May 23, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-14 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-चतुर्दशोऽध्यायः चौदहवाँ अध्याय गंगा के विष्णु पत्नी होने का प्रसंग गङ्गायाः कृष्णपत्नीत्ववर्णनम् नारदजी बोले — [ हे प्रभो ! ] यह तो मैंने आपसे सुन लिया कि लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा और विश्वपावनी तुलसी — ये चारों ही भगवान् नारायण की पत्नियाँ हैं और उनमें से गंगा वैकुण्ठ चली गयीं। किंतु वे गंगा विष्णु की पत्नी कैसे हुईं — यह प्रसंग मैंने नहीं सुना ॥ १-२ ॥ श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] जब गंगाजी वैकुण्ठ चली गयीं, उसके पश्चात् जगत् की रचना करने वाले ब्रह्माजी भी वहाँ पहुँचे। गंगा के साथ जगदीश्वर विष्णु के पास पहुँचकर उन्हें प्रणाम करके वे उनसे कहने लगे ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी बोले — राधा और श्रीकृष्ण के अंग से आविर्भूत जो द्रवरूपिणी देवी गंगा हैं, वे इस समय नवीन यौवन से सम्पन्न तथा उत्तम स्वभाव-वाली श्रेष्ठ सुन्दरी के रूप में विराजमान हैं। ये देवी शुद्धसत्त्वस्वरूपिणी तथा क्रोध और अहंकार से रहित हैं। उन श्रीकृष्ण के अंग से प्रादुर्भूत ये गंगा उन्हें छोड़कर किसी अन्य का पतिरूप में वरण नहीं करना चाहतीं ॥ ४-५ ॥ किंतु अतिमानिनी राधा वहाँ विद्यमान हैं । वे श्रेष्ठ तथा तेजस्विनी राधा इन गंगा को पी जाने के लिये उद्यत थीं। इससे अत्यन्त भयभीत ये गंगा बड़ी बुद्धिमानी के साथ परमात्मा श्रीकृष्ण के चरणकमल में समाविष्ट हो गयीं ॥ ६१/२ ॥ उस समय सर्वत्र ब्रह्माण्ड-गोलक को शुष्क हुआ देखकर मैं गोलोक गया, जहाँ पर सर्वान्तर्यामी श्रीकृष्ण सम्पूर्ण वृत्तान्त जानने के लिये विराजमान थे। उन्होंने सबका अभिप्राय समझकर अपने चरण के अँगुष्ठ-नख के अग्रभाग से गंगा को बाहर निकाल दिया । तब मैंने इन गंगा को राधिका-मन्त्र प्रदानकर इनके जल से ब्रह्माण्ड – गोलक को पूर्ण करके उन राधा तथा राधापति श्रीकृष्ण को प्रणाम करके मैं इन्हें साथ लेकर यहाँ आया । हे प्रभो ! अब आप गान्धर्व-विवाह के द्वारा इन सुरेश्वरी गंगा को स्वीकार कर लीजिये । श्रेष्ठ देवताओं में आप परम रसिक हैं और यहाँ विराजमान ये गंगा भी रसिका हैं । हे देवेश ! आप पुरुषों में रत्न हैं और ये साध्वी गंगा भी स्त्रियों में रत्न हैं । विदग्ध नारी का विदग्ध पुरुष के साथ सम्मिलन कल्याणकारी होता है ॥ ७–१११/२ ॥ जो पुरुष स्वतः प्राप्त कन्या को नहीं ग्रहण करता, उससे महालक्ष्मी रुष्ट हो जाती हैं और उसे छोड़कर चली जाती हैं; इसमें सन्देह नहीं है । जो विद्वान् होता है, वह कभी प्रकृति का अपमान नहीं करता ॥ १२-१३ ॥ सभी पुरुष प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं और स्त्रियाँ भी उसी प्रकृति की कलाएँ हैं । केवल आप भगवान् जगन्नाथ ही निर्गुण और प्रकृति से परे हैं ॥ १४ ॥ वे श्रीकृष्ण ही आधे अंग से दो भुजा वाले श्रीकृष्ण बने रहे और आधे भाग से चतुर्भुज हो गये। इसी प्रकार पूर्वकाल में श्रीकृष्ण के वाम अंग से प्रादुर्भूत राधा भी दो भागों में विभक्त हो गयी थीं । दाहिने अंश से तो वे स्वयं राधा बनी रहीं और बायें अंश से कमला हो गयीं। इसलिये ये गंगा आपको ही पतिरूप में वरण करना चाहती हैं; क्योंकि ये आपके ही देह से उत्पन्न हुई हैं । हे प्रभो ! प्रकृति और पुरुष की भाँति स्त्री-पुरुष दोनों का शरीर एक ही होता है ॥ १५-१६१/२ ॥ ऐसा कहकर वे ब्रह्माजी श्रीहरि को गंगा सौंपकर वहाँ से चल दिये। तत्पश्चात् नारायण श्रीहरि ने गंगा का पुष्प- चन्दनचर्चित हाथ पकड़कर गान्धर्व विवाह – विधि के अनुसार उन्हें पत्नीरूप में ग्रहण किया। इसके बाद वे रमापति श्रीहरि गंगा के साथ प्रसन्नतापूर्वक विहार करने लगे। इस प्रकार जो गंगा पृथ्वी पर गयी हुई थीं, वे अपने स्थान पर पुनः आ गयीं। ये गंगा भगवान् विष्णु के चरण-कमल से निकली हैं, इसलिये विष्णुपदी – इस नाम से विख्यात हुईं ॥ १७–१९१/२ ॥ अब रसिकेश्वर भगवान् श्रीहरि के साथ प्रथम रतिक्रीड़ा में अतिशय सुखानुभूति के कारण वे रसिका देवी गंगा मूर्च्छित हो गयीं । उन गंगा को देखकर सरस्वती नित्य दुःखित रहती थीं । लक्ष्मी के बार-बार मना करने पर भी सरस्वती उन गंगा से सदा ईर्ष्या करती थीं, किंतु गंगा ने सरस्वती के प्रति ऐसा नहीं किया । अन्त में विष्णुप्रिया गंगा ने कोप करके सरस्वती को भारतवर्ष में जाने का शाप दे दिया था ॥ २०-२२ ॥ हे मुने! इस प्रकार उन रमापति श्रीहरि की गंगासहित तीन भार्याएँ हैं। इसके बाद में तुलसी को लेकर उनकी चार पत्नियाँ हुईं ॥ २३ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘गंगा का कृष्णपत्नीत्व वर्णन’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe