श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -082
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
बयासीवाँ अध्याय
सभी पापों का उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करने वाला व्यपोहनस्तव और उसके पाठ का फल
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे द्व्यशीतितमोऽध्यायः
व्यपोहनस्तव निरूपणं

सूतजी बोले — [ हे ऋषियो !] अब मैं सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाले मंगलमय व्यपोहन स्तव को बताऊँगा; इसे नन्दी के मुख से सुनकर महात्मा सनत्कुमार ने व्यासजी को बताया और उनसे परम आदरपूर्वक मैंने सुना। कल्याणकारी, शुद्ध, निर्मल, यशस्वी, दुष्टों का नाश करने वाले, सर्व, भव तथा परमात्मा को नमस्कार है । पाँच मुखों वाले, दस भुजाओं वाले, पन्द्रह नेत्रों से युक्त, शुद्ध स्फटिक के सदृश कान्तिमान्, सभी आभूषणों से विभूषित, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, शान्त, सबसे ऊपर प्रतिष्ठित तथा पद्मासनपर स्थित उमासहित भगवान् शिव पाप को शीघ्र दूर करें ॥ १-४१/२

ईशान, तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात तथा भगवान् वामदेव पाप को शीघ्र दूर करें। वे अनन्त, सर्वविद्येश, सर्वज्ञ, सर्वद, प्रभु तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पाप को दूर करें। वे सूक्ष्म, सुरासुरेशान, विश्वेश, गणपूजित तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पाप को दूर करें। वे शिवोत्तम, महापूज्य, शिवध्यानपरायण, सर्वग, सर्वद तथा शान्त मेरे पाप को दूर करें। वे एकाक्ष, भगवान्, ईश, शिवार्चन – परायण तथा शिवध्यानैकसम्पन्न सदा मेरे पाप को दूर करें ॥ ५-९१/२

वे त्रिमूर्ति, भगवान्, ईश, शिवभक्तिप्रबोधक तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पाप को दूर करें। वे श्रीकण्ठ, श्रीपति, श्रीमान्, सदा शिवध्यानरत तथा शिवार्चनरत मेरे पाप को दूर करें। वे शिखण्डी, भगवान्, शान्त, शवभस्मानुलेपन, शिवार्चनरत तथा श्रीमान् मेरे पाप को दूर करें ॥ १०-१२१/२

जो तीनों लोकों द्वारा नमस्कृत, उल्का के आकार वाली, सनातनी देवी, दक्षकन्या, महादेवी, गौरी, हिमालयपुत्री, कल्याणमयी, एकपर्णा, अग्रजा, सौम्या, एकपाटला, अपर्णा, वरदायिनी, वरप्रदान करने में सदा तत्पर, उमा, असुरों का संहार करने वाली साक्षात् कौशिकी, कपर्दिनी, खट्वांग धारण करने वाली, दिव्य, हाथ के अग्रभाग में वृक्ष का पल्लव धारण करने वाली, नैगमेय[^1]  आदि चारों दिव्य पुत्रों से घिरी हुई, मेना की पुत्री, जल से उत्पन्न, कमल के समान नेत्रों वाली, शोकरहित महात्मा नन्दी की अम्बा (माता), शुभावती की सखी, शान्त स्वभाव वाली,  , वर प्रदान करने वाली, सभी प्राणियों की सृष्टि के लिये प्रकृति के स्वरूप को प्राप्त, अव्यय (शाश्वत), महत् आदि तेईस तत्त्वों से सम्पन्न, लक्ष्मी आदि शक्तियों से सदा नमस्कृत, नन्दनन्दिनी, महादेवी मनोन्मनी, मायामयी, अलंकरण से प्रीति करने वाली, [अपनी] माया से ब्रह्मा आदि तथा चराचरसहित सम्पूर्ण जगत्‌ को क्षुब्ध एवं मोहित करने वाली, योगियों के हृदय में सर्वदा विराजमान, संसार में एक तथा अनेक रूपों में स्थित, नीलकमल के समान नेत्रों वाली, गणेश्वरों- ब्रह्मा- इन्द्र-यम-कुबेर आदि सभी देवताओं के द्वारा परम भक्ति से नित्य स्तुत होने वाली, [ उनके द्वारा ] स्तुत होकर उनकी माता के रूप में सभी विपत्तियों का नाश करने वाली, भक्तों के कष्टों का हरण करने वाली, भव्य, सांसारिक भावों को नष्ट करने वाली, दिव्य और बिना प्रयास के भक्तों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली हैं — वे साक्षात् महादेवी मेरे पाप को शीघ्र दूर करें ॥ १३–२४ ॥

