January 23, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -065 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ चौंसठवाँ अध्याय वसिष्ठपुत्र शक्ति का आख्यान तथा महर्षि पराशर की कथा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः रुद्रसहस्रनामकथनं [^1] ऋषिगण बोले — हे वंशविदों में श्रेष्ठ ! हे रोमहर्षण ! आप संक्षेप में सूर्यवंश तथा चन्द्रवंश के विषय में हम लोगों को बताने की कृपा करें ॥ १ ॥ सूतजी बोले — हे द्विजो ! अदिति ने कश्यप से आदित्य नामक पुत्र को उत्पन्न किया । उस आदित्य की ज्येष्ठ भार्या के अतिरिक्त तीन और भार्याएँ थीं । वे संज्ञा, राज्ञी, प्रभा तथा छाया थीं — मैं उनके पुत्रों के विषय में आप लोगों को बताता हूँ । त्वष्टा की पुत्री संज्ञा ने सूर्य से श्रेष्ठ मनु को उत्पन्न किया। राज्ञी ने यम, यमुना तथा रेवत को जन्म दिया। प्रभा ने सूर्य से प्रभात को जन्म दिया। संज्ञा ने ही छाया को अपने स्थान पर नियोजित किया ॥ २-४ ॥ हे द्विजो! छाया ने उन सूर्य से सावर्णि मनु, शनि, तपती तथा विष्टि को यथाक्रम जन्म दिया । छाया अपने पुत्र सावर्णि मनु से अधिक स्नेह करती थी। पूर्व मनु (वैवस्वत मनु) तो इसे सहन कर गये, पर क्रोध विक्षुब्ध यम इसे सहन न कर सका और उसने क्रोध से [ अपना ] दाहिना पैर उठाकर छाया पर प्रहार किया । [पैर से] यम के द्वारा मारे जाने पर वह छाया दुःखित हुई ॥ ५-७ ॥ तब छाया के शाप से यम का वह सुन्दर पैर खराब हो गया, वह मवाद तथा रक्त से भर गया और कीड़ों के समूह से युक्त गया । तदनन्तर वह [यम] गोकर्ण में रहकर एक फलक (पटरे ) – पर बैठकर [ केवल ] वायु पीता हुआ दस हजार वर्षों तक महादेवजी की आराधना करता रहा। शिव की कृपा से श्रेष्ठ लोकपालत्व तथा पितरों का स्वामित्व प्राप्त करके उसने देवदेव शूल- पाणि (शिव) – के प्रभाव से शाप से मुक्ति प्राप्त की ॥ ८-१०१/२ ॥ पूर्वकाल में सूर्य के तेजोमय रूप को सहन न करती हुई त्वष्टा की शुभ कन्या संज्ञा ने अपने शरीर से [दूसरी] छाया नामक स्त्री की रचना की और वह सुव्रता स्वयं वडवा (घोड़ी) का रूप धारणकर तप करने लगी । कुछ समय के बाद प्रयत्नपूर्वक छाया को संज्ञा की प्रतिकृति छायापति प्रभु सूर्य ने घोड़े का रूप धारणकर उस वडवारूपधारिणी संज्ञा के साथ रमण किया। तब घोड़ी के रूपवाली त्वष्टापुत्री संज्ञा ने उन सूर्य से देवस्वरूप दोनों अश्विनीकुमारों को जन्म दिया; वे देवताओं के श्रेष्ठ वैद्य थे ॥ ११–१४ ॥ उसके बाद महान् आत्मावाले संज्ञापिता [त्वष्टा]- ने सूर्य को खरादा। भगवान् त्वष्टा ने रुद्र की कृपा से सूर्य के मण्डल से विष्णु के चक्र का निर्माण किया, जो बड़ा भयानक था; वह उनका प्रधान तथा दिव्य अस्त्र था, जिसे शुभ सुदर्शन [चक्र] कहा गया है। भगवान् कृष्ण ने कालाग्नि सदृश उस चक्र को प्राप्त किया था ॥ १५-१६१/२ ॥ प्रथम मनु [वैवस्वत] – के नौ पुत्र हुए, जो उन्हीं के समान थे। इक्ष्वाकु, नभग, धृष्णु, शर्याति, नरिष्यन्त, बुद्धिमान् नाभाग, अरिष्ट, करूष तथा पृषध्र — ये नौ मनुपुत्र कहे गये हैं। उनकी ज्येष्ठ तथा वरिष्ठ पुत्री इला जो पूर्वकाल में पुरुष हो गयी थी, वह सुद्युम्न [^2] नाम से प्रसिद्ध हुई । हे श्रेष्ठ मुनियो ! मित्र तथा वरुण की कृपा से वह इला पूर्वकाल में पुरुषत्व को प्राप्त हुई थी; पुनः शिव की आज्ञा से शरवण [नामक वन] को प्राप्तकर सोमवंश की वृद्धि के लिये वे मनुपुत्र श्रीमान् सुद्युम्न स्त्रीत्व को प्राप्त हुए। इक्ष्वाकु के अश्वमेध के समय वह इला किंपुरुष (पुरुष रूप वाली) हो गयी थी । वह इला किंपुरुष हो जाने पर ‘सुद्युम्न’ – इस नाम से कही जाती थी ॥ १७-२२ ॥ वह इला एक महीने तक वीर पुरुष के रूप में और पुनः एक महीने तक स्त्री के रूप में रहती थी। वह चन्द्रमा के पुत्र बुध के भवन में रहने लगी। अवसर पाकर वह बुध के साथ मैथुन के लिये तत्पर हुई । तब सोमपुत्र बुध और इला से पुरूरवा उत्पन्न हुए; जो सोमवंश में प्रथम उत्पन्न होने वाले, बुद्धिमान्, शिवभक्त तथा प्रतापी थे। हे तपोधनो! अब इसके बाद मैं इक्ष्वाकुवंश के विस्तार का वर्णन करूँगा ॥ २३-२५ ॥ हे उत्तम द्विजो ! उन सुद्युम्न के तीन पुत्र हुए — उत्कल, गय तथा विनताश्व । उत्कल का उत्कल [ नामक ] राष्ट्र था और विनताश्व का पश्चिमी प्रदेश था। गय की गया [नामक] परम सुन्दर पुरी कही गयी है, जिसमें देवताओं तथा पितरों की स्थिति सर्वदा रहती है ॥ २६-२७१/२ ॥ कन्या प्रकृति वाले होने के कारण महातेजस्वी सुद्युम्न इक्ष्वाकु के ज्येष्ठ पुत्र ने मध्यदेश प्राप्त किया । [ अपना ] भाग नहीं पा सके; किंतु वसिष्ठ के कहने से प्रतिष्ठानपुर में धर्मराज महात्मा सुद्युम्न की प्रतिष्ठा स्थापित हुई और स्त्री-पुरुष के लक्षणों से युक्त, महायशस्वी तथा महाभाग्यशाली मनुपुत्र [सुद्युम्न] -ने राज्य प्राप्त करके उसे पुरूरवा को दे दिया ॥ २८-३०१/२ ॥ सौ पुत्रों वाले इक्ष्वाकु के ज्येष्ठ पुत्र विकुक्षि थे, वे महान् धर्मज्ञ थे। उनके पचास पुत्र हुए; उनमें ककुत्स्थ सबसे बड़े थे। ककुत्स्थ से सुयोधन उत्पन्न हुए । हे श्रेष्ठ मुनियो ! उन [सुयोधन] से पृथु और पृथु से विश्वक उत्पन्न हुए। विश्वक के पुत्र बुद्धिमान् आर्द्रक थे और उनके पुत्र युवनाश्व थे। हे श्रेष्ठ द्विजो ! उनके पुत्र महातेजस्वी शाबस्ति