श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -004
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
चौथा अध्याय
वासुदेवपरायण विष्णुभक्तों के लक्षण तथा उनकी महिमा
श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे चतुर्थोऽध्यायः
विष्णुभक्तकथनं

ऋषिगण बोले —  हे महामते ! जो वासुदेवपरायण वैष्णव कहे गये हैं, उनके क्या लक्षण हैं; उसे हमें बताइये । हे सूत ! हे सर्वतत्त्वज्ञ ! भगवान् भूतभावन उन्हें कौन-सी गति प्रदान करते हैं; यह सब हमसे कहिये ॥ १-२ ॥

सूतजी बोले —  आप लोगों ने आज मुझसे जो पूछा है, वही बात पूर्वकाल में अम्बरीष ने मार्कण्डेयमुनि से पूछी थी; [उस समय उन्होंने जो कहा था] उसे मैं यथार्थ रूप से आप लोगों को बता रहा हूँ ॥ ३ ॥

मार्कण्डेयजी बोले —  हे राजन् ! आप मुझसे जो पूछ रहे हैं, उसे ध्यानपूर्वक सुनिये। जहाँ विष्णुभक्त रहता है, वहीं पर नारायण विराजमान रहते हैं। जिनके लिये सर्वत्र विष्णु ही देवता कहे गये हैं, भगवान् श्रीहरि का कीर्तन होते समय जिसके शरीर में सदा रोमांच होने लगता है, कम्पन उत्पन्न हो जाता है, पसीना आने लगता है और नेत्रों में अश्रु दिखायी पड़ने लगते हैं; विष्णु की भक्ति से युक्त श्रौतस्मार्त कर्मप्रवर्तक विद्वानों को देखकर जो आनन्दित हो उठता है, उसे वैष्णव कहा गया है। जगत् के दर्शन में [ अपनी रक्षा के निमित्त] वैष्णव को आवश्यक परिधान के अतिरिक्त वस्त्र आदि शरीर का आवरण नहीं करना चाहिये ॥ ४–७ ॥ विष्णुभक्त को आता हुआ देखकर जो सामने खड़े होकर उसे वासुदेवतुल्य समझकर प्रणाम आदि करता है, उसे वैष्णव भक्त जानना चाहिये; वह तीनों लोकों में विजयी होता है। कठोर वचन सुनता हुआ भी जो भगवद्भाव से युक्त होकर प्रणामपूर्वक धैर्य के साथ बोलता है, वही वैष्णव है ॥ ८-९१/२

सब कुछ श्रीहरि का है —ऐसा मानकर जो गन्ध, पुष्प आदि को सिर से लगाता है, वह वैष्णव कहा गया है। जो विष्णु-क्षेत्र में प्रेमयुक्त होकर शुभ कर्म ही करता है और एकाग्रचित्त होकर श्रीहरि की प्रतिमा का नित्य पूजन करता है, उसे मन-वाणी-कर्म से विष्णुभक्त समझना चाहिये। जो सदा नारायण में अनुरक्त है, वह परमभागवत है ॥ १०-१२१/२

विष्णुभक्तों के भोजन एवं आराधन की यथाशक्ति व्यवस्था करने वाला वास्तविक फल का भागी कहा गया है। नारायण में भक्ति रखने वाला विद्वान् प्रसन्नचित्त होकर जिसका भी अन्न खाता है, वह अन्न मानो साक्षात् श्रीहरि के मुख में चला गया; इसमें संदेह नहीं है ॥ १३-१४१/२

भक्तवत्सल लक्ष्मीपति विश्वात्मा विष्णु अपने पूजन की अपेक्षा अपने महाभागवत भक्त का पूजन देखकर अधिक प्रसन्न होते हैं। वासुदेव में भक्ति रखने वाले पापरहित वैष्णव को देखकर देवता भी भयभीत होकर उसे प्रणाम करके जैसे आते हैं, वैसे ही लौट जाते हैं ॥ १५-१६१/२

विष्णुभक्त के वैभव से सम्बन्धित एक प्राचीनकाल का वृत्तान्त सुनिये । दग्ध पापों वाले वैष्णव भक्त भृगुपुत्र च्यवन को देखकर यमराज ने भी उठ करके दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया था । अतः मनुष्य को चाहिये कि भगवान् विष्णु की ही भाँति भक्तिपूर्वक वैष्णवों की पूजा करे; [जो ऐसा करता है ] वह विष्णु का सामीप्य प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १७–१९ ॥ विष्णुभक्त अन्य देवताओं के भक्तों से हजार गुना श्रेष्ठ होता है और विष्णुभक्तों से हजार गुना श्रेष्ठ शिवभक्त होता है; रुद्रभक्त श्रेष्ठ कोई भी लोक में नहीं है, इसमें संशय नहीं है। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिये सम्पूर्ण प्रयत्न के साथ विष्णुभक्त अथवा रुद्रभक्त की पूजा करनी चाहिये ॥ २०-२१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत उत्तरभाग में ‘विष्णुभक्तकथन’ नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥

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