श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -048
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
अड़तालीसवाँ अध्याय
भूमध्य में स्थित मेरु (सुमेरु) पर्वत और इन्द्र आदि लोकपालों की पुरियों का वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अष्टचत्वारिंशोऽध्याय
मेरुगिरिवर्णनं

सूतजी बोले —  इस द्वीप के मध्य में मेरु नामक महान् पर्वत है। पर्वतों में श्रेष्ठ यह अनेक प्रकार के रत्नों से पूर्ण शिखरों से यह युक्त होकर स्थित है ॥ १ ॥ चौरासी हजार योजन ऊँचाई वाला कहा गया है। यह सोलह हजार योजन पृथ्वी के नीचे प्रविष्ट है और सोलह हजार योजन ही फैला हुआ है। यह एक चौड़े शराव (कसोरा ) – के समान स्थित है और बत्तीस हजार योजन चोटी पर फैला हुआ है। इसका घेरा इसके विस्तार से तीन गुना है॥ २-३ ॥ यह महेश्वर के शुभ शरीर के स्पर्श से सुवर्ण का हो गया है। यह धतूर के पुष्प के समान आभा वाला, सभी देवताओं का निवासस्थान तथा देवताओं की क्रीड़ाभूमि है और अनेक आश्चर्यों से भरा हुआ है ॥ ४१/२

इस महान् पर्वत का आयाम एक लाख योजन है । पृथ्वी के नीचे यह सोलह हजार योजन तक है और हे विप्रेन्द्रो ! उस पर्वत का शेष भाग पृथ्वी के ऊपर है । इस पर्वत के मूल के आयाम ( दैर्घ्य ) – का प्रमाण विस्तार में है; उसके विस्तार को पर्वत के मूल से दुगुना कहा गया है ॥ ५-७ ॥ यह पूर्व में पद्मराग की आभा के समान, दक्षिण में स्वर्ण के समान, पश्चिम में नीलमणि के समान और उत्तर में मूँगे के समान है ॥ ८ ॥ इसके पूर्वभाग में अमरावती ( इन्द्रपुरी) है, जो अनेक प्रकार के महलों से युक्त, अनेक देवताओं से भरी हुई और मणिमय जालों से घिरी हुई है । यह विविध आकार वाले तथा स्वर्ण एवं रत्नों से विभूषित गोपुरों, सोने तथा मणियों के बने हुए अद्भुत तोरणों, राजमार्ग पर स्थित-वार्तालाप में प्रवीण- सभी आभूषणों से अलंकृत-स्तन के भार से झुकी हुई एवं मद के कारण घूर्णित नेत्रों वाली हजारों स्त्रियों से भरी और चारों ओर से अप्सराओं से घिरी हुई है । यह विचित्र बावलियों से युक्त है । यह खिले हुए कमलों से सुशोभित, स्वर्ण की बनी हुई सीढ़ियों वाले, स्वर्णमय बालुओं वाले, नीलकमलों तथा अन्य प्रकार के कमलों से शोभायमान, सुगन्धित नील कमलों एवं स्वर्णकमलों वाले इस प्रकार के सरोवरों से तथा नदियों और नदों से युक्त यह सुन्दर पुरी [ अत्यन्त ] शोभित है। उस पुरी से यह सुन्दर पर्वत भी सुशोभित होता है ॥ ९–१४ ॥

इस पर्वत के आग्नेय (दक्षिण – पूर्व ) भाग में अग्निदेव की तेजस्विनी नामक पुरी है। यह अमरावतीतुल्य, दिव्य तथा समस्त भोगों से परिपूर्ण है ॥ १५ ॥ हे व्रतियों में श्रेष्ठ मुनिगण! इसके दक्षिण में यम की उत्तम वैवस्वती नामक पुरी है। यह सुवर्णमय, दिव्य तथा शुभ भवनों से घिरी हुई है ॥ १६ ॥ इसके नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)-में कृष्णवर्ण की सुन्दर शुद्धवतीपुरी है और वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशा में उसी प्रकार की सुन्दर पुरी गन्धवती है। इसके उत्तर में महोदया तथा ईशान ( उत्तर-पूर्व ) – में यशोवती नामक पुरी है। इस प्रकार मेरु पर्वत की सभी दिशाओं में द्युलोक में पुरियाँ सर्वदा सुशोभित रहती हैं ॥ १७-१८ ॥ यह पर्वत ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य देवताओं का निवासस्थान है। यह समस्त सुख-साधनों से सम्पन्न, पुण्यमय, अनेक झीलों और उत्तम वृक्षों से युक्त है। यह सिद्धों, यक्षों, गन्धर्वों, श्रेष्ठ मुनियों एवं विविध आकार वाले चारों प्रकार के प्राणियों से परिपूर्ण है ॥ १९-२० ॥

