January 16, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -033 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ तैंतीसवाँ अध्याय मुनियों को शिवभक्ति का उपदेश श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ऋषिवाक्यं नन्दीश्वर बोले — उन मुनियों के द्वारा संस्तुत भगवान् महेश्वर उनकी स्तुति सुनकर उनके प्रति अनुग्रहशील होकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनसे यह वचन बोले ॥ १ ॥ जो विप्र आप लोगों द्वारा की गयी स्तुति को पढ़ेगा अथवा सुनेगा अथवा द्विजों को सुनायेगा, वह मेरे गणों में मुख्य स्थान प्राप्त करेगा ॥ २ ॥ हे मुनिश्रेष्ठो ! आप भक्तों के हितार्थ अब शुभ उपदेश करता हूँ। इस जगत् में समस्त स्त्रीलिङ्ग – समुदाय मेरे शरीर से उत्पन्न प्रकृतिदेवी का ही रूप है और हे विप्रो ! सभी पुंल्लिंग – समुदाय मेरी देह से उत्पन्न पुरुष का रूप है। हे विप्रो! यह सृष्टि मुझसे प्रादुर्भूत पुरुष-प्रकृति (नर-नारी) इन्हीं दोनों से हुई है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ३-४ ॥ सभी शिवरूप हैं, अतएव किसी की भी निन्दा न करें। विशेष रूप से मेरी भक्ति में तत्पर उत्तम, दिगम्बर, ब्रह्मवादी, बालस्वभाव वाले, उन्मत्त तथा चेष्टारहित यति की तो कभी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये ॥ ५ ॥ भस्म से विभूषित होकर दग्ध पापों वाले, इन्द्रियजित्, ध्यानपरायण, नित्य नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले तथा महादेव की भक्ति में तत्पर जो विप्र मन-वाणी एवं शरीर से संयत होकर मुझ महादेव की यथोक्त रीति से पूजा-आराधना करते हैं, वे रुद्रलोक को प्राप्त होते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता है। अतएव व्यक्त लिङ्ग वाले शिव का यह [ पाशुपत] व्रत परम दिव्य तथा अव्यक्त है ॥ ६–८ ॥ विद्वान् मनुष्य को चाहिये कि भस्म धारण किये तथा मुण्डित सिर जो शिवरूप व्रती हैं, उनकी न तो निन्दा करे तथा न तो उनकी बातों का उल्लंघन करे । लोक एवं परलोक में अपना हित चाहने वाले को ऐसे महात्माओं पर न तो हँसना चाहिये और न तो उनके प्रति अप्रिय वचन बोलना चाहिये ॥ ९१/२ ॥ जो मनुष्य इनकी निन्दा करता है, वह मन्दबुद्धि साक्षात् महादेव की निन्दा करता है तथा जो इनकी नित्य पूजा करता है, वह महादेवजी की पूजा करता है ॥ १०१/२ ॥ इस प्रकार ये महायोगी शिवजी भस्म – भूषित होकर लोक-कल्याण की कामना से युग-युग में नानाविध क्रीड़ाएँ करते हैं। आप लोग भी ऐसा ही आचरण कीजिये; उससे आप लोगों का कल्याण होगा तथा आप लोग सिद्धि प्राप्त करेंगे ॥ ११-१२ ॥ महाभय का नाश करने वाले शिव-कथित अतुलनीय तथा परमपद को जानकर उन मुनियों का चित्त सांसारिक लोभ एवं मोह से रहित हो गया और उन्होंने शंकरजी के चरणों पर सिर रखकर प्रणाम किया ॥ १३ ॥ इस प्रकार शिव की बातें सुनकर प्रसन्न मन वाले उन मुनियों ने गन्ध, पुष्प तथा कुश से मिश्रित शुद्ध जल से परिपूर्ण विशाल घड़ों से महेश्वर को स्नान कराया और पुनः वे गूढ़ तथा हुंकारयुक्त सुन्दर स्वरों से महादेवजी का स्तुति गान करने लगे ॥ १४-१५ ॥ देवाधिदेव महादेव को नमस्कार है। अर्धनारीश्वर तथा सांख्ययोग के प्रवर्तक शिव को नमस्कार है। मेघवाहन कृष्ण (सदाशिव), गजचर्म को अधोवस्त्र के रूप में धारण करने वाले, कृष्णमृग के चर्म को उत्तरीय के रूप में धारण करने वाले एवं सर्प को यज्ञोपवीत के रूप में धारण करने वाले शिव को नमस्कार है ॥ १६-१७ ॥ सुन्दर बने हुए अतिविचित्र कुण्डल धारण करने वाले, सुन्दर रचित माला को आभूषण के रूप में धारण करने वाले, सिंह के उत्तम चर्म को वस्त्र के रूप में धारण करने वाले तथा विस्तृत यश वाले आप शंकर को नमस्कार है ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् उस स्तुति से अत्यन्त प्रसन्नता को प्राप्त उन महादेव ने उन मुनियों से पुनः कहा — हे सुव्रती मुनीश्वरो! मैं तुम लोगों की तपस्या से अति प्रसन्न हूँ । तुम सब वर माँगो ॥ १९ ॥ इसपर भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, अत्रि, सुकेश, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, कश्यप, कण्व, संवर्त आदि उन सभी महान् तपस्वी मुनियों ने शिवजी को प्रणामकर उनसे यह वचन कहा — भस्म- स्नान, नग्नता, वामता, प्रतिलोमता ( काम्य कर्ममार्ग में प्रवृत्ति), सेव्य तथा असेव्य – इनके विषय में हम जानना चाहते हैं ॥ २०–२२१/२ ॥ इसपर उनकी बात सुनकर परमेश्वर भगवान् शिव ने मुसकराकर सभी मुनिवरों की ओर देखकर उनसे कहा ॥ २३-२४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘ऋषिवाक्य’ नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe