श्रीमद्भागवतमहापुराण – एकादशः स्कन्ध – अध्याय १०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
दसवाँ अध्याय
लौकिक तथा पारलौकिक भोगों की असारता का निरूपण

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं — प्यारे उद्धव ! साधक को चाहिये कि सब तरह से मेरी शरण में रहकर (गीता, पाञ्चरात्र आदि में) मेरे द्वारा उपदिष्ट अपने धर्मों का सावधानी से पालन करे । साथ ही जहाँ तक उनसे विरोध न हो वहाँ तक निष्काम-भाव से अपने वर्ण, आश्रम और कुल के अनुसार सदाचार का भी अनुष्ठान करे ॥ १ ॥ निष्काम होने का उपाय यह है कि स्वधर्मों का पालन करने से शुद्ध हुए अपने चित्त में यह विचार करे कि जगत् के विषयी प्राणी शब्द, स्पर्श, रूप आदि विषयों को सत्य समझकर उनकी प्राप्ति के लिये जो प्रयत्न करते हैं, उसमें उनका उद्देश्य तो यह होता है कि सुख मिले; परन्तु मिलता है — दुःख ॥ २ ॥ इसके सम्बन्ध में ऐसा विचार करना चाहिये कि स्वप्न-अवस्था में और मनोरथ करते समय जाग्रत् अवस्था में भी मनुष्य मन-ही-मन अनेक प्रकार के विषयों का अनुभव करता है, परन्तु उसकी वह सारी कल्पना वस्तु-शून्य होने के कारण व्यर्थ हैं । वैसे ही इन्द्रियों के द्वारा होनेवाली भेद-बुद्धि भी व्यर्थ ही है, क्योंकि यह भी इन्द्रिय-जन्य और नाना वस्तु-विषयक होने के कारण पूर्ववत् असत्य ही हैं ॥ ३ ॥ जो पुरुष मेरी शरण में हैं, उसे अन्तर्मुख करनेवाले निष्काम अथवा नित्यकर्म ही करने चाहिये । उन कर्मों का बिल्कुल परित्याग कर देना चाहिये, जो बहिर्मुख बनानेवाले अथवा सकाम हों । जब आत्मज्ञान की उत्कट इच्छा जाग उठे, तब तो कर्म-सम्बन्धी विधि-विधानों का भी आदर नहीं करना चाहिये ॥ ४ ॥

अहिंसा आदि यमों का तो आदरपूर्वक सेवन करना चाहिये, परन्तु शौच (पवित्रता) आदि नियमों का पालन शक्ति के अनुसार और आत्मज्ञान के विरोधी न होने पर ही करना चाहिये । जिज्ञासु पुरुष के लिये यम और नियमों के पालन से भी बढ़कर आवश्यक बात यह है कि वह अपने गुरु की, जो मेरे स्वरूप को जाननेवाले और शान्त हों, मेरा ही स्वरूप समझकर सेवा करे ॥ ५ ॥ शिष्य को अभिमान न करना चाहिये । वह कभी किसी से डाह न करे — किसी का बुरा न सोचे । वह प्रत्येक कार्य में कुशल हो — उसे आलस्य छू न जाय । उसे कहीं भी ममता न हो, गुरु के चरणों में दृढ़ अनुराग हो । कोई काम हड़बड़ाकर न करे — उसे सावधानी से पूरा करे । सदा परमार्थ के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा बनाये रखे । किसी के गुणों में दोष न निकाले और व्यर्थ की बात न करे ॥ ६ ॥ जिज्ञासु का परम धन है आत्मा; इसलिये वह स्त्री-पुत्र, घर-खेत, स्वजन और धन आदि सम्पूर्ण पदार्थों में एक सम आत्मा को देखे और किसी में कुछ विशेषता का आरोप करके उससे ममता न करे, उदासीन रहे ॥ ७ ॥

उद्धव ! जैसे जलनेवाली लकड़ी से उसे जलाने और प्रकाशित करनेवाली आग सर्वथा अलग है । ठीक वैसे ही विचार करने पर जान पड़ता हैं कि पञ्चभूतों का बना स्थूल-शरीर और मन-बुद्धि आदि सत्रह तत्त्वों का बना सूक्ष्म-शरीर दोनों ही दृश्य और जड़ हैं । तथा उनको जानने और प्रकाशित करनेवाला आत्मा साक्षी एवं स्वयं-प्रकाश है । शरीर अनित्य, अनेक एवं जड हैं । आत्मा नित्य, एक एवं चेतन है । इस प्रकार देह की अपेक्षा आत्मा में महान् विलक्षणता है । अतएव देह से आत्मा भिन्न है ॥ ८ ॥ जब आग लकड़ी में प्रज्वलित होती है, तब लकड़ी के उत्पत्ति-विनाश, बड़ाई-छोटाई और अनेकता आदि सभी गुण वह स्वयं ग्रहण कर लेती है । परन्तु सच पूछो, तो लकड़ी के उन गुणों से आग का कोई सम्बन्ध नहीं है । वैसे ही जब आत्मा अपने को शरीर मान लेता है, तब वह देह के जडता, अनित्यता, स्थूलता, अनेकता आदि गुणों से सर्वथा रहित होने पर भी उनसे युक्त जान पड़ता है ॥ ९ ॥