श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! इस पर्वत के ऊपर शुद्ध स्फटिक के समान, हजार मण्डपों से युक्त तथा विस्तृत विमान बायीं ओर स्थित हैं । विशाल भुजाओं वाले तथा चन्द्र- सूर्य – अग्निरूप नेत्रों वाले शिव उसमें मणिमय सिंहासन पर पार्वती देवी तथा कार्तिकेय के साथ विराजमान रहते हैं ॥ २१-२२ ॥ वहाँ विष्णु का भी विमान है, जो उन शिव के विमान के आधे विस्तार वाला है और दक्षिण में पद्मयोनि ब्रह्मा का पद्मरागमय दिव्य विमान है ॥ २३ ॥ उस मेरु पर शिव के भवन के चारों ओर इन्द्र, यम, चन्द्रमा, वरुण, निरृति, पावक, वायु और रुद्र का विशाल तथा सुन्दर पुर है । विविध दिव्य विमानों में अन्य लोगों का निवास है। उस ईश्वरक्षेत्र (शिवविमान) – में ईशानदिशा में नित्य पूजा होती रहती है। वहाँ भगवान् नन्दी सिद्धेश्वरों के साथ रहते हैं और शिष्यों सहित सुरेश्वर सनत्कुमार सिद्धों के साथ सुखपूर्वक आसीन रहते हैं। इसी प्रकार सनक, सनन्द और उन्हीं के समान अन्य हजारों लोग विराजमान रहते हैं ॥ २४-२७ ॥

उस पर्वत पर कहीं-कहीं योगभूमि है और कहीं- कहीं भोगभूमि है । वहाँ उगते हुए सूर्य के सदृश, सुन्दर तथा शुभ विमान है, उसमें वे गणेश्वर विराजमान रहते हैं। वहाँ छः मुखों वाले कार्तिकेय, गणेश, हजारों गणों, सुयशा तथा सुनेत्रा — इन पार्वती की सखियों, सभी माताओं तथा मदन (कामदेव)-के भी विमान हैं ॥ २८-२९१/२

उस पर्वत के मूल को चारों ओर से घेरकर जम्बू नामक नदी प्रवाहित होती है। उसके दक्षिण भाग में अत्यन्त सुन्दर, बहुत ऊँचा, अतिविस्तृत तथा सभी समयों में फल प्रदान करने वाला जम्बूवृक्ष है ॥ ३०-३१ ॥ मेरु पर्वत के चारों ओर इलावृत नामक विस्तृत तथा सुन्दर वर्ष (देश) है। वहाँ पर लोग जम्बूफल का आहार करने वाले हैं और कुछ लोग अमृत का आहार करने वाले हैं । वहाँ के लोग स्वर्ण के समान आभा वाले तथा अन्य वर्णों वाले भी हैं और [ सब प्रकार के ] सुखों को भोगने वाले हैं । हे विप्रो ! यह द्वीप मेरु के मूल के चारों ओर फैला हुआ, सुन्दर, मध्य में स्थित, नौ वर्षों से युक्त और नदियों-नदों तथा महान् पर्वतों से समन्वित है। अब मैं नौ वर्षों से युक्त जम्बूद्वीप का यथार्थ वर्णन करूँगा; योजनों में इसके विस्तार, मण्डल आदि को [आप लोग ] सुनिये ॥ ३२–३५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘मेरुगिरिवर्णन’ नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४८ ॥

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