श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-13
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-त्रयोदशोऽध्यायः
तेरहवाँ अध्याय
श्रीराधाजी के रोष से भयभीत गंगा का श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण लेना, श्रीकृष्ण के प्रति राधा का उपालम्भ, ब्रह्माजी की स्तुति से राधा का प्रसन्न होना तथा गंगा का प्रकट होना
गङ्‌गोपाख्यानवर्णनम्

नारदजी बोले — हे सुरेश्वर ! कलि के पाँच हजार वर्ष व्यतीत हो जाने पर वे गंगा कहाँ चली गयीं ? हे महाभाग ! मुझे वह प्रसंग बताने की कृपा कीजिये ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले — हे नारद! सरस्वती के शाप के प्रभाव से वे गंगा भारतवर्ष में आयीं और पुनः शाप की अवधि बीत जाने पर श्रीहरि की इच्छा से वैकुण्ठ चली गयीं। इसी प्रकार सरस्वती और पद्मावतीनदी -स्वरूपिणी वे लक्ष्मी भी शाप के अन्त में भारत छोड़कर उन विष्णु लोक में चली गयीं ॥ २-३ ॥ हे ब्रह्मन् ! गंगा, सरस्वती और लक्ष्मी —ये तीनों ही भगवान् श्रीहरि की भार्याएँ हैं । साथ ही तुलसीसहित भगवान् श्रीहरि की चार स्त्रियाँ वेदों में कही गयी हैं ॥ ४ ॥

नारदजी बोले — हे भगवन् ! विष्णु के चरण- कमलों से प्रकट होकर वे गंगाजी किस प्रकार ब्रह्मा के कमण्डलु में स्थित हुईं और शिव की प्रिया के रूप में कैसे विख्यात हुईं ? हे मुनिश्रेष्ठ ! वे गंगा भगवान् नारायण की भी प्रेयसी किस प्रकार हुईं, वह सब मुझे बताने की कृपा कीजिये ॥ ५-६ ॥

श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] प्राचीन काल में द्रवरूपिणी वे गंगा गोलोक में विराजमान थीं। राधा और श्रीकृष्ण के अंग से आविर्भूत वे गंगा उन्हीं के अंश तथा स्वरूपवाली हैं ॥ ७ ॥ जलमयी गंगा की जो अधिष्ठात्री देवी हैं, वे अनुपम रूप धारणकर पृथ्वीलोक में आयीं। उनका श्रीविग्रह नूतन यौवन से सम्पन्न तथा सभी प्रकार के अलंकारों से विभूषित था ॥ ८ ॥ शरद् ऋतु के मध्याह्नकाल में खिले हुए कमल के समान प्रतीत होने वाला उनका मुखमण्डल मुसकान से युक्त तथा अत्यन्त मनोहर था । उनके शरीर का वर्ण तप्त स्वर्ण की आभा के समान तथा कान्ति शरत्कालीन चन्द्रमा के समान थी ॥ ९ ॥ वे स्निग्ध प्रभावाली देवी अत्यन्त दयालु मुद्रा में थीं। उनका स्वरूप शुद्ध तथा सात्त्विक था । उनके जघन स्थूल तथा कठोर थे। उनके नितम्बयुगल अत्यन्त सुन्दर थे ॥ १० ॥ उनका वक्ष:स्थल उन्नत, स्थूल, कठोर तथा गोल था। कटाक्षयुक्त तथा वक्राकार उनकी दोनों आँखें बड़ी सुन्दर थीं। मालती के पुष्प हार से सुसज्जित उनके केशपाश घुँघराले थे । उनका ललाट चन्दन के तिलक के साथ-साथ सिन्दूर की बिन्दियों से सुशोभित हो रहा था। उनके दोनों गण्डस्थलों पर कस्तूरी से मनोहर पत्र – रचनाएँ की हुई थीं । उनका अधरोष्ठ बन्धूक के पुष्प के समान अत्यन्त सुन्दर था । उनके दाँतों की अति उज्ज्वल पंक्ति पके हुए अनार के दानों की भाँति चमक रही थी। वे अग्नि के समान पवित्र तथा नीवीयुक्त दो वस्त्र धारण किये हुए थीं । कामभाववाली वे गंगाजी वस्त्र से मुँह ढँककर लज्जित होती हुई श्रीकृष्ण के पास विराजमान हो गयीं और प्रसन्न होकर अपलक नेत्रों से प्रभु के मुख- सौन्दर्य का निरन्तर पान करने लगीं। हर्ष के कारण नवीन संगम की लालसा से युक्त उन गंगा का मुखमण्डल प्रसन्नता से खिल उठा और उनके शरीर का रोम-रोम पुलकित हो गया। प्रभु श्रीकृष्ण के रूप से वे चेतनारहित – सी हो गयी थीं ॥ ११–१६१/२

इसी बीच राधिका वहाँ आकर विराजमान हो गयीं। उनके साथ तीस करोड़ गोपियाँ भी थीं। उनके शरीर की कान्ति करोड़ों चन्द्रमाओं की प्रभा के समान थी; कोप के कारण उनके मुख तथा नेत्र लाल कमल के समान प्रतीत हो रहे थे; उनके श्रीविग्रह का वर्ण पीले चम्पक-पुष्प के समान आभावाला था; वे मत्त गजराज की भाँति मन्द गतिवाली थीं; बहुमूल्य रत्नों से निर्मित अनेक प्रकार के आभूषणों से अलंकृत थीं; वे अपने शरीर पर अमूल्य रत्नों से जटित तथा अग्नि के समान पवित्र दो नीवीयुक्त बहुमूल्य पीले वस्त्र धारण किये हुए थीं, वे स्थल – कमल की सर्वोत्तम कान्ति को तिरस्कृत करने वाले, कोमल, सुरंजित तथा भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा प्रदत्त अर्घ्य से सुशोभित चरण-कमलों को धीरे-धीरे रख रही थीं; वे देवी रत्नों से बने हुए विमान से उतरकर वहाँ उपस्थित हुई थीं; स्वच्छ चँवर की वायु से ऋषियों के द्वारा उनकी सेवा की जा रही थी; कस्तूरी के बिन्दुओं से युक्त, चन्दन-मिश्रित, प्रज्वलित दीपक के समान आकार वाला तथा बिन्दुरूप में शोभायमान सिन्दूर उनके ललाट के मध्य भाग में सुशोभित हो रहा था, उनके सीमन्त (माँग)- ) – का निचला भाग परम स्वच्छ था, पारिजात के पुष्पों की माला से सुशोभित अपनी घुंघराली तथा सुन्दर अलकावली को कँपाती हुई वे स्वयं भी कम्पित हो रही थीं, ऐसी वे राधा रोष के कारण अपने सुन्दर तथा रागयुक्त ओष्ठ कँपाती हुई भगवान् श्रीकृष्ण के पास जाकर रत्नमय सुन्दर सिंहासन पर विराजमान हो गयीं । प्रभु श्रीकृष्ण की प्रिया उन राधा के साथ सखियों का महान् समुदाय विद्यमान था ॥ १७–२६ ॥

उन्हें देखते ही भगवान् श्रीकृष्ण आदरपूर्वक उठ खड़े हुए और आश्चर्यपूर्ण मुद्रा में मुसकराते हुए उनसे मधुर बातें करने लगे ॥ २७ ॥ उस समय अत्यन्त भयभीत गोपों ने सिर झुकाकर भगवती राधिका को प्रणाम किया और फिर वे भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे । साथ ही परमेश्वर श्रीकृष्ण ने भी राधिका की स्तुति की ॥ २८ ॥

तदनन्तर गंगा ने भी तुरन्त उठकर राधिका की बहुत स्तुति की। भयभीत उन गंगा ने अति विनम्रतापूर्वक राधा से कुशल पूछा ॥ २९ ॥ वे डर के मारे झुककर खड़ी थीं । उनके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये थे। उन्होंने ध्यानपूर्वक भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमल की शरण ली ॥ ३० ॥ अपने हृदयकमल पर स्थित उन गंगा को देखकर भगवान् श्रीकृष्ण ने उन भयभीत देवी को अभय प्रदान किया । सर्वेश्वर श्रीकृष्ण से वर पाकर देवी गंगा का चित्त शान्त हो गया ॥ ३१ ॥ तदनन्तर गंगा ने राधा को ऊँचे आसन पर विराजमान देखा। उनका रूप परम मनोहर था, उन्हें देखने में सुख प्राप्त हो रहा था और वे ब्रह्मतेज से देदीप्यमान हो रही थीं ॥ ३२ ॥ वे सनातन देवी सृष्टि के आरम्भ में असंख्य ब्रह्माओं की रचना करने वाली हैं और नवीन यौवन से युक्त कन्या के समान सदा बारह वर्ष की अवस्था में रहती हैं ॥ ३३ ॥ सम्पूर्ण विश्व में रूप तथा गुण में उनके समान कोई नहीं है। वे परम शान्त, कमनीय, अनन्त, आदि- अन्त से रहित, साध्वी, पवित्र, कल्याणमयी, सुन्दर भाग्यवाली तथा अपने स्वामी के सौभाग्य से सम्पन्न रहती हैं। वे सम्पूर्ण सुन्दरियों में श्रेष्ठ तथा सौन्दर्य से सुशोभित हैं ॥ ३४-३५ ॥ वे श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी हैं । तेज, आयु और कान्ति में वे श्रीकृष्ण के ही सदृश हैं। लक्ष्मीपति श्रीविष्णु के द्वारा लक्ष्मीसहित वे महालक्ष्मीस्वरूपा राधिका पूजित हैं ॥ ३६ ॥ वे राधिका परमात्मा श्रीकृष्ण की प्रभामयी सभा को अपनी कान्ति से सदा आच्छादित किये रहती हैं। वे सखियोंके द्वारा प्रदत्त दुर्लभ ताम्बूल का सदा सेवन करती रहती हैं ॥ ३७ ॥ वे स्वयं अजन्मा होती हुई भी सम्पूर्ण जगत् की जननी हैं। वे भगवान् श्रीकृष्ण को प्राणों से भी अधिक प्रिय, उनके प्राणों की अधिष्ठातृदेवी, धन्य, मान्य तथा मानिनी और मनोरम हैं ॥ ३८ ॥

[हे नारद!] उस समय उन रासेश्वरी राधिका को देखकर सुरेश्वरी गंगा तृप्त नहीं हुईं और वे अपलक नेत्रों से राधा की सौन्दर्य – सुधा का पान करने लगीं ॥ ३९ ॥ मुने ! इसी बीच शान्त तथा विनम्र स्वभाववाली राधा मुसकराकर मधुर वाणी में जगदीश्वर श्रीकृष्ण से कहने लगीं ॥ ४० ॥

राधा बोलीं — हे प्राणेश! पास में बैठकर आपके मुसकानयुक्त मुखकमल को मुसकराकर तिरछी दृष्टि से देखती हुई यह कामनायुक्त सुन्दरी कौन है ? अपना मुख वस्त्र से ढँककर आपके रूप को बार-बार देखती हुई पुलकित शरीर वाली यह सुन्दरी चेतनारहित हो जाया करती है ॥ ४१-४२ ॥ आप भी कामनायुक्त होकर उसकी ओर देखकर हँस रहे हैं। मेरे जीवित रहते गोलोक में ऐसी दुर्वृत्ति वाली स्त्री कैसे आयी ? और आप भी बार-बार दुश्चेष्टा करते जा रहे हैं। कोमल स्वभाववाली स्त्री-जाति होने के कारण प्रेमवश मैं आपको क्षमा कर दे रही हूँ ॥ ४३-४४ ॥ कामी व्रजेश्वर ! अपनी इस अभीष्ट प्रेयसी को लेकर आप अभी गोलोक से चले जाइये, अन्यथा आपका कल्याण नहीं है ॥ ४५ ॥

एक बार पूर्व में मैंने आपको चन्दनवन में विरजा के साथ देखा था । सखियों का वचन मानकर मैंने उस समय क्षमा कर दिया था ॥ ४६ ॥ मेरी ध्वनि सुनते ही आप उस समय छिप गये थे । विरजा ने वह शरीर त्याग दिया और उसने नदी का रूप धारण कर लिया था ॥ ४७ ॥ वे देवी आज भी एक करोड़ योजन चौड़ाई तथा उससे भी चार गुनी लम्बाईवाली आपकी सत् कीर्तिस्वरूपिणी नदी के रूप में विद्यमान हैं ॥ ४८ ॥ मेरे घर चले जाने पर आप पुनः उसके पास विरजे ! विरजे ! ऐसा कहते हुए जोर-जोर से जाकर रोने लगे थे ॥ ४९ ॥ तब उस सिद्धयोगिनी ने योगबल के प्रभाव से जल से बाहर निकलकर अलंकारयुक्त मूर्तिमती सुन्दरी के रूप में आपको दर्शन दिया था ॥ ५० ॥ उस समय आपने उसमें अपने तेज का आधान किया था और समयानुसार उससे सात समुद्र उत्पन्न हुए ॥ ५१ ॥

इसी प्रकार मैंने आपको शोभा नामक गोपी के साथ चम्पक वन में देखा था । उस समय भी मेरी ध्वनि सुनते ही आप छिप गये थे और वह शोभा शरीर छोड़कर चन्द्रमण्डल में चली गयी थी । तब उसका शरीर परम सुन्दर तथा तेजोमय हो गया था ॥ ५२-५३ ॥ तत्पश्चात् आपने दुःखित हृदय से उस तेज को विभक्त करके कुछ तेज रत्न को, कुछ स्वर्ण को, कुछ राजा को, कुछ नव पल्लवों को, कुछ पुष्पों को, कुछ श्रेष्ठ मणियों को, कुछ स्त्रियों के मुखकमल को, कुछ पके फलों को, कुछ फसलों को, कुछ राजाओं के सुसज्जित महलों को, कुछ नये पत्तों को और कुछ तेज दुग्ध को प्रदान कर दिया ॥ ५४–५६३ ॥

इसी प्रकार मैंने वृन्दावन में आपको प्रभा नामक गोपी के साथ देखा था । उस समय आप मेरा शब्द सुनते ही शीघ्रतापूर्वक छिप गये थे और प्रभा अपनी देह त्यागकर सूर्यमण्डल में चली गयी थी ॥ ५७-५८ ॥ उस समय उसका शरीर अत्यन्त तेजोमय हो गया था और आपने रोते-रोते उस तेज को प्रेमपूर्वक विभाजित करके जगह-जगह स्थान प्रदान कर दिया था। हे कृष्ण! लज्जा तथा मेरे भय के कारण आपकी आँखों से निकले हुए उस तेज को आपने कुछ अग्नि को, कुछ यक्षों को, कुछ राजाओं को, कुछ देवताओं को, कुछ विष्णुभक्तों को, कुछ नागों को, कुछ ब्राह्मण – मुनि तथा तपस्वियों को और कुछ तेज सौभाग्यवती स्त्रियों तथा यशस्वी पुरुषों को प्रदान कर दिया। इस प्रकार इन सबको वह तेज प्रदान करके पूर्व काल में आपने बहुत रुदन किया था ॥ ५९–६२१/२

इसी तरह एक बार मैंने आपको शान्ति नामक गोपी के साथ रासमण्डल में देखा था । वसन्त ऋतु में रत्नमय दीपकों से युक्त रत्ननिर्मित महल में आप माला धारण किये तथा शरीर में चन्दन लगाकर और विभिन्न प्रकार के आभूषण पहनकर अनेकविध रत्नाभूषणों से अलंकृत उसके साथ पुष्प की शय्या पर विराजमान थे। हे विभो ! पूर्वकाल में उसने आपको ताम्बूल दिया और आपने उसे प्रेमपूर्वक ग्रहण कर लिया था ॥ ६३-६५ ॥ हे प्रभो ! उस समय मेरा शब्द सुनकर आप तुरन्त छिप गये थे और वह शान्ति भय से अपना देह त्यागकर आपमें समाविष्ट हो गयी थी ॥ ६६ ॥ तब उसका शरीर उत्तम गुणों के रूप में परिणत हो गया । तदनन्तर रोते हुए आपने उसे विभाजित करके प्रेमपूर्वक विश्व में बाँट दिया था । हे प्रभो ! उसका कुछ अंश निकुंज में, कुछ भाग ब्राह्मणों में और कुछ भाग मुझ राधा में समाहित हो गया। हे विभो ! फिर आपने उसका कुछ भाग शुद्धस्वरूपा लक्ष्मी को, कुछ भाग अपने मन्त्र के उपासकों को, कुछ भाग शक्ति की आराधना करनेवालों को, कुछ भाग तपस्वियों को, कुछ भाग धर्म को और कुछ भाग धर्मात्मा पुरुषों को दे दिया ॥ ६७–६९ ॥