ईश्वर के द्वारा नियन्त्रित माया के गुणों ने ही सूक्ष्म और स्थूल शरीर का निर्माण किया है । जीव को शरीर और शरीर को जीव समझ लेने के कारण ही स्थूल शरीर के जन्म-मरण और सूक्ष्मशरीर के आवागमन का आत्मा पर आरोप किया जाता हैं । जीव को जन्म-मृत्युरूप संसार इसी भ्रम अथवा अध्यास के कारण प्राप्त होता है । आत्मा के स्वरूप का ज्ञान होने पर उसकी जड़ कट जाती है ॥ १० ॥ प्यारे उद्धव ! इस जन्म-मृत्युरूप संसार का कोई दुसरा कारण नहीं, केवल अज्ञान ही मूल कारण हैं । इसलिये अपने वास्तविक स्वरूप को — आत्मा को जानने की इच्छा करनी चाहिये । अपना यह वास्तविक स्वरूप समस्त प्रकृति और प्राकृत जगत् से अतीत, द्वैत की गन्ध से रहित एवं अपने आप में ही स्थित है । उसका और कोई आधार नहीं हैं । उसे जानकर धीरे-धीरे स्थूल-शरीर, सूक्ष्म शरीर आदि में जो सत्यत्व-बुद्धि हो रही है, उसे क्रमशः मिटा देना चाहिये ॥ ११ ॥ (यज्ञ में जब अरणि-मन्थन करके अग्नि उत्पन्न करते हैं, तो उसमें नीचे-ऊपर दो लकड़ियाँ रहती हैं और बीच में मन्थन-काष्ठ रहता हैं, वैसे ही) विद्यारुप अग्नि की उत्पत्ति के लिये आचार्य और शिष्य तो नीचे-ऊपर की अरणियाँ हैं तथा उपदेश मन्थन-काष्ठ है । इनसे जो ज्ञानाग्नि प्रज्वलित होती है, वह विलक्षण सुख देनेवाली है । इस यज्ञ में बुद्धिमान् शिष्य सद्गुरु के द्वारा जो अत्यन्त विशुद्ध ज्ञान प्राप्त करता है, वह गुणों से बनी हुई विषयों की माया को भस्म कर देता है । तत्पश्चात् वे गुण भी भस्म हो जाते हैं, जिनसे कि यह संसार बना हुआ है । इस प्रकार सबके भस्म हो जाने पर जब आत्मा के अतिरिक्त और कोई वस्तु शेष नहीं रह जाती, तब वह ज्ञानाग्नि भी ठीक वैसे ही अपने वास्तविक स्वरूप में शान्त हो जाती हैं, जैसे समिधा न रहने पर आग बुझ जाती है ॥ १२-१३ ॥

प्यारे उद्धव ! यदि तुम कदाचित् कर्मों के कर्ता और सुख-दुख के भोक्त जीवों को अनेक तथा जगत्, काल, वेद और आत्माओं को नित्य मानते हो; साथ ही समस्त पदार्थों की स्थिति-प्रवाह से नित्य और यथार्थ स्वीकार करते हो तथा यह समझते हो कि घट-पट आदि बाह्य आकृतियों के भेद से उनके अनुसार ज्ञान ही उत्पन्न होता और बदलता रहता है; तो ऐसे मत के मानने से बड़ा अनर्थ हो जायगा, (क्योंकि इस प्रकार जगत् के कर्ता आत्मा की नित्य सत्ता और जन्म-मृत्यु के चक्कर से मुक्ति भी सिद्ध न हो सकेगी।) यदि कदाचित् ऐसा स्वीकार भी कर लिया जाय तो देह और संवत्सरादि कालावयवों के सम्बन्ध से होनेवाली जीवों की जन्म-मरण आदि अवस्थाएँ भी नित्य होने के कारण दूर न हो सकेंगी; क्योंकि तुम देहादि पदार्थ और काल की नित्यता स्वीकार करते हो । इसके सिवा, यहाँ भी कर्मों का कर्ता तथा सुख-दुःख का भोक्ता जीव परतन्त्र ही दिखायी देता है; यदि वह स्वतन्त्र हो तो दुःख का फल क्यों भोगना चाहेगा ? इस प्रकार सुख-भोग की समस्या सुलझ जाने पर भी दुःख-भोग की समस्या तो उलझी ही रहेगी । अतः इस मत के अनुसार जीव को कभी मुक्ति या स्वतन्त्रता प्राप्त न हो सकेगी । जन जीव स्वरूपतः परतन्त्र है, विवश है, तब तो स्वार्थ या परमार्थ कोई भी उसका सेवन न करेगा । अर्थात् वह स्वार्थ और परमार्थ दोनों से ही वञ्चित रह जायगा ॥ १४-१७ ॥