जो सभी गणों के ईश, शम्भु के मुख से निकले हुए, शिवार्चन में लीन तथा श्रीयुक्त चण्ड हैं; वे मेरे पाप को दूर करें। शालंकायन के पुत्र, हलमार्ग से उत्पन्न, ऐश्वर्यशाली, मरुतों के जामाता, देवता, सभी भूतों के महेश्वर, सर्वव्यापी, सर्वद्रष्टा, शर्व, सर्वेश्वर के समान प्रभुत्वसम्पन्न, नारायण- इन्द्र-चन्द्र-सूर्य आदि देवताओं – सिद्धों-यक्षों-गन्धर्वों- भूतों, भूतों का सृजन करने वालों- उरगों – ऋषियों-महात्मा ब्रह्मा के द्वारा स्तुत, तीनों लोकों के स्वामी, मुनियों के हृदय में विराजमान और सबके द्वारा सर्वदा पूजित नन्दी [मेरे] पाप को दूर करें ॥ २५-२९ ॥

महातेजस्वी, दूसरे महादेवसदृश, श्रीयुक्त तथा शिव के अर्चन में लीन महाकाय मेरे पाप को दूर करें। जो मेरु, मन्दर, कैलास की चोटियों का भेदन करने वाले हैं; जो ऐरावत आदि दिव्य दिग्गजों से सम्यक् पूजित हैं; सातों पाताल जिनके पैर हैं; सातों द्वीप जिनके ऊरु तथा जंघा हैं; सातों समुद्र जिनके अंकुश हैं; सभी तीर्थ जिनके उदर हैं; जो कल्याणकारी हैं; आकाश जिनका शरीर है; दिशाएँ जिनकी भुजाएँ हैं; चन्द्र, सूर्य तथा अग्नि जिनके नेत्र हैं; जिन्होंने असुररूपी महावृक्ष को काट डाला है; जो ब्रह्मविद्या से परम उत्कट हैं; अपनी चित्तवृत्ति को रोककर दिव्य तथा योगपाश से समन्वित ब्रह्मा आदि महावतों के द्वारा जो हृदयकमलरूपी स्तम्भ में आबद्ध किये गये हैं; जो गजराज के समान मुख वाले हैं; जो साक्षात् करोड़ों गणों से घिरे हुए हैं तथा जो एकमात्र शिवध्यान में लीन हैं, वे [ गजानन] मेरे पाप को दूर करें ॥ ३०-३५ ॥

जो पिंगल वर्ण के नेत्र वाले, भस्म को ग्रहण करने वाले, विशिष्ट देहयुक्त, शिवार्चन में लीन तथा ऐश्वर्यसम्पन्न हैं, वे भृंगीश मेरे पाप को दूर करें। जो [ अपने] चार शरीरों से सर्वदा सभी असुरों का संहार करने वाले, शक्तिधर, शान्तस्वभाव, सेनानी, मयूर वाहन वाले, देवसेना के सेनापति तथा श्रीसम्पन्न हैं, वे स्कन्द मेरे पाप को दूर करें। शिवार्चन में सदा संलग्न, भव, शर्व, ईशान, रुद्र, पशुपति, उग्र, भीम तथा महादेव, परमेष्ठी [ सदाशिव ] — की ये मूर्तियाँ [मेरे] पाप को दूर करें ॥ ३६-३९ ॥ महादेव, शिव, रुद्र, शंकर, नीललोहित, ईशान, विजय, भीम, देवदेव भवोद्भव, कपाली तथा ईश — ये रुद्र के अंश से उत्पन्न हैं, अतः इन्हें रुद्र ही जानना चाहिये; शिव को प्रणाम करने में तत्पर ये [ रुद्र] मेरे पाप को दूर करें ॥ ४०-४१ ॥ विकर्तन, विवस्वान्, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, लोकसाक्षी, त्रिविक्रम, आदित्य, सूर्य, अंशुमान् तथा दिवाकर — ये बारह आदित्य मेरे पाप को दूर करें ॥ ४२-४३ ॥ आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य तथा आत्मा — ये शिवजी की मूर्तियाँ कही गयी हैं; ये मेरे पाप को दूर करें और मेरे भय का नाश करें। इन्द्र, पावक, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, सोम, ईशान, भगवान् हरि तथा शिवध्यान में लीन प्रभु ब्रह्मा — ये मेरे द्वारा मन तथा कर्म से किये गये पाप को दूर करें ॥ ४४–४६१/२

