श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -085
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
पचासीवाँ अध्याय
पंचाक्षरी विद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः
पञ्चाक्षरमाहात्म्यं

सूतजी बोले — हे श्रेष्ठ द्विजो ! समस्त व्रतों में देवदेव उमापति की पूजा करके विधिपूर्वक पंचाक्षरीविद्या (मन्त्र) – का जप करना चाहिये। जप से ही विशेषकर व्रतों की पूर्णता होती है, अन्यथा नहीं; इसमें सन्देह नहीं है । अत: उत्तम पंचाक्षरीविद्या का जप [ अवश्य] करना चाहिये ॥ १-२ ॥

ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी !] पंचाक्षरीविद्या क्या है और इसका प्रभाव कैसा होता है ? हे महाभाग ! क्रम से इसकी विधि बताइये; इसे सुनने की हमलोगों की [बड़ी] उत्सुकता है ॥ ३ ॥

सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] पूर्वकाल में देवदेव रुद्र भगवान् शम्भु के द्वारा पार्वती से कहे गये इस पुण्यप्रद मन्त्र को मैं संक्षेप में बता रहा हूँ ॥ ४ ॥

श्रीदेवी बोलीं — हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे सर्वलोक- महेश्वर ! मैं यथार्थरूप से पंचाक्षरमन्त्र का माहात्म्य सुनना चाहती हूँ ॥ ५ ॥

श्रीभगवान् बोले — हे देवि ! सौ करोड़ वर्षों में भी पंचाक्षरमन्त्र का माहात्म्य नहीं कहा जा सकता है; अतः इसे संक्षेप में सुनिये ॥ ६ ॥

हे देवि ! प्रलय के उपस्थित होने पर जब समस्त चराचर जगत्, देवता तथा असुर, नाग एवं राक्षस नष्ट हो जाते हैं और आप सहित सभी पदार्थ प्रकृति में लीन होकर प्रलय को प्राप्त हो जाते हैं, उस समय एकमात्र मैं रह जाता हू; दूसरा कुछ भी नहीं रह जाता है। उस समय सभी वेद तथा शास्त्र उसी पंचाक्षरमन्त्र में स्थित रहते हैं; मेरी शक्ति से अनुपालित होने के कारण वे नष्ट नहीं होते हैं ॥ ७–९ ॥ मैं एक होता हुआ भी उस समय प्रकृति तथा आत्मा के भेद से दो रूपों में रहता हूँ। वे भगवान् नारायण मायामय शरीर धारण कर जल के मध्य में योगरूपी पर्यंक पर शयन करते हैं। उनके नाभिकमल से पाँच मुख वाले ब्रह्मा उत्पन्न हुए; तीनों लोकों का सृजन करने की इच्छा वाले उन ब्रह्मा ने [ इस कार्य में] असमर्थ तथा सहायकविहीन होने के कारण प्रारम्भ में अमित तेज वाले दस मानस पुत्रों को उत्पन्न किया ॥ १०–१२ ॥

उनकी सृष्टि की वृद्धि के लिये ब्रह्मा ने मुझसे कहा — ‘हे महादेव ! हे महेश्वर ! मेरे पुत्रों को शक्ति प्रदान कीजिये।’ उनके ऐसा कहने पर पाँच मुख धारण करने वाले मैंने कमलयोनि (ब्रह्मा) – के लिये [अपने] पाँचमुखों से पाँच अक्षरों का उच्चारण किया। अपने पाँच मुखों से उन [अक्षरों] को ग्रहण करते हुए लोकपितामह ब्रह्मा ने वाच्यवाचक भाव से परमेश्वर को जान लिया। हे देवि! तीनों लोकों में पूजित शिव पंचाक्षरों से वाच्य हैं और [ यह ] परम पंचाक्षरमन्त्र उनके वाचक के रूप में स्थित है ॥ १३-१६ ॥ पाँच मुखवाले महात्मा ब्रह्मा ने विधिपूर्वक इसके प्रयोग को जानकर तथा सिद्धि प्राप्त करके जगत् के कल्याण के लिये अपने पुत्रों को महान् अर्थवाले इस पंचाक्षरमन्त्र का उपदेश किया ॥ १७ ॥ तदनन्तर साक्षात् लोकपितामह से इस मन्त्ररत्न को प्राप्त कर वे उन परात्पर देव शिव की आराधना करने में तत्पर हो गये ॥ १८ ॥ तब त्रिदेवों में श्रेष्ठ भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और उन्होंने उन्हें सम्पूर्ण ज्ञान तथा अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ प्रदान कीं ॥ १९ ॥

तत्पश्चात् [उन] वरों को प्राप्तकर वे विप्र [मेरी] आराधना की आकांक्षा करने लगे। मेरु के रम्य शिखर पर मुंजवान् [^1]  नामक पर्वत है। शोभासम्पन्न यह पर्वत मुझे प्रिय है और मेरे भूतों के द्वारा भलीभाँति रक्षित है। हे देवि ! पूर्वकाल में उस [ पर्वत ] के समीप स्थित रहते हुए लोकसृष्टि के इच्छुक उन ऋषियों ने मेरे अनुग्रह हेतु वायु के आहार पर रहकर हजार दिव्य वर्षों तक कठोर तप किया ॥ २०-२२ ॥

[ हे देवि !] उनकी भक्ति देखकर मैं शीघ्र ही उनके समक्ष प्रकट हो गया और मैंने लोकों के कल्याण की इच्छा से उन महात्माओं को पंचाक्षरमन्त्र, उसके ऋषि, छन्द, देवता, शक्ति, बीजसहित षडंग न्यास, दिग्बन्ध तथा विनियोग पूर्ण रूप से बता दिया ॥ २३-२४ ॥ उस मन्त्र का माहात्म्य सुनकर उन तपोधन ऋषियों ने मन्त्र का विनियोग करके सभी अनुष्ठान पूर्ण किये । उसके बाद उन्होंने उस मन्त्र की महिमा से लोकों, देवताओं, असुरों, मनुष्यों, वर्णों, वर्णविभागों तथा समस्त उत्तम धर्मों को जो पूर्व कल्प में उत्पन्न हुए थे — उन सबका श्रवण किया। पंचाक्षरमन्त्र के प्रभाव से ही लोक, वेद, महर्षिगण, शाश्वत धर्म, देवता तथा यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। अब मैं उसके विषय में सब कुछ बताऊँगा; सावधान होकर सुनिये ॥ २५-२८ ॥

