श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -059
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
उनसठवाँ अध्याय
पार्थिव, शुचि तथा वैद्युत नाम से अग्नि के तीन रूपों का वर्णन, बारह मास के बारह सूर्यों का नामनिर्देश एवं सूर्यरश्मियों का वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकोनषष्टितमोऽध्यायः
सूर्यरश्मिस्वरूपकथनं

सूतजी बोले —  यह सुनकर मुनिलोग संशय में पड़ गये और उन्होंने उन रोमहर्षण (सूतजी)-से यह बात पूछी ॥ १ ॥

ऋषिगण पुनः बोले — वक्ताओं में श्रेष्ठ हे सूतजी ! आपने यहाँ जो कहा है, उसे तथा ग्रहों के निर्णय को विस्तार से बताइये ॥ २ ॥

तब उनका वचन सुनकर उनके सन्देह को दूर करने के लिये सूतजी एकाग्रचित्त होकर उत्तम बात कहने लगे ॥ ३ ॥

इस विषय में शान्तबुद्धि वाले महाज्ञानियों ने जो कुछ बताया है, उसे मैं आप लोगों से कहूँगा और चन्द्रमा तथा सूर्य की गति का वर्णन करूँगा। मैं यह बताऊँगा कि सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह किस प्रकार देवताओं के निवास स्थान हैं, इसके बाद मैं अग्नि की तीन प्रकार की उत्पत्ति का वर्णन करूँगा। दिव्य अग्नि, भौतिक अग्नि तथा पार्थिव अग्नि के विषय में बताऊँगा ॥ ४-५१/२

अव्यक्त से उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा की रात्रि बीत जाने पर यह दृश्य जगत् अस्पष्ट था और घोर अन्धकार से आच्छन्न था। इस लोक के विशेष रूप से नष्ट हो जाने परं तथा इसका चौथाई भाग अवशिष्ट रहने पर संसार का कार्य सिद्ध करने वाले वे भगवान् ब्रह्मा सृष्टि की कामना से खद्योत की भाँति वहाँ विचरण करने लगे ॥ ६-८ ॥ तदनन्तर पृथ्वी तथा जल में संश्रित उन जगदीश्वरं ने लोक के आदि में अग्नि का सृजन करके पृथ्वी के जल का संहरणकर उसके प्रकाश के लिये अग्नि को तीन भागों में विभक्त किया। इस लोक में जो पवन है, वह पार्थिव अग्नि कहा जाता है और जो अग्नि सूर्य में तपती है, उसे शुचि अग्नि कहा गया है। विद्युत् से उत्पन्न अग्नि को अब्ज जानना चाहिये। इस प्रकार जलके गर्भ से उत्पन्न वैद्युत, जाठर तथा सौर — ये तीन अग्नियाँ हैं । अब उनके लक्षणों को बताऊँगा ॥ ९-११ ॥

विभु सूर्य अपनी किरणों से जल को पीते हुए चमकते हैं। जल से उत्पन्न अग्नि जल में समाविष्ट रहती है और वह जल से नहीं बुझती है। मनुष्यों के उदर में रहने वाली अग्नि प्रशान्त नहीं होती। वह पवन अग्निज्वालायुक्त होती है, किंतु निष्प्रभ होती है, उसे जाठर अग्नि कहा गया है। यह जो अग्नि है, वह एक मण्डल के रूप में, शुक्ल वर्णवाली तथा ऊष्मारहित होती है। सूर्य अस्त हो जाने पर उनकी सम्पूर्ण प्रभा एक पाद (चौथाई) रह जाती है। वह प्रभा रात्रि के समय अग्नि में प्रविष्ट हो जाती है, इसलिये वह दूर से प्रकाश दिया करती है। जब सूर्य पुन: उगता है, तब पार्थिव अग्नि की उष्णता एक चरण से सूर्य में प्रवेश कर जाती है, इसलिये अग्नि तपती है ॥ १२–१५१/२

सूर्य तथा अग्नि के तेज प्रकाश एवं उष्ण गुण-स्वरूप वाले हैं, ये दोनों परस्पर अनुप्रवेश के कारण एक-दूसरे को आप्यायित करते हैं। मेरु के दक्षिणी तथा उत्तरी भूम्यर्ध में, जब सूर्य उदित होता है, तब रात्रि जल में प्रवेश कर जाती है, इसलिये दिन के समय रात्रि के [जल में] प्रवेश करने के कारण जल ताम्रवर्ण हो जाता है। जब सूर्य अस्त होता है, तब दिन जल में प्रवेश कर जाता है, इसलिये रात में जल पुनः शुक्ल वर्ण वाला तथा चमकीला दिखायी पड़ता है। इसी क्रमयोग से उदय एवं अस्त दोनों समयों में दिन और रात दक्षिणोत्तर भूम्यर्ध में जल में प्रवेश किया करते हैं ॥ १६-२० ॥ जो यह सूर्य [ अपनी ] किरणों से जल को पीता हुआ तपता रहता है, उसे पार्थिवाग्निमिश्रित दिव्य शुचि (अग्नि) कहा गया है । हजार पाद (किरण) – वाली यह अग्नि वृत्तकुम्भ के तुल्य कही गयी है। वह अपनी हजार नाड़ियों (किरणों)-से चारों ओर से नदियों, समुद्रों, कूपों, बावलियों, नालों आदि स्थावर-जंगम से जलों को ग्रहण करती है। उसकी एक हजार नाड़ियाँ हैं; जो शीत, उष्ण और वर्षा से युक्त हैं । उनमें से विचित्र रूपों वाली चार सौ नाड़ियाँ वर्षा करती हैं। वे भजना, माल्या, केतना तथा पतना हैं; अमृता नामवाली ये सभी रश्मियाँ वृष्टि करने वाली हैं ॥ २१–२५ ॥