(यदि यह कहा जाय कि जो भलीभाँति कर्म करना जानते हैं, वे सुखी रहते हैं और जो नहीं जानते उन्हें दुःख भोगना पड़ता है तो यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि) ऐसा देखा जाता है कि बड़े-बड़े कर्मकुशल विद्वानों को भी कुछ सुख नहीं मिलता और मूढों का भी कभी दुःख से पाला नहीं पड़ता । इसलिये जो लोग अपनी बुद्धि या कर्म से सुख पाने का घमंड करते हैं, उनका वह अभिमान व्यर्थ है ॥ १८ ॥ यदि यह स्वीकार कर लिया जाय कि वे लोग सुख की प्राप्ति और दुःख के नाश का ठीक-ठीक उपाय जानते हैं, तो भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि उन्हें भी ऐसे उपाय का पता नहीं है, जिससे मृत्यु उनके ऊपर कोई प्रभाव न डाल सके और वे कभी मरे ही नहीं ॥ १९ ॥ जब मृत्यु उनके सिर पर नाच रहीं हैं, तब ऐसी कौन-सी भोग-सामग्री या भोग-कामना हैं, जो उन्हें सुखी कर सके ? भला जिस मनुष्य को फाँसी पर लटकाने के लिये वध-स्थान पर ले जाया जा रहा है, उसे क्या फूल-चन्दन-स्त्री आदि पदार्थ सन्तुष्ट कर सकते हैं ? कदापि नहीं । (अतः पूर्वोक्त मत माननेवालों की दृष्टि से न सुख ही सिद्ध होगा और न जीव का कुछ पुरुषार्थ ही रहेगा) ॥ २० ॥

प्यारे उद्धव ! लौकिक सुख के समान पारलौकिक सुख भी दोषयुक्त ही है; क्योंकि वहाँ भी बराबरीवालों से होड़ चलती है, अधिक सुख भोगनेवालों के प्रति असूया होती है उनके गुणों में दोष निकाला जाता है और छोटों से घृणा होती है । प्रतिदिन पुण्य क्षीण होने के साथ ही वहाँ के सुख भी क्षय के निकट पहुँचते रहते हैं और एक दिन नष्ट हो जाते हैं । वहाँ की कामना पूर्ण होने में भी यजमान, ऋत्विज् और कर्म आदि की त्रुटियों के कारण बड़े-बड़े विघ्नों की सम्भावना रहती है । जैसे हरी-भरी खेती भी अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदि के कारण नष्ट हो जाती है, वैसे ही स्वर्ग भी प्राप्त होते-होते विघ्नों के कारण नहीं मिल पाता ॥ २१ ॥ यदि यज्ञ-यागादि धर्म बिना किसी विघ्न के पूरा हो जाय, तो उसके द्वारा जो स्वर्गादि लोक मिलते हैं, उनकी प्राप्ति का प्रकार मैं बतलाता हूँ, सुनो ॥ २२ ॥ यज्ञ करनेवाला पुरुष यज्ञों के द्वारा देवताओं की आराधना करके स्वर्ग में जाता है और वहाँ अपने पुण्यकर्मों के द्वारा उपार्जित दिव्य भोगों को देवताओं के समान भोगता है ॥ २३ ॥

उसे उसके पुण्यों के अनुसार एक चमकीला विमान मिलता है और वह उस पर सवार होकर सुर-सुन्दरियों के साथ विहार करता है । गन्धर्वगण उसके गुणों का गान करते हैं और उसके रूप-लावण्य को देखकर दूसरों का मन लुभा जाता है ॥ २४ ॥ उसका विमान वह जहाँ ले जाना चाहता है, वहीं चला जाता है और उसकी घंटियाँ घनघनाकर दिशाओं को गुञ्जारित करती हैं । वह अप्सराओं के साथ नन्दनवन आदि देवताओं की विहार-स्थलियों में क्रीड़ाएँ करते-करते इतना बेसुध हो जाता है कि उसे इस बात का पता ही नहीं चलता कि अब मेरे पुण्य समाप्त हो जायेंगे और मैं यहाँ से ढकेल दिया जाऊँगा ॥ २५ ॥ जब तक उसके पुण्य शेष रहते हैं, तब तक वह स्वर्ग में चैन की वंशी बजाता रहता है; परन्तु पुण्य क्षीण होते ही इच्छा न रहने पर भी उसे नीचे गिरना पड़ता है, क्योंकि काल की चाल ही ऐसी है ॥ २६ ॥

