श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-60
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
साठवाँ अध्याय
वृत्रासुर के वध के लिये देवराज इन्द्र का दधीचि से अस्थियाँ माँगना, दधीचि का प्राण-त्याग, इन्द्र द्वारा दधीचि की अस्थियों से वज्र बनाकर वृत्रासुर का संहार
अथः षष्टितमोऽध्यायः
दधीचिप्राणत्यागे देवराजस्य ब्रह्महत्यावर्णनं

श्रीनारदजी बोले — देवदेव ! महेश्वर ! प्रभो ! जिस तरह से इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप लगा, जिस तरह से वे महामति इन्द्र तथा ब्रह्मा आदि देवता महाकाली के दर्शन की इच्छा से गये, जिस प्रकार से वे ब्रह्मा आदि देवगण देवाधिदेव शिव की कृपा से सभी लोक को पार करके उन भगवती के लोक में पहुँचे और वे भैरवों द्वारा रक्षित उनके पुर के द्वारों को पार कर अन्तःपुर में गये तथा जिस तरह उन्होंने देवी को देखा एवं उन भगवती की जैसी मूर्ति का दर्शन किया; यह सब अब आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ १-४ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — पूर्वकाल में ब्रह्माजी के द्वारा दिये गये वर से उत्पन्न महान् असुर वृत्र सभी देवताओं को जीतकर स्वयं इन्द्र हो गया । नारद! महान् बल तथा पराक्रमवाले उस वृत्रासुर ने चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, मरुद्गण, कुबेर तथा यम के अधिकारों को छीनकर तीनों लोकों पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया था ॥ ५-६ ॥ ब्रह्माजी ने दधीचि की अस्थि से बनाये गये महास्त्र के द्वारा देवराज इन्द्र के हाथ से उस दुरात्मा की मृत्यु सुनिश्चित की थी। मुनिवर ! देवराज इन्द्र ने बृहस्पति के निर्देशानुसार पद्मयोनि ब्रह्माजी से प्रार्थना करके इस रहस्य को जाना। तत्पश्चात् इन्द्र मुनि दधीचि के पास स्वयं गये और लोकों की रक्षा के निमित्त भिक्षा के रूप में उनकी अस्थि की याचना की ॥ ७-९ ॥

मुने! उन इन्द्र ने दोनों हाथ जोड़कर मुनिश्रेष्ठ महात्मा दधीचि को प्रणाम किया और दधीचि ने कहा — आपका स्वागत है ‘ ॥ १० ॥

तत्पश्चात् मुनि दधीचि भी देवराज इन्द्र को आया हुआ जानकर अपने स्थान से उठ खड़े हुए और उन्होंने आसन देकर कुशल आदि पूछा तथा कहा — देवराज ! आपका यहाँ आगमन किसलिये हुआ, उसे मुझे बतलाइये ॥ १११/२

दधीचि मुनि के ऐसा कहने पर देवराज इन्द्र ने उनसे कहा — मुने! हम लोगों का जैसा समाचार है, वह क्या आपको ज्ञात नहीं है ? ॥ १२१/२

ब्रह्माजी के द्वारा दिये गये वरदान से उत्पन्न वृत्र नामक महान् असुर हम लोकपालों को जीतकर स्वयं त्रिलोकेश हो गया है। मुनिश्रेष्ठ ! हम सभी देवतागण उसके भय से स्वर्ग छोड़कर मनुष्यों की भाँति इस मृत्युलोक में निवास कर रहे हैं ॥ १३-१४ ॥ मैं न तो यज्ञभाग प्राप्त कर पा रहा हूँ और न कोई हमारी पूजा ही कर रहे हैं। इस प्रकार की दुर्गति को प्राप्त हुआ मैं आपसे और कुछ क्या कहूँ। मुने! आप ही कृपा करके यदि देवताओं का उद्धार करें, तभी दुःखरूपी सागर में निमग्न हम देवताओं का उद्धार हो सकेगा, आप ही हमारे उद्धारक हैं ॥ १५-१६ ॥

