January 29, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -084 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ चौरासीवाँ अध्याय उमामहेश्वरव्रत का वर्णन तथा पूजाविधान श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुरशीतितमोऽध्याय उमामहेश्वरव्रतं सूतजी बोले — हे श्रेष्ठ मुनियो ! अब मैं नर, नारी आदि प्राणियों के हित के लिये [ स्वयं ] शिवजी द्वारा कहे गये उमामहेश्वर व्रत को बताऊँगा । वर्षभर अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा को रात में हविष्य ग्रहण करना चाहिये और शिवजी की पूजा करनी चाहिये ॥ १-२ ॥ [ शैलादि बोले — ] हे प्रभो [ सनत्कुमार ] ! जो [मनुष्य ] सुवर्ण अथवा चाँदी की उमा-महेश की परम सुन्दर प्रतिमा बनाकर वर्ष के अन्त में विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करके पूर्ण सौन्दर्ययुक्त तथा छत्र- चामर – आभूषणों से अलंकृत रथ आदि से देवेश [ शिव] – को शिवालय में ले जाकर इस व्रत को परमेश्वर शिव को निवेदित करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है और यदि नारी हो, तो वह भगवती उमा का सायुज्य प्राप्त करती है ॥ ३-५१/२ ॥ कन्या हो अथवा विधवा हो – वह एक वर्ष तक अष्टमी तथा चतुर्दशी को नियमपूर्वक ब्रह्मचारिणी रहकर भोजन न करे; वर्ष के अन्त में पूर्वोक्त विधि से प्रतिमा बनाकर विधान के अनुसार उसकी प्रतिष्ठा करके उसे रुद्रालय में प्रदान करके पुनः ब्राह्मणों को भोजन कराकर वह भवानी (पार्वती) के साथ आनन्द मनाती है । हे द्विजो ! जो स्त्री वर्षपर्यन्त केवल कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को यह व्रत करती है और वर्ष के अन्त में जिस किसी पदार्थ से प्रतिमा बनाकर पूर्वोक्त समस्त विधान सम्पन्न करती है, वह भवानी के साथ आनन्द मनाती है ॥ ६-९१/२ ॥ स्त्री को चाहिये कि वर्षपर्यन्त नियन्त्रित रहती हुई अमावस्या के दिन आहार ग्रहण न करे और वर्ष के अन्त में विधिपूर्वक त्रिशूल बनवाकर शिव को निवेदित करे तथा ईशान को स्नान कराकर हजार श्वेत कमलों से भक्तिपूर्वक उनका पूजन करे और सुवर्णमयी कर्णिका से युक्त चाँदी का कमल शिवजी को समर्पित करके ब्राह्मणों को दक्षिणा भी प्रदान करे। वह स्त्री [शिवजी के निमित्त ] त्रिशूल के दान से जानबूझकर भ्रूणहत्या आदि जो भी पाप होता है, उन सबको ध्वस्त कर डालती है; इसमें सन्देह नहीं है और हे श्रेष्ठ द्विजो ! वह भवानी का सायुज्य प्राप्त कर लेती है। यदि [कोई] मनुष्य इसे करता है, तो वह भी रुद्रसायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ १०–१४ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! पूरे एक वर्ष भर पूर्णमासी तथा अमावस्या को आलस्यरहित तथा उपवासपरायण होकर नारी को तथा नर को भी इसे करना चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो ! पति की आज्ञा से ही स्त्रियों को यह व्रत, जप, दान, तप — सब कुछ करना चाहिये; क्योंकि स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं हैं। सुव्रतो ! वर्ष के अन्त में सभी प्रकार के गन्धों से युक्त उस प्रतिमा को शिव को निवेदित कर देना चाहिये; वह सुव्रता [स्त्री] भवानी का सायुज्य तथा सारूप्य प्राप्त कर लेती है; इसमें सन्देह नहीं है, मैं यह पूर्णतः सत्य कह रहा हूँ ॥ १५–१७१/२ ॥ जो स्त्री कार्तिक मास में एक बार भोजन करती है, क्षमा-अहिंसा आदि नियमों से युक्त रहती है, ब्रह्मचर्य का पालन करती है, आलस्यरहित होकर एक भार [^1] काला तिल तथा घृत- गुड़ मिलाकर पकाया भात परमेश्वर को निवेदित करती है, ब्राह्मणों को अपने सामर्थ्य के अनुसार दान देती है और अष्टमी तथा चतुर्दशी को उपवास करती है — वह उत्तम व्रत वाली [स्त्री] भवानी का सारूप्य प्राप्त करके उनके साथ आनन्द मनाती है ॥ १८- २१ ॥ समस्त व्रतों में क्षमा, सत्य, दया, दान, शुद्धि तथा इन्द्रियों का निग्रह और रुद्रपूजन — यह सामान्य धर्म है ॥ २२ ॥ अब मैं संक्षेप में क्रम से मार्गशीर्ष से प्रारम्भ करके कार्तिक तक प्रत्येक महीने के व्रत को बताऊँगा; इस परम पुण्यप्रद व्रत को [ स्वयं] नन्दी ने कहा था ॥ २३१/२ ॥ जो [स्त्री] मार्गशीर्ष मास में पूर्ण अंगों वाले उत्तम वृषभ को अलंकृत करके विधिपूर्वक शिव को निवेदित करती है, वह भवानी के साथ आनन्दित रहती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २४-२५ ॥ जो पौष मास में पूर्वोक्त विधि के अनुसार सम्पूर्ण कृत्य करके त्रिशूल की स्थापना कर उसे [शिव को] समर्पित करती है, वह भवानी के साथ आनन्द मनाती है ॥ २६ ॥ महाभाग मुनियो ! जो माघ महीने में सभी लक्षणों से युक्त रथ बनाकर देवेश की पूजा करके उसे शिव को समर्पित करती है और ब्राह्मणों को भोजन कराती है, वह देवी [पार्वती]-के साथ आनन्द करती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २७१/२ ॥ जो फाल्गुन मास में अपने सामर्थ्य के अनुसार विधिपूर्वक सोने, चाँदी अथवा ताँबे की प्रतिमा बनाकर उसकी प्रतिष्ठा तथा पूजा करके शिवालय में स्थापित करती है, वह महादेवी के साथ आनन्दित रहती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २८-२९१/२ ॥ चैत्र मास में ताँबे आदि से शिव, कुमार (कार्तिकेय) तथा भवानी की मूर्तियाँ यथाविधि बनाकर विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके उन्हें रुद्र शम्भु को अर्पण करने से स्त्री भवानी के साथ आनन्दित रहती है ॥ ३०-३१ ॥ कुबेर का रजतमय कैलास आलय बनाकर उसे चारों ओर से सभी रत्नों से युक्त करके उसमें शिव, उमा तथा गणेश्वरों की रजतमय मूर्ति रखकर उसकी यथाविधि प्रतिष्ठा करके उसे परमेश्वर शिव के सुन्दर मन्दिर में स्थापित करना चाहिये; जो [स्त्री] वैशाख मास में इस प्रकार कैलास नामक उत्तम व्रत को करती है, वह कैलासपर्वत पहुँचकर भवानी के साथ आनन्द करती है ॥ ३२-३४ ॥ हे उत्तम ब्राह्मणो ! ज्येष्ठ मास में उमापति महादेव की ताम्र आदि एक शुभ्र लिङ्गमूर्ति बनवाये, जो हाथ जोड़े हुए हंस पर सवार ब्रह्मा तथा वाराह पर सवार विष्णु से संयुक्त हो और मध्य में भव (महेश्वर) विराजमान हों — ऐसी लिङ्गमूर्ति बनवाकर विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करने के अनन्तर ब्राह्मणों को भोजन कराये और अपने कल्याण के लिये शिव को प्रसन्न करके ब्राह्मणों को साथ लेकर शिवालय में उसे विधिपूर्वक स्थापित करके वह देवी का सायुज्य प्राप्त कर लेती है ॥ ३५-३७ ॥ जो स्त्री शुभ आषाढ़ महीने में अपने सामर्थ्य के अनुसार पके हुए ईंटों से विधिवत् गृह बनवाकर उसे सभी बीजरसों से, परम सुन्दर मूसल-उलूखल आदि गृहोपयोगी सामग्रियों से, दास-दासी आदि से, [ पलंग – विस्तर आदि ] शयन – वस्तुओं से, [अन्न आदि ] खाद्य पदार्थों से युक्त करके उस गृह को सभी ओर से पूर्ण वस्त्रों से ढँककर उमापति प्रभु महादेव को घृत आदि से स्नान कराकर विधिपूर्वक एक हजार ब्राह्मणों को भोजन कराकर विद्या विनय से सम्पन्न तथा वेद में पारंगत ब्रह्मचारी ब्राह्मण की भक्तिपूर्वक यथाविधि पूजा करके पूर्ण जीवनभर के लिये एक परम सुन्दरी कन्या, क्षेत्र (खेत), गोमिथुन और मेरुपर्वत के समान महाराशि वाले अनेक प्रकार के दिव्य सामानों सहित वह गृह [शिव को] समर्पित करती है; वह गोलोक प्राप्त करके भवानी के साथ आनन्द करती है, भवानी के सदृश होकर सभी कल्पों में अव्यय ( शाश्वत) बनी रहती है और [अन्त में] भवानी का सायुज्य प्राप्त करती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३८–४५१/२ ॥ सावन महीने में सभी धातुओं से युक्त तथा विचित्र ध्वजों से सुशोभित तिलपर्वत शिव को समर्पित करना चाहिये। जो [स्त्री] वितान, ध्वज, वस्त्र, धातु आदि सहित तिलपर्वत निवेदित करती है और [अन्त में] ब्राह्मणों को भोजन कराती है, उसे पूर्व में कहा गया सबकुछ प्राप्त हो जाता है ॥ ४६-४७१/२ ॥ जो भाद्रपद मास में वितान, ध्वज, वस्त्र, धातु आदि सहित शालि चावल का सुन्दर पर्वत बनाकर उसे शिव को समर्पित करती है और ब्राह्मणों को भोजन कराकर विधिपूर्वक उसका दान करती है, वह सूर्य की किरणों के समान होकर भवानी के साथ आनन्द करती है ॥ ४८-४९१/२ ॥ आश्विन महीने में सुवर्ण तथा वस्त्र से युक्त एक विशाल धान्यपर्वत बनाकर उसे शिव को अर्पण करके शंकर की विधिवत् पूजा करके ब्राह्मणों को भोजन कराने से पूर्व कहा गया सबकुछ प्राप्त हो जाता है। तीनों लोकों के आधारस्वरूप मेरु नामक उत्तम पर्वतराज का निर्माण करे, जो सभी धान्यों से युक्त हो, सभी बीजों तथा रसों से परिपूर्ण हो, सभी धातुओं से संयुक्त हो, सभी रत्नों से सुशोभित हो, चार शृंगों (शिखर) – से युक्त हो, वितान तथा छत्र से सुशोभित हो, गन्ध-पुष्प एवं अद्भुत धूपों से सुशोभित हो, विचित्र नृत्य – गानों से शोभायमान हो, शंख – वीणा की ध्वनियों से युक्त हो, वेदध्वनियों से और विशेषकर मंगलसूचक प्रार्थना आदि से अत्यन्त पवित्र हो, आठ बड़ी ध्वजाओं से युक्त हो और विचित्र पुष्पों से सुशोभित हो । उस [पर्वत]-के शिखर पर मध्य में धातुनिर्मित शिव को विराजमान करे । दक्षिण में चतुर्मुख ब्रह्मा, उत्तर में निर्विकार देवदेवेश नारायण, इन्द्र आदि लोकपालों को भक्तिपूर्वक यथाविधि विराजमान