यदि कोई मनुष्य दुष्टों की संगति में पड़कर अधर्मपरायण हो जाय, अपनी इन्द्रियों के वश में होकर मनमानी करने लगे, लोभवश दाने-दाने में कृपणता करने लगे, लम्पट हो जाय अथवा प्राणियों को सताने लगे और विधि-विरुद्ध पशुओं की बलि देकर भूत और प्रेतों की उपासना में लग जाय, तब तो वह पशुओं से भी गया-बीता हो जाता हैं और अवश्य ही नरक में जाता है । उसे अन्त में घोर अन्धकार, स्वार्थ और परमार्थ से रहित अज्ञान में ही भटकना पड़ता है ॥ २७-२८ ॥ जितने भी सकाम और बहिर्मुख करनेवाले कर्म हैं, उनका फल दुःख ही है । जो जीव शरीर में अहंता-ममता करके उन्हीं में लग जाता है, उसे बार-बार जन्म-पर-जन्म और मत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती रहती है । ऐसी स्थिति में मृत्युधर्मा जीव को क्या सुख हो सकता है ? ॥ २९ ॥ सारे लोक और लोकपालों की आयु भी केवल एक कल्प हैं, इसलिये मुझसे भयभीत रहते हैं । औरों की तो बात ही क्या, स्वयं ब्रह्मा भी मुझसे भयभीत रहते हैं, क्योंकि उनकी आयु भी काल से सीमित — केवल दो परार्द्ध है ॥ ३० ॥

सत्त्व, रज और तम — ये तीनों गुण इन्द्रियों को उनके कर्मों में प्रेरित करते हैं और इन्द्रियाँ कर्म करती हैं । जीव अज्ञानवश सत्व, रज आदि गुणों और इन्द्रियों को अपना स्वरूप मान बैठता है और उनके किये हुए कर्मों का फल सुख-दुःख भोगने लगता है ॥ ३१ ॥ जब तक गुणों की विषमता है अर्थात् शरीरादि में मैं और मेरेपन का अभिमान है, तभी तक आत्मा के एकत्स की अनुभूति नहीं होती — वह अनेक ज्ञान पड़ता है; और जब तक आत्मा की अनेकता है, तब तक तो उन्हें काल अथवा कर्म किसी के अधीन रहना ही पड़ेगा ॥ ३२ ॥ जब तक परतन्त्रता है, तब तक ईश्वर से भय बना ही रहता है । जो मैं और मेरेपन के भाव से ग्रस्त रहकर आत्मा की अनेकता, परतन्त्रता आदि मानते हैं और वैराग्य न ग्रहण करके बहिर्मुख करनेवाले कर्मों का ही सेवन करते रहते हैं, उन्हें शोक और मोह की प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥ प्यारे उद्धव ! जब माया के गुणों में क्षोभ होता है, तब मुझ आत्मा को ही काल, जीव, वेद, लोक, स्वभाव और धर्म आदि अनेक नामों से निरूपण करने लगते हैं । (ये सब मायामय हैं । वास्तविक सत्य मैं आत्मा ही हूँ) ॥ ३४ ॥

उद्धवजी ने पूछा — भगवन् ! यह जीव देह आदि रूप गुणों में ही रह रहा है । फिर देह से होनेवाले कर्मों या सुख-दुःख आदि रूप फलों में क्यों नहीं वैधता है ? अथवा यह आत्मा गुणों से निर्लिप्त हैं, देह आदि के सम्पर्क से सर्वथा रहित है, फिर इसे बन्धन की प्राप्ति कैसे होती है ? ॥ ३५ ॥ बद्ध अथवा मुक्त पुरुष कैसा बर्ताव करता है, वह कैसे विहार करता है, या वह किन लक्षणों से पहचाना जाता है, कैसे भोजन करता है ? और मल-त्याग आदि कैसे करता है ? कैसे सोता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है ? ॥ ३६ ॥ अच्युत ! प्रश्न का मर्म जानने वालों में आप श्रेष्ठ हैं । इसलिये आप मेरे इस प्रश्न का उत्तर दीजिये — एक ही आत्मा अनादि गुणों के संसर्ग से नित्यबद्ध भी मालूम पड़ता है और असङ्ग होने के कारण नित्यमुक्त भी । इस बात को लेकर मुझे भ्रम हो रहा है ॥ ३७ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां एकादशस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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