श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -074
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
चौहत्तरवाँ अध्याय
ब्रह्मा की आज्ञा से विश्वकर्मा द्वारा विभिन्न लिङ्गों का निर्माण करके देवताओं को प्रदान करना एवं देवताओं द्वारा उन-उन लिङ्गों का पूजन, लिङ्गों के विविध भेद तथा उनकी स्थापना का माहात्म्य
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुःसप्ततितमोऽध्यायः
शिवलिङ्गभेदसंस्थापनादिवर्णनं

सूतजी बोले —  विश्वकर्मा ने प्रभु ब्रह्मा की आज्ञा से अपने अधिकार के अनुरूप लिङ्गों का निर्माण करके उन [ देवताओं ] – को दिया ॥ १ ॥ विष्णु ने इन्द्रनील (नीलकान्तमणि ) – से निर्मित लिङ्ग की सदा पूजा की । इन्द्र ने पद्मराग निर्मित लिङ्ग की, विश्रवा के पुत्र कुबेर ने सुवर्णनिर्मित लिङ्ग की, विश्वेदेवों ने चाँदी से बने हुए लिङ्ग की, वसुओं ने चन्द्रकान्तमणि से बने हुए सुन्दर लिङ्ग की, वायु ने आरकूट (पीतल) – से बने हुए लिङ्ग की तथा [ दोनों] अश्विनीकुमारों ने मिट्टी से बने हुए लिङ्ग की सदा पूजा की ॥ २-३ ॥ राजा वरुण ने स्फटिक से बने हुए लिङ्ग की, आदित्यों ने ताँबे से बने हुए लिङ्ग की, बुद्धिमान् सोमराट् ने मोती से बने हुए शुभ अत्युत्तम लिङ्ग की, अनन्त आदि महानागों ने प्रवालनिर्मित लिङ्ग की और महात्मा दैत्यों तथा राक्षसों ने लोहे से बने हुए लिङ्ग की पूजा की ॥ ४-५ ॥

हे द्विजोत्तमो ! गुह्यकों ने तीन प्रकार के लोहे से निर्मित लिङ्ग की, गणों ने सर्वलोहमय लिङ्ग की और चामुण्डा तथा [सभी ] माताओं ने बालू से बने हुए लिङ्ग की पूजा की। नैर्ऋति ने लकड़ी से बने लिङ्ग की, यम ने मरकत से बने शुभ लिङ्ग की, नील आदि रुद्रों ने भस्म निर्मित शुद्ध तथा शुभ लिङ्ग की भक्तिपूर्वक पूजा की ॥ ६-७ ॥

हे श्रेष्ठ मुनियो ! लक्ष्मी ने लक्ष्मीवृक्ष (बेल)-से निर्मित लिङ्ग की, गुह ने गोमय से निर्मित लिङ्ग की, मुनियों ने कुश के अग्रभाग से निर्मित उत्तम लिङ्ग की, वामदेव आदि ने पुष्प के लिङ्ग की, मनोन्मनी ने गन्धों से निर्मित लिङ्ग की और सरस्वती ने रत्न अथवा रुद्र के जल से निर्मित लिङ्ग की पूजा की। दुर्गा ने वेदीसहित सुवर्णनिर्मित अत्युत्तम शिवलिङ्ग की, उग्रों ने आटे से बने हुए लिङ्ग की, सभी मन्त्रों ने घृतनिर्मित शुभ लिङ्ग की, सभी वेदों ने दधिनिर्मित लिङ्ग की एवं पिशाचों ने सीसनिर्मित लिङ्ग की पूजा की। इन सभी ने [ पूजा करके] ब्रह्माजी की कृपा से यथायोग्य पद प्राप्त किया, इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ? शिवलिङ्ग की पूजा करने से ही यह चराचर जगत् स्थित है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ८–१२ ॥

द्रव्यों के भेद से छः प्रकार का लिङ्ग कहा गया है। उनके कुल चौवालीस भेद कहे गये हैं । प्रथम प्रकार का लिङ्ग पाषाण निर्मित कहा गया है; वह चार प्रकार का होता है। हे श्रेष्ठ मुनियो ! द्वितीय प्रकार का लिङ्ग रत्न निर्मित होता है; वह सात प्रकार का होता है । शिवजी का तीसरे प्रकार का लिङ्ग धातुनिर्मित होता है; वह आठ प्रकार का होता है। चौथे प्रकार का लिङ्ग लकड़ी से बना होता है; वह सोलह प्रकार का कहा जाता है। श्रेष्ठ द्विजो ! पाँचवें प्रकार का लिङ्ग मिट्टी से बना होता है; वह दो विभागों वाला होता है। छठे प्रकार का लिङ्ग क्षणिक ( रंगवल्लीनिर्मित) होता है; वह सात प्रकार का कहा गया है ॥ १३–१६ ॥

रत्ननिर्मित लिङ्ग श्री (लक्ष्मी) प्रदान करने वाला, पाषाणनिर्मित लिङ्ग समस्त सिद्धियों को देने वाला, धातुनिर्मित लिङ्ग साक्षात् धन प्रदान करने वाला तथा काष्ठनिर्मित लिङ्ग भोग-सिद्धि प्रदान करने वाला है। हे श्रेष्ठ विप्रो ! मिट्टी से बना हुआ (पार्थिव) शुभ लिङ्ग सभी सिद्धियों की प्राप्ति कराने वाला है। पाषाणनिर्मित लिङ्ग उत्तम तथा धातुनिर्मित लिङ्ग मध्यम कहा गया है ॥ १७-१८ ॥

लिङ्गों के बहुत भेद हैं; संक्षेप में वे नौ हैं। [ लिङ्ग के ] मूल में ब्रह्मा, मध्य में तीनों लोकों के ईश्वर विष्णु तथा ऊपरी भागमें प्रणवसंज्ञक महादेव रुद्र सदाशिव विराजमान रहते हैं । लिङ्ग की वेदी महादेवी अम्बिका हैं; वे [सत्, रज, तम] तीनों गुणों से तथा त्रिदेवों से युक्त रहती हैं। जो उस [वेदी] – के साथ लिङ्ग की पूजा करता है, उसने मानो महादेव तथा भगवती [पार्वती]-का पूजन कर लिया। पाषाणनिर्मित, रत्ननिर्मित, धातुनिर्मित, काष्ठनिर्मित, पार्थिव अथवा क्षणिक जो भी लिङ्ग हो – उसे भक्तिपूर्वक स्थापित करके [ व्यक्ति ] शुभ फल प्राप्त करता है। वह परम पुण्यात्मा इन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि, यम, वरुण, कुबेर, सिद्धों, विद्याधरों, नागराज, यक्षों, दानवों तथा किन्नरों के द्वारा देवदुन्दुभियों की ध्वनि से स्तुत होता हुआ क्रमशः भूः भुवः, स्व:, मह:, जन, तप तथा सत्य लोकों को लाँघकर अपने तेज से प्रकाशित होता हुआ लिङ्गस्थापन आदि सन्मार्ग में निहित स्वाधीन खड्ग से शीघ्र ही ब्रह्माण्ड का भेदन करके निःशंक भाव से मुक्त हो जाता है ॥ १९-२५ ॥

पाषाणनिर्मित, रत्ननिर्मित, धातुनिर्मित, काष्ठनिर्मित, पार्थिव अथवा क्षणिक लिङ्ग की अपेक्षा चन्द्रकलादि सहित बाणलिङ्ग आदि की स्थापना करनी चाहिये । विधिपूर्वक लिङ्ग बनाकर जो मनुष्य कार्तिकेय – पार्वती सहित कुन्द पुष्प तथा गाय के दूध के समान वर्ण वाले शुभ लिङ्ग को स्थापित करता है, वह मानव-शरीर धारण करके भी रुद्र के रूप में स्थित रहता है; इसमें सन्देह नहीं है। उसके दर्शन तथा स्पर्श से [अन्य] मनुष्य मुक्ति प्राप्त करते हैं । हे विप्रेन्द्रो ! मैं उसके पुण्य का सम्यक् वर्णन सैकड़ों युगों में भी नहीं कर सकता हूँ, अतः विधिपूर्वक लिङ्ग को स्थापित करना चाहिये। सभी मनुष्यों के लिये प्रभु का सकल (सगुण), दिव्य तथा शुभ विग्रह भावना के योग्य है, किंतु योगियों के लिये निष्कल (निर्गुण) विग्रह भावना के योग्य है ॥ २६–३० ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘शिवलिङ्गभेदसंस्थापनादिवर्णन’ नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७४ ॥

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