यह मन्त्र अल्प अक्षरों वाला, महान् अर्थोंवाला, वेदों का सार, मुक्तिप्रद, आज्ञासिद्ध, असन्दिग्ध तथा शिवस्वरूप है ॥ २९ ॥ यह मेरा मन्त्र अनेक सिद्धियों से युक्त, अलौकिक, लोगों के चित्त को आनन्दित करनेवाला, सुनिश्चित अर्थों वाला, गम्भीर तथा परमेश्वरस्वरूप है ॥ ३० ॥ यह मन्त्र मुख से सुखपूर्वक उच्चारणयोग्य, सम्पूर्ण प्रयोजनों को सिद्ध करने वाला, सभी विद्याओं का बीजस्वरूप, आद्य (सबसे पहला) मन्त्र, परम सुन्दर, अति सूक्ष्म एवं महान् अर्थों वाला है। इसे वटवृक्ष के बीज की भाँति समझना चाहिये। यह वेदस्वरूप, तीनों गुणों से परे, सर्वज्ञ, सब कुछ करने वाला तथा सर्वसमर्थ है ॥ ३१-३२ ॥

– यह एक अक्षर वाला मन्त्र है; सर्वव्यापी शिव इसमें स्थित रहते हैं । पाँच अक्षररूपी शरीर वाले शिव स्वभाव से ही सूक्ष्म षडक्षर (छः अक्षरों वाले) – मन्त्र में वाच्य-वाचक भाव से विराजमान हैं। प्रमेयत्व के कारण शिव वाच्य हैं तथा मन्त्र उनका वाचक कहा गया है। यह वाच्य – वाचक भाव ( सम्बन्ध ) उन दोनों में अनादि है। वेद अथवा शिवागम में षडक्षरमन्त्र स्थित है; किंतु लोक में पंचाक्षरमन्त्र को मुख्य माना गया है। जिसके हृदय में परमेश्वररूप यह मन्त्र स्थित है उसे बहुत मन्त्रों अथवा अतिविस्तृत शास्त्रों से क्या प्रयोजन! जो विद्वान् विधानपूर्वक इसका ज्ञान प्राप्त कर इसे ठीक-ठीक जपता है, उसने मानो वेदों का अध्ययन कर लिया और सब कुछ अनुष्ठित कर लिया। मात्र यही शिवज्ञान है, यही परम पद है और यही ब्रह्मविद्या है; अतः विद्वान्‌ को नित्य इसका जप करना चाहिये । प्रणव (ॐ)-सहित पाँच अक्षरों से युक्त यह मन्त्र [ ॐ नमः शिवाय ] मेरा हृदय है । यह गूढ़ से भी गूढ़ है और साक्षात् सर्वोत्तम मोक्षज्ञान है ॥ ३३-३९१/२

[हे देवि !] अब मैं इस मन्त्र के और प्रत्येक अक्षर के ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति, स्वर, वर्ण तथा स्थान का वर्णन करूँगा । इस मन्त्र के ऋषि वामदेव तथा छन्द पंक्ति कहा गया । हे वरानने ! इस मन्त्र का देवता [स्वयं] मैं शिव ही हूँ। पंचभूतस्वरूप ‘न’कार आदि इसके बीज हैं। प्रणव को सर्वव्यापी तथा शाश्वत आत्मा समझो। हे सभी देवताओं से नमस्कृत देवेशि ! [स्वयं] तुम ही इसकी शक्ति हो । कुछ प्रणव तुम्हारा है और कुछ प्रणव हमारा है । हे देवि! तुम्हारा प्रणव सभी मन्त्रों का शक्तिस्वरूप है; इसमें संशय नहीं है ॥ ४०–४४ ॥

हे देवि! ‘अ’, ‘उ’, ‘म’ मेरे प्रणव में स्थित हैं। क्रम से ‘उ’,’म’, ‘अ’ तुम्हारे प्रणव के हैं; तुम इस उत्तम प्रणव को प्लुत तीन मात्राओं वाला जानो । ओंकार का स्वर उदात्त है, इसके ऋषि ब्रह्मा हैं, इसका शरीर श्वेत है, छन्द देवी गायत्री हैं और इसके अधिदेवता परमात्मा हैं। इसका पहला, दूसरा तथा चौथा वर्ण उदात्त; पाँचवाँ वर्ण स्वरित और मध्यम वर्ण निषध [निषादस्वर] कहा गया है ॥ ४५–४७१/२

‘न’ पीले रंग का है और स्थान पूर्वमुख (पूरब की ओर मुख वाला) कहा गया है। इसके अधिदेवता इन्द्र हैं, इसका छन्द गायत्री है और इसके ऋषि गौतम हैं । ‘म’ कृष्ण वर्ण वाला है, इसका स्थान दक्षिणमुख है, इसका छन्द अनुष्टुप् है, इसके ऋषि अत्रि हैं और इसके अधिदेवता रुद्र कहे जाते हैं। ‘शि’ धूम्र वर्ण वाला है, इसका स्थान पश्चिममुख है, इसके ऋषि विश्वामित्र हैं, इसका छन्द त्रिष्टुप् है और इसके देवता विष्णु हैं । ‘वा’ हेम वर्ण वाला है, इसका स्थान उत्तरमुख है, इसके अधिदेवता ब्रह्मा हैं, इसका छन्द बृहती है और इसके ऋषि अंगिरा हैं। ‘य’ लाल रंग वाला है, इसका स्थान ऊर्ध्वमुख है, इसका छन्द विराट् है, इसके ऋषि भरद्वाज हैं और इसके देवता स्कन्द कहे जाते हैं ॥ ४८–५२१/२

[हे देवि!] अब मैं सभी सिद्धियाँ प्रदान करने वाले, मंगलमय तथा समस्त पापों का नाश करने वाले इसके न्यास को बताऊँगा। न्यास तीन प्रकार का कहा जाता है । उत्पत्ति, स्थिति (पालन) तथा संहार के भेद से यह तीन प्रकार का कहा गया है; यह क्रमशः ब्रह्मचारियों, गृहस्थों तथा यतियों के लिये होता है। उत्पत्ति [ न्यास] ब्रह्मचारियों का, स्थिति [ न्यास] गृहस्थों का और संहति (संहार) न्यास यतियों का होता है; अन्यथा सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती ॥ ५३–५५१/२

