श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-029
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
उनतीसवाँ अध्याय
महर्षि कश्यप की पत्नी दिति तथा अदिति के वंश का वर्णन, हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु की उत्पत्ति का वर्णन, उनकी तपस्या तथा उन्हें वरदान की प्राप्ति, प्रह्लादपुत्र विरोचन के वध का आख्यान
अथः एकोनत्रिंशोऽध्यायः
बालचरिते विरोचनवध

ब्रह्माजी बोले — मैंने कश्यप को आज्ञा दी थी कि आप विविध प्रकार की सृष्टि करें। महर्षि कश्यप अत्यन्त विनीत, महान् ज्ञानी, भूत-भविष्य तथा वर्तमान का ज्ञान रखने वाले, सूर्य तथा अग्नि के तेज से भी अधिक तेजस्वी और उत्तम तपस्या की निधि थे। उन्होंने सृष्टि करने की सामर्थ्य प्राप्त करने के लिये अत्यन्त महान् तप किया ॥ १-२ ॥ उन्होंने षडक्षर मन्त्र के द्वारा भगवान् गणेशजी का ध्यान किया। इस प्रकार दिव्य हजार वर्ष बीत जाने पर वे देव गजानन उनके लिये वरप्रदाता हुए ॥ ३ ॥ उन्होंने महर्षि कश्यपजी को सभी प्रकार के अभीप्सित विविध वरों को प्रदान किया था। तब वरदान के प्रभाव से वे जो-जो भी अपने मन में कल्पना करते थे, उस-उसको शीघ्रता से अपने समक्ष पाते थे ॥ ४१/२

उन्होंने अपनी चौदह पत्नियों में अनेक बार गर्भाधान करके अपने तेज से सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृष्टि की थी। उन चौदह पत्नियों में दिति तथा अदिति नामवाली दो पत्नियाँ श्रेष्ठ थीं ॥ ५-६ ॥

भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने के लिये अदिति ने भी दस हजार वर्षों तक तपस्या की। इससे भगवान् जनार्दन सन्तुष्ट हो गये ॥ ७ ॥ उसके तप से सन्तुष्ट होकर भगवान् विष्णु संसार के पालन-पोषण के लिये, धर्म की स्थापना के लिये तथा इन्द्र आदि देवताओं और उनकी सन्तति की रक्षा और दुष्टों के संहार के लिये पहले देवी अदिति के पुत्र के रूप में अवतरित हुए। तदनन्तर एक समय की बात है, जब महर्षि कश्यप होम करने के लिये उद्यत थे। उस समय दिति ने अपने स्वामी से आदरपूर्वक कहा  — ॥ ८-९ ॥

हे भगवन्! मुझे कामाग्नि पीड़ित कर रही है । अतः आप ऋतुदान कीजिये । उसका ऐसा वचन सुनकर महर्षि कश्यप आदरपूर्वक उससे बोले — ॥ १० ॥

यह भयंकर सन्ध्याकाल है। इस समय हवन- उपस्थित है। तुम क्षणभर धैर्य धारण करो । तदनन्तर मैं तुम्हारे साथ रमण करूँगा। इस समय सहवास करने से देवताओं तथा धर्म का विरोधी दुष्ट पुत्र उत्पन्न होगा । दिति स्वामीके इस प्रकार के वचन सुनकर उनका हाथ पकड़कर उनके चरणों में गिर पड़ी ॥ ११-१२ ॥ लाल-लाल नेत्रोंवाली होकर वह तीनों लोकों को जला देने की इच्छा से बोल पड़ी — हे मुने! इसी समय यदि आप मेरी अभिलाषा पूर्ण नहीं करेंगे तो कामदेव की अग्नि से विह्वल हुई मैं अपने शरीर का त्याग कर दूँगी । दैवयोग से मेरा पुत्र देवताओं अथवा धर्म का विरोधी चाहे जैसा भी हो ॥ १३-१४ ॥ उसका ऐसा वचन सुनकर शरणागतवत्सल महर्षि कश्यप ने उसे ऋतुदान दिया और फिर स्नान करने के अनन्तर होम किया ॥ १५ ॥

कालान्तर में दिति को महान् बलशाली हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। उन दोनों ने अत्यन्त उत्कट तपस्या की ॥ १६ ॥ पञ्चाक्षर मन्त्र (नमः शिवाय) – का बहुत वर्षों तक जप करते हुए वे दोनों पैर के एक अँगूठे के बल पर खड़े होकर केवल वायु का भक्षण करते रहे। उनके शरीर पर दीमकों ने बाँबी बना ली थी ॥ १७ ॥ जब कृपानिधि भगवान् शंकर उन्हें वर प्रदान करने के लिये उपस्थित हुए, तब उन दोनों ने भक्तिपूर्वक भगवान् त्रिलोचन की स्तुति की ॥ १८ ॥ अपने हाथ जोड़कर वे दोनों उनके चरणों पर गिर पड़े और उनके दर्शन के प्रभाव से प्रस्फुटित बुद्धि वाले वे यथाज्ञान यथाशक्ति स्तुति करने लगे ॥ १९ ॥