इसी तरह पूर्वकाल में मैंने आपको क्षमा नामक गोपी के साथ देखा था । आप सुन्दर वेष धारण करके, माला पहनकर तथा शरीर में गन्ध और चन्दन का लेप करके रत्नों के आभूषणों से अलंकृत और गन्ध- चन्दनचर्चित उस क्षमा के साथ पुष्प तथा चन्दन से सुरभित शय्या पर सुखपूर्वक अचेतावस्था में विराजमान थे। उस निद्राग्रस्त सुन्दरी के साथ आप सुखपूर्वक क्रीडामें संसक्त थे। उसी समय पहुँचकर मैंने उस क्षमा को तथा आपको जगाया था, इस बात को आप स्मरण कीजिये ॥ ७०-७२ ॥ उस समय मैंने आपका पीताम्बर, मनोहर मुरली, वनमाला, कौस्तुभ और बहुमूल्य रत्नमय कुण्डल ले लिया था। किंतु बाद में सखियों के प्रेमपूर्वक कहने पर उसे आपको लौटा दिया था । हे प्रभो ! उस समय आप लज्जा तथा पाप से कृष्णवर्ण के हो गये थे ॥ ७३-७४ ॥ तत्पश्चात् लज्जा के कारण क्षमा अपना शरीर त्यागकर पृथ्वी में समा गयी और उसका शरीर उत्तम गुणोंके रूप में परिणत हो गया । तब रोते हुए आपने उस क्षमा का विभाजन करके उसे प्रेमपूर्वक अनेक लोगों को दे दिया । उसका कुछ अंश विष्णु को, कुछ विष्णुभक्तों को, कुछ धार्मिक पुरुषों को, कुछ धर्म को, कुछ दुर्बलों को, कुछ तपस्वियों को, कुछ देवताओं को और कुछ भाग पण्डितों को आपने दे दिया था ॥ ७५- ७७ ॥ हे प्रभो ! यह सब मैंने आपको बता दिया । अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? आपके और भी बहुत-से बड़े-बड़े गुण हैं, किंतु मैं सब नहीं जानती ॥ ७८ ॥

श्रीकृष्ण से ऐसा कहकर लालकमल के समान नेत्रों वाली उन राधा ने नीचे की ओर मुख की हुई लज्जित साध्वी गंगा से कहना आरम्भ किया, तभी सिद्धयोगिनी वे गंगा योग के द्वारा सभी रहस्य  समझकर सभा के मध्य में अन्तर्धान होकर अपने जल में प्रविष्ट हो गयीं ॥ ७९-८० ॥ तब सिद्धयोगिनी राधा योगबल के प्रभाव से इस रहस्य को जानकर सर्वत्र विद्यमान उन जलस्वरूपिणी गंगा को अंजलि से उठाकर मुँह से पान करने लगीं ॥ ८१ ॥ तत्पश्चात् सिद्धयोगिनी गंगा योगबल से इस रहस्य को जान लेने के उपरान्त भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमल में प्रवेश कर गयीं और उनके शरणागत हो गयीं ॥ ८२ ॥ तब राधा ने गोलोक, वैकुण्ठ तथा ब्रह्मलोक आदि सभी स्थानों में गंगा को खोजा, किंतु उन्हें कहीं भी गंगा दिखायी नहीं दीं ॥ ८३ ॥ उस समय सर्वत्र जल का अभाव हो गया तथा सूखा कीचड़ और गोला दिखायी दे रहा था, जो जलचर जन्तुओं के मृत शरीरों से युक्त था ॥ ८४ ॥ सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अनन्त, धर्म, इन्द्र, चन्द्रमा, मनुगण, मुनिवृन्द, देवता, सिद्ध और तपस्वी-ये सभी गोलोक चले गये। उस समय उनके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये थे । वहाँ पहुँचकर उन सबने प्रकृति से भी परे, सर्वेश्वर, श्रेष्ठ, पूज्य, वरदायक, वरिष्ठ, वरके कारणस्वरूप, सभी गोपों तथा गोपिकाओं के समुदाय में सर्वश्रेष्ठ, कामनारहित, निराकार, आसक्तिहीन, निराश्रय, निर्गुण, निरुत्साह, निर्विकार, निर्दोष, अपनी इच्छा से साकार रूप में प्रकट होने वाले, भक्तों पर कृपा करने वाले, सत्त्वस्वरूप, सत्येश, सबके साक्षीस्वरूप तथा सनातन प्रभु श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। उन परम परमेश्वर परमात्मा सर्वेश्वर श्रीकृष्ण को प्रणाम करके वे सब भक्ति के कारण अपने मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति करने लगे। उस समय उनकी वाणी गद्गद हो गयी थी, उनकी आँखों में आँसू भर आये थे और उनके शरीर के रोम-रोम पुलकित हो गये थे ॥ ८५–९०१/२