अंगन्यास, करन्यास, देहन्यास — यह तीन प्रकार का न्यास होता है; हे वरानने ! अब मैं उत्पत्ति आदि तीन भेदों से इन्हें भी आपको बताऊँगा । सबसे पहले करन्यास उसके बाद देहन्यास पुनः अंगन्यास मन्त्र के अक्षरों के क्रम से करना चाहिये। सिर से प्रारम्भ होकर पैरों तक का न्यास उत्पत्ति-न्यास कहा जाता । हे प्रिये ! पैरों से प्रारम्भ होकर सिर तक का न्यास संहार-न्यास होता है । हृदय, मुख और कण्ठ का न्यास स्थिति-न्यास कहा गया है । हे शोभने ! यह न्यास [क्रमश: ] ब्रह्मचारियों, गृहस्थों तथा यतियों के लिये है ॥ ५६-५९१/२

तत्पश्चात् सम्पूर्ण मन्त्र से सिरसहित देह का स्पर्श करना चाहिये। वह देहन्यास कहा गया है; वह सबके लिये समान है। दाहिने हाथ के अँगूठे से प्रारम्भ करके बायें हाथ के अँगूठे तक जो न्यास किया जाता है, वह उत्पत्तिन्यास है और इसके विपरीत करना संहृति (संहार) न्यास है। दोनों हाथों में अँगूठे से प्रारम्भ करके कनिष्ठा तक जो न्यास किया जाता है, वह स्थितिन्यास होता है; हे देवि ! वह [ न्यास] गृहस्थों को परम सुख प्रदान करने वाला है । सर्वप्रथम करन्यास करके देहन्यास करना चाहिये और उसके बाद अंगन्यास करना चाहिये; यह सामान्य विधि है ॥ ६०–६३१/२

अंगों में, दोनों हाथों में तथा दसों अँगुलियों के अग्रभाग में प्रत्येक मन्त्र को ओंकार से सम्पुटित करके सभी क्रम से न्यास करना चाहिये। दोनों पैर धोकर आचमन करके शुद्ध होकर समाहित चित्त होकर पूर्व की ओर अथवा उत्तर की ओर मुख करके न्यासकर्म करना चाहिये ॥ ६४-६५१/२

हे वरानने! प्रारम्भ में ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति, परमात्मा तथा गुरु का स्मरण करना चाहिये । मन्त्र के उच्चारण के साथ दोनों हाथों को धोकर दोनों करतलों में प्रणव का न्यास करना चाहिये। सभी अँगुलियों के आदि-अन्त पर्वों पर और पाँचों मध्यम पर्वों पर बिन्दुयुक्त पाँच बीजों का उत्पत्ति आदि तीन भेदों से तथा ब्रह्मचर्य आदि के क्रम से न्यास करना चाहिये। दोनों हाथों से मस्तक से लेकर पैर तक प्रणव के द्वारा सम्पुटित मन्त्र से देह का स्पर्श करना चाहिये । प्रणवयुक्त मन्त्र से सिर, मुख, कण्ठ, हृदय, गुह्यस्थान एवं दोनों पैरों में; गुह्यस्थान, हृदय, कण्ठ, मुख तथा सिर में; पुनः हृदय, गुह्यस्थान, दोनों पैरों, सिर, मुख तथा कण्ठ में तीन प्रकार का न्यास करना चाहिये । इस प्रकार अंगन्यास करके प्रणवसहित नकार से प्रारम्भ होकर यकार पर पूर्ण होने वाले इन नकार आदि वर्णों की क्रमशः अपने शरीर में भावना करे। इसके बाद मन्त्र में नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् तथा फट् के साथ यथास्थान छहों अंगों में उत्तम रीति से न्यास करना चाहिये ॥ ६६–७४ ॥

प्रणव को हृदय जानना चाहिये, ‘न’ को सिर कहा जाता है, ‘म’ को शिखा कहा गया है, ‘शि’ को कवच कहा गया है, ‘वा’ को नेत्र और ‘य’ को अस्त्र कहा गया है। इस प्रकार अंगों का न्यास करने के अनन्तर दिशाओं को बाँधना चाहिये। आग्नेय आदि चारों कोणों में क्रमशः विघ्नेश, माताएँ, दुर्गा तथा क्षेत्रज्ञ दिशाओं के देवता हैं। अंगुष्ठ तथा तर्जनी अग्रभागों से कल्याणप्रद तथा सुन्दर मुख वाले गणेश आदि को दिशाओं में स्थापित करके ‘रक्षा कीजिये’ – ऐसा कहकर इन्हें पृथक्-पृथक् नमस्कार करना चाहिये ॥ ७५–७८ ॥ बुद्धिमान्‌ को चाहिये कि कण्ठ में, मध्य में, अँगूठे में, तर्जनी आदि अँगुलियों में अँगूठे से ही करन्यास करे । इस प्रकार यह न्यास सभी पापों को हरने वाला, शुभ, सभी सिद्धियाँ देने वाला, पुण्यप्रद, सबकी रक्षा करने वाला तथा कल्याणकारी कहा गया है। हे सुभगे ! मन्त्र का न्यास कर लेने पर साधक शिवतुल्य हो जाता है और उसके द्वारा पूर्व जन्म में किया गया पाप भी उसी क्षण नष्ट हो जाता है। इस प्रकार न्यास करके मेधावी को शुद्ध शरीर वाला तथा दृढव्रती होकर आचार्य की कृपा से ग्रहण करके पंचाक्षर मन्त्र का जप करना चाहिये ॥ ७९-८२ ॥

हे शुभे ! अब मैं इस मन्त्र को ग्रहण करने की विधि बताऊँगा, जिसके बिना यह निष्फल हो जाता है और जिसके द्वारा यह सफल होता है। आज्ञाहीन, क्रियाहीन, श्रद्धाहीन, ध्यानहीन, आज्ञप्त तथा दक्षिणाहीन मन्त्र जपे जाने पर सदा निष्फल होता है। आज्ञासिद्ध, क्रियासिद्ध, श्रद्धासिद्ध, सुमानस (पूर्ण ध्यानयुक्त) तथा दक्षिणासिद्ध मन्त्र सदा सफल होता है ॥ ८३-८५ ॥ शिष्य को चाहिये कि मन्त्र के वास्तविक अर्थ के ज्ञाता, ज्ञानसम्पन्न, सद्गुणों से युक्त तथा ध्यान-योग-परायण ब्राह्मण गुरु के पास जाकर भावशुद्धि से युक्त हो मन-वचन – शरीर तथा धन से उन्हें प्रयत्नपूर्वक सन्तुष्ट करे और बड़े प्रयत्न के साथ उन आचार्य की सर्वदा पूजा करे। वैभव रहने पर हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, क्षेत्र, गृह, आभूषण, वस्त्र तथा विविध धान्य — ये सब गुरु को भक्तिपूर्वक देना चाहिये । यदि वह अपनी सिद्धि चाहता हो तो धन की कृपणता नहीं करनी चाहिये। हे देवि ! इसके बाद सेवक आदि सहित अपने आपको भी समर्पित कर देना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक यथाशक्ति [ गुरु की] पूजा करके निष्कपट भाव रखते हुए [शिष्य को ] गुरु से क्रमपूर्वक मन्त्र तथा ज्ञान ग्रहण करना चाहिये ॥ ८६–९१ ॥

