January 15, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -026 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ पचीसवाँ अध्याय लिङ्गार्चन विधि के अन्तर्गत शरीर एवं मन की शुद्धि के लिये अन्तः एवं बाह्य स्नान की प्रक्रिया और विविध मन्त्रों से आत्माभिषेचन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षड्विंशोऽध्यायः पञ्चयज्ञविधानं नन्दिकेश्वर बोले — [हे सनत्कुमार!] इस विधि से स्नान करने के पश्चात् ‘आयातु वरदा देवी’ ॐ आयातु वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि । गायत्रिच्छन्दसां मातः! ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते ॥इस मन्त्र से महेश्वरी वेदमाता गायत्री का आवाहन करना चाहिये और पुनः पाद्य, आचमन, अर्घ्य आदि अर्पित करना चाहिये। पुनः तीन बार प्राणायाम करके बैठे-बैठे अथवा खड़े होकर एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार गायत्री जप प्रणव के साथ नियमपूर्वक करना चाहिये। इन तीनों में किसी एक विधि से ही जप करना चाहिये ॥ १-३ ॥ सूर्य को अर्घ्य देकर उनका पूजनकर सिर झुकाकर प्रणाम करके ‘उत्तमे शिखरे देवी [^1] ऐसा कहकर माता का विसर्जन करके पूर्व दिशा में देखते हुए वेदमाता महेश्वरी गायत्री का अभिवन्दन करके दोनों हाथ जोड़कर सूर्य की प्रार्थना करनी चाहिये। ‘उदुत्यं जातवेदसम् [^2] तथा ‘चित्रं देवानाम् ‘[^3] . – इन मन्त्रों से सूर्य तथा ब्रह्मा को नमस्कार करके ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के सूर्य सम्बन्धी सूक्तों का विधानपूर्वक पाठ करके तीन बार सूर्यदेव की प्रदक्षिणा करनी चाहिये ॥ ४-७ ॥ इसके बाद आत्मा, अन्तरात्मा तथा परमात्मा का ध्यान करके सूर्य, ब्रह्मा एवं अग्नि को प्रणाम करना चाहिये । पुनः मुनियों, पितरों तथा देवताओं – सभी का उनका अपने नाम से आवाहन करे । सबको आवाहित करके पूर्वमुख अथवा उत्तरमुख होकर उनके तत्त्वों तथा स्वरूपों का ध्यान करके विधिपूर्वक क्रम से तीर्थ के जल से तर्पण करना चाहिये और अन्त में प्रणाम करना चाहिये ॥ ८-१० ॥ पुष्पयुक्त जल से देवताओं का, कुशयुक्त जल से ऋषियों का तथा तिल और गन्धयुक्त जल से पितरों का तर्पण करना चाहिये ॥ ११ ॥ हे विप्रेन्द्र ! यज्ञोपवीती अर्थात् सव्य होकर देवतर्पण, निवीती अर्थात् कण्ठ में यज्ञोपवीत धारण करके ऋषितर्पण तथा प्राचीनावीती अर्थात् अपसव्य होकर पितृतर्पण क्रमानुसार करना चाहिये ॥ १२ ॥ सभी सिद्धियों की प्राप्ति के लिये बुद्धिमान् तथा विद्वान् वेदज्ञ ब्राह्मण को चाहिये कि वह अंगुलि के अग्रभाग से देवतर्पण, कनिष्ठ अँगुलि से ऋषितर्पण एवं दाहिने अँगूठे से पितृतर्पण सम्पन्न करे ॥ १३१/२ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! इसी प्रकार यज्ञकर्मपरायण तथा पवित्रात्मा द्विज को ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, भूतयज्ञ एवं पितृयज्ञ करना चाहिये ॥ १४-१५ ॥ हे विप्रो ! अपनी शाखा का अध्ययन करना ब्रह्मयज्ञ कहा गया है तथा अग्नि में अन्न आदि का हवन देवयज्ञ कहा गया है। उसी प्रकार सभी भूतों के लिये विधिपूर्वक बलि देना भूतयज्ञ कहा जाता है; यह भूतयज्ञ प्राणियों को ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है। वेदवेत्ता एवं तत्त्वज्ञ ब्राह्मणों को उनकी भार्यासहित सभी को प्रणाम करके उन्हें अन्न का दान करना मनुष्ययज्ञ कहा जाता है । पितरों के निमित्त जो श्राद्ध आदि सम्पन्न किया जाता है, उसे पितृयज्ञ कहते हैं। इस प्रकार सभी मनोरथों की सिद्धि के लिये इन पाँच महायज्ञों को करना चाहिये ॥ १६–१९ ॥ सुनिये, ब्रह्मयज्ञ सभी यज्ञों से श्रेष्ठ यज्ञ कहा गया है । ब्रह्मयज्ञ करने वाला मनुष्य ब्रह्मलोक में वास करते हुए आनन्दित होता है । ब्रह्मयज्ञ से इन्द्रसमेत सभी देवता, ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, नीललोहित शंकरजी, सभी वेद तथा पितृगण संतुष्ट हो जाते हैं; इसमें किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये ॥ २०-२११/२ ॥ ब्रह्मयज्ञ करने के लिये ब्रह्मयज्ञवेत्ता ब्राह्मण को गाँव से उतनी दूर बाहर चले जाना चाहिये, जहाँ से झोपड़ियों की छत तक दिखायी न दे। वहाँ बैठकर पूर्व, उत्तर अथवा ईशान दिशा की ओर मुख करके शुद्धि के लिये आचमन करना चाहिये ॥ २२-२३१/२ ॥ हे ब्राह्मणो! ऋग्वेदाधिष्ठातृ देवता की प्रीति के लिये तीन बार चुलुकभर जल पीकर, यजुर्वेदाधिष्ठातृ देवता की प्रीति के लिये जल द्वारा दो बार प्रक्षालन एवं परिमार्जन करके, सामवेदाधिष्ठातृ देवता की प्रीति के लिये आचमन करके मूर्धा का स्पर्श करे। आंगिरस सम्बन्धी अथर्ववेद के अधिष्ठातृ देवता की प्रीति के लिये नेत्रों का स्पर्श करे । ब्राह्मणग्रन्थों, शिक्षा-कल्प आदि वेदांगों की प्रीति के लिये नासिका को जल से पवित्रकर स्पर्श करे । क्रमशः ब्रह्म आदि अठारह पुराणों, सौर आदि उपपुराणों, पवित्र इतिहासग्रन्थों तथा शैवादि आगम-ग्रन्थों की तुष्टि के लिये कान का स्पर्श करे । तदनन्तर हृदयदेश का स्पर्श करे । हे श्रेष्ठ कल्पवेत्ताओ! सभी कल्प-ग्रन्थों के लिये भी पूर्वोक्त क्रिया करनी चाहिये ॥ २४– २८१/२ ॥ बुद्धिमान् एवं संयमी श्रोत्रिय को समाहितचित्त होकर इस प्रकार आचमन करके अपने दक्षिण से उत्तर की ओर कुश बिछाकर उसपर हाथ रखकर अपने हाथ की अँगुली में कुशा की पवित्री अथवा सोने की अँगूठी धारणकर विधिपूर्वक ब्रह्मयज्ञ करना चाहिये। मुनि तथा द्विज होकर जो मनुष्य इन पाँच महायज्ञों को किये बिना भोजन करता है, वह सूकर की योनि में जन्म लेता है । अतः अपने कल्याण के इच्छुक व्यक्ति को विशेष प्रयत्न के साथ इन्हें सम्पन्न करना चाहिये ॥ २९–३२ ॥ ब्रह्मयज्ञ के पश्चात् डुबकी लगाकर स्नान करके इन्द्रियों को वश में रखने वाले उस पुरुष को चाहिये कि तीर्थ का जल लेकर विधिवत् शिविर में प्रवेश करे । घर के बाहर जल से हाथ-पैर धोकर पुनः देह की शुद्धि के लिये विधिपूर्वक भस्मस्नान करना चाहिये। इसके लिये अग्निहोत्र का भस्म लेकर नियमानुसार प्रणव से उसका शोधन कर लेना चाहिये । सूर्य के ज्योतिस्वरूप होने से सूर्योदय के पश्चात् प्रातः काल ‘ज्योतिः सूर्य०’ इस मन्त्र से और सायंकाल में ‘ज्योतिरग्नि०’ इस मन्त्र से हवन करना चाहिये। सूर्योदय हुए बिना किया गया अग्निहोत्र व्यर्थ होता है । इसलिये सूर्योदय के बाद किये गये हवन की भस्म पवित्र तथा कल्याणप्रद होती है ॥ ३३–३६ ॥ सत्य के समान कुछ भी नहीं है और असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं होता है । हे सुव्रतो ! ईशानमन्त्र से सिर, तत्पुरुष से मुख, अघोर से वक्षःस्थल, वामदेव से गुह्यस्थान, सद्योजात से दोनों पैर तथा प्रणव से सभी अंगों का भस्माभिषेचन करना चाहिये ॥ ३७-३८ ॥ ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ पुरुष को इस भाँति भस्म-स्नान करके हाथ-पैर धोकर हाथ में कुश लेकर देवदेव शिव का स्मरण करते हुए ‘आपो हि ष्ठा’ [^4] आदि मन्त्रों तथा ऋक्, यजुः एवं साम के पवित्र मन्त्रों से मन्त्रस्नान करना चाहिये ॥ ३९-४० ॥ ब्राह्मणों के हित के लिये ही मैंने इस स्नानविधि का आज आपसे संक्षेप में वर्णन किया है। जो मनुष्य एक बार भी इस विधि से स्नान करेगा, वह परम गति को प्राप्त होगा ॥ ४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘पंचयज्ञविधान’ नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥ [^1]: ॐ उत्तमे शिखरे देवी भूम्यां पर्वतमूर्धनि । ब्राह्मणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम् ॥ [^2]: ॐ उदु॒ त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः ॥ दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥ (यजु० ७ । ४१) [^3]: ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष सूर्यꣳ आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥ (यजु० ७ । ४२) [^4]: ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः। ॐ ता न ऊर्जे दधातन । ॐ महे रणाय चक्षसे । ॐ यो वः शिवतमो रसः । ॐ तस्य भाजयतेह नः। ॐ उशतीरिव मातरः । ॐ तस्मा अरं गमाम वः । ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ । ॐ आपो जनयथा च नः । Content is available only for registered users. 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