नभस्वान्, स्पर्शन, वायु, अनिल, मारुत, प्राण, प्राणेश और जीवेश — ये सब शिवभाषित तथा शिवार्चनपरायण मारुत मेरे पाप को दूर करें। खेचरी, वसुचारी, ब्रह्मेश, ब्रह्म, ब्रह्मधी, सुषेण, शाश्वत, पुष्ट, सुपुष्ट, महाबल — ये चारण जो शम्भु की पूजा से अत्यन्त पवित्र हैं, मेरे द्वारा किये गये समस्त पाप तथा दोष को दूर करें ॥ ४७-५० ॥ मन्त्रज्ञ, मन्त्रविद्, प्राज्ञ, मन्त्रराट्, सिद्धपूजित, सिद्धवत् और परमसिद्ध — ये सभी [ सप्त ] सिद्धगण जो सभी सिद्धियों के प्रदाता तथा शिव के चरणों के उपासक हैं, मेरे पाप को दूर करें । यक्ष, यक्षेश, धनद, जृम्भक, मणिभद्रक, पूर्णभद्रेश्वर, माली, शितिकुण्डलि और नरेन्द्र — ये यक्षों के स्वामी मेरे पाप को दूर करें ॥ ५१-५३ ॥ शिव के प्रणाम में रत तथा शिव के शरीर के आभूषणस्वरूप अनन्त, कुलिक, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, महापद्म, शंखपाल और महाबल मेरे पाप को तथा स्थावर-जंगम विष को दूर करें ॥ ५४-५५ ॥ शिव को प्रणाम करने में तल्लीन वीणाज्ञ, किन्नर, सुरसेन, प्रमर्दन, अतीशय, सप्रयोगी और गीतज्ञ — ये किन्नरगण मेरे पाप को दूर करें। विद्याधर विबुध, विद्याराशि, विदांवर, विबुद्ध, विबुध, श्रीमान्, कृतज्ञ और महायश — ये सभी शिवध्यानपरायण विद्याधर महादेव की कृपा से मेरे घोर पाप को दूर करें ॥ ५६-५८१/२  ॥

वामदेवी, महाजम्भ, कालनेमि, महाबल, सुग्रीव, मर्दक, पिंगल, देवमर्दन, प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद, बाष्कलद्वय, जम्भ, कुम्भ, मायावी, कार्तवीर्य, कृतंजय — ये महादेवपरायण महात्मा असुर मेरे घोर भय तथा आसुरी भाव को दूर करें। गरुत्मान् खगति, पक्षिराट्, नागमर्दन, नागशत्रु, हिरण्यांग, वैनतेय, प्रभंजन, नागाशी, विषनाश, विष्णुवाहन — ये सुवर्ण के रंग वाले तथा अनेकविध आभूषणों से युक्त विष्णुवाहन गरुड़ मेरे पाप को दूर करें ॥ ५९–६४ ॥ अगस्त्य, वसिष्ठ, अंगिरा, भृगु, काश्यप, नारद, दधीच, च्यवन, उपमन्यु—ये तथा अन्य शिवभक्त और शिवार्चनपरायण समस्त ऋषि मेरे पाप को दूर करें ॥ ६५-६६ ॥ शिव के ध्यान में तल्लीन रहने वाले पिता, पितामह, प्रपितामह, अग्निष्वात्त, बर्हिषद् तथा मातामह आदि [मेरे] भय तथा पाप को दूर करें। लक्ष्मी, धरणी, गायत्री, सरस्वती, दुर्गा, उषा, शची तथा ज्येष्ठा — ये देवपूजित माताएँ, देवताओं की माताएँ, गणों की माताएँ, भूतों की माताएँ तथा अन्य जो भी गणमाताएँ जहाँ-कहीं भी हों — वे सब देवदेव [ शिव] के अनुग्रह से मेरे पाप को दूर करें ॥ ६७–७० ॥ अत्यन्त भक्तियुक्त होकर शिव के लिये नित्य ताण्डव [नृत्य] करने वाली तथा शिवार्चन में रत रहने वाली उर्वशी, मेनका, रम्भा, रति, तिलोत्तमा, सुमुखी, दुर्मुखी, कामुकी, कामवर्धनी — ये तथा सभी लोकों की अन्य दिव्य अप्सराएँ और देवियाँ मेरे पाप को दूर करें ॥ ७१-७२१/२

शिव का अर्चन करने वाले सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु [मेरे ] घोर भय तथा ग्रहकष्ट का निवारण करें। मेष, वृष, मिथुन, शुभ कर्क, सिंह, कन्या, विशद तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ तथा मीन — ये बारह शिवपूजापरायण राशियाँ महेश्वर की कृपा से [मेरे] भय तथा पाप को दूर करें। अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, श्रीयुक्त मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, महाभाग पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढा, श्रवण, धनिष्ठा शतभिषा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद तथा रेवती — ये देवियाँ निरन्तर मेरे पाप को दूर करें ॥ ७३-८०१/२

ज्वर, कुम्भोदर, शंकुकर्ण, महाबल, महाकर्ण, प्रभात, महाभूतप्रमर्दन, श्येनजित्, शिवदूत — ये प्रीति- वर्धक प्रमथगण और करोड़ों-करोड़ों भूतोंसहित माताएँ महादेव की कृपा से [मेरे] भय तथा पाप को सर्वदा दूर करें ॥ ८१-८३ ॥ जो एकमात्र शिव के ध्यान में तल्लीन, हिमालय से प्रादुर्भूत गंगा के जल के समान पापनाशक, कुन्द [पुष्प] तथा चन्द्रमा के समान आकार वाले, कुम्भ-कुन्दपुष्पों तथा इन्दु को भूषण के रूप में धारण करने वाले, बड़वानल के शत्रु, बड़वा के मुख का भेदन करने वाले हैं, चार पैरों वाले, क्षीरसागर के समान पाण्डुर वर्ण वाले, रुद्रों तथा गणेश्वरों के साथ सदा रुद्रलोक में रहने वाले, विश्व को धारण करने वाले, सम्पूर्ण जगत् के पिता, नन्दा आदि माताओं से सदा घिरे हुए, यज्ञ का नाश करने वाले तथा शिवार्चनपरायण हैं — वे वृषेन्द्र मेरे पाप को सदा दूर करें ॥ ८४-८७ ॥ रुद्रलोक में स्थित जगज्जननी गंगामाता मेरे पाप को दूर करें। जो शिवभक्त नन्दा नामक गौ हैं, वे मेरे पाप को दूर करें। भद्रपद वाली, शिवलोक में स्थित, गायों की माता महाभाग्यशालिनी जो देवी भद्रा नामक गौ हैं, वे मेरे पाप को दूर करें। सब प्रकार से कल्याण करने वाली, सभी पापों का नाश करने वाली तथा सदा रुद्रपूजा में लीन रहने वाली वे सुरभि नामक गौ मेरे पाप को दूर करें । शील से सम्पन्न, ऐश्वर्य प्रदान करने वाली, शिवभक्त तथा नित्य शिवलोक में रहने वाली वे सुशीला नामक गौ मेरे पाप को दूर करें ॥ ८८-९१ ॥

वेदों तथा शास्त्रों के अर्थ तथा तत्त्व के ज्ञाता, समस्त कार्यों का चिन्तन करने वाले, सभी गुणों से सम्पन्न, सर्वदेवेश्वर [शिव]-के पुत्र, श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, सौम्य, साक्षात् महाविष्णु के विग्रहस्वरूप, देवताओं के सेनापति, गम्भीरता से युक्त, यज्ञ को विनष्ट करने वाले, ऐरावत हाथी पर सवार, काले तथा घुँघराले केश वाले, कृष्णवर्ण के अंग वाले, लाल नेत्रों वाले, चन्द्रमा तथा सर्प के आभूषण वाले, भूतों-प्रेतों-पिशाचों तथा कूष्माण्डों से घिरे हुए और शिवार्चन में तल्लीन वे आर्य कालभैरव मेरे पाप को दूर करें ॥ ९२–९५ ॥ ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा, आग्नेयिका — समस्त लोकों से पूजित तथा योगिनियों से घिरी हुई ये सभी माताएँ [मेरे] महापाप को दूर करें ॥ ९६-९७ ॥

महातेजस्वी, हिम (बर्फ) – कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमा के सदृश, रुद्र के पुत्र, भयानक, शूलयुक्त विशाल भुजा वाले, हजार भुजाओं वाले, सब कुछ जानने वाले, सभी प्रकार के शस्त्र धारण करने वाले, तीन अग्निरूप नेत्र वाले, देवस्वरूप, तीनों लोकों को अभय प्रदान करने वाले, ऐश्वर्यशाली, माताओं की सर्वदा रक्षा करने वाले, महान् वृषभ पर आरूढ़, तीनों लोकों से नमस्कृत, श्रीयुक्त, शिव के पादार्चन में तल्लीन, यज्ञ के सिर का छेदन करने वाले, पूषा के दाँत को तोड़ने वाले, अग्नि के हाथ को नष्ट करने वाले, साक्षात् भग के नेत्र को नीचे गिराने वाले, [अपने] पैर के अँगूठे से सोम के अंग को पीसने वाले, प्रभु नाम वाले, उपेन्द्र-इन्द्र-यम आदि देवताओं के अंगरक्षक, महादेवी सरस्वती के ओठ तथा नाक को काटने वाले, गणों के ईश्वर (स्वामी) तथा सेनानायक जो वीरभद्र हैं — वे मेरे पाप को दूर करें ॥ ९८-१०३ ॥

ज्येष्ठ, वरिष्ठ, वरदायिनी, श्रेष्ठ आभूषणों से विभूषित तथा जगज्जननी जो महालक्ष्मी हैं — वे मेरे पाप को दूर करें। महाभाग्यवती, महान् भूतगणों से घिरी हुई तथा शिवपूजन में सदा रत जो महामोहा ( महामाया) हैं – वे मेरे पाप को दूर करें। सभी गुणों से सम्पन्न, सभी लक्षणों से युक्त, सब कुछ देने वाली और सर्वत्र गमन करने वाली जो देवी लक्ष्मी हैं — वे मेरे पाप को दूर करें। सिंह पर आरूढ़ पार्वती की पुत्री, शाश्वत, विष्णु की निद्रारूपा, महामाया, वैष्णवी (विष्णु की शक्ति), देवताओं से पूजित, तीन नेत्रों वाली, वर प्रदान करने वाली, महिषासुर का संहार करने वाली तथा शिव के अर्चन में तल्लीन जो महादेवी भगवती दुर्गा हैं — वे मेरे पाप को दूर करें ॥ १०४-१०८ ॥ ब्रह्माण्ड को धारण करने वाले तथा सभी लोकों द्वारा पूजित सभी सत्य और मानस रुद्र मेरे भय को दूर करें। जो भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्डगणनायक तथा कूष्माण्ड हैं — वे समाहितचित्त होकर [मेरे] पाप को दूर करें ॥ १०९-११० ॥