इस प्रकार सन्तुष्ट गुरु वर्षपर्यन्त पास रहकर सेवामें परायण, अहंकाररहित, उपवास से दुर्बल शरीर वाले तथा शुद्धियुक्त पूजित शिष्य को स्नान कराकर ब्राह्मणों की पूजा करके [किसी] समुद्रतट पर, नदीतट पर, गोशाला में, देवालय में, पवित्र स्थान में अथवा घर में ही सिद्धिकारक समय में, उत्तम तिथि में तथा दोषरहित नक्षत्र एवं शुभयोग में शिष्य पर अनुग्रह करके उसे अत्युत्तम शिवज्ञान प्रदान करे; साथ ही प्रसन्नचित्त होकर एकान्त में स्वर से सम्यक् उच्चारण करे । स्वयं उच्चारणकर तथा उच्चारण कराकर मन्त्रदाता आचार्य बोले — [ तुम्हारा ] कल्याण हो, शुभ हो, कुशल हो, प्रिय हो ॥ ९२–९६ ॥

इस प्रकार गुरु से श्रेष्ठ मन्त्र तथा ज्ञान प्राप्त करके नित्य इसका ससंकल्प जप करना चाहिये और पुरश्चरण भी करना चाहिये। जो बिना भोजन किये तत्पर होकर आजीवन नित्य इसका एक हजार आठ बार जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है ॥ ९७-९८ ॥ व्रत करते हुए तथा नियमों का पालन करते हुए जो श्रद्धापूर्वक मन्त्र की अक्षर संख्या का चार लाख गुना जप करता है, उसे पुरश्चरणकर्ता कहा गया है। पुरश्चरण जप करने वाला अथवा नित्य जप करने वाला शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है। दोनों में किसी एक को अवश्य करना चाहिये ॥ ९९-१०० ॥ जो मनुष्य पुरश्चरण करके इसका नित्य जप करने वाला है, उसके समान लोक में कोई नहीं है; वह सिद्ध, सिद्धिदाता तथा इन्द्रियजित् होता है ॥ १०१ ॥

सुखदायक आसन लगाकर मौन तथा एकाग्रचित्त होकर पूर्व की ओर अथवा उत्तर की ओर मुख करके [ इस ] सर्वोत्तम मन्त्र का जप करना चाहिये ॥ १०२ ॥ जप के प्रारम्भ और अन्त में [तीन-तीन] प्राणायाम करना चाहिये और अन्त में एक सौ आठ बार बीजमन्त्र का जप करना चाहिये । श्वास रोककर चालीस बार जप करना चाहिये। यह पंचाक्षरमन्त्र का प्राणायाम कहा गया है । प्राणायाम से शीघ्र ही सभी पापों का नाश और इन्द्रियों का निग्रह हो जाता है, अतः प्राणायाम [ अवश्य ] करना चाहिये ॥ १०३-१०५ ॥ घर में किये गये जप को सामान्य फल वाला जानना चाहिये । गोशाला में किया गया जप उससे सौ गुना फलदायक होता है । नदी के तट पर किया गया जप लाख गुना और शिव के सान्निध्य में किया गया जप अनन्त गुना फलदायक होता है। समुद्र के तट पर, देवसरोवर में, पर्वत पर, देवालय में अथवा सभी पवित्र आश्रमों में किया गया जप करोड़ गुना फलदायक होता है। शिव की सन्निधि में, सूर्य, गुरु, दीपक, गौ अथवा जल के समक्ष जपकर्म श्रेष्ठ माना जाता है ॥ १०६-१०८ ॥

हे शुभानने ! एक-एक करके अँगुली से जप की गणना करने पर वह सामान्य फल प्रदान करता है; रेखाओं से करने पर वह आठ गुना फलदायक कहा गया है। पुत्रजीव-फलों से जप करने पर दस गुना, शंखमणियों से करने पर सौ गुना, प्रवालों (मूँगा ) – से करने पर हजार गुना स्फटिकों से करने पर दस हजार गुना और मोतियों से करने पर लाख गुना फलदायक कहा जाता है। कमल के बीज से करने पर दस लाख गुना और सोने के सुवर्णखण्डों से करने पर जप करोड़ गुना फलदायक कहा जाता है।  कुशा की ग्रन्थि से तथा रुद्राक्षों से गणना करने पर जप अनन्त गुना फलदायक होता है ॥ १०९–१११ ॥ पचीस मणियों की माला मोक्ष के लिये, सत्ताईस की [माला] पुष्टि के लिये, तीस की धन सम्पदा के लिये और पचास की अभिचार कर्म के लिये होती है । पूर्व की ओर मुख करके किया गया जप वशीकरण की शक्ति देने वाला और दक्षिण की ओर मुख करके किया गया जप अभिचारकर्म की शक्ति देने वाला होता है। पश्चिम की ओर मुख करके किये गये जप को धन प्रदान करने वाला जानना चाहिये। उत्तर की ओर मुख करके किया गया जप शान्ति प्रदान करने वाला होता है ॥ ११२-११३ ॥

अँगूठे को मोक्ष देने वाला जानना चाहिये । तर्जनी [ अँगुली] शत्रु का नाश करने वाली तथा मध्यमा धन प्रदान करने वाली है। अनामिका शान्ति प्रदान करती है । हे शोभने ! जपकर्म में कनिष्ठा रक्षणीय होती है। अँगूठे से अन्य अँगुलियों के साथ मन्त्र का जप करना चाहिये; क्योंकि बिना अँगूठे के जो जपकर्म किया जाता है, वह निष्फल होता है ॥ ११४-११५१/२

वे सभी यज्ञ हिंसा के साथ हुआ करते हैं, किंतु जपयज्ञ [हे देवि!] सुनो, जपयज्ञ सभी यज्ञों से श्रेष्ठ है; बिना हिंसा के होता है। जितने भी अनुष्ठान, यज्ञ, दान तथा तप हैं, वे सब [इस] जपयज्ञ की सोलहवीं कला के वाचिक जपयज्ञ का जो माहात्म्य बताया गया है; भी बराबर नहीं हैं ॥ ११६-११७१/२