थे, जिन्होंने गौड़देश में शाबस्ती नगरी का निर्माण किया। उनसे वंशक [नामक पुत्र ] उत्पन्न हुए और वंश [ वंशक] – से बृहदश्व हुए। कुवलाश्व उन [बृहदश्व के] पुत्र थे; उन्होंने महाबली ‘धुन्धु’ को मारकर धुन्धुमार नाम प्राप्त किया था । धुन्धुमार के तीन पुत्र हुए, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे; वे दृढाश्व, चण्डाश्व तथा कपिलाश्व [नाम वाले] कहे गये हैं । दृढाश्व के पुत्र प्रमोद और उनके पुत्र हर्यश्व थे। हर्यश्व के पुत्र निकुम्भ और उन [ निकुम्भ ] – के पुत्र संहताश्व थे। संहताश्व के कृशाश्व तथा रणाश्व [नामक ] दो पुत्र थे। रणाश्व के पुत्र युवनाश्व थे और उन [ युवनाश्व] – के पुत्र मान्धाता थे। मान्धाता के तीन पुत्र हुए — पुरुकुत्स, पराक्रमी अम्बरीष तथा पुण्यात्मा मुचुकुन्द; ये तीनों लोकों में विख्यात थे। अम्बरीष के पुत्र युवनाश्व द्वितीय बताये गये हैं। युवनाश्व के पुत्र हरित थे, जिनसे उत्पन्न सभी पुत्र ‘हरित’ [ नाम वाले] कहे गये हैं। ये सब अंगिरा के वंश के ब्राह्मण थे, किन्तु क्षत्रिय-स्वभाव वाले थे ॥ ३१–४०१/२ ॥ पुरुकुत्स के पुत्र महायशस्वी त्रसदस्यु थे। उनके पुत्र सम्भूति थे, जो नर्मदा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे । उन [सम्भूति]-के पुत्र विष्णुवृद्ध थे। विष्णुवृद्ध के सभी वंशज विष्णुवृद्ध [नाम वाले] कहे गये हैं। ये सब भी अंगिरा के वंश में [ब्राह्मण] थे, किंतु क्षत्रिय-स्वभाव से युक्त थे । हे द्विजो ! सम्भूति ने अनरण्य नामक दूसरे पुत्र को उत्पन्न किया, जो त्रैलोक्य विजय के समय रावण के द्वारा मार दिये गये। अनरण्य के पुत्र बृहदश्व और बृहदश्व के पुत्र हर्यश्व थे । हर्यश्व से [ उनकी पत्नी] दृषद्वती के गर्भ से राजा ‘वसुमना’ उत्पन्न हुए । उनके त्रिधन्वा नामक पुत्र हुए; वे शिवभक्त थे । उन प्रतापी तथा शिवभक्त ने ब्रह्मा के पुत्र तण्डी की कृपा से उनकी शिष्यता प्राप्त करके और उनकी आज्ञा से हजार अश्वमेध का फल प्राप्तकर गणों के स्वामी का पद ग्रहण कर लिया था । ‘मैं अश्वमेध कैसे करूँ’ – [ किसी समय] ऐसा सोचते हुए उन धनहीन धर्मात्मा [त्रिधन्वा ]- ने ब्रह्मा के पुत्र तण्डी नामक ब्राह्मण को देखा और हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! रुद्रसहस्रनाम को उनसे प्राप्त कर लिया । पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने [तण्डी को ] रुद्रसहस्रनाम बताया था; उसी सहस्रनाम से महेश्वर की स्तुति करके ब्रह्माजी के पुत्र द्विजश्रेष्ठ तण्डी ने गणाधिप पद प्राप्त किया था । तदनन्तर पूर्वकाल में तण्डी के द्वारा बताये गये रुद्र सहस्रनाम को ग्रहण करके राजा [ त्रिधन्वा ] – ने भी गणाधिप पद प्राप्त किया ॥ ४१-५०१/२ ॥ ऋषिगण बोले — ब्रह्मा के पुत्र तण्डी के द्वारा कहा गया रुद्रसहस्रनाम समग्र वेदार्थों से परिपूर्ण है; हे सूतजी ! हे सुव्रत ! उस उत्तम सहस्रनाम को कृपा करके [हम ] विप्रों को बताइये ॥ ५१-५२ ॥ सूतजी बोले — हे सुव्रतो ! हे श्रेष्ठ मुनियो ! सभी प्राणियों के आत्मस्वरूप तथा अमित तेजवाले रुद्र के एक हजार आठ नामों वाले स्तोत्र को सुनिये, जिसका जप करके तण्डी ने गणाधिप पद प्राप्त किया था ॥ ५३१/२ ॥ ‘ॐ स्थिर, स्थाणु, प्रभु, भानु, प्रवर, वरद, वर, सर्वात्मा, सर्वविख्यात, सर्व, सर्वकर, भव, जटी, दण्डी, शिखण्डी, सर्वग, सर्वभावन, हरि, हरिणाक्ष, सर्वभूतहर, स्मृत, प्रवृत्ति, निवृत्ति, शान्तात्मा, शाश्वत, ध्रुव, श्मशानवासी, भगवान्, खचर, गोचर, अर्दन, अभिवाद्य, महाकर्मा, तपस्वी, भूतधारण, उन्मत्तवेष, प्रच्छन्न, सर्वलोक, प्रजापति, महारूप, महाकाय, सर्वरूप, महायश ॥ ५४-५८ ॥ महात्मा, सर्वभूत, विरूप, वामन, नर, लोकपाल, अन्तर्हितात्मा, प्रसाद, अभयद, विभु, पवित्र, महान्, नियत, नियताश्रय, स्वयम्भू, सर्वकर्मा, आदि, आदिकर, निधि, सहस्राक्ष, विशालाक्ष, सोम, नक्षत्रसाधक, चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, ग्रह (मंगल), ग्रहपति (बृहस्पति), मत (बुध), राजा (शुक्र), राज्योदय (राहु ), कर्ता, मृगबाणार्पण, घन, महातप, दीर्घतप, अदृश्य, धनसाधक ॥ ५९-६२ ॥ संवत्सर, कृत, मन्त्र, प्राणायाम, परन्तप, योगी, योग, महाबीज, महारेता, महाबल, सुवर्णरेता, सर्वज्ञ, सुबीज, वृषवाहन, दशबाहु, अनिमिष, नीलकण्ठ, उमापति, विश्वरूप, स्वयं श्रेष्ठ, बलवीर, बलाग्रणी, गणकर्ता, गणपति, दिग्वास, काम्य, मन्त्रवित्, परम, मन्त्र, सर्व – भावकर, हर, कमण्डलुधर, धन्वी, बाणहस्त, कपालवान् ॥ ६३-६६ ॥ शरी, शतघ्नी, खड्गी, पट्टिशी, आयुधी, महान्, अज, मृगरूप, तेज, तेजस्कर, विधि, उष्णीषी, सुवक्त्र, उदग्र, विनत, दीर्घ, हरिकेश, सुतीर्थ, कृष्ण, शृगालरूप, सर्वार्थ, मुण्ड, सर्वशुभंकर, सिंहशार्दूलरूप, गन्धकारी, कपर्दी, ऊर्ध्वरेता, ऊर्ध्वलिङ्गी, ऊर्ध्वशायी, नभ, तल, त्रिजटी, चीरवासा, रुद्र, सेना, पति, विभु, अहोरात्र, नक्त, तिग्ममन्यु, सुवर्चस, गजहा, दैत्यहा, काल, लोकधाता, गुणाकर ॥ ६७–७१ ॥ सिंहशार्दूलरूपाणामार्द्रचर्मांबरंधर, कालयोगी, महा-नाद, सर्वावास, चतुष्पथ, निशाचर, प्रेतचारी, सर्वदर्शी, महेश्वर, बहु, भूत, बहुधन, सर्वसार, अमृतेश्वर, नृत्यप्रिय, नित्यनृत्य, नर्तन, सर्वसाधक, सकार्मुक, महाबाहु, महाघोर, महातप, महाशर, महापाश, नित्य, गिरिचर, अमत, सहस्रहस्त, विजय, व्यवसाय, अनिन्दित, अमर्षण, मर्षणात्मा, यज्ञहा, कामनाशन, दक्षहा, परिचारी, प्रहस, मध्यम ॥ ७२- ७६ ॥ तेज, अपहारी, बलवान्, विदित, अभ्युदित, अबहु, गम्भीरघोष, योगात्मा, यज्ञहा, कामना, अशन, गम्भीररोष, गम्भीर, गम्भीरबलवाहन, न्यग्रोधरूप, न्यग्रोध, विश्वकर्मा, विश्वभुक्, तीक्ष्णोपाय, हर्यश्व, सहाय, कर्म, कालवित्, विष्णु प्रसादित, यज्ञ, समुद्र, वडवामुख, हुताशनसहाय, प्रशान्तात्मा, हुताशन, उग्रतेज, महातेज, जय, विजय-कालवित् ॥ ७७-८० ॥ ज्योतिषामयन, सिद्धि, सन्धि, विग्रह, खड्गी, शंखी, जटी, ज्वाली, खचर, द्युचर, बली, वैणवी, पणवी, काल, कालकण्ठ, कटंकट, नक्षत्रविग्रह, भाव, निभाव, सर्वतोमुख, विमोचन, शरण, हिरण्यकवचोद्भव, मेखला, कृतिरूप, जलाचार, स्तुत, वीणी, पणवी, ताली, नाली कलिकटु, सर्वतूर्यनिनादी, सर्वव्याप्य-परिग्रह ॥ ८१-८४ ॥ व्यालरूपी, बिलावासी, गुहावासी, तरंगवित्, वृक्ष, श्रीमालकर्मा, सर्वबन्धविमोचन, बन्धन, सुरेन्द्राणां युधि – शत्रुविनाशन, सखा, प्रवास, दुर्वाप, सर्वसाधु- निषेवित, प्रस्कन्द, अविभाव, तुल्य, यज्ञविभागवित्, सर्ववास, सर्वचारी, दुर्वासा, वासव, मत, हैम, हेमकर, यज्ञ, सर्वधारी, धरोत्तम, आकाश, निर्विरूप, विवास, उरग, खग ॥ ८५-८८ ॥ भिक्षु, भिक्षुरूपी, रौद्ररूप, सुरूपवान्, वसुरेता, सुवर्चस्वी, वसुवेग, महाबल, मन, वेग, निशाचार, सर्वलोकशुभप्रद, सर्वावासी, त्रयीवासी, उपदेशकर, धर, मुनि, आत्मा, मुनि, लोक, सभाग्य, सहस्रभुक्, पक्षी, पक्षरूप, अतिदीप्त, निशाकर, समीर, दमनाकार, अर्थ, अर्थकर, वश, वासुदेव, देव, वामदेव, वामन ॥ ८९-९२ ॥ सिद्धियोगापहारी, सिद्ध, सर्वार्थसाधक, अक्षुण्ण, क्षुण्णरूप, वृषण, मृदु, अव्यय, महासेन, विशाख, षष्टिभाग, गवांपति, चक्रहस्त, विष्टम्भी, मूलस्तम्भन, ऋतु, ऋतुकर, ताल, मधु, मधुकर, वर, वानस्पत्य, वाजसन, नित्य, आश्रमपूजित, ब्रह्मचारी, लोकचारी, सर्वचारी, सुचारवित्, ईशान, ईश्वर, काल, निशाचारी, निमित्तस्थ, निमित्त, नन्दि, नन्दिकर, हर, अनेकदृक् ॥ ९३–९६ ॥ नन्दीश्वर, सुनन्दी, नन्दन, विषमर्दन, भगहारी, नियन्ता, काल, लोकपितामह, चतुर्मुख, महालिङ्ग, चारुलिङ्ग, लिङ्गाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, कालाध्यक्ष, युगावह, बीजाध्यक्ष, बीजकर्ता, अध्यात्म, अनुगत, बल, इतिहास, कल्प, दमन, जगदीश्वर, दम्भ, दम्भकर, दाता, वंश, वंशकर, कलि ॥ ९७-१०० ॥ लोककर्ता, पशुपति, महाकर्ता, अधोक्षज, अक्षर, परम, ब्रह्म, बलवान्, शुक्र, नित्य, अनीश, शुद्धात्मा, शुद्ध, मान, गति, हवि, प्रासाद, बल, दर्प, दर्पण, हव्य, इन्द्रजित्, वेदकार, सूत्रकार, विद्वान्, परमर्दन, महामेघ-निवासी, महाघोर, वशी, कर, अग्निज्वाल, महाज्वाल, परिधूम्रावृत, रवि, धिषण, शंकर, अनित्य, वर्चस्वी, धूम्रलोचन ॥ १०१-१०४ ॥ अंगलुप्त, शोभन, नरविग्रह, स्वस्ति, नील, स्वस्तिस्वभाव, भोगी, भोगकर, लघु, उत्संग, महांग, महागर्भ, प्रतापवान्, कृष्णवर्ण, सुवर्ण, इन्द्रिय, सर्ववर्णिक, महापाद, महाहस्त, महाकाय, महायश, महामूर्धा, महामात्र, महामित्र, नगालय, महास्कन्ध, महाकर्ण, महोष्ठ, महाहनु, महानास, महाकण्ठ, महाग्रीव, श्मशानवान् ॥ १०५-१०८ ॥ महाबल, महातेज, अन्तरात्मा, मृगालय, लम्बितोष्ठ, निष्ठ, महामाय, पयोनिधि, महादन्त, महाद्रंष्ट्र महाजिह्व, महामुख, महानख, महारोम, महाकेश, महाजट, असपत्न, प्रसाद, प्रत्यय, गीतसाधक, प्रस्वेदन, अस्वहेन, आदिक, महामुनि, वृषक, वृषकेतु, अनल, वायुवाहन, मण्डली, मेरुवास, देववाहन ॥ १०९–११२ ॥ अथर्वशीर्ष, सामास्य, ऋक्सहस्रोर्जितेक्षण, यजुः पादभुज, गुह्य, प्रकाशौज, अमोघार्थप्रसाद, अन्तर्भाव्य, सुदर्शन, उपहार, प्रिय, सर्व, कनक, कांचनस्थित, नाभि, नन्दिकर, हर्म्य, पुष्कर, स्थपति, स्थित, सर्वशास्त्र, धन, आद्य, यज्ञ, यज्वा समाहित, नग, नील, कवि, काल, मकर, कालपूजित, सगण, गणकार, भूतभावन-सारथि ॥ ११३–११६ ॥ भस्मशायी, भस्मगोप्ता, भस्मभूततनु, गण, आगम, विलोप, महात्मा, सर्वपूजित, शुक्ल, स्त्रीरूपसम्पन्न, शुचि, भूतनिषेवित, आश्रमस्थ, कपोतस्थ, विश्वकर्मा, पति, विराट्, विशालशाख, ताम्रोष्ठ, अम्बुजाल, सुनिश्चित, कपिल, कलश, स्थूल, आयुध, रोमश, गन्धर्व, अदिति, तार्क्ष्य, अविज्ञेय, सुशारद, परश्वधायुध, देव, अर्थकारी, सुबान्धव ॥ ११७-१२० ॥ तुम्बवीण, महाकोप, ऊर्ध्वरेता, जलेशय, उग्र, वंशकर, वंश, वंशवादी, अनिन्दित, सर्वांगरूपी, मायावी, सुहृद, अनिल, बल, बन्धन, बन्धकर्ता, सुबन्धन-विमोचन, राक्षसघ्न, कामारि, महादंष्ट्र, महायुध, लम्बित, लम्बितोष्ठ, लम्बहस्त, वरप्रद, बाहु, अनिन्दित, सर्व शंकर, अकोपन, अमरेश, महाघोर, विश्वदेव, सुरारिहा ॥ १२१–१२४ ॥ अहिर्बुध्न्य, निर्ऋति, चेकितान, हली, अजैकपात्, कापाली, शं, कुमार, महागिरि, धन्वन्तरि, धूमकेतु, सूर्य, वैश्रवण, धाता, विष्णु, शक्र, मित्र, त्वष्टा, धर, ध्रुव, प्रभास, पर्वत, वायु, अर्यमा, सविता, रवि, धृति, विधाता, मान्धाता, भूतभावन, नीर, तीर्थ, भीम, सर्वकर्मा, गुणोद्वह, पद्मगर्भ, महागर्भ, चन्द्रवक्त्र, नभ, अनघ ॥ १२५-१२८ ॥ बलवान्, उपशान्त, पुराण, पुण्यकृत्, तम, क्रूरकर्ता, क्रूरवासी, तनु, आत्मा, महौषध, सर्वाशय, सर्वचारी, प्राणेश, प्राणिनांपति, देवदेव, सुखोत्सिक्त, सत्, असत् सर्वरत्नवित्, कैलासस्थ, गुहावासी, हिमवद्, गिरिसंश्रय, कुलहारी, कुलाकर्ता, बहुवित्त, बहुप्रज, प्राणेश, बन्धकी वृक्ष, नकुल, अद्रिक, हस्वग्रीव, महाजानु, अलोल, महौषधि ॥ १२९-१३२ ॥ सिद्धान्तकारी, सिद्धार्थ, छन्द, व्याकरणोद्भव, सिंहनाद, सिंहदंष्ट्र, सिंहास्य, सिंहवाहन, प्रभावात्मा, जगत्काल, काल, कम्पी, तरु, तनु, सारंग, भूतचक्रांक, केतुमाली, सुवेधक, भूतालय, भूतपति, अहोरात्र, मल, अमल, वसुभृत्, सर्वभूतात्मा, निश्चल, सुविदु, बुध, सर्वभूतानामसुहृत्, निश्चल, चलविद्, बुध, अमोघ, संयम, हृष्ट, भोजन, प्राणधारण ॥ १३३-१३६ ॥ धृतिमान्, मतिमान्, त्र्यक्ष, सुकृत, युधांपति, गोपाल, गोपति, ग्राम, गोचर्मवसन, हर, हिरण्यबाहु, गुहावास, प्रवेशन, महामना, महाकाम, चित्तकाम, जितेन्द्रिय, गान्धार, सुराप, तापकर्मरत, हित, महाभूत, भूतवृत, अप्सर, गणसेवित, महाकेतु, धराधाता, नैकतानरत, स्वर, अवेदनीय, आवेद्य, सर्वग, सुखावह ॥ १३७–१४० ॥ तारण, चरण, धाता, परिधा, परिपूजित, संयोगी, वर्धन, वृद्ध, गणिक, गणाधिप, नित्य, धाता, सहाय, देवासुरपति, पति, युक्त, युक्तबाहु, सुदेव, सुपर्वण, आषाढ़, सुषाढ़, स्कन्धद, हरित, हर, वपु, आवर्तमान, अन्य, वपुश्रेष्ठ, महावपु, शिर, विमर्शन, सर्वलक्ष्य – लक्षण – भूषित, अक्षय, रथगीत, महाबल ॥ १४१–१४४ ॥ सर्वभोगी, साम्नाय, महाम्नाय, तीर्थदेव, महायश, निर्जीव, जीवन, मन्त्र, सुभग, बहुकर्कश, रत्नभूत, रत्नांग, महार्णवनिपातवित्, मूल, विशाल, अमृत, व्यक्ताव्यक्त, तपोनिधि, आरोहण, अधिरोह, शीलधारी, महातप महाकण्ठ, महायोगी, युग, युगकर, हरि, युगरूप, नग, न्याय, महारूप, वहन, गहन, पण्डित, अचलोपम ॥ १४५–१४८ ॥ निर्वापण, अपाद, बहुमाल, महामाल, शिपिविष्ट, सुलोचन, विस्तार, लवण, कूप, कुसुमांग, फलोदय, ऋषभ, वृषभ, भंग, मणिबिम्बजटाधर, इन्दु विसर्ग, सुमुख, शूर, सर्वायुध, सह, निवेदन, सुधाजात, स्वर्गद्वार, महाधनु, गिरावास, विसर्ग, सर्वलक्षणलक्षवित् गन्धमाली, भगवान्, अनन्त, सर्वलक्षण, सन्तान, बहुल, बाहु, सकल, सर्वपावन ॥ १४९-१५२ ॥ करस्थाली, कपाली, ऊर्ध्वसंहनन, युवा, यन्त्रतन्त्रसुविख्यात, लोक, सर्वाश्रय, मृदु, मुण्ड, विरूप, विकृत, दण्डी, कुण्डी, विकुर्वण, वार्यक्ष, ककुभ, वज्री, दीप्ततेज, सहस्रपात्, सहस्रमूर्धा, देवेन्द्र, सर्वदेवमय, गुरु, सहस्रबाहु, सर्वांग, शरण्य, सर्वलोककृत्, पवित्र, त्रिमधु, मन्त्र, कनिष्ठ, कृष्णपिंगल, ब्रह्मदण्डविनिर्माता, शतघ्न, शतपाशधृक् ॥ १५३–१५६ ॥ कला, काष्ठा, लव, मात्रा, मुहूर्त, अहः, क्षपा, क्षण, विश्वक्षेत्रप्रद, बीज, लिङ्ग, आद्य, निर्मुख, सदसद्, व्यक्त, अव्यक्त, पिता, माता, पितामह, स्वर्गद्वार, मोक्षद्वार, प्रजाद्वार, त्रिविष्टप, निर्वाण, हृदय, ब्रह्मलोक, परागति, देवासुर-विनिर्माता, देवासुरपरायण, देवासुरगुरु, देव, देवासुरनमस्कृत, देवासुर – महामात्र, देवासुर-गणाश्रय ॥ १५७-१६० ॥ देवासुरगणाध्यक्ष, देवासुरगणाग्रणी, देवाधिदेव, देवर्षि, देवासुरवरप्रद, देवासुरेश्वर, विष्णु, देवासुरमहेश्वर, सर्वदेवमय, अचिन्त्य, देवतात्मा, स्वयम्भव, उद्गत, त्रिक्रम, वैद्य, वरद, अवरज, अम्बर, इज्य, हस्ती, व्याघ्र, देवसिंह, महर्षभ, विबुधाग्र्य, सुर, श्रेष्ठ, स्वर्गदेव, उत्तम, संयुक्त, शोभन, वक्ता, अव्यय ॥ १६१-१६४ ॥ आशानांप्रभव, गुरु, कान्त, निज, सर्ग, पवित्र, सर्ववाहन, शृंगी, शृंगप्रिय, बभ्रू, राजराज, निरामय, अभिराम, सुशरण, निराम, सर्वसाधन, ललाटाक्ष, विश्वदेह, हरिण, ब्रह्मवर्चस, स्थावराणां पति, नियतेन्द्रियवर्तन, सिद्धार्थ, सर्वभूतार्थ, अचिन्त्य, सत्य, शुचिव्रत, व्रताधिप, परब्रह्म, मुक्तानां परमा गति, विमुक्त, मुक्तकेश, श्रीमान्, श्रीवर्धन, जगत् ॥ १६५-१६८ ॥ इन नामों की प्रधानता के अनुसार मैंने भक्तिपूर्वक समाहितचित्त होकर भगवान् यज्ञपति विभु शिव की स्तुति की। इस प्रकार उनसे आज्ञा पाकर मैंने भक्तों की गतिस्वरूप शिव की स्तुति की। उन तण्डी से शिवजी का स्तोत्र प्राप्त करके तीनों लोकों में विख्यात तथा महायशस्वी राजा [त्रिधन्वा ] – ने हजार अश्वमेधयज्ञ का फल प्राप्त कर प्रभु तण्डी के तेज से गणाधिपपद प्राप्त किया ॥ १६९-१७१ ॥ हे द्विजो! जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा ब्राह्मणों को सुनाता है, वह हजार अश्वमेधयज्ञ का फल अवश्य प्राप्त करता है। ब्राह्मण का वध करने वाला, सुरापान करने वाला, सुवर्ण चुराने वाला, गुरुपत्नी के साथ व्यभिचार करने वाला, शरण में आये हुए का वध करने वाला, मित्र के साथ विश्वासघात करने वाला, माता-पिता का वध करने वाला, वीर – हत्या करने वाला तथा भ्रूणहत्या करने वाला भी शिवमन्दिर में वर्षपर्यन्त तीनों सन्ध्याकालों में क्रम से [ इन नामों का ] जप करके एवं तीनों सन्ध्याकालों में देव [शिव]-का पूजन करके समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ॥ १७२-१७५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘रुद्रसहस्रनामकथन’ नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६५ ॥ [^2]: See Also:- 1. वैवस्वत मनु के पुत्र राजा सुद्युम्न की कथा 2. राजा सुद्युम्न की इला नामक स्त्री के रूप में परिणति, इला का बुध से विवाह और पुरूरवा की उत्पत्ति, भगवती की स्तुति करने से इलारूपधारी राजा सुद्युम्न की सायुज्यमुक्ति Content is available only for registered users. 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