January 30, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -086 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ छियासीवाँ अध्याय पाशुपतयोग ज्ञान का स्वरूप तथा उसकी महिमा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षडशीतितमोऽध्यायः संसारविषकथनं ऋषिगण बोले — दग्ध पापवाले ब्राह्मणों ने विरक्त ज्ञानियों के उत्तम ध्यानयज्ञ को जप से श्रेष्ठ कहा है; अतः हे सूतजी ! अब आप विरक्त महात्माओं के ध्यानयज्ञ के विषय में पूर्णरूप से विस्तारपूर्वक पूर्णप्रयत्न के साथ [हम लोगों को] बताइये ॥ १-२ ॥ दीर्घ काल तक यज्ञ करने वाले उन ऋषियों का वचन सुनकर सूतजी ने वह सारा वृत्तान्त कहा, जिसे विश्व की रचना करने वाले रुद्र ने कालकूट नामक विष को निष्क्रिय करके [मेरुपर्वत की] गुफा में आकर महात्माओं को बताया था ॥ ३१/२ ॥ सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] गुफा में पहुँचकर पार्वती के साथ सुखपूर्वक बैठे हुए उन शंकर को महात्मा मुनियों ने प्रणाम किया। उसके बाद उन सभी ने गुफा में विराजमान उमापति [ भगवान् ] नीलकण्ठ की स्तुति की और कहा — हे भगवन्! आपने अति भयंकर कालकूट नामक विष को निष्क्रिय कर दिया; अतः हे देव ! हे वृषध्वज ! आपके द्वारा ही सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ ४-६ ॥ उनका वह वचन सुनकर विश्वात्मा भगवान् नीललोहित सनन्दन आदि [ मुनियों ] से हँसते हुए कहने लगे — हे श्रेष्ठ द्विजो ! यह [ विष] क्या है ! मैं अति भयंकर विष के विषय में बताऊँगा, जो इस [कालकूट] विष को भी निष्क्रिय कर देता है, वह [ परम] समर्थ है; यह कालकूट विष कौन-सी चीज है। कालकूट नामक विष [ वास्तव में ] विष नहीं है, बल्कि संसार ही विष कहा जाता है। अतः पूर्ण प्रयत्न से इस संसाररूपी अत्यन्त भीषण विष को नष्ट करना चाहिये अर्थात् संसार में मिथ्यात्व का भाव रखना चाहिये ॥ ७-९ ॥ अपने अधिकार के अनुसार यह संसार दो प्रकार का कहा गया है; मूढ़चित्त वाले मनुष्यों के लिये यह असंक्षीण (क्षय न होने वाला) तथा अत्यन्त भयंकर है। हे सुव्रतो ! यह सृष्टि इच्छा तथा रागजनित दोष के कारण है; इसका ज्ञान होने पर संसार बाधित हो जाता है। उन्हीं ( ईषणा और ज्ञान) – के वश में होने से ही सभी लोगों की धर्म तथा अधर्म में प्रवृत्ति होती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १०-११ ॥ हे ब्राह्मणो ! पारलौकिक पदार्थ के प्रत्यक्ष न रहने पर भी शास्त्र के द्वारा उसके विषय में श्रवण कर लेने से उसमें सज्जनों तथा विद्वानों की प्रवृत्ति हो जाती है । अतः जो इहलौकिक तथा पारलौकिक — इन दोनों पदार्थों को हेय समझकर पूर्ण प्रयत्न से इनका परित्याग कर देता है; वह विरक्त कहा जाता है ॥ १२-१३ ॥ द्विजो ! श्रुतिप्रतिपादित सकाम कर्मों में, जिसमें सबकी प्रवृत्ति है तथा वेद के मस्तकस्वरूप एवं मन्त्र-द्रष्टा ऋषियों के सारस्वरूप निष्कामकर्मफल को प्रतिपादित करने वाला जो अध्यात्मशास्त्र है, वही शास्त्र कहा जाता है ॥ १४ ॥ जो श्रुति रहस्य को नहीं जानते हैं, वे ही ऐसा कहते हैं कि चूँकि सभी लोगों का स्वभाव कामनामूलक दिखायी देता है, अतः श्रुति सकामकर्म की ही प्रवर्तिका है ॥ १५ ॥ वास्तविक रूप में विरक्त जनों के लिये निष्कामकर्म का प्रतिपादन करने में ही श्रुति का तात्पर्य है, अतः सभी देहधारियों के लिये संसार अज्ञानमूलक है। वेदोक्त निष्कामकर्म के द्वारा जीवभाव क्षीण होता है। अविद्या से उत्पन्न जो अज्ञान है, उसके कारण सकामकर्म के वशीभूत तीन प्रकार का जीवभाव दृढ़ होता है ॥ १६-१७ ॥ पापकर्म करने वाला नारकी होता है, पुण्यकर्म करने वाला अपने पुण्य की महिमा के कारण स्वर्गी होता है और पाप-पुण्यकर्म के मिश्रण वाला जीव उद्भिज, स्वेदज, अण्डज तथा जरायुज — इन चार रूपों में व्यवस्थित होता है। इस प्रकार से व्यवस्थित वह अज्ञानी जीव अपने कर्म के कारण [संसारचक्र से] मुक्त नहीं हो पाता है ॥ १८-१९ ॥ सन्तान, कर्म तथा धन से सज्जनों की मुक्ति नहीं होती है; एकमात्र त्याग के द्वारा ही मुक्ति प्राप्त होती है और उसके अभाव के कारण यह जीव भ्रमण करता रहता है। इस प्रकार अज्ञान के दोष के कारण तथा अनेक कर्मों के वशीभूत होने के कारण यह जीव छः कोशों ( स्नायु, अस्थि, मज्जा, त्वचा, मांस, रक्त) – से निर्मित इस शरीर को धारण करता है ॥ २०-२१ ॥ गर्भ में, योनिमार्ग में, पृथ्वीतल पर, कुमारावस्था में, युवावस्था में, वृद्धावस्था में और मृत्यु के समय प्राणी को अनेक दुःख होते हैं। हे द्विजो ! विचारपूर्वक देखा जाय तो स्त्रीसंसर्ग आदि से ही सज्जनों को दुःख उत्पन्न होता है; वे एक दु:ख से दूसरे दुःख को शान्त करना चाहते हैं और दु:खी होते रहते हैं। विषयों के उपभोग से काम की शान्ति कभी नहीं होती है; जैसे हवि से अग्नि बढ़ती है, वैसे ही वह [ वासना ] निरन्तर बढ़ती ही जाती है ॥ २२-२४ ॥ अतः विचार किया जाय तो मनुष्यों को विषयों के प्राप्त होने पर भी सुख नहीं प्राप्त होता है। धन के अर्जन में, उसकी सुरक्षा करने में तथा व्यय में भी दुःख है । हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! विचार करने पर देखा जाय, तो पिशाचलोक, राक्षसलोक, यक्षलोक, गन्धर्वलोक, चन्द्रलोक, बुधलोक, प्रजापतिलोक, ब्राह्मलोक और प्रकृतिलोक तथा पुरुषलोक में भी भोगों के नाश की सम्भावना से तथा एक- दूसरे से श्रेष्ठ होने के कारण ईर्ष्याजन्य दुःखों से वे भी दुःखी ही रहते हैं। अतः हे सुव्रतो! भाग्य से प्राप्त अशुद्ध भोगों तथा अशुद्ध धनों का त्याग कर देना चाहिये; हे सुव्रतो! चाहे वह भोग (सुख) आठ प्रकार का हो, अथवा सोलह प्रकार का हो, अथवा चौबीस प्रकार का हो, अथवा बत्तीस प्रकार का हो, अथवा चालीस प्रकार का हो, अथवा अड़तालीस प्रकार का हो, अथवा छप्पन प्रकार का हो अथवा चौंसठ प्रकार का हो, [^1] विवेकयुक्त व्यक्ति के लिये भोग दुःखरूप ही होता है ॥ २५-३० ॥ विचार किया जाय तो पृथ्वीसम्बन्धी, जलसम्बन्धी, अग्निसम्बन्धी, वायुसम्बन्धी, आकाशसम्बन्धी, मनसम्बन्धी, अहंकारसम्बन्धी, बुद्धिसम्बन्धी तथा प्रकृतिसम्बन्धी भोग भी ब्रह्मवादी योगियों के लिये दुःख ही हैं; इसमें सन्देह नहीं है। विचारपूर्वक देखा जाय, तो गणेश्वरों के गुण भी [वास्तव में] दुःख ही हैं । समस्त लोकों में प्रारम्भ, मध्य तथा अन्त में सर्वदा दुःख ही है। वास्तव में वर्तमान में भी दुःख है और भविष्य में भी दुःख होंगे। दोषों से ग्रस्त सभी देशों में अनेक प्रकार के दुःख हैं; अपने को ज्ञानी समझने वाले [कुछ लोग] अज्ञान के कारण अतीत का स्मरण नहीं करते हैं। जिस प्रकार औषधि रोगों के उपचार के लिये होती है; न कि सुख के लिये, उसी प्रकार आहार को भूखरूपी रोग को दूर करने के लिये बताया गया है, न कि सुख के लिये । शीत, ताप, वायु, वर्षा आदि के द्वारा उन-उन कालों में शरीरधारियों को दुःख ही होता है, इसमें सन्देह नहीं है; किंतु अज्ञानी लोग इसे नहीं समझ पाते हैं ॥ ३१–३६१/२ ॥ हे श्रेष्ठ मुनियो ! इसी प्रकार स्वर्ग में भी लोग पुण्य के क्षय आदि दुःखों से तथा राग, द्वेष, भय आदि नानाविध रोगों से ग्रस्त होते हैं। जैसे जड़ से कटा हुआ वृक्ष विवश होकर पृथ्वी पर गिर जाता है, वैसे ही स्वर्ग में रहने वाले भी पुण्यरूपी वृक्ष के क्षय होने से पृथ्वी पर पुनः आ जाते हैं । दुःखमय कामनाओं से युक्त तथा दुःखमय भोगसम्पदा से परिपूर्ण स्वर्गवासी [ देवताओं] को भी इस स्वर्ग से पतित होने पर दुःख तथा कष्ट ही होता है । हे श्रेष्ठ मुनियो ! शास्त्रोचित कर्मों को न करने से विभिन्न वर्ण के लोगों को नरकों में पड़ने के कारण वहाँ दुःख ही भोगना पड़ता है ॥ ३७–४१ ॥ जैसे उजड़े हुए निवास वाला मृग मृत्यु से भयभीत होकर निद्रा ग्रहण नहीं कर पाता, उसी प्रकार ध्यानपरायण महात्मा संन्यासी संसार से भयभीत होकर निद्रा ग्रहण नहीं कर पाता अर्थात् प्रमादरहित होकर सर्वथा सजग रहता है ॥ ४२ ॥ कीटों, पक्षियों, मृगों, घोड़ा-हाथी आदि पशुओं में भी [सर्वदा] दुःख ही देखा गया है; अतः भोग का त्याग करने वाले को उत्तम सुख प्राप्त होता है। हे सुव्रतो ! वैमानिक देवताओं और कल्पों के अधिकारी तथा अपने पद का अभिमान करने वाले मनु आदि को भी दुःख प्राप्त होता है। तीनों लोकों में एक-दूसरे को जीतने की इच्छा के कारण देवताओं तथा दैत्यों को और राजाओं तथा राक्षसों को भी दुःख प्राप्त होता है ॥ ४३–४५ ॥ वस्तुतः समस्त वर्णों के आश्रम भी श्रम के कारण दुःख ही देते हैं। लोग आश्रमों, देवों, यज्ञों, सांख्यों, व्रतों, विविध कठोर तपों तथा अनेक प्रका के दानों से भी आत्मतत्त्व नहीं प्राप्त करते; अपितु ज्ञानवान् लोग स्वतः प्राप्त कर लेते हैं, अतः पूर्ण प्रयत्न से पाशुपतव्रत करना चाहिये। बुद्धिमान् को पाशुपतव्रत में स्थित होकर नित्य भस्मशायी होना चाहिये। सद्योजातादि पाँच मन्त्रों [^2] के अर्थ- ज्ञान से सम्पन्न तथा शिवतत्त्व में समाहित बुद्धिमान् व्यक्ति को मुक्तिदायक तथा कर्म का नाश करने वाले पाशुपत योग का आश्रय लेना चाहिये। पंचार्थयोग से युक्त विद्वान् दुःख के अन्त को प्राप्त होता है ॥ ४६-४९१/२ ॥ भक्तजन परा विद्या से ही ज्ञान प्राप्त करते हैं, अपरा विद्या से नहीं । परा तथा अपरा — ये दो प्रकार की विद्याएँ कही गयी हैं । हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, सभी अर्थों को सिद्ध करने वाला अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष — ये अपरा विद्या हैं। परा विद्या अक्षररूप में स्थित है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! वह अदृश्य, अग्राह्य, गोत्ररहित, वर्णरहित, नेत्र – कान-हाथ- पैर आदि से रहित, अजात, अभूत तथा शब्दविहीन है । हे द्विजो ! वह स्पर्शरहित, रूपरहित, रस- गन्धहीन, अव्यय, आधारहीन, नित्य, सर्वगामी, सर्वशक्तिशाली, महान्, बृहत्, अज तथा चित्स्वरूप है। वह प्राणरहित, मनरहित, स्नेहरहित तथा अलोहित है। वह अप्रमेय, अस्थूल, अदीर्घ तथा अनुल्बण है । वह अह्रस्व, अपार आनन्दमय एवं अच्युत है । वह अनपावृत, अद्वैत, अनन्त, अगोचर, आवरणरहित तथा आत्मस्वरूप है; उस पराविद्या का अन्य प्रकार से वर्णन नहीं किया जा सकता है ॥ ५०-५८ ॥ जो परा तथा अपरा विद्याएँ कही गयी हैं; वे परमार्थ की दृष्टि से नहीं हैं। वास्तव में मैं ही सम्पूर्ण जगत् हूँ; मुझमें ही सम्पूर्ण जगत् स्थित है । यह जगत् मुझसे ही उत्पन्न होता है, मुझमें ही स्थित रहता है और [अन्त में] मुझमें ही विलीन हो जाता है। मुझसे पृथक् कुछ नहीं है — ऐसा मन, वचन तथा कर्म से अनुभव करना चाहिये। एकाग्रचित्त होकर सत् तथा असत् सब कुछ आत्मा में ही देखना चाहिये; आत्मा में ही सब कुछ देखने वाला [साधक] अपने मन को बाह्य जगत् में आसक्त नहीं करता है ॥ ५९-६१ ॥ नाभि से बारह अंगुल ऊपर अधोमुख हृत्कमल-स्थित है; उसे विश्व का महान् गृह समझना चाहिये । इस हृदय के मध्य में कमल विराजमान है; जो धर्मरूपी कन्द से उत्पन्न, ज्ञानरूपी नालवाला, अत्यन्त सुन्दर, आठ सिद्धिस्वरूप अष्ट दल से युक्त और श्वेत तथा उत्तम वैराग्यरूपी कर्णिका वाला है एवं जिसके छिद्र प्राणवायुरूपी दिशाओं के रूप में प्रतिष्ठित हैं ॥ ६२-६४ ॥ प्राण आदि से युक्त होने पर साधक बहुत रूपों में इसे क्रम से देख सकता है । हे श्रेष्ठ मुनियो ! प्रत्येक नाड़ी दस प्राणों का वहन करती