उपांशु [जपयज्ञ] उससे सौ गुना और मानस [ जपयज्ञ ] हजार गुना [फलप्रद] कहा गया है । यदि साधक स्पष्ट पद – अक्षरों वाले शब्दों के साथ उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों में वाणी के द्वारा मन्त्र का उच्चारण करता है, तो वह जपयज्ञ वाचिक होता है। यदि साधक धीमे स्वर में मन्त्र का उच्चारण करता है और कुछ-कुछ ओठों को चलाता है तथा उसे कुछ-कुछ कान में सुनायी पड़ता है, तो वह जप उपांशु कहा गया है। यदि साधक मन में अक्षरसमूह के वर्ण से वर्ण तथा पद से पद शब्दार्थ का बार-बार चिन्तन करता है, तो उस जप को मानस जप कहा गया है। तीनों जपयज्ञों में उत्तरोत्तर ( बादवाला पहले की अपेक्षा) श्रेष्ठ है । यज्ञविशेष से उसके फल का वैशिष्ट्य होता है ॥ ११८–१२२१/२

जप के द्वारा नित्य स्तुति किये जाते हुए देवता प्रसन्न हो जाते हैं और प्रसन्न होकर अत्यधिक भोग तथा चिरस्थायी मुक्ति प्रदान करते हैं। यक्ष, राक्षस, पिशाच तथा सभी भयंकर ग्रह जप करने वाले के पास नहीं जाते और उससे पूर्णरूप से भयभीत रहते हैं ॥ १२३-१२४ ॥ मनुष्य जन्म-जन्मान्तर में जो भी पाप किये रहता है, उसे जप के द्वारा नष्ट कर देता है; जप के द्वारा भोगों को प्राप्त करता है; मृत्यु को जीत लेता है; जप के द्वारा सिद्धि तथा मुक्ति को भी प्राप्त कर लेता है ॥ १२५ ॥ इस प्रकार शिवज्ञान प्राप्त करके और जप के विधिक्रम को जानकर सदाचारी [ मनुष्य ] नित्य जप करता हुआ तथा शिव का ध्यान करता हुआ कल्याण प्राप्त करता है ॥ १२६१/२

[ हे देवि !] अब मैं धर्म के साधनस्वरूप सदाचार का सम्यक् वर्णन करूँगा; क्योंकि आचारहीन [ व्यक्ति]-का साधन निष्फल हो जाता है। आचार सर्वश्रेष्ठ धर्म है, आचार परम तप है, आचार परम विद्या है और आचार परम गति है । जिस तरह सदाचारी मनुष्यों को सभी जगह अभय रहता है; उसी तरह आचारहीनों को सर्वत्र भय ही रहता है ॥ १२७–१२९१/२

हे वरानने ! जो सदाचार का पालन करते हैं, वे देवत्व तथा ऋषित्व प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार जो आचार का उल्लंघन करते हैं, वे कुत्सित योनि प्राप्त करते हैं। आचार से विहीन पुरुष संसार में निन्दित होता है, अतः सिद्धि की इच्छा रखने वाले को पूर्णरूप से आचारवान् होना चाहिये। महान् शुद्धि से युक्त होता हुआ भी दुराचारी व्यक्ति पापी तथा ज्ञान को दूषित करने वाला होता है ॥ १३०-१३२ ॥ वर्णाश्रम-विधान के अनुसार बताये गये धर्म का यत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। जिसका जो कर्म विहित है, उसे करने वाला सर्वदा मुझे प्रिय है । प्रसन्नचित्त होकर प्रातः तथा सायंकाल सन्ध्योपासन करना चाहिये । द्विज को चाहिये कि सूर्योदय तथा सूर्यास्त के पूर्व आरम्भ करके पवित्र होकर विधिपूर्वक सन्ध्या करे और काम, मोह, भय तथा लोभ के कारण सन्ध्या का उल्लंघन न करे; क्योंकि सन्ध्या का उल्लंघन करने से विप्र ब्राह्मणत्व से पतित हो जाता है ॥ १३३–१३५१/२

कुछ भी असत्य नहीं बोलना चाहिये और सत्य का त्याग नहीं करना चाहिये । सत्य को ब्रह्म कहा गया है; असत्य ब्रह्म को दूषित करने वाला है। असत्य, कठोर वचन, शठता तथा परनिन्दा — ये पाप के कारण हैं। वाणी तथा मन से भी परायी स्त्री तथा पराये धन का हरण और परहिंसा कभी भी नहीं करनी चाहिये ॥ १३६–१३८ ॥ शूद्र के अन्न, बासी अन्न, [शिव का] नैवेद्य, श्राद्ध के अन्न, अनेक लोगों के अधिकार वाले अन्न, समुदायविशेष के लिये निर्मित अन्न का तथा राजा के अन्न का त्याग करना चाहिये। अन्न की शुद्धि से अन्तःकरण की शुद्धि होती है, न कि मिट्टी अथवा जल से । अन्तःकरण की पवित्रता से सिद्धि प्राप्त होती है, अत: अन्न का शोधन करना चाहिये अर्थात् पवित्र अन्न ग्रहण करना चाहिये ॥ १३९-१४० ॥ जैसे भुने हुए बीजों का अंकुरण नहीं होता है, वैसे ही ब्रह्मवादी ब्राह्मणों को भी राजाओं के प्रतिग्रह से दग्ध जानना चाहिये। अर्थात् वे ब्राह्मणत्व से च्युत हो जाते हैं। राजाओं से प्रतिग्रह लेना पाप तथा विष के समान है — प्रारम्भ में ही ऐसा जानकर बुद्धिमान ्‌को इसे ग्रहण नहीं करना चाहिये और कुत्ते के मांस के समान इसका त्याग कर देना चाहिये ॥ १४१-१४२ ॥

बिना स्नान किये, बिना जप किये तथा बिना अग्निपूजन किये भोजन नहीं करना चाहिये । पत्ते के पृष्ठ पर भोजन नहीं करना चाहिये तथा रात में बिना दीपक जलाये भोजन नहीं करना चाहिये। टूटे हुए पात्र में, मार्ग में एवं पतितजनों के समीप भोजन नहीं करना चाहिये । शूद्रों का छोड़ा हुआ अन्न नहीं खाना चाहिये और शिशुओं के साथ भी भोजन नहीं करना चाहिये ॥ १४३-१४४ ॥ शुद्ध, स्निग्ध (चिकना ), पका हुआ तथा अभिमन्त्रित अन्न ग्रहण करना चाहिये; भोजन करने वाला शिव है — ऐसा समझकर मौन तथा एकाग्रचित्त होकर भोजन करना चाहिये । खड़े-खड़े, अंजुलि से, मुख लगाकर, बायें हाथ से, शय्या पर तथा दायें हाथ से भी पानी नहीं पीना चाहिये ॥ १४५-१४६ ॥