तीन सौ हिमवाहिनी नाड़ियाँ हैं । वे रेशा, मेघा, वात्स्या तथा ह्लादिनी हैं; चन्द्रभा नाम वाली वे सभी रश्मियाँ हिम का सर्जन करने वाली हैं और पीत आभा वाली हैं। शुक्ला, ककुभा, गौ तथा विश्वभृत् — ये रश्मियाँ शुक्ला नाम वाली हैं; वे सब तीन सौ रश्मियाँ ऊष्मा उत्पन्न करने वाली हैं। चन्द्रमा उन तीनों किरणों के द्वारा मनुष्य, पितृगणों तथा देवताओं का भरण करता है। वह मनुष्यों को औषधि से, पितरों को स्वधा से और सभी देवताओं को अमृत से तृप्त करता है ॥ २६-२९ ॥

वह [सूर्य] वसन्त तथा ग्रीष्म में तीन सौ किरणों से तपता है, वर्षा तथा शर में चार सौ किरणों से वर्षा करता है और हेमन्त तथा शिशिर में तीन सौ किरणों से हिम छोड़ता है। इन्द्र, धाता, भग, पूषा, मित्र, वरुण, अर्यमा, अंशु, विवस्वान्, त्वष्टा, पर्जन्य और विष्णु — ये [बारह ] सूर्य हैं। वरुण माघ मास में सूर्य है एवं पूषा फाल्गुन मास में सूर्य है। अंशु चैत्र मास में सूर्य होता है और धाता वैशाख मास में सूर्य होता है । इन्द्र ज्येष्ठ मास में सूर्य होता है और अर्यमा आषाढ़ मास में सूर्य होता है । विवस्वान् श्रावण मास में और भग भाद्रपद मास में सूर्य कहा गया है। पर्जन्य आश्विन मास में सूर्य होता है और त्वष्टा कार्तिक मास में सूर्य होता है। मित्र मार्गशीर्ष मास में सूर्य होता है और सनातन विष्णु पौष मास में सूर्य होता है ॥ ३०–३४१/२

सूर्य सम्बन्धी कर्म में वरुण की पाँच हजार रश्मियाँ होती हैं । पूषा छ: हजार किरणों से, अंशुदेव सात हजार किरणों से, धाता आठ हजार किरणों से और इन्द्र नौ हजार किरणों से सूर्य कर्म करते हैं। विवस्वान् दस हजार किरणों से गमन करता है और भग ग्यारह हजार किरणों से गमन करता है। मित्र सात हजार रश्मियों से तपता है। त्वष्टा आठ हजार किरणों से युक्त कहा गया है । अर्यमा दस हजार किरणों से तथा पर्जन्य नौ हजार किरणों से गमन करता है। विष्णु [ नामक सूर्य ] छः हजार रश्मियों से पृथ्वी पर तपता है ॥ ३५-३८ ॥

सूर्य वसन्त ऋतु में कपिल वर्ण के और ग्रीष्म-ऋतु में स्वर्ण की प्रभा वाले होते हैं। वे सूर्य वर्षाऋतु में श्वेतवर्ण और शरद् ऋतु में पाण्डुवर्ण के होते हैं। रवि हेमन्त ऋतु ताम्र वर्ण वाले और शिशिर ऋतु में लोहित वर्ण वाले होते हैं। इस प्रकार मैंने सूर्य में होने वाले रंगों का वर्णन किया ॥ ३९-४० ॥

सूर्य औषधियों को बल देते हैं, स्वधा से पितरों को तृप्त करते हैं और देवताओं को अमृत प्रदान करते हैं, इस प्रकार वे उन तीनों को तीन वस्तुएँ देते हैं। इस प्रकार सूर्य की वे हजारों किरणें लोककल्याण करती हैं। शीत, उष्ण तथा वर्षा करने वाली ये किरणें लोक में पहुँचकर भिन्न-भिन्न रूप धारण करती हैं ॥ ४१-४२ ॥ शुक्ल वर्ण वाला तथा देदीप्यमान यह मण्डल सूर्य नाम वाला है। यह नक्षत्रों, ग्रहों एवं चन्द्रमा की प्रतिष्ठा का कारण है। चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रह – इन सभी को सूर्य से उत्पन्न जानना चाहिये । चन्द्रमा नक्षत्रों का अधिपति है और शिवजी का बायाँ नेत्र है। स्वयं सूर्य शिवजी के दाहिने नेत्र हैं। वे इस लोक में लोगों को ले जाते हैं, इसीलिये ये नयन कहे जाते हैं ॥ ४३-४५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘सूर्यरश्मिस्वरूपकथन’ नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥

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