जो देव वृषभ के वाहन पर विराजमान रहने वाले हैं, दस भुजाओं वाले हैं। ललाट पर अर्धचन्द्र को धारण करने वाले तथा नागों से सुशोभित हैं। जो विविध रूपवाले गणों तथा गिरिराजपुत्री पार्वती से समन्वित हैं, सम्पूर्ण चराचर जगत् के कारण हैं। जो बाघम्बर तथा गजचर्म धारण करनेवाले हैं। जिनके तीन नयन हैं, जो त्रिशूल को धारण करने वाले और कामदेव का दहन करने वाले हैं। जो भक्तों की इच्छा पूरी करने के लिये एकमात्र आश्रय- स्वरूप हैं और जो धर्म-अर्थ [, काम] तथा मोक्ष प्रदान करने वाले हैं [वे भगवान् शिव हमपर प्रसन्न हों] ॥ २० ॥ इस प्रकार सर्वव्यापी परमेश्वर महादेव की स्तुति करके उन्होंने भक्तों की अभिलाषा पूर्ण करने के लिये कल्पवृक्ष के समान उन भगवान् शिव को प्रणाम किया ॥ २१ ॥

तदनन्तर भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर उन दोनों से कहा — वर माँगो। तब उन दोनों ने वरों को माँगते हुए कहा कि देवताओं, यक्षों, राक्षसों, किन्नरों, श्रेष्ठ मनुष्यों, पिशाचों तथा चारण आदि किसी भी योनि के प्राणी के द्वारा हमारी मृत्यु न हो। न शस्त्रों से, न गीले पदार्थ से, न शुष्क पदार्थ से, न किसी जन्तु और न किसी जलचर प्राणी के द्वारा ही हमारी मृत्यु हो । अन्य किसी स्थावर अथवा जंगम प्राणी से हमारी मृत्यु न हो। हमारी मृत्यु न दिन में हो, न रात में हो। न तो पृथ्वी में हो, न आकाश में हो, न उन दोनों के मध्य में हो और न ही उषाकाल में हमारी मृत्यु हो ॥ २२-२४ ॥

तब भगवान् शिव ने ‘ऐसा ही होगा’ कहा और फिर वे अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर उन दोनों ने पृथ्वी तथा आकाश के मध्यभाग [स्वर्गादि दिव्यलोक ] और रसातल पर विजय प्राप्त कर ली ॥ २५ ॥ देवताओं के सभी स्थानों को बलपूर्वक जीतकर वे वहाँ स्थित हो गये। हिरण्यकशिपु का प्रह्लाद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह दैत्यों के लिये कण्टक के समान था और भगवान् विष्णु के भक्तों में सर्वश्रेष्ठ था। भगवान् नारायण का नाम-मन्त्र जपने पर पिता हिरण्यकशिपु ने उसे अत्यन्त प्रताड़ित किया था ॥ २६-२७ ॥ पिता हिरण्यकशिपु के द्वारा अनेक प्रकार की यातनाओं के दिये जाने पर उन करुणासागर भगवान् विष्णु ने जल में, स्थल में और विष तथा अग्नि से उसकी अनेक बार रक्षा की। सभी लोगों को भय पहुँचाने वाले उस हिरण्यकशिपु को नरसिंहरूप धारण करके श्रीहरि ने अपने नाखूनों के द्वारा सायंकाल के समय विदीर्ण कर डाला ॥ २८-२९ ॥

इससे पूर्व भगवान् विष्णु ने वाराहरूप धारण करके हिरण्याक्ष द्वारा समुद्र में डुबोयी गयी पृथ्वी को अपनी दाढ़ों के ऊपर उठाकर यथास्थान स्थित किया । प्रह्लाद का पुत्र विरोचन हुआ और उसका पुत्र हुआ बलि ॥ ३० ॥ विरोचन भगवान् सूर्य का भक्त था। उसने उनसे मुकुट प्राप्त किया था। सात अश्वोंवाले रथ में आसीन रहने वाले भगवान् सूर्य ने विरोचन से कहा था कि इस मुकुट पर यदि किसी दूसरे के हाथ का स्पर्श होगा तो यह नष्ट हो जायगा। इसमें कोई संशय नहीं है । भगवान् सूर्य के वर के प्रभाव से विरोचन ने तीनों लोकों को अपने अधीन कर लिया ॥ ३१-३२ ॥ अपने स्थानों से च्युत हो जाने पर देवता भगवान् अच्युत की शरण में गये। भगवान् विष्णु महान् चिन्ता करते हुए भी किसी निश्चय पर नहीं पहुँचे ॥ ३३ ॥ तब उन्होंने स्त्री का रूप धारण किया, जो सभी स्त्रियों में सर्वश्रेष्ठ थी । उस स्त्रीरूप के द्वारा उन्होंने दीर्घकाल तक विरोचन को आनन्दित किया ॥ ३४ ॥

तदनन्तर कुत्सित बुद्धि वाला वह विरोचन जब उस स्त्रीरूप के साथ रमण करने को उद्यत हुआ, तो सुन्दर दाँतोंवाली उस स्त्री ने कहा — भो [ दैत्य ] ! मेरी भी एक कामना है, वह यह कि पहले तुम अपने शरीर में तेल का अभ्यंग करो । उसके बाद ही मेरे साथ रमण करो। उस स्त्री का यह वचन सुनकर कामासक्त विरोचन ने वैसा ही किया ॥ ३५-३६ ॥ वह मुकुट को उतारकर सिर में तेल की मालिश करने लगा। उसी समय उस मुकुट के सौ टुकड़े हो गये । मुकुट के चूर्ण होने के समान ही वह विरोचन भी ( प्राप्त वरदान के अनुसार) मुकुट की गति को प्राप्त हुआ ॥ ३७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘विरोचनवधवर्णन’ नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २९ ॥

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