इस प्रकार उन सबने सर्वेश्वर, परात्पर, ज्योतिर्मय विग्रह वाले, परब्रह्म तथा सभी कारणों के भी कारण, बहुमूल्य रत्नों से निर्मित, विचित्र सिंहासन पर विराजमान, गोपालों के द्वारा श्वेत चँवर डुलाकर सेवा किये जाते हुए, प्रसन्नतापूर्वक मुसकराते हुए, गोपिकाओं का नृत्यसंगीत देखने में संलग्न, राधा के लिये प्राणों से भी अधिक प्रिय, राधा वक्ष:स्थल में स्थित तथा उन राधा के द्वारा दिये गये सुवासित ताम्बूल का सेवन करते हुए उन परिपूर्णतम सुरेश्वर भगवान्‌ की स्तुति करके उन्हें रासमण्डल में विराजमान देखा। सभी मुनि, स्वायम्भुव आदि मनु, सिद्ध और तपस्वी महात्मा प्रसन्नचित्त हो गये, उन्हें महान् आश्चर्य हुआ। एक-दूसरे को देखकर वे सभी लोग जगत्प्रभु चतुर्मुख ब्रह्मासे अपना वांछित अभिप्राय कहने लगे ॥ ९१–९६१/२

उनका वचन सुनकर ब्रह्माजी भगवान् विष्णु को दाहिने और महादेव को बायें करके परम आनन्द से परिपूर्ण श्रीकृष्ण तथा परमानन्दस्वरूपिणी राधा के पास पहुँचे ॥ ९७-९८ ॥ उस समय ब्रह्माजी ने रासमण्डल में सब कुछ श्रीकृष्णमय देखा। सबकी वेष-भूषा एक समान थी, सभी लोग समान आसन पर विराजमान थे, सभी लोगों ने दो भुजाओं वाले श्रीकृष्ण के रूप में हाथ में मुरली ले रखी थी, सभी लोग वनमाला से सुशोभित थे, सबके मुकुट में मोर के पंख लगे थे, सभी लोग कौस्तुभमणि से शोभायमान हो रहे थे, गुण- भूषण-रूप – तेज – आयु और कान्ति से सम्पन्न उन सबका विग्रह अत्यन्त कोमल, सुन्दर तथा शान्त था, सब-के-सब परिपूर्णतम और सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न थे, उन्हें देखकर कौन सेव्य है तथा कौन सेवक है, यह बता सकने में वे ब्रह्मा असमर्थ थे, भगवान् श्रीकृष्ण क्षणभर में तेज: स्वरूप हो जाते थे और क्षणभर में ही विग्रहवान् होकर आसन पर विराजित हो जाते थे, इस प्रकार ब्रह्माजी ने एक ही क्षण में उनके साकार तथा निराकार दोनों प्रकार के रूपों को देखा ॥ ९९–१०१/२

तदनन्तर एक ही क्षण में ब्रह्माजी ने देखा कि वे परमेश्वर श्रीकृष्ण राधा से रहित हैं और फिर उसी क्षण वे राधिका के साथ प्रत्येक आसन पर विराजमान दिखायी देने लगे। ब्रह्माजी ने श्रीकृष्ण को राधा का रूप धारण किये हुए तथा राधा को श्रीकृष्ण का रूप धारण किये हुए देखा। इस प्रकार वहाँ कौन स्त्रीरूप में तथा कौन पुरुषरूप में है — इस रहस्य को जानने में वे ब्रह्मा भी अक्षम हो गये ॥ १०४-१०५ ॥ तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने अपने हृदयकमल पर विराजमान श्रीकृष्ण का ध्यान करके ध्याननेत्र से उनका दर्शन किया और स्त्री-पुंभावविषयक संशय का अनेक प्रकार से निराकरण करते हुए भक्तिपूर्वक उनका स्तवन किया ॥ १०६ ॥ इसके बाद भगवान्‌ की आज्ञा से उन्होंने अपने नेत्र खोलकर देखा कि वे अद्वितीय श्रीकृष्ण राधिका के वक्ष:स्थल पर स्थित हैं, वे अपने पार्षदों से घिरे हुए हैं और गोपिकाओं के समुदाय से सुशोभित हो रहे हैं। तदनन्तर उन ब्रह्मा आदि देवताओं ने परमेश्वर श्रीकृष्ण का दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और फिर उनकी स्तुति की ॥ १०७-१०८ ॥ तदनन्तर सभी प्राणियों के आत्मस्वरूप, सब कुछ जानने वाले, सर्वेश्वर तथा सबका सृजन करने वाले लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण उन देवताओं का अभिप्राय समझकर उनसे कहने लगे ॥ १०९ ॥

श्रीभगवान् बोले — हे ब्रह्मन् ! आपका कुशल हो, आइये । हे कमलापते ! आइये। हे महादेव ! यहाँ आइये । आप लोगों का सदा कुशल हो। आप सभी महाभाग गंगा को ले जाने के लिये यहाँ आये हुए हैं, किंतु गंगाजी तो इस समय भयभीत होकर मेरे चरणकमल में शरणागत हो गयी हैं । जब वे गंगा मेरे सांनिध्य में थी, तब उन्हें देखकर पी जाने के लिये राधिका उद्यत हो गयी थीं, इसलिये वे मेरे सांनिध्य में आ गयीं। मैं आप लोगों को उन्हें अवश्य दे दूँगा, किंतु आप लोग पहले उन्हें भयमुक्त कीजिये ॥ ११०–११२ ॥

[ हे नारद! ] श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर कमलयोनि ब्रह्मा मुसकराने लगे और वे भक्ति के कारण अपना मस्तक झुकाकर चारों मुखों से सबकी आराध्या तथा श्रीकृष्ण के द्वारा सुपूजित राधिका की स्तुति करने लगे । उनकी स्तुति करके चारों वेदों को धारण करने वाले चतुर्मुख ब्रह्मा राधा से इस प्रकार कहने लगे ॥ ११३-११४ ॥

चतुरानन बोले — भगवान् शंकर की संगीत-ध्वनि मुग्ध आपके तथा प्रभु श्रीकृष्ण के द्रवरूप में परिणत हुए अंग से वह गंगा रासमण्डल में प्रकट हुई थीं ॥ ११५ ॥ अतः आप तथा श्रीकृष्ण के अंशस्वरूप होने के कारण आपकी प्रिय पुत्री के तुल्य ये गंगा आपका मन्त्र ग्रहण करके आपकी पूजा करें। [इसके फलस्वरूप] वैकुण्ठ के अधिपति चतुर्भुज भगवान् श्रीहरि इनको पति के रूप में प्राप्त होंगे और साथ ही अपनी एक कला से जब ये भूमण्डल पर जायँगी, उस समय लवणसमुद्र भी इनके पति बनेंगे ॥ ११६-११७ ॥ अम्बिके! ये गंगा जैसे गोलोक में हैं, वैसे ही इन्हें सर्वत्र रहना चाहिये । आप देवेश्वरी इनकी माता हैं और वे सदा आपकी पुत्री हैं ॥ ११८ ॥

