श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -008
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
आठवाँ अध्याय
शिवमहामन्त्र के जप से ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धुमूक का शिव की कृपा से शिवगणत्व को प्राप्त करना
श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अष्टमोऽध्यायः
अष्टाक्षरप्रशंसा

सूतजी बोले — हे द्विजश्रेष्ठो ! ॐ नमो नारायणाय यह अष्टाक्षर मन्त्र तथा द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) – ये परमात्मा के श्रेष्ठ मन्त्र हैं । किंतु हे विप्रो !ॐ नमः शिवाय — यह जो षडक्षर मन्त्र है, वह सभी वेदार्थों का सारभूत है, उसी प्रकार शिवतराय तथा मयस्कराय’ – ये दिव्य तथा मंगलकारक पंचाक्षरमन्त्र सभी मनोरथों को प्राप्त कराने वाले हैं और उसी तरह प्रधानपुरुष रुद्र का नमस्ते शङ्कराय – सप्ताक्षर मन्त्र भी सभी मनोरथों को सिद्ध करनेवाला यह है ॥ १–३ ॥

हे द्विजश्रेष्ठो ! ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा इन्द्रसहित सभी देवता, श्रेष्ठ द्विजगण एवं मुनिलोग इन मन्त्रों से उन शंकर, देवदेवेश, मयस्कर तथा अजोद्भव शिव का यजन करते हैं और उन्हीं शिव को शंकर, रुद्र, देवदेव तथा उमापति कहते हैं । नमः शिवाय, नमस्ते शङ्कराय, मयस्कराय, रुद्राय, शिवतराय — इन मन्त्रों का जप करके विप्र ब्रह्महत्या आदि [ महापातकों ] -से क्षणभर में मुक्त हो जाता है ॥ ४-७ ॥

पूर्वकाल में प्रभु मनु के तीसरे आवर्त (चतुर्युग)-के त्रेतायुग में कोई धुन्धुमूक नामक सामर्थ्यसम्पन्न द्विज था ॥ ८ ॥ मेघवाहन कल्प में परमात्मा शिव का मेघरूपी वाहन बनकर देवदेव जनार्दन विष्णु ने अत्यन्त आदर के साथ उन महादेव कृत्तिवास (व्याघ्रचर्मधारी) ईश्वर रुद्र का वहन किया था। तब रुद्र के अत्यधिक भार से पीड़ित होने के कारण वे श्वास-उच्छ्वास से रहित हो गये । इसके बाद उन कमलनयन विष्णु ने शितिकण्ठ शिव को उद्देश्य करके तपस्या की और अपनी तपस्या के द्वारा परमेश्वर तथा परमात्मा शंकर से परम ऐश्वर्य और अद्भुत बल प्राप्त किया । इसीलिये वह कल्प मेघवाहन नाम से विख्यात हुआ ॥ ९-१२ ॥

उस कल्प में [पूर्वजन्म में किसी ] मुनि के शाप के कारण धुन्धुमूक के यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ, धुन्धुमूक का वह पुत्र [पिता के दोष के कारण] दुरात्मा हो गया । पूर्वकाल में वह धुन्धुमूक विरक्त होते हुए भी भार्या पर मोहित हो गया और उसने अमावास्या तिथि को दिन में ही रुद्रदैवत मुहूर्त में कामासक्त मन से भार्या के साथ सुखपूर्वक संसर्ग किया और उसमें गर्भ स्थापित कर दिया। तत्पश्चात् हे मुनिश्रेष्ठो ! विशल्या नामक उस [मुनिपत्नी] ने शनि की दृष्टि वाले भयंकर मुहूर्त में अत्यन्त कष्टपूर्वक एक पुत्र को जन्म दिया ॥ १३–१६ ॥ माता, पिता तथा अपने लिये अरिष्टकारी होकर उसने जन्म लिया था । हे विप्रो ! मित्र एवं वरुण नामक श्रेष्ठ ऋषियों ने उस धुन्धुमूक से कहा कि यह दुष्पुत्र है, किंतु वसिष्ठ ने उससे कहा कि तुम्हारा यह पुत्र नीच तथा दुर्बुद्धि होते हुए भी बृहस्पति के प्रभाव से पाप से मुक्त हो जायगा ॥ १७-१८१/२