दधीचि बोले — जो हो चुका है और जो आगे होगा, वह सब मैं अपने विशिष्ट विज्ञानरूपी नेत्रों से जान रहा हूँ । इन्द्र ! मुझे क्या करना है, वह मुझे बताइये ॥ १७ ॥

इन्द्र बोले — ब्रह्मन् ! मैं क्या कहूँ ! मुझे बड़ा भय लग रहा है। महामुने! मैं जिसके लिये आपके पास आया हूँ, उसे सुनिये ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी ने उस वृत्रासुर की मृत्यु किसी अन्य प्रकार से निश्चित नहीं की है, अपितु आपकी अस्थियों से बनाये गये अस्त्रों से ही उसकी मृत्यु सम्भव है। [प्रभो!] इसीलिये मैं आपके पास आया हूँ। मुनिश्रेष्ठ! जिसके लिये मेरा आगमन हुआ है। वह सब मैंने आपसे बता दिया। अब जैसा उचित हो, वैसा आप विचार करें ॥ १९-२० ॥

श्रीमहादेवजी बोले — देवराज इन्द्र के ऐसा कहने पर मुनीश्वर दधीचि सोचने लगे कि क्या मैं इन इन्द्र को निराश करके लौटा दूँ अथवा अपनी देह का त्याग करूँ। इस प्रकार कुछ समय द्विविधा में पड़े हुए महामति दधीचि ने अन्त में देह त्याग का निश्चय कर देवराज इन्द्र से कहा — ॥ २१-२२ ॥

दधीचि बोले — देवराज! यदि राज्य से च्युत देवतागण मेरी अस्थियों के द्वारा महान् असुरराज वृत्र से छुटकारा पाते हैं तो मैं अवश्य ही योगबल से अपना यह शरीर त्याग दूँगा ॥ २३ ॥ उसी प्राणी का शरीर धन्य है, जिसका उपयोग दूसरे के सुख के लिये हो । यह शरीर तो अनित्य है और धर्म ही नित्य है, अतः मैं इस शरीर का त्याग कर रहा हूँ ॥ २४ ॥

मुने! ऐसा कहकर उन दधीचिमुनि ने योग के द्वारा अपने तेज से अत्यन्त देदीप्यमान अपने शरीर को देवराज इन्द्र के सामने ही त्यागकर मोक्ष प्राप्त किया ॥ २५ ॥ यह देखकर देवराज इन्द्र बार-बार दीर्घ श्वास लेते हुए ‘लौकिक विषयों की कामना करने वाले हम देवताओं को धिक्कार है’ इस प्रकार अपनी निन्दा करके विषादपूर्ण मन से कुछ समय तक वहीं पर खड़े रहे ॥ २६ ॥ मुने! तत्पश्चात् उनकी अस्थियों को आदरपूर्वक ग्रहण कर उन देवराज इन्द्र ने देवगणों से मन्त्रणा करके उस महान् असुरराज वृत्रासुर के वध के लिये उन अस्थियों से अनेक प्रकार के अस्त्र बनाये ॥ २७ ॥

तदनन्तर सफल पराक्रमवाले, प्रचण्ड धनुर्धर, देवगणों के नायक इन्द्र देवताओं के लिये दुर्जेय उस महान् असुर वृत्र के पास देवताओं के साथ गये और उन्होंने उस शत्रु को महायुद्ध के लिये ललकारा ॥ २८ ॥ मुने ! तत्पश्चात् महान् युद्ध छिड़ जाने पर देवेन्द्र ने उन अस्थियों से निर्मित बाणों, वज्र तथा अति प्रज्वलित चक्र से उस दैत्यपति वृत्रासुर को मार डाला ॥ २९ ॥

नारद! इस प्रकार इन्द्र को अपने द्वारा की गयी उस ब्रह्महत्या का पाप लगा । जिस प्रकार उन इन्द्र ने जगत् की एकमात्र जननी महाकाली का दर्शन किया, अब मैं उस प्रसंग का वर्णन कर रहा हूँ, आप ध्यान से सुनिये ॥ ३० ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराणके अन्तर्गत ‘दधीचिप्राणत्यागमें देवराज- ब्रह्महत्यावर्णन ‘ नामक साठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥

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