करके उनकी प्रतिष्ठा करने के अनन्तर स्नान कराकर महेश्वर की पूजा करके महादेव के दाहिने हाथ में देवपूजित त्रिशूल तथा बायें हाथ में पाश, भवानी के हाथ में हेमभूषित कमल, विष्णु के हाथों में शंख-चक्र-गदा- पद्म, ब्रह्मा के हाथों में अक्षमाला तथा उत्तम कमण्डलु, इन्द्र के हाथ में वज्र, अग्नि के हाथ में शक्ति नामक महान् आयुध, यम के हाथ में दण्ड, निशिचर निर्ऋति के हाथ में खड्ग, वरुण के हाथ में नाग नामक भयंकर तथा अद्भुत महापाश, वायुदेव के हाथ में यष्टि (छड़ी), कुबेर के हाथ में लोकपूजित गदा और ईशान देव के हाथ में टंक — इस प्रकार क्रम से निवेदित करके शिव की चरुसमन्वित महान् पूजा करके अपने सामर्थ्य के अनुसार सभी देवताओं की पूजा करे। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर प्रयत्नपूर्वक उनका सम्मान करके महामेरुव्रत सम्पन्नकर महादेव को समर्पित कर दे। ऐसा करने वाली स्त्री महामेरुपर्वत पहुँचकर महादेवी के साथ आनन्द करती है और चिरकाल तक महादेवी का सायुज्य प्राप्त किये रहती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५०-६५ ॥ जो स्त्री कार्तिक मास में सोने अथवा ताँबे की सभी आभरणों से युक्त तथा सभी लक्षणों से समन्वित देवी उमा की सुन्दर प्रतिमा बनाकर; साथ ही देवेश महादेव की भी सभी लक्षणों से युक्त मूर्ति बनाकर विधानपूर्वक उनकी प्रतिष्ठा करके उन दोनों के सम्मुख अग्नि को, हाथ में स्रुव लिये हुए ब्रह्मा को और लोकपालों तथा सिद्धों से घिरे हुए एवं सभी आभूषणों से विभूषित कन्या-दाता नारायण को यत्नपूर्वक स्थापित करके भक्तिपूर्वक इस व्रत को रुद्रालय में उन [शिव] – को समर्पित करती है, वह भवानी का स्वरूप प्राप्त करके शिव के साथ आनन्द करती है ॥ ६६–६९१/२ ॥ एक बार भोजन करके प्रत्येक मास के पुण्यप्रद व्रत को क्रम से करे; हे श्रेष्ठ मुनियो ! नर नारी आदि प्राणियों के कल्याण के लिये मार्गशीर्ष से आरम्भ करके कार्तिक तक किये जाने वाले इस व्रत को प्रवर्तित किया गया है। शिव द्वारा बताये गये इस व्रत को करके पुरुष शिव का सायुज्य प्राप्त करता है और नारी देवी [ पार्वती ] का सायुज्य प्राप्त करती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७०-७२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘उमामहेश्वरव्रत’ नामक चौरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८४ ॥ [^1]: भार का परिमाण इस प्रकार है- चतुर्भिर्त्रीहिभिर्गुञ्जं गुञ्जान्पञ्च पणं पलम् । अष्टौ धरणमष्टौ च कर्षं तांश्चतुरः पलम् । तुलां पलशतं प्राहुर्भारं स्याद्विंशतिस्तुलाः ॥ अर्थात् ‘चार व्रीहि (धान)-की एक गुंजा, पाँच गुंजाका एक पण, आठ पणका एक धरण, आठ धरणका एक कर्ष, चार कर्षका एक पल, सौ पलकी एक तुला और बीस तुलाका एक भार कहलाता है।’ See Also:– भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय २३ (उमामहेश्वर—व्रत की विधि) Content is available only for registered users. 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