January 13, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -023 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ तेईसवाँ अध्याय विभिन्न कल्पों में होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारों का वर्णन, विभिन्न लोकों की स्थिति तथा महारुद्र का विश्वरूपत्व श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रयोविंशोऽध्यायः विविधकल्पवर्णनं सूतजी बोले — ब्रह्माजी का वह वचन सुनकर उनके प्रबोधन के लिये ब्रह्मरूप भगवान् शिव ने मुसकराकर उनसे कहा — ॥ १ ॥ जब श्वेतकल्प था, उस समय मैं श्वेत वर्ण का था । मेरी श्वेत पगड़ी, श्वेत माला, श्वेत वस्त्र, श्वेत अस्थि, श्वेत रोम, श्वेत त्वचा तथा श्वेत ही मेरा रुधिर था। इसी कारण से वह कल्प ‘श्वेतकल्प’ नाम से विख्यात हुआ ॥ २-३ ॥ उस कल्प में मुझसे उत्पन्न ब्रह्म नाम से जानी जाने वाली देवेश्वरी गायत्री भी श्वेत अंगोंवाली, श्वेत रक्तवाली तथा श्वेत वर्ण वाली थीं ॥ ४ ॥ तदनन्तर हे देवेश ! आपने अपने उग्र तप से सद्योजातत्व को प्राप्त मुझ शिव को जाना ॥ ५ ॥ मेरा यह सद्योजात रूप गुह्य ब्रह्म के रूप में जाना जाता है। अतएव गुह्यत्व को प्राप्त मुझ सद्योजात शिव को जो द्विजातिगण जानेंगे, वे मेरे सान्निध्य को प्राप्त होंगे, जहाँ से उनका पुनरागमन नहीं होता अर्थात् वे जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं ॥ ६१/२ ॥ पुनः जब मेरा नाम लोहित था, तब मेरे द्वारा धारित लोहित वर्ण के कारण वह कल्प लोहितकल्प नाम से कहा गया ॥ ७१/२ ॥ उस कल्प में रक्तवर्ण के मांस तथा हड्डियों वाली, रक्त-वर्ण का दूध प्रदान करने वाली, लाल आँखों वाली तथा लाल स्तन वाली धेनुरूप में गायत्री अधिष्ठित हुईं ॥ ८१/२ ॥ तदनन्तर उस धेनु के लोहितत्व, उस कल्प में वर्ण के बदल जाने तथा योग की वामता के कारण मैं वामदेवत्व को प्राप्त हुआ अर्थात् मेरा नाम वामदेव पड़ गया ॥ ९१/२ ॥ हे महासत्त्व ! उस कल्प में भी नियत आत्मा वाले आपने अपने योगबल से लोहितवर्ण-स्थित मुझ परमेश्वर को जाना और तभी से मैं पृथ्वीलोक में वामदेव नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त हो गया ॥ १०-११ ॥ जो भी द्विजातिगण मेरे वामदेवस्वरूप को जानेंगे, वे जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति प्राप्त कराने वाले मेरे रुद्रलोक में निवास करेंगे ॥ १२ ॥ जब मैं युगक्रम से पीतवर्ण वाला हुआ, तब मेरे वर्णनाम पर उस कल्पका नाम पीतकल्प हुआ ॥ १३ ॥ मेरे द्वारा उत्पन्न तथा ब्रह्म नाम से जानी जाने वाली देवेश्वरी गायत्री का भी अंग पीला, रक्त पीला तथा वर्ण आदि सब पीला था ॥ १४ ॥ उन द्विजातियों ने योगयुक्त चित्त से मुझे जाना । हे कनकाण्डज ! हे महासत्त्व! उस कल्प में भी योगपरायण मन वाले उस कल्प में तुमने भी मुझे पुनः तत्पुरुषरूप में जाना; उसी कारण से मेरा यह तत्पुरुष नाम हुआ ॥ १५-१६ ॥ तपस्या से युक्त, विशुद्ध मन वाले तथा ब्रह्मपरायण जो लोग मुझ रुद्र तथा वेदमाता रुद्राणी गायत्री की आराधना करेंगे, वे पुनर्जन्म से मुक्ति दिलाने वाले रुद्रलोक को प्राप्त होंगे ॥ १७१/२ ॥ पुनः जब मैंने भयानक कृष्णवर्ण धारण किया, तब मेरे वर्ण के नाम से वह कल्प कृष्णकल्प कहा गया ॥ १८१/२ ॥ हे ब्रह्मन् ! उस कल्प में भी तुमने कालसदृश, कालरूप, लोकों के लिये महाकाल तथा घोर पराक्रम वाले मुझ घोर को जाना ॥ १९१/२ ॥ देवेश ! उस कल्प में मुझसे उत्पन्न ब्रह्मसंज्ञा वाली गायत्री भी कृष्ण अंगों वाली, कृष्ण रक्तवाली तथा कृष्ण रूप वाली थीं ॥ २०१/२ ॥ अतएव इस भूतल पर जो लोग घोरत्व को प्राप्त मुझ शिव को जान लेंगे, शाश्वत रूपवाला मैं उनके लिये सौम्य तथा शान्त हो जाऊँगा ॥ २११/२ ॥ हे ब्रह्मन् ! पुनः जब मैं विश्वरूपत्व को प्राप्त हुआ, उस समय भी आपने परम समाधि से मुझे जाना था। उस समय समस्त लोकों को धारण करने वाली गायत्री भी विश्वरूपा अर्थात् अनेक वर्णों वाली थीं ॥ २२-२३ ॥ इस भूतल पर जो लोग विश्वत्व को प्राप्त मुझ परमात्मा को जान लेंगे, उनके प्रति मैं सदा के लिये सौम्य तथा शान्त हो जाऊँगा ॥ २४ ॥ इसी कारण यह कल्प विश्वरूप कल्प नाम से जाना गया और ये गायत्री विश्वरूपा नाम से कही गयीं । वे सर्वरूपा थीं और ये सद्योजात आदि चार कुमार मेरे पुत्ररूप में प्रकट हुए, जिनकी लोक में विशेष प्रसिद्धि हुई ॥ २५-२६ ॥ ये गायत्री शब्द और अर्थरूप से मेध्या अर्थात् यज्ञ योग्या होंगी, सर्वभक्षा अर्थात् पातकादिविनाशिका होंगी। गायत्री के [सावित्री के] सर्ववर्णा (सर्वशब्दात्मिका) होने से ही चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था प्रजा में व्यवस्थित होगी ॥ २७ ॥ इसीलिये धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष – चार प्रकार के ये पुरुषार्थ हैं और वेद भी चार हैं। जीव-समुदायों के भी जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज – ये चार प्रकार के रूप हैं तथा आश्रम भी चार हैं। दया, दान, तप, सत्य — ये धर्म के चार पाद हैं एवं मेरे पुत्र भी चार हैं ॥ २८-२९ ॥ इसीलिये यह चराचर जगत् युगरूप चार अवस्थाओं वाला है और यह चतुष्पादात्मक लोक भी भेदानुसार चार रूपों में अवस्थित है ॥ ३० ॥ भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक तथा सत्यलोक — इन सबके परे विष्णुलोक स्थित है ॥ ३१ ॥ अष्टाक्षररूप लोक अपने-अपने स्थान पर अक्षरात्मकरूप में विद्यमान हैं। भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोक ही चार पाद के रूप में अवस्थित हैं। इनमें भूर्लोक पहला पाद है, भुवर्लोक दूसरा पाद है, स्वर्लोक तीसरा तथा महर्लोक चौथा पाद ॥ ३२-३३ ॥ पाँचवाँ जनलोक, छठा तपलोक तथा पुनर्जन्म की प्राप्ति न करने वाले लोगों का सत्यलोक सातवाँ लोक कहा गया है ॥ ३४ ॥ विष्णुलोक वह पद है, जहाँ पहुँचकर जीव का पुनः आगमन नहीं होता है। उससे भी आगे स्कन्दलोक तथा उससे भी परे पार्वतीलोक है, जो सर्वविध सिद्धियों से युक्त माना गया है ॥ ३५ ॥ रुद्रलोक उससे परे विद्यमान है। वह पद योगियों के लिये अत्यन्त शुभकर कहा गया है। ममतारहित, अहंकार-शून्य, काम-क्रोध से विवर्जित तथा ध्यानपरायण चित्त वाले योगीजन ही उस लोक का दर्शन करेंगे ॥ ३६१/२ ॥ और जो आपने चार पादों वाली इस गायत्री (सरस्वती) – को देखा है, उसी के चार चरणों के रूप में चरम पद वाला विष्णुलोक, शान्त तथा उत्तम स्कन्दलोक, पार्वतीलोक एवं रुद्रलोक अवस्थित हैं। ऐसी माहात्म्ययुक्त सरस्वती का आपने दर्शन किया है ॥ ३७-३८ ॥ इससे सभी पशु भी चार पैरों वाले होंगे और इसी से इनके चार स्तन भी होंगे। हे ब्रह्मन् ! मेरे मुख से गिरा हुआ मन्त्रयुक्त सोमरूप अमृत प्राणधारियों का जीवन बनकर उनके स्तन में निवास करेगा। इसलिये वे स्तन ‘पीतस्तन’ कहे जायँगे ॥ ३९-४० ॥ उसी के कारण सोममय अमृत जीवनसंज्ञा वाला होगा और उनके दुग्ध का श्वेतत्व उसी सोमरूपत्व के कारण होगा- ऐसे गुणों वाले वे चतुष्पाद होंगे ॥ ४१ ॥ आपके द्वारा देखी गयी यह लोकभाविनी सावित्री महेश्वरी पुनः दो पादों वाली होकर क्रियारूप धारण करेगी; जिससे सभी शुभ नर-नारी दो पादों तथा दो स्तनों वाले होंगे ॥ ४२१/२ ॥ सभी प्राणियों को धारण करने वाली तथा महान् शक्ति सम्पन्न जिस देवी का आपने दर्शन किया है; वह महेश्वरी अजा होकर जब सर्ववर्णमय विश्वरूप धारण करेगी, तब उसी से सभी प्रजाएँ भी अनेक वर्णों वाली होंगी ॥ ४३-४४ ॥ तब महातेज तथा अमोघ वीर्यवाले अज विश्वरूप धारण करेंगे और इनके मुख में सर्वत्र अग्नि विराजमान होगी; उसी कारण सर्वव्यापी पशुरूपी अग्नि पवित्र मानी जायगी ॥ ४५१/२ ॥ विशुद्ध आत्मा वाले जो द्विजगण अपनी तपस्या से ईशित्व (ईश्वरत्व) तथा वशित्व ( योगसिद्धि ) – में सभी जगह मुझे भी सर्वव्यापी रूप में विराजमान देखेंगे; वे रजोगुण तथा तमोगुण से रहित होकर मानव शरीर का त्याग करके मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे और उनका पुनर्जन्म नहीं होगा ॥ ४६-४७१/२ ॥ सूतजी कहते हैं कि हे द्विजो! शिवजी के इस प्रकार कहने पर भगवान् ब्रह्मा ने प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक रुद्र से पुन: कहा — हे भगवन्! जो विद्वान् सर्वव्यापी विश्वात्मा आप महेश्वर को गायत्री सहित सर्वत्र स्थित देखे तथा हे ईश्वर! आपकी एवं गायत्री की आराधना करे, उसे आप परमपद दें । इस पर उन शिवजी ने कहा — वैसा ही होगा ॥ ४८–५० ॥ इसलिये प्रभु शिव द्वारा ब्रह्माजी के प्रति कहे गये वचन के अनुसार जो विद्वान् गायत्री तथा महात्मा रुद्र का विश्वरूपत्व जान लेता है, वह ब्रह्मसायुज्य को प्राप्त होता है अर्थात् ब्रह्म के साथ उसका तादात्म्य स्थापित हो जाता है ॥ ५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘विविधकल्पवर्णन’ नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥ Content is available only for registered users. 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