[हे नारद!] ब्रह्मा का यह वचन सुनकर राधा ने हँसते हुए सभी बातें स्वीकार कर लीं। तब वे गंगा श्रीकृष्ण के चरण के अँगूठे के नख के अग्रभाग से बाहर निकलीं। वहाँ सब लोगों ने उनका सत्कार किया और वे सबके मध्य शान्त होकर स्थित रहीं। तब जलस्वरूपा गंगा की अधिष्ठात्री देवी जल से निकलकर वहीं पर विराजमान हो गयीं ॥ ११९-१२० ॥ उस समय ब्रह्माजी ने गंगा का कुछ जल अपने कमण्डलु में रख लिया और कुछ जल चन्द्रशेखर भगवान् शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया ॥ १२१ ॥ तदनन्तर कमलयोनि ब्रह्मा ने गंगा को राधा-मन्त्र प्रदान किया और उन्हें राधा के स्तोत्र, कवच, ध्यान और पूजा की विधि तथा पुरश्चर्याक्रम — इन सभी सामवेद-प्रतिपादित अनुष्ठानों के विषय में बतलाया। गंगा ने इन नियमों के द्वारा उन राधा की विधिवत् पूजा करके नारायण के साथ वैकुण्ठ के लिये प्रस्थान किया ॥ १२२-१२३ ॥ हे मुने! लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा और विश्वपावनी तुलसी — ये चारों देवियाँ भगवान् नारायण की ही पत्नियाँ हैं ॥ १२४ ॥ इसके बाद वे श्रीकृष्ण हँसकर उन ब्रह्मा को दुर्बोध, सूक्ष्म तथा सामयिक वृत्तान्त बताने लगे ॥ १२५ ॥

श्रीकृष्ण बोले — हे ब्रह्मन् ! आप गंगा को ग्रहण कीजिये। हे विष्णो! हे महेश्वर ! हे ब्रह्मन् ! आपलोग ध्यानपूर्वक काल का वृत्तान्त मुझसे सुनिये ॥ १२६ ॥ आपलोग तथा अन्य देवता, मुनि, मनुगण, सिद्ध तथा यशस्वीजन — जो-जो यहाँ आये हुए हैं — केवल ये लोग ही कालचक्र के प्रभाव से रहित इस गोलोक में जीवित हैं। इस समय कल्पक्षय के कारण सम्पूर्ण विश्व जल में आप्लावित हो गया है । अन्य ब्रह्माण्डों में रहने वाले जो ब्रह्मा आदि देवता हैं, वे मुझमें विलीन हो गये हैं । हे पद्मज ! इस समय केवल वैकुण्ठ को छोड़कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जल में डूबा हुआ है । आप जाकर ब्रह्मलोक आदि लोकों की पुनः सृष्टि कीजिये । आप अपने ब्रह्माण्ड की रचना कीजिये, इसके बाद गंगा वहाँ जायँगी ॥ १२७–१३० ॥ इसी प्रकार इस सृष्टि के अवसर पर मैं अन्य ब्रह्माण्डों में भी ब्रह्मा आदि की रचना का प्रयत्न कर रहा हूँ। अब आप देवताओं के साथ यहाँ से शीघ्र जाइये । आपका बहुत समय बीत चुका है, न जाने कितने ब्रह्मा समाप्त हो गये और न जाने कितने ब्रह्मा अभी होंगे ॥ १३१-१३२ ॥

हे मुने! ऐसा कहकर राधिकानाथ भगवान् श्रीकृष्ण अन्तः पुर में चले गये और ब्रह्मा आदि देवता वहाँ से चलकर प्रयत्नपूर्वक सृष्टिकार्य में संलग्न हो गये ॥ १३३ ॥ तब गोलोक, वैकुण्ठ, शिवलोक और ब्रह्मलोक तथा अन्यत्र भी जिस-जिस स्थान पर गंगा को रहने के लिये परमात्मा श्रीकृष्ण ने आज्ञा दी थी, उस उसपर वे गंगा चली गयीं। वे गंगा भगवान् विष्णु के चरणकमल से निकली हैं, इसलिये वे विष्णुपदी कही गयी हैं ॥ १३४-१३५ ॥ हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने आपसे गंगा के इस सर्वोत्तम, सुखदायक, मोक्षप्रद तथा सारगर्भित उपाख्यान का वर्णन कर दिया। अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं ? ॥ १३६ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘गंगोपाख्यानवर्णन’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

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