बहेड़ा, अर्क (मदार), करंज तथा सेंहुड़ के वृक्ष की छाया में शरण नहीं लेना चाहिये। किसी खम्भे, दीप, मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों की छाया में खड़े नहीं होना चाहिये ॥ १४७ ॥ दूर यात्रा पर अकेले नहीं जाना चाहिये, भुजाओं के सहारे तैरकर नदी को पार नहीं करना चाहिये, कूप आदि में नहीं उतरना चाहिये और लम्बे वृक्षों पर नहीं चढ़ना चाहिये ॥ १४८ ॥ शुभे ! सूर्य, अग्नि, जल, देवता तथा गुरुजनों के विमुख होकर जपकर्म तथा [अन्य] शुभ कर्म नहीं करने चाहिये ॥ १४९ ॥ अग्नि में पैरों को तपाना नहीं चाहिये, पैरों से हाथ का स्पर्श नहीं करना चाहिये, अग्नि के ऊपर आसन नहीं बनाना चाहिये और अग्नि में कोई मल ( दूषित पदार्थ) नहीं डालना चाहिये ॥ १५० ॥ पैरों से जल नहीं उछालना चाहिये, शरीर की मैल को जल में नहीं छोड़ना चाहिये; तटपर ही मल को साफ करना चाहिये और उसे साफ करके स्नान करना चाहिये ॥ १५१ ॥

नाखून तथा केश से टपकता हुआ जल और स्नानवस्त्र का तथा घट का जल मनुष्यों के लिये श्रेयस्कर नहीं होता है; यदि कोई इसे स्पर्श करता है, तो अशुद्ध हो जाता है ॥ १५२ ॥ यदि कोई मूढ़ बुद्धिवाला [ मनुष्य ] बकरी, कुत्ता, गधा, ऊँट आदि से उठी हुई धूल और झाडू लगाने से उठी हुई धूल का स्पर्श करता है, तो उसकी लक्ष्मी नष्ट हो जाती है, चाहे वह विष्णु ही क्यों न हों ॥ १५३ ॥ जिसके घर में बिल्ली रहती है, वह चाण्डाल के समान होता है। यदि कोई मनुष्य बिल्ली की सन्निधि में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराता है, तो उसे चाण्डाल समान जानना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १५४१/२

दूषित वायु, सूप की वायु और प्राणियों के मुख से निकली हुई वायु — इनका सम्पर्क हो जाने पर ये मनुष्य के पुण्यों को नष्ट कर देते हैं। पगड़ी धारण करके, कंचुक पहनकर, नग्न होकर, केशों को खोलकर, मैल से युक्त होकर, अपवित्र हाथ से, अशुद्ध होकर तथा बात-चीत करते हुए कभी भी जप नहीं करना चाहिये ॥ १५५-१५६१/२

क्रोध, अहंकार, भूख, आलस्य, थूकना, जम्हाई, कुत्ते तथा नीच व्यक्ति का दर्शन, निद्रा तथा वार्तालाप — ये जप के शत्रु हैं; इनके उत्पन्न होने पर सूर्य आदि का दर्शन करना चाहिये । पुनः आचमन करके अथवा प्राणायाम करके शेष जप करना चाहिये। सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, तारे — ये विद्वान् ब्राह्मणों के द्वारा ज्योतिर्गण कहे गये हैं ॥ १५७-१५९१/२

पैरों को फैलाकर अथवा कुक्कुट आसन में बैठकर जप नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार जापक को बिना आसन के, लेटे हुए, मार्ग पर, शूद्र के पास, रक्तभूमि पर अथवा चारपाई पर जप नहीं करना चाहिये। आसन पर बैठकर मन में मन्त्र के अर्थ का चिन्तन करते हुए भली- भाँति जप करना चाहिये। रेशमी वस्त्र, व्याघ्रचर्म, वस्त्र, रूई, लकड़ी अथवा ताड़ के पत्ते का आसन बनाना चाहिये ॥ १६०–१६२१/२

अपना हित चाहने वाले को तीनों सन्ध्याओं में गुरु की पूजा करनी चाहिये। जो गुरु हैं, वे शिव कहे गये हैं और जो शिव हैं, वे गुरु कहे गये हैं। जैसे शिव हैं, वैसे ही विद्या; जैसी विद्या वैसे ही गुरु होते हैं। शिवविद्या उन गुरु से ही ग्रहण की जा सकती है और भक्ति के द्वारा अनुकूल फल प्राप्त होता है। हे देवि ! वे [गुरु] सर्वदेवस्वरूप तथा सर्वशक्तिस्वरूप हैं। गुरु सगुण हों अथवा निर्गुण — उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करना चाहिये । जो कल्याण का इच्छुक है, उसे मन से भी गुरु की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिये । पूर्णरूप से गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला [शिष्य ] ज्ञानसम्पदा प्राप्त करता है। चलते हुए, बैठते हुए, सोते हुए अथवा खाते हुए [शिष्य] जो भी कर्म यदि गुरु के समक्ष करे, वह समस्त कार्य उनकी आज्ञा से ही करना चाहिये ॥ १६३-१६७१/२

गुरुदेव के समक्ष इच्छानुसार आसन पर नहीं बैठना चाहिये; क्योंकि गुरु साक्षात् देवता हैं और उनका घर देवमन्दिर है । जिस प्रकार पापियों की संगति के कारण उनके पापों से [व्यक्ति का ] पतन हो जाता है, उसी प्रकार गुरु की संगति [व्यक्ति ] उनके धर्मफल का भागी होता है। जैसे सुवर्ण अग्नि के सम्पर्क से अपने मैल का त्याग करता है, वैसे ही मनुष्य गुरु के सम्पर्क से पाप का त्याग करता है । जैसे अग्नि के समीप स्थित कुम्भ का घृत पिघल जाता है, वैसे ही आचार्य (गुरु)–के सम्पर्क से [मनुष्य का] पाप विलीन हो जाता है। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि मल तथा काष्ठ को जला डालती है, उसी प्रकार प्रसन्न हुए गुरु अपने मन्त्र के तेज से [शिष्य के] पाप को भस्म कर देते हैं ॥ १६८-१७२१/२

गुरु के प्रसन्न रहने पर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सभी देवता तथा मुनि भी [ उस व्यक्ति पर] प्रसन्न होकर कृपा करते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। मन, वचन तथा कर्म से गुरु को क्रोधित नहीं करना चाहिये; उनके क्रोध से आयु, लक्ष्मी (वैभव ), ज्ञान और सत्कर्म दग्ध हो जाते हैं। जो लोग उन्हें कुपित करते हैं, उनके यज्ञ, जप तथा अन्य अनुष्ठान व्यर्थ हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १७३-१७५१/२

पूर्ण प्रयत्नपूर्वक गुरु विरुद्ध कुछ भी वचन नहीं बोलना चाहिए; यदि कोई अज्ञानवश ऐसा बोलता है, तो वह रौरव नरक में पड़ता है। हे देवि ! मन, धन, वचन तथा कर्म गुरु को कभी झूठा सिद्ध नहीं करना चाहिये । उनका दुर्गुण कहने पर व्यक्ति सौ दुर्गुणों से युक्त हो जाता है और उनका गुण कहने पर सभी गुणों का फल मिलता है । गुरु ने आदेश दिया हो अथवा नहीं, सर्वदा उनका हित तथा प्रिय करना चाहिये; गुरु सामने हों अथवा परोक्ष में हों, उनका कार्य करना चाहिये। मन, वचन, शरीर तथा कर्म से गुरु का हित तथा प्रिय करना चाहिये। ऐसा न करने वाला नरक में गिरता है और वहाँ जाकर वहीं पर विचरण करता रहता है । अतः सर्वदा उनकी उपासना तथा वन्दना करनी चाहिये । पास रहते हुए भी गुरु से आज्ञा लेकर तथा उनकी ओर मुख न करके बोलना चाहिये । ऐसा आचारवान्, भक्ति-सम्पन्न, नित्य जप करने वाला तथा गुरु का प्रिय करने वाला [शिष्य ] इस मन्त्र का विनियोग करने के योग्य होता है ॥ १७६-१८२१/२

[ हे देवि !] अब मैं सिद्धमन्त्र के प्रयोजनस्वरूप विनियोग को बताऊँगा; विनियोग न जानने वाले का वह मन्त्र प्रभावहीन हो जाता है। जिसका जिस कार्य के साथ विशेष रूप से संयोजन किया जाय, उसे विनियोग कहा गया है । यह इस लोक में तथा परलोक में फल प्रदान करता है। विनियोग से आयु, आरोग्य, शरीर की नित्यता, राज्य, ऐश्वर्य, उत्तम ज्ञान, स्वर्ग तथा मोक्ष — ये सब प्राप्त होते हैं ॥ १८३–१८५१/२

स्नान में तथा [प्रातः-सायं] दोनों सन्ध्याओं में ग्यारह बार पंचाक्षरमन्त्र से प्रोक्षण, अभिषेक तथा अघमर्षण करना चाहिए। जो शुद्ध होकर पर्वत पर चढ़कर आलस्यरहित हो एक लाख बार मन्त्र का जप करता है अथवा किसी महानदी के तट पर दो लाख बार जप करता है, वह दीर्घ आयु प्राप्त करता है ॥ १८६-१८७१/२

दूर्वांकुर, तिल, वाणी, गुरुच और घुटिका — इनका दस हजार होम आयु की वृद्धि करने वाला होता है। बुद्धिमान् ‌को चाहिये कि पीपल के वृक्ष का आश्रय लेकर दो लाख जप करे । शनिवार को पीपल वृक्ष का स्पर्श करके मनुष्य दीर्घ आयु प्राप्त करता है । बुद्धिमान् को शनैश्चर के दिन [अपने] दोनों हाथों से पीपल के वृक्ष का स्पर्श करना चाहिये और एक सौ आठ बार [ मन्त्र का ] जप करना चाहिये; यह भी अकाल मृत्यु को दूर करने वाला होता है ॥ १८८-१९०१/२

सूर्य की ओर मुख करके एकाग्रचित्त होकर एक लाख जप करना चाहिये; अर्क की समिधाओं से प्रतिदिन एक सौ आठ होम करने वाला [व्यक्ति ] रोग से मुक्त हो जाता है। मनुष्य को समस्त रोगों के शमन के लिये पलाश-समिधाओं से होम करना चाहिये; इससे दस हजार होम करके मनुष्य रोगरहित हो जाता है । प्रतिदिन एक सौ आठ बार जप करके सूर्य के समक्ष जल पीना चाहिये; ऐसा करने वाला एक महीने में ही सभी उदर- सम्बन्धी रोगों से मुक्त हो जाता है ॥ १९१–१९३१/२

ग्यारह बार मन्त्र से अभिमन्त्रित करके अन्न तथा अन्य भक्ष्य-पेय पदार्थ ग्रहण करना चाहिये; इससे विष भी अमृत हो जाता है। प्रतिदिन पूर्वाह्न में एक सौ आठ आहुति देकर तथा सूर्योपस्थान करके एक लाख जप करना चाहिये; ऐसा करने वाला पूर्ण आरोग्य प्राप्त करता है। नदी के जल से भरे हुए सुन्दर घड़े को स्पर्श करते हुए दस हजार जप करने से तथा उसी जल से स्नान करने से सभी रोगों की चिकित्सा हो जाती है ॥ १९४–१९६१/२

पवित्र होकर प्रतिदिन अट्ठाईस बार [[मन्त्र का ] जप करके अन्न ग्रहण करना चाहिये और बाद में उतनी ही पलाश – समिधाओं से हवन करने से [ व्यक्ति ] आरोग्य प्राप्त करता है । चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण के अवसर पर पवित्र होकर विधिपूर्वक उपवास करके जबतक ग्रहण का मोक्ष हो, तबतक किसी समुद्रगामिनी नदी में एकाग्रचित्त होकर जप करना चाहिये और हे द्विजो ! ग्रहण के समाप्त होने पर एक हजार आठ मन्त्र का जप करके ब्राह्मीरस का पान करना चाहिये। ऐसा करने वाला सभी शास्त्रों को धारण करने वाली कल्याणमयी लौकिक प्रतिभा प्राप्त करता है और उसकी वाणी अतिमानुषी होकर देवी सरस्वती की वाणी के तुल्य हो जाती है ॥ १९७-२००१/२

ग्रह तथा नक्षत्र के कारण कष्ट होने पर मनुष्य भक्तिपूर्वक दस हजार जप करके तथा आठ हजार आहुति देकर ग्रहपीड़ा से मुक्त हो जाता है । दुःस्वप्न देखने पर स्नान करके मनुष्य को दस हजार जप करना चाहिये; इसके बाद घृत की एक सौ आठ आहुति देने से उसे शीघ्र ही शान्ति प्राप्त होगी ॥ २०१-२०२१/२

चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण के समय विधिपूर्वक लिङ्ग का पूजन करके शुद्ध तथा एकाग्रचित्त होकर इन महादेव के समीप आदरपूर्वक दस हजार जप करना चाहिये; हे देवि ! वह मनुष्य जो कुछ भी माँगता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २०३-२०४१/२

हाथियों, घोड़ों तथा विशेषकर गोजाति के पशुओं में रोग उत्पन्न होने पर शुद्ध होकर तथा भक्तियुक्त होकर विधिपूर्वक महीनेभर पूजन करके समिधा की दस हजार आहुति देने से उन पशुओं के रोग की शान्ति तथा उनकी वृद्धि होती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २०५-२०६१/२

हे देवि ! उपद्रव तथा शत्रुबाधा उत्पन्न होने पर जो [व्यक्ति ] पवित्र होकर पलाश की समिधाओं से दस हजार होम करता है; उसकी शान्ति होती है । हे देवि ! आभिचारिक बाधा में भी ऐसा ही करना चाहिये; ऐसा करने से उसकी शक्ति प्रकट होती है और शत्रु को पीड़ा उत्पन्न होती है। विद्वेषण के लिये बहेड़े की समिधाओं से आठ आहुति डालनी चाहिये; अथवा रुधिर से स्नान करके विपरीत अक्षर से मन्त्र का जप करते हुए गीले रक्त से या विष से होम करना चाहिये; यह मनुष्यों के लिये विद्वेषणकारी है ॥ २०७–२१० ॥

[हे देवि !] अब मैं समस्त पापों से शुद्धि के लिये प्रायश्चित्त का वर्णन करूँगा। मनुष्य को पापशुद्धि करने हेतु पूर्णरूप से प्रयत्नशील होना चाहिये; क्योंकि सम्यक् पापशुद्धि ज्ञान-सम्पदा का मूल कारण होती है। यदि पापशुद्धि नहीं होती है, तो मनुष्य की सभी क्रियाएँ व्यर्थ हो जाती हैं और उसका ज्ञान क्षीण होता रहता है, इसलिये पाप का शोधन [अवश्य] करना चाहिये ॥ २११-२१२१/२

हे शुभे ! विद्या तथा लक्ष्मी की विशुद्धि के लिये अंजलि में जल लेकर मेरा ध्यान करके ग्यारह बार शिव – मन्त्र का जप करके उस जल से अभिषेक करना चाहिये। पाप-शोधन के लिये एक सौ आठ बार मन्त्र का जप करके स्नान करना चाहिये; यह सभी तीर्थों का फल देने वाला, सभी पापों को दूर करने वाला तथा कल्याणकारक है। सन्ध्योपासन के छूट जाने पर मनुष्य को एक सौ आठ बार मन्त्र का जप करना चाहिये। सुअर, चाण्डाल, दुर्जन तथा कुक्कुट का स्पर्श किया हुआ अन्न नहीं खाना चाहिये और खा लेने पर एक सौ आठ बार मन्त्र का जप करना चाहिये ॥ २१३–२१६ ॥ ब्रह्महत्या के शोधन के लिये मनुष्य को सौ हजार करोड़ बार मन्त्र का जप करना चाहिये, अन्य बड़े पापों के शोधन के लिये उसका आधा जप होना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । उपपातक शोधन के लिये उसका आधा जप करना बताया गया है। शेष [छोटे] पापों की शुद्धि के लिये भी पाँच हजार बार मन्त्र को जपना चाहिये ॥ २१७-२१८ ॥

जो शान्त होकर आत्मबोध कराने वाले, गोपनीय तथा शिवज्ञान को प्रकाशित करने वाले इस मन्त्र का पाँच लाख जप करता है, वह [ साक्षात् ] शिव हो जाता है और हे भद्रे ! वह मनुष्य सुखपूर्वक पाँचों वायु पर विजय प्राप्त कर लेता है । हे सुमुखि ! जो शुद्ध होकर इन्द्रियों को वश में करके पाँच लाख मन्त्र जप करता है, वह पाँचों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेता है। जो शान्त होकर ध्यानमग्न हो पाँच लाख बार मन्त्र का जप करता है, वह पाँचों विषयों पर विजय प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर चौथी बार इस मन्त्र को पाँच लाख बार जपता है, वह इस लोक में [पृथ्वी आदि ] पंचभूतों पर विजय प्राप्त कर लेता है ॥ २१९-२२२१/२

हे वरानने ! जो [ अपने] मन को नियन्त्रित करके प्रयत्नपूर्वक चार लाख बार मन्त्र का जप करता है, वह [मन, बुद्धि आदि ] अन्तःकरणों पर पूर्णरूप से विजय प्राप्त कर लेता है । हे कमलमुखि ! पचीस लाख बार मन्त्र जप से मनुष्य पचीस तत्त्वों पर विजय प्राप्त कर लेता है। हे सुन्दरि ! जो मध्यरात्रि में वातरहित स्थान में आदरपूर्वक दस हजार जप करता है, वह इस व्रत के द्वारा ब्रह्मसिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो [ मनुष्य ] आलस्यरहित होकर मध्यरात्रि में वातशून्य तथा ध्वनि- रहित स्थान में एक लाख बार जप करता है, वह शिव तथा पार्वती का दर्शन कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है । उस समय अन्धकार का विनाश हो जाता है और हृदय के बाहर तथा भीतर दीपक की भाँति प्रकाश हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। आत्मज्ञ को सभी प्रकार की सम्पदा तथा समृद्धि के लिये मन्त्र का दस हजार जप करना चाहिये। [हे देवि !] जो पवित्र तथा भक्तियुक्त होकर बीज के सम्पुटसहित मन्त्र का सौ लाख (एक करोड़) जप करता है, वह मेरा सायुज्य प्राप्त कर लेता है; इससे बढ़कर [फल] क्या हो सकता है ! ॥ २२३-२२९ ॥

[हे देवि !] मैंने तुम्हें पंचाक्षरमन्त्र के जप की सम्पूर्ण विधि बता दी । जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह परम गति प्राप्त करता है। जो देवकर्म अथवा पितृकर्म में शुद्ध ब्राह्मणों को पंचाक्षर विधि के क्रम का श्रवण कराता है, वह शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ २३०-२३१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘पंचाक्षरमाहात्म्य’ नामक पचासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८५ ॥

[^1]: पुं० [सं० मुंज+मतुप्] १. एक तरह की सोमलता (सुश्रुत) २. कैलाश के पास का एक पर्वत।

Content is available only for registered users. Please login or register [^2]: सुव्रताः- यह सम्बोधन सूतजी द्वारा ऋषियों के लिये प्रयुक्त है।

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