January 10, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -020 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ बीसवाँ अध्याय शेषशय्या पर आसीन भगवान् विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माजी का प्रादुर्भाव, भगवान् शिव की माया से दोनों का विमोहित होना, विष्णु द्वारा ब्रह्मा के प्रति शिवमाहात्म्य का कथन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विंशोऽध्यायः ब्रह्मप्रबोधनं ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी ! ] प्राचीनकाल में पाद्म कल्प में ब्रह्माजी कमल से किस प्रकार जायमान हुए और पुरुषोत्तम विष्णु ने उन ब्रह्मा के साथ शिव का दर्शन कैसे किया ? कृपया अब इन सब वृत्तान्तों का आप विस्तारपूर्वक वर्णन करें ॥ ११/२ ॥ सूतजी बोले — प्रलय के समय चारों ओर जल-ही-जल तथा घोर, घनीभूत अन्धकार व्याप्त था । उस प्रलयसागर के मध्य शंख-चक्र-गदा धारण किये, नीलमेघ सदृश वर्ण वाले, कमल के समान नेत्र वाले, मुकुट धारण किये, आठ भुजाओं वाले, विशाल वक्षःस्थल वाले, लोकों की योनि कहे जाने वाले, सभी जीवात्माएँ जिनके मुख से निकली हैं — ऐसे योगात्मा भगवान् विष्णु किसी अनिर्वचनीय योग में स्थित होकर, तथा योगवित् सर्वात्मा नारायण पुरुषोत्तम लक्ष्मीपति हजार फणों से सुशोभित शेषनाग के अप्रतिम ओजसम्पन्न, अति उन्नत तथा छायायुक्त फणरूप शय्या को भलीभाँति बिछाकर प्रलय – सागर स्थित उस महान् पर्यंक ( शेषशय्या) – पर शयन कर रहे थे ॥ २-६ ॥ इस प्रकार वहाँ शयन कर रहे गूढ़ रहस्यों वाले सर्वव्यापी आत्माराम विष्णु ने अपनी क्रीड़ा के निमित्त अत्यन्त ऊँचे वज्रदण्ड से युक्त एक कमल, जो शतयोजन विस्तीर्ण तथा प्रखर सूर्य के समान था, अपनी नाभि से लीलापूर्वक उत्पन्न किया ॥ ७-८ ॥ कमल के साथ क्रीड़ारत उन देवश्रेष्ठ विष्णु के पास आकर हिरण्यगर्भ, अण्डज, सोने के वर्णवाले, अतीन्द्रिय, चार मुख वाले तथा विशाल नेत्रों वाले ब्रह्मा ने शोभासम्पन्न, दिव्य, सुन्दर तथा सुगन्धित कमल के साथ सुन्दर नयनों वाले विष्णु को खेलते हुए देखा। तत्पश्चात् उनके सन्निकट पहुँचकर ब्रह्माजी ने विस्मयपूर्ण भाव से विनम्रतायुक्त वाणी में उनसे पूछा — आप कौन हैं और इस समुद्र के मध्य आश्रय लेकर क्यों सो रहे हैं ? ॥ ९-१११/२ ॥ उन ब्रह्मा का यह सुखद वचन सुनकर विष्णुजी पर्यंक से उठकर बैठ गये और नेत्रों में प्रसन्नता भरकर उनके उत्तर में कहने लगे कि मैं प्रत्येक कल्प में इसी स्थान का आश्रय लेकर शयन करता हूँ ॥ १२-१३ ॥ जो कुछ भी किया जाना है, किया गया है और किया जा रहा है तथा स्वर्गलोक, आकाश, पृथ्वी एवं भुवर्लोक — इन सबका परम पद मैं ही हूँ ॥ १४ ॥ उनसे इस प्रकार कहकर भगवान् विष्णु ने पुनः उनसे पूछा — ऐश्वर्यसम्पन्न आप कौन हैं तथा मेरे पास कहाँ से आये हैं? आप पुनः कहाँ जायँगे तथा आपका निवासस्थान कहाँ है? विश्वमूर्ति स्वरूप आप कौन हैं तथा मैं आपके लिये क्या करूँ ? ॥ १५-१६ ॥ भगवान् विष्णु के ऐसा कहने पर महात्मा शिव की माया से मोहित होने के कारण भगवान् जनार्दन को पहचाने बिना पितामह ब्रह्मा उन्हीं शिव की माया से मोह को प्राप्त अविज्ञात विष्णुदेव से कहने लगे, जिस प्रकार आप इस जगत् के आदिकर्ता तथा प्रजापति हैं, वैसे ही मैं भी हूँ ॥ १७-१८ ॥ जगत् के रचयिता ब्रह्माजी का यह विस्मयकारी वचन सुनकर और उनकी आज्ञा लेकर विश्व की उत्पत्ति करने वाले योगी महायोगी विष्णु भगवान् कौतूहलवश ब्रह्मा के मुख में प्रविष्ट हो गये ॥ १९१/२ ॥ ब्रह्माजी के उदर में प्रवेश करके वहाँ पर अठारह द्वीपों, सभी समुद्रों, समस्त पर्वतों, ब्राह्मण आदि चार वर्णों के जनसमूहों, सनातन सात लोकों तथा ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सभी स्थावर-जंगम पदार्थ देखकर महाभुज महातेजस्वी विष्णुभगवान् अत्यन्त विस्मित हुए । ‘अहो ! इनकी तपस्या का ऐसा प्रभाव’ — ऐसा बार-बार कहते हुए विष्णु भगवान् उदर के अन्दर विविध लोकों तथा अनेक स्थानों पर हजार वर्षों तक भ्रमण करते रहे, किंतु जब उसका अन्त नहीं पा सके, तब वे शेषशायी जगदाधार नारायण उन ब्रह्मा के मुखमार्ग से बाहर निकलकर उनसे कहने लगे — ॥ २०-२४ ॥ हे अनघ ! आप भगवान् हैं। आप आदि, अन्त, मध्य, काल, दिशा, आकाश आदि से युक्त हैं। मैं आपके उदर का अन्त नहीं देख पाया ॥ २५ ॥ ऐसा कहकर भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा से पुन: यह कहा — हे सुरश्रेष्ठ! मैं भी इसी तरह भगवान् हूँ । अब आप भी मेरे शाश्वत उदर में प्रवेश करके इन्हीं अनुपम लोकों का दर्शन करें ॥ २६१/२ ॥ लक्ष्मीकान्त विष्णु की यह आह्लादकारिणी वाणी सुनकर उन्हें प्रसन्न करते हुए ब्रह्माजी उनके उदर में प्रविष्ट हुए ॥ २७१/२ ॥ सत्य पराक्रम वाले ब्रह्माजी ने विष्णु के उदर में स्थित उन्हीं सब लोकों को देखा और उसमें बहुत भ्रमण करने के उपरान्त भी विष्णुदेव के उदर का अन्त नहीं पा सके ॥ २८ ॥ सभी इन्द्रिय द्वारों को निरुद्ध करके मैं सुखपूर्वक सो लिया – ऐसा सोचकर और ब्रह्माजी की गति को सर्वव्यापक विष्णुजी ने शीघ्र ही उनकी अभिलाषा पूर्ण करने की इच्छा की ॥ २९ ॥ तत्पश्चात् सभी द्वारों को बन्द देखकर पितामह ने अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करके नाभि में मार्ग पाया तथा पद्मसूत्र (कमलनाल)-के सहारे पुष्कर (कमल)-से स्वयं को बाहर निकाला, तदनन्तर पद्मगर्भ के समान कान्ति वाले जगद्योनि स्वयम्भू पितामह भगवान् ब्रह्मा कमल के ऊपर शोभित हुए ॥ ३०-३२ ॥ उस समुद्र के मध्य ब्रह्मा और विष्णु में अनेक प्रकार से संघर्ष चल रहा था, उसी समय श्रेष्ठ स्वर्ण के समान वस्त्र को धारण करने वाले, अमेय आत्मा वाले, जीवों के स्वामी शूलपाणि महादेव कहीं से वहाँ पर पहुँच गये, जहाँ वे शेषशायी अनन्त विष्णुभगवान् थे ॥ ३३-३४१/२ ॥ उनके शीघ्रतापूर्वक चलने से चरणों के प्रहार से संपीडित होकर समुद्र जल की बड़ी-बड़ी बूँदें आकाश तक पहुँचने लगीं और वहाँ कभी अत्यन्त गर्म तथा कभी अत्यन्त शीतल वायु बहने लगी ॥ ३५-३६ ॥ उस महान् आश्चर्य को देखकर ब्रह्मा ने विष्णु से कहा कि ये शीतल एवं उष्ण जल की बूँदें इस कमल को अत्यधिक कम्पायमान कर रही हैं। इस विषय में मेरी शंका का समाधान कीजिये अथवा आप कुछ और करना तो नहीं चाहते ? ॥ ३७१/२ ॥ ब्रह्मा के मुख से निर्गत इस प्रकार की बात सुनकर अप्रतिम कर्म वाले असुरसंहारक भगवान् विष्णु सोचने लगे कि मेरी नाभि में इस कौन-से जीव ने अपना स्थान बना लिया है, जो इस तरह प्रेमपूर्वक मधुर-मधुर बोल रहा है; तथा मैंने इसके प्रति कहीं क्रोध किया है — ऐसा मन में ध्यान करके विष्णु भगवान् यह उत्तर देने लगे — ॥ ३८-४० ॥ आप भगवान् हैं और आपको यहाँ कमल के विषय में व्याकुलता क्यों हो रही है ? हे देव! मैंने कौन-सा श्रेष्ठ कार्य किया है, जो आप मुझसे प्रेमपूर्वक बोल रहे हैं? हे पुरुषश्रेष्ठ! इसका कारण मुझे यथार्थ रूप से बताइये ॥ ४११/२ ॥ लोकयात्रा का अनुवर्तन करने वाले तथा कमल की आभा के समान नेत्रवाले देवेश्वर विष्णु के इस प्रकार बोलने पर वेदनिधि प्रभु ब्रह्मा ने उनसे कहा ॥ ४२१/२ ॥ यह मैं आपकी ही इच्छा से पूर्वकाल में आपके उदर में प्रविष्ट हुआ था । हे प्रभो ! जिस प्रकार प्रथम मेरे उदर में प्रवेश करके आपने सभी लोकों को देखा था, उसी प्रकार मैंने भी आपके उदर में उन सम्पूर्ण लोकों का दर्शन किया है ॥ ४३-४४ ॥ हे अनघ ! वहाँ मैं हजार वर्षों तक चक्कर लगाता रहा। इसके बाद ईर्ष्याभाव से युक्त होकर आपने मुझे वश में करने की इच्छा से चारों ओर से सभी इन्द्रिय द्वार शीघ्रतापूर्वक बन्द कर लिये ॥ ४५१/२ ॥ तदनन्तर हे महाभाग! मैं अपने तेज के प्रभाव से विवेकपूर्वक अतिसूक्ष्मरूप धारणकर आपके नाभि- स्थल से कमलनाल के सहारे बाहर निकल आया । इसके लिये आपके मन में थोड़ा भी विषाद नहीं होना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥ हे विष्णो! जो यह मेरा बाहर निकलना हुआ है, वह किसी विशेष कार्य के लिये है । अब आप मुझे यह बताइये कि मैं क्या करूँ ? ॥ ४८ ॥ तदनन्तर पितामह ब्रह्मा की प्रिय, मधुर, पवित्र तथा कल्याणमयी वाणी सुनकर हिरण्यकशिपु के शत्रु अप्रमेयात्मा भगवान् विष्णु ने ईर्ष्यारहित होकर उनसे यह वचन कहा कि आपके नाभिकमलोद्भव रूप इस कार्य के लिये मैंने कोई प्रयास नहीं किया है ॥ ४९-५० ॥ आपको बोध कराने की इच्छा से मैंने तो क्रीड़ापूर्वक दैवयोग से यों ही अपने सभी दरवाजे शीघ्र बन्द कर लिये थे। इसे आप कुछ भी अन्यथा न समझें। हे कल्याणकारक! आप मेरे मान्य तथा पूज्य हैं, अतएव मैंने आपका जो भी अपकार किया है, वह सब आप क्षमा करें ॥ ५१-५२ ॥ हे प्रभो ! मेरे द्वारा वहन किये जाते हुए आप अब कमल से उतर आइये; क्योंकि आपके अत्यन्त गुरुतर तथा तेजसम्पन्न होने के कारण मैं आपका भार सहन करने में समर्थ नहीं हूँ ॥ ५३ ॥ तब ब्रह्मा ने कहा कि आप मुझसे वरदान माँगिये । इस पर विष्णु कहने लगे — हे प्रभो ! आप कमल से नीचे उतर आइये और यही वर दीजिये कि आप मेरे पुत्र बनेंगे। हे शत्रुदलन ! इससे आपको भी अपार हर्ष प्राप्त होगा ॥ ५४ ॥ हे प्रभो! आप सद्भावनापूर्ण वचन बोलिये और कमल से नीचे उतर आइये। आप महायोगी तथा प्रणवरूप हैं। आप हमारे पूज्य हैं । आज से आप सबके स्वामी हैं तथा श्वेत पगड़ी से सदा शोभायमान रहेंगे और इस प्रकार ‘पद्मयोनि’ नाम से लोक में प्रसिद्ध होंगे। हे ब्रह्मन् ! हे प्रभो! आप मेरे पुत्र तथा सात लोकों के स्वामी हों ॥ ५५-५६१/२ ॥ तत्पश्चात् किरीटधारी विष्णु से ‘ऐसा ही होगा’ कहकर अर्थात् वर देकर ब्रह्माजी प्रसन्नतायुक्त तथा द्वेष रहित हो गये। इसके बाद पितामह ने उदीयमान सूर्य की आभा के समान विशाल मुख वाले तथा अत्यन्त अद्भुत रूप वाले शिव को अति समीप आते हुए देखकर भगवान् विष्णु से कहा — ॥ ५७-५८१/२ ॥ हे विष्णो! अप्रमेय, विशाल वक्त्र सम्पन्न, वाराह के समान दाढ़ों वाला, फैले हुए केशों वाला, दश भुजाओं वाला, त्रिशूलधारी, नेत्रों से हर जगह स्थित अर्थात् सर्वदर्शी, मुंज की मेखला धारण किये, विकृत रूप वाला, उन्नत तथा विशाल मेढ्र वाला, अत्यन्त भयंकर ध्वनि करता हुआ साक्षात् लोक-प्रभुतुल्य, महान् कान्तिसम्पन्न तथा तेजपुंज -सा यह कौन प्राणी सभी दिशाओं तथा आकाश को व्याप्त करके इधर ही चला आ रहा है ? ॥ ५९-६११/२ ॥ ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर भगवान् विष्णु ने उनसे कहा — इस सागर में चलने के कारण जिनके दोनों पैरों के आघात से आकाश में महान् वेग से जलाशय उठ रहे हैं, सभी ओर उठी हुई विशाल जल- बूँदों से आप सिक्त हो चुके हैं, जिनकी नासिका से निकली वायु से आपके साथ कम्पायमान यह महापद्म – जो मेरी नाभि से उत्पन्न है, स्वच्छन्दतापूर्वक दोलायमान हो रहा है, वे ही आदि-अन्तरहित पार्वतीनाथ प्रभु शिव आ रहे हैं। अब हम दोनों मिलकर स्तोत्र के द्वारा इन वृषध्वज महादेव की प्रार्थना करें — ॥ ६२-६५१/२ ॥ तत्पश्चात् कमल की आभा के समान नेत्रों वाले भगवान् विष्णु से ब्रह्माजी ने कुपित होकर कहा कि लोकों के स्वामी तथा सर्वव्यापी स्वयं अपने को एवं जगत् के कर्ता मुझ सनातन ब्रह्मा को आप नहीं जानते। हम दोनों से बढ़कर यह शंकर नाम वाला कौन है ? ॥ ६६-६७१/२ ॥ उन ब्रह्मा का वह क्रोधयुक्त वचन सुनकर भगवान् विष्णु बोले — हे कल्याणकारक ! महात्मा शिव के लिये ऐसा निन्दित वचन मत बोलिये। ये महादेव साक्षात् धर्मस्वरूप हैं, अत्यन्त प्रचण्ड हैं, महायोग प्रदीप्त करने वाले तथा वर प्रदान करने वाले हैं ॥ ६८-६९ ॥ ये शिव ही इस जगत् के कारण हैं । ये प्राचीन पुरुष हैं, समस्त बीजों अर्थात् कारणों के मूल बीज अर्थात् परम कारण हैं, निर्विकार हैं एवं एकमात्र ज्योति के रूप में जगत् को प्रकाशित कर रहे हैं। जिस प्रकार बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, उसी प्रकार ये महादेव स्वयं जगत् के साथ खेलते रहते हैं अर्थात् नानाविध लीलाएँ रचते रहते हैं ॥ ७०१/२ ॥ प्रधान, अव्यय, योनि, अव्यक्त, प्रकृति, तम, नित्य आदि ये नाम मुझ प्रसवधर्मी के हैं और जिनके विषय में आपने पूछा है कि ये कौन हैं, वे शिव जन्म-मरण आदि दुःखों का भलीभाँति अनुभव करके वैराग्य को प्राप्त यतियों द्वारा दृष्टिगत किये जाते हैं। ये शिव बीजवान् हैं, आप (ब्रह्मा) बीज हैं तथा सनातनरूप मैं (विष्णु) योनि हूँ ॥ ७१-७२१/२ ॥ विष्णु के इस प्रकार कहने पर विश्वात्मा ब्रह्मा ने उनसे पूछा — आप योनि, मैं बीज तथा महेश्वर शिव बीजी (बीजवान्) किस प्रकार हैं? आप मेरे इस सूक्ष्म तथा अव्यक्त संदेह का निवारण करने की कृपा करें ॥ ७३-७४ ॥ अनेक प्रकार से लोकतन्त्री ब्रह्मा की उत्पत्ति जानकर भगवान् विष्णु ने उनके इस परम निगूढ़ प्रश्न का उत्तर दिया। इन महादेव से बढ़कर अन्य कोई भी गूढ़ तत्त्व नहीं है। महत्तत्त्व का सर्वोत्कृष्ट स्थान अध्यात्म ज्ञानियों का कल्याणमय पद है ॥ ७५-७६ ॥ उन्होंने अपने को सगुण तथा निर्गुण — इन दो रूपों में विभाजित किया। उनमें जो निर्गुण हैं, वे अव्यक्तरूप में तथा जो सगुण हैं, वे महेश्वररूप में प्रतिष्ठित हैं ॥ ७७ ॥ प्राचीनकाल में सृष्टि के आदि में माया की विधि को भी जानने वाले, अगम्य तथा दुर्बोध उन्हीं महादेव के लिङ्ग से प्रादुर्भूत बीज सर्वप्रथम मेरी योनि में गिरा । पुनः कालान्तर में उस सागररूप योनि में वह बीज स्वर्ण के अण्ड में परिवर्तित हो गया ॥ ७८-७९ ॥ एक हजार वर्षों तक वह अण्ड जल में ही स्थित रहा; इस अवधि के अन्त में वायु के द्वारा यह दो भागों में विभक्त हो गया। एक खण्ड से आकाश तथा दूसरे खण्ड से पृथ्वी का प्रादुर्भाव हुआ । यह अति उन्नत जो स्वर्णपर्वत मेरु है, वह उस अण्ड के गर्भावरण से निर्मित हुआ ॥ ८०-८१ ॥ तत्पश्चात् प्रतिसन्ध्यात्मा देवाधिदेव हिरण्यगर्भ चतुर्मुख महाप्रभु भगवान् ब्रह्मा आविर्भूत हुए ॥ ८२ ॥ तारा, सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रपर्यन्त समस्त लोकों को शून्य देखकर ‘मैं कौन हूँ’ — ऐसा आपके विचार करने पर पुनः एक हजार वर्ष के अनन्तर यतियों के पूर्वज, यत्नशील, प्रिय दर्शन वाले, समस्त भुवनों को अपने तेज से व्याप्त करने वाले, कमलपत्र के समान विशाल नेत्रों वाले श्रीमान् सनत्कुमार, ऋभु, सनक, सनातन तथा सनन्दन नामक वे कुमार आपके पुत्ररूप में आविर्भूत हुए, जिनमें सनत्कुमार तथा ऋभु ऊर्ध्वरेता थे । बुद्धि तथा इन्द्रियों से अगोचर, विशिष्ट ज्ञानसम्पन्न, जगत् की स्थिति के कारणरूप तथा तीन प्रकार के तापों से रहित वे कुमार एक साथ उत्पन्न हुए थे, जिनकी कर्ममार्ग में प्रवृत्ति नहीं थी ॥ ८३-८७ ॥ जीवन में सुख कम तथा दुःख अधिक है, जीवन जरा तथा शोक से युक्त है, जीवन में जन्म तथा मरण बार-बार होते रहते हैं, स्वर्ग में अत्यल्प सुख तथा नरक में दुःख-ही-दुःख है और भावी अटल है — ये सब बातें अवश्यम्भावी हैं, ऐसा जानकर ऋभु तथा सनत्कुमार को आपके वश में स्थित देखकर त्रिगुणातीत सनक – सनातन- सनन्दन — ये आपके तीनों महातेजस्वी पुत्र अध्यात्मसम्बन्धी ब्रह्मज्ञान की ओर प्रवृत्त हो गये ॥ ८८-९०१/२ ॥ तत्पश्चात् उन सनक आदि तीनों कुमारों के ज्ञानमार्ग में प्रवृत्त हो जाने पर आप महादेव की माया से विमूढ़ (मोहित) हो गये। हे अनघ ! इस प्रकार कल्प के प्रवृत्त होने पर आपका ज्ञान नष्ट हो जाया करता है ॥ ९१-९२ ॥ कल्प में जो सूक्ष्म जीव तथा पार्थिव पदार्थ अवशिष्ट रह जाते हैं । उन सबको जाग्रत् करने वाली शक्ति ही ऐश्वरी माया कही गयी है ॥ ९३ ॥ जिस प्रकार यह मेरुपर्वत देवलोक के रूप में प्रसिद्ध है, उसी प्रकार उन देवश्रेष्ठ महादेव के इस माहात्म्य को भी प्रसिद्ध समझिये ॥ ९४ ॥ परमेश्वर महादेव का सद्भाव जानकर तथा मुझ कमलनयन को जानकर प्रणवयुक्त साममन्त्रों के द्वारा भूतों के भी महाभूत वरदाता जगद्गुरु प्रभु महादेव को नमस्कार करके उठिये, अन्यथा ये क्रोधित होकर अपने निःश्वास से मुझे तथा आपको दग्ध कर डालेंगे ॥ ९५-९६ ॥ इस प्रकार उनके महान् योग तथा अमित बल को जानकर आपको आगे करके अग्निसदृश प्रभा वाले महादेव के निकट खड़ा होकर मैं उनकी स्तुति करूँगा ॥ ९७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘ब्रह्मप्रबोधन’ नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ Content is available only for registered users. 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