द्विजश्रेष्ठो ! ऐसी दशा वाले पुत्र को देखकर वह धुन्धुमूक [बहुत] दु:खित हुआ। उसने विधिपूर्वक उसके जातकर्म आदि संस्कार करके स्वयं उसे सम्यक् प्रकार से पढ़ाया। उस धुन्धुमूक के पुत्र ने भलीभाँति अध्ययन किया। हे सुव्रतो! इसके बाद उसका विवाह कर दिया गया, तब वहाँ से जाकर वह गुरुसेवा में निरत गया ॥ १९-२१ ॥ द्विजश्रेष्ठ ! इसी [पूर्वोक्त दोष] के कारण वह धुन्धुमूकपुत्र किसी शूद्रा को देखकर मदोन्मत्त होकर अपनी भार्या के समान उसके साथ दिन-रात भोग करके [उसके पास] पड़ा रहता था। वह द्विजाधम तथा दुर्बुद्धि अपनी परम धर्मगति का त्याग करके उसके साथ शय्या पर स्थित होकर दुराचार में रत रहता था। वह कामोद्दीपन के लिये उसके साथ मदिरा भी पीता था ॥ २२-२३१/२

हे द्विजश्रेष्ठो ! किसी कारण से उस शूद्रा के साथ उसका विरोध हो गया और उस पापी ने अभद्र शूद्रा को मार डाला। तब उसके भाइयों ने उस धौन्धुमूक के पिता को मार डाला, इसी प्रकार उन्होंने उस दुर्बुद्धि की माता, सुन्दर पत्नी तथा उसके सालों (पत्नी के भाइयों ) – का भी वध कर दिया। हे सुव्रतो ! इस प्रकार क्षणभर में उसका कुल विनष्ट हो गया और उस शूद्रा का सम्पूर्ण कुल भी राजा के द्वारा मार डाला गया ॥ २४–२६१/२

तत्पश्चात् जिस किसी तरह वहाँ से निकलकर वह धौन्धुमूक पूर्वकाल में महेश्वर महादेव से पाशुपतव्रत प्राप्त करके रुद्रजप में तत्पर मुनिश्रेष्ठ बृहस्पति के यहाँ प्रारब्धवश पहुँचकर उनसे सर्वश्रेष्ठ पंचाक्षर तथा षडक्षर मन्त्र ग्रहण करके और बाद में उस पंचाक्षर तथा षडक्षर मन्त्र को पृथक्-पृथक् एक लाख बार जपकर और इस प्रकार दिव्य द्वादश मासिक व्रत को विधिपूर्वक करके अन्त में [ आयु के समाप्त होने पर ] मृत्यु को प्राप्त हुआ। यमलोक में यमराज के द्वारा वह बहुत सम्मानित किया गया । हे सुव्रतो! इस प्रकार उसने [ शूद्रों के द्वारा मारे गये] अपने माता, पिता तथा सालों का उद्धार कर दिया और सुन्दर मुसकान वाली उसकी पतिव्रता भार्या सौभाग्यवती हो गयी। उन सभी के साथ विमान में बैठकर [रुद्रलोक पहुँचकर ] इन्द्रसहित सभी देवताओं से स्तुत होता हुआ वह गणाध्यक्ष बनकर भगवान् रुद्र का प्रिय हो गया ॥ २७–३२ ॥

अतएव अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रों से यह [ पंचाक्षरमन्त्र ] करोड़ों गुना अधिक पुण्यप्रद होता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। अतः जो मनुष्य पूर्व में कहे गये [^1]  विधान के अनुसार आदि में मायाबीज ( ‘ह्रीं’ )लगाकर इस मन्त्र का नित्य जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है ॥ ३३-३४ ॥ [हे मुनियो!] मैंने आप लोगों से यह उत्तम कथासार कह दिया, जो [मनुष्य] इस सर्वोत्कृष्ट रुद्रजपसम्बन्धी प्रसंग को पढ़ता है, सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजों को सुनाता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है ॥ ३५-३६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत उत्तरभाग में ‘अष्टाक्षरप्रशंसा’ नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

[^1]: पंचाक्षरमन्त्र का पूर्ण विधान श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभाग के पचासीवें अध्याय में वर्णित है ।

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