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! प्रत्येक महीने में इस [व्यपोहनस्तव]-से शिव की स्तुति करके भूमि पर मस्तक टेककर प्रणाम करके अन्त में सम्पूर्ण अनुष्ठान का समापन करना चाहिये ॥ १११ ॥ जो [इस] दिव्य व्यपोहनस्तव को पढ़ता अथवा सुनता है, वह समस्त पापों को ध्वस्त करके रुद्रलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ११२ ॥ कन्या की अभिलाषा रखने वाला कन्या प्राप्त करता है, विजय की कामना करने वाला विजय प्राप्त करता है, धन की इच्छा रखने वाला धन प्राप्त करता है, पुत्र की कामना करने वाला अनेक पुत्र प्राप्त करता है, विद्या चाहने वाला विद्या प्राप्त करता है और सुख चाहने वाला सुख प्राप्त करता है; मनुष्य जिन-जिन कामनाओं की प्रार्थना करता है, इसके श्रवण से इस लोक में उन सबको शीघ्र प्राप्त कर लेता है और देवताओं का प्रिय हो जाता है। जिस किसी के निमित्त इस पवित्र स्तव को पढ़ा जाता है, उसे वात, पित्त आदि से होने वाले रोग पीड़ित नहीं करते हैं, असमय में उसकी मृत्यु नहीं होती है और उसे सर्प नहीं डँसते हैं ॥ ११३–११६ ॥

जो पुण्य तीर्थों की यात्रा करने से, जो फल यज्ञों के करने से, जो पुण्य दान करने से और जो पुण्य विशेषरूप से व्रतों के करने से होता है; उससे करोड़ों गुना फल इसे जप करके मनुष्य प्राप्त करता है। जो गाय की हत्या करने वाला, कृतघ्न, वीरघाती, ब्रह्महत्यारा, शरणागत का वध करने वाला, मित्र के साथ विश्वासघात करने वाला, दुष्ट, पापमय आचरण वाला और माता-पिता का वध करने वाला होता है, वह भी [ इसके पाठ से] सभी पापों से मुक्त होकर शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ११७–१२० ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘व्यपोहनस्तवनिरूपण’ नामक बयासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८२ ॥

[^1]: सुश्रुतसंहिता के उत्तरतन्त्र अध्याय २७–३७ तक में छोटे शिशुओं में जो रोग होते हैं, उन्हें ग्रहों से उत्पन्न बताया गया है। स्कन्दग्रह, स्कन्दापस्मार, शकुनी, रेवती, पूतना, अन्धपूतना, शीतपूतना, मुखमण्डिका और नैगमेय (पितृग्रह) – ये नौ ग्रह बताये गये हैं। इन नौ ग्रहों से पीड़ित बालक के लक्षण अलग-अलग होते हैं। लक्षणों के आधार पर यह ज्ञान होता है कि बालक अमुक ग्रह से पीड़ित है। नैगम ग्रह से पीड़ित बालक के मुख से झाग गिरता है, वह हर समय बेचैन रहता है तथा ऊपर की ओर देखता हुआ बराबर रोता है, ज्वर से पीड़ित रहता है, उसके शरीर से वसा के समान गन्ध आती है, वह बार-बार बेहोश हो जाता है इत्यादि । सुश्रुतसंहिता में इन अरिष्टकारी बालग्रहों की चिकित्सा भी बतायी गयी है और इन ग्रहों के स्वामी स्कन्दग्रह से प्रार्थना की गयी है कि मेरा बच्चा वेदना और रोग से शीघ्र कष्टमुक्त हो स्वस्थ हो जाय — ‘नीरुजो निर्विकारश्च शिशुर्मे जायतां द्रुतम्’ (सुश्रुत० उत्त० २७ । २१) । ये सभी ग्रह दिव्य तथा ऐश्वर्यशाली हैं। कृत्तिका, पार्वती, अग्नि तथा महादेवजी ने अपने पुत्र कार्तिकेय की रक्षा के लिये इन्हें उत्पन्न किया है। नैगमेय को पार्वती का पुत्र बताया गया है। इसका मुख भेड़ के समान है।

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