श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -015
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
पन्द्रहवाँ अध्याय
अघोरेश माहात्म्य तथा अघोर मन्त्र के जप से विविध पातकों का विनाश
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चदशोऽध्यायः
अघोरेश माहात्म्यं

सूतजी बोले [हे मुनियो!] उस भयावह कृष्ण कल्प के बीत जाने पर ब्रह्माजी उन ब्रह्मस्वरूप देवदेवेश अघोर की स्तुति करने लगे ॥ १ ॥

उस स्तुति से प्रसन्न होकर महादेव ने अनुग्रह करके ब्रह्मा से कहा — हे महाभाग ! ब्रह्महत्या आदि महापातकों, अन्य पातकों तथा अनेकविध पापों को मैं अपने इसी अघोर रूप से दूर करता हूँ; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ २-३ ॥ सुव्रत! हे पितामह! इसी प्रकार सभी उपपातकों, मानसिक पापों, सुतीक्ष्ण वाचिक पापों, कायिक पापों, मिश्रित पापों, प्रासंगिक पापों, जानबूझकर किये गये पापों, सहज रूप में आगन्तुक पापों तथा पितृ-मातृदेहजन्य पाप को दूर कर देता हूँ और हे विभो ! समस्त प्रकार के पातकजनित दुःखों का नाश कर देता हूँ; इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ॥ ४–६ ॥ प्रभो ! एक लाख बार अघोर मन्त्र ( अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यः० ) जपकर ब्रह्म हत्यारा भी मुक्त हो जाता है। हे वत्स ! उससे आधा जप करने से वाचिक पाप तथा उससे भी आधे जप से मानसिक पाप, चार गुना जप करने से बुद्धिपूर्वक अर्थात् जानबूझकर किये गये पाप तथा आठ गुना जप करने से क्रोधपूर्वक किये गये पाप दूर होते हैं ॥ ७१/२

वीरों की हत्या करने वाले को एक लाख जप तथा भ्रूण हत्या करने वाले को एक करोड़ जप करना चाहिये । माता का हत्यारा दस लाख जप करने से शुद्ध होता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ८२ ॥ गाय की हत्या करने वाला, कृतघ्न तथा स्त्री का हत्यारा — ऐसा पापी मनुष्य दस हजार बार अघोरमन्त्र जपकर पापमुक्त हो जाता है; इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है ॥ ९१/२

हे प्रभो! जानकर अथवा बिना जाने सुरापान करने वाला एक लाख जप से तथा वारुणी (मद्य ) पीने वाला उसके आधे अर्थात् पचास हजार जप से पापमुक्त हो जाता है; इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है ॥ १०१/२

बिना स्नान किये भोजन करने वाला, गायत्री जप तथा अग्निहोत्र किये बिना और देवताओं एवं अतिथियों आदि को भोजन कराये बिना भोजन करने वाला द्विज एक हजार जप करने से शुद्ध होता है ॥ १११/२

ब्राह्मण का धन हरण करने वाला तथा स्वर्ण की चोरी करने वाला अधम व्यक्ति दस लाख अघोर मन्त्र जपकर पाप से मुक्त होता है, इसमें संदेह नहीं है। इसी प्रकार पितामह! गुरुपत्नी में आसक्ति रखने वाले, माता का वध करने वाले तथा ब्रह्महत्यारे नराधम को भी [ पापमुक्तिहेतु] दस लाख मानस जप करना चाहिये ॥ १२-१३१/२

पापियों के सम्पर्क मात्र से लगने वाला पाप उन पापियों के पाप के ही समान कहा गया है, फिर भी मात्र दस हजार जप से ही सम्पर्क में रहने वाला प्राणी उस पाप से मुक्त हो जाता है ॥ १४१/२

संसर्ग से होने वाले पाप शमन के लिये पातकी को एक लाख मानस जप अथवा उसका चार गुना उपांशु जप अथवा आठ गुना वाचिक जप बुद्धिपूर्वक करना चाहिये। उपपातकीजनों के लिये पापीजनों के लिये निर्धारित जप का आधा जप करना बताया गया है तथा सामान्य पापों से मुक्ति हेतु उससे भी आधे जप का विधान है; इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिये ॥ १५-१६१/२

हे द्विजो! ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्ण की चोरी, गुरुपत्नीगमन आदि महापातक करने वाले ब्राह्मण को चाहिये कि वह रुद्रगायत्री मन्त्र 1  के द्वारा कपिला (किंचित् पीतवर्ण ) गाय का मूत्र, ‘गन्धद्वारा० 2   इस मन्त्र से उसी गाय का पृथ्वी के सम्पर्क से रहित गोबर, ‘तेजोऽसि शुक्रं 3  इस मन्त्र से कपिला गाय का घी, ‘आप्यायस्व ‘ 4  इस मन्त्र से दूध, ‘दधिक्राव्ण 5  इस मन्त्र से साक्षात् कपिला गाय का ताजा दही और हे पितामह! ‘देवस्य त्वा’ 6  इस मन्त्र से कुशा का जल इकट्ठा करे। तत्पश्चात् इन सबको स्वर्ण, चाँदी या ताँबे के पात्र में अथवा कमल या पलाशपत्र में एकत्र करके अघोरमन्त्र 7  से अभिमन्त्रित करना चाहिये । पुनः उसमें ब्रह्मकूर्च तथा सभी रत्नोंसहित सोना डाल देना चाहिये ॥ १७-२२ ॥

तत्पश्चात् अघोर मन्त्र का जप करके घी आदि से हवन करना चाहिये। घी, चरु, समिध, तिल, यव, धान्य से अलग-अलग आहुति देनी चाहिये । प्रत्येक की सात-सात बार आहुति देने का विधान है। इन द्रव्यों के अभाव में अघोरमन्त्र से केवल घी से ही हवन किया जा सकता है। हे द्विजो ! इसके बाद अघोर मन्त्र का जप करते हुए आठ द्रोण घी से देवेश शिव को स्नान कराकर बाद में शुद्धोदक स्नान कराना चाहिये ॥ २३-२५ ॥ पुनः दिन-रात उपवास करके दूसरे दिन प्रातः-काल स्नानकर ब्रह्मकूर्च विधि 8  से बनाये गये पंचगव्य का पान करना चाहिये । तत्पश्चात् आचमन करके शिव के आगे विधिपूर्वक ब्रह्मसम्बन्धी गायत्री मन्त्र का जप करना चाहिये ॥ २६ ॥

ऐसा करके कृतघ्न, ब्रह्महत्यारा, भ्रूणहत्या करनेवाला, वीरघाती, गुरुकी हत्या करनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करने वाला, चौर – वृत्तिवाला, स्वर्णचोर, गुरु की पत्नी में सदा आसक्ति रखने वाला, मद्य पान करने वाला, शूद्र- स्त्री आसक्त, परायी स्त्री के साथ व्यभिचार करने वाला, ब्राह्मण का धन हरण करने वाला, गोहत्यारा, माता- पिता की हत्या करने वाला, देवताओं की मूर्ति खण्डित करने वाला, शिवलिङ्ग ध्वस्त करने वाला तथा हजारों प्रकार के अन्य मानसिक- वाचिक-शारीरिक पाप करने वाला द्विज शीघ्र ही पापमुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं, इस विधि के करने से सैकड़ों जन्म-जन्मान्तर के पापों से मुक्ति मिल जाती है। मैंने अघोरेश्वर भगवान् शिव के प्रसंग से इस रहस्य का वर्णन किया है। अतएव द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य को सभी पापों से मुक्तिहेतु इस अघोर मन्त्र का जप नित्य करना चाहिये ॥ २७-३२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘अघोरेशमाहात्म्य’ नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥

1. ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
2. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥
3. तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि धाम नामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि ॥ ( शु० यजु० १ । ३१)
4. आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य सङ्गथे ॥ ( शु० यजु० १२ । ११२ )
5.  दधिक्राव्णोऽअकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखा करत्प्र ण आयुषि तारिषत् ॥ ( शु० यजु० २३ । ३२)
6. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् ।
7. अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥

8. ब्रह्मकूर्च विधि –  पलाश या कमल के पत्ते में अथवा तांबे या सुवर्ण के पात्र में पञ्चगव्य संग्रह करना चाहिये। गायत्री मन्त्र से गोमूत्र का ‘गन्धद्वारां०’ (श्रीसूक्त) इस मन्त्र से गोबर का, ‘आप्यायस्व०’ (शु० यजु० १२ ११२ ) इस मन्त्र से दूध का ‘दधिक्राव्णो०’ (शु० यजु० २३ । ३२ ) इस मन्त्र से दही का ‘तेजोऽसि शुक्रं०’ (शु० यजु० २२ । १) इस मन्त्र से घी का और ‘देवस्य त्वा०’ ( शु० यजु० ६।३०) इस मन्त्र से कुशोदक का संग्रह करे चतुर्दशी को उपवास करके अमावस्या को उपर्युक्त वस्तुओं का संग्रह करे। गोमूत्र एक पल होना चाहिये, गोबर आधे अँगूठे के बराबर हो, दूध का मान सात पल और दही का तीन पल है। घी और कुशोदक एक- एक पल बताये गये हैं। इस प्रकार इन सबको एकत्र करके परस्पर मिला दें। तत्पश्चात् सात-सात पत्तों के तीन कुश लेकर जिनके अग्रभाग कटे न हों, उनसे उस पञ्चगव्य की अग्नि में आहुति दे आहुति से बचे हुए पञ्चगव्य को प्रणव से आलोडन और प्रणव से ही मन्थन करके, प्रणव से ही हाथ में ले तथा फिर प्रणव का ही उच्चारण करके उसे पी जाय। इस प्रकार तैयार किये हुए पञ्चगव्य को ‘ब्रह्मकूर्च’ कहते हैं। स्त्री-शूद्रों को ब्राह्मण के द्वारा पचगव्य बनवाकर प्रणव उच्चारण के बिना ही पीना चाहिये। सर्वसाधारण के लिये ब्रह्मकूर्च पान का मन्त्र यह है – यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम् । ब्रह्मकूर्चो दहेत्सर्व प्रदीप्ताग्निरिवेन्धनम्॥ (वृद्धशातातप० १२) अर्थात् ‘देहधारियों के शरीर में चमड़े और हड्डी तक में जो पाप विद्यमान है, वह सब ब्रह्मकूर्च इस प्रकार जला दे, जैसे प्रज्वलित आग ईन्धन को जला डालती है।’

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