारकर उनका प्राणान्त कर उन्हें गिरा दिया ॥ ३१ ॥ उसने किसी को घुमाकर पृथ्वी पर पटक दिया, तो किसी को पाद-प्रहार, किसी को मुष्टि-प्रहार और कुछ अन्य देवताओं को कुहनी के प्रहार से मार डाला ॥ ३२ ॥ उसने कुछ अन्य देवताओं का गला पकड़कर उन्हें तब तक घसीटा, जब तक कि उनका प्राणान्त नहीं हो गया। उसने कुछ देवताओं के घुटने तोड़ डाले तो कुछ की भुजाएँ। कुछ देवताओं की जँघाएँ तोड़कर उसने उन्हें दूर फेंक दिया। कुछ देवता ऊपर की ओर मुख करके कुछ नीचे की ओर मुख किये गिरे पड़े थे और [ भूतल पर अपना] मुख पटक रहे थे । कुछ चलने में असमर्थ हो गये थे ॥ ३३-३४ ॥

कुछ देवता दुखित होकर मन-ही-मन विचार कर रहे थे कि जगदीश्वर ने क्या अकस्मात् प्रलय प्रारम्भ कर दिया। वे सभी देवता वैसे ही छिन्न-भिन्न [ अंगोंवाले] हो गये थे, जैसे सिंह से पीड़ित होकर हाथी हो जाते हैं । तदनन्तर उस जयशील देवान्तक ने उसी प्रकार स्वयं गर्जन किया, जैसे मेघों के गर्जन करने पर मयूरमण्डली गर्जन करने लगती है । उस समय सूर्य भी अपनी भास्करी नामक पुरी को छोड़कर दूर चले गये ॥ ३५-३७ ॥

[उस समय] सभी देवता अपने-अपने पदों (अधिकारों)-को छोड़कर पलायन कर गये। तब वह निर्भय मन से स्वयं इन्द्रपद पर आसीन हो गया ॥ ३८ ॥ सभी देवता [उस समय उससे भयभीत होकर ] हिमालय की श्रेष्ठ गुफाओं में चले गये और कन्द-मूल- फल का आहार करते हुए [बड़े ही] कष्ट से दिन बिताने लगे ॥ ३९ ॥ तदनन्तर पृथ्वी से तथा सभी दिशाओं से अगणित दैत्य-दानवों ने अनेक प्रकार के द्रव्यों, अनेक तीर्थों से लाये हुए जल तथा अनेक ऋषियों द्वारा उच्चारित मन्त्र-समूहों और शंख – भेरी-मृदंग एवं दुन्दुभियों की ध्वनि के साथ उस देवान्तक का अभिषेक किया ॥ ४०-४१ ॥

तत्पश्चात् दैत्यों ने अपने उस स्वामी से कहा — ‘दैत्यकुल में आपके सदृश न तो कोई हुआ है, न होगा । आप हम सबको आज्ञा करें’ ॥ ४२ ॥

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] इस प्रकार उसने इन्द्र एवं उनके अग्रगामी (प्रधान) देवताओं को अकेले ही जीत लिया और देवताओं पर राज्य किया तथा अमरावती की रक्षा की ॥ ४३ ॥ तदनन्तर वह करोड़ों दैत्यों से घिरा हुआ सत्यलोक (ब्रह्मलोक ) – को गया । तब ब्रह्माजी भी [ उससे भयभीत होकर] वहीं चले गये, जहाँ देवता पहले से गये थे, उस समय वह कभी तो ब्रह्माजी के [हंसयुक्त ] विमान पर आरोहण करता था और कभी इन्द्र के वाहन ऐरावत पर। तदनन्तर एक नायक को वहाँ (ब्रह्मलोक में) स्थापितकर (शासन – सूत्र सौंपकर ) वह (देवान्तक) वैकुण्ठलोक को गया, परंतु उसके पहुँचने के पूर्व ही | भगवान् श्रीहरि लक्ष्मीजी के साथ क्षीरसागर को चले गये। तब उसने अपने एक परम विश्वासपात्र दैत्य को वहाँ नियुक्तकर [अन्य दैत्यों से] विचार-विमर्श करते हुए कहा — ॥ ४४–४६ ॥

हे दैत्यो! बताओ, मैंने किसे नहीं जीता है ? मैं वहाँ जाऊँ। तब उन दैत्यों ने कहा कि ‘देवताओं का कोई भी स्थान अब शेष नहीं है ॥ ४७ ॥ अब आप विभिन्न लोकपालों के पदों पर दैत्यजनों को नियुक्तकर निर्भय होकर और अन्य कार्य छोड़कर केवल अमरावती का संरक्षण करें’ । मन्त्रियों द्वारा दिये गये इस उचित परामर्श को सुनकर देवान्तक ने परम प्रसन्नतापूर्वक उनके कथनानुसार कार्य किया ॥ ४८-४९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत क्रीडाखण्ड में ‘स्वर्गविजय-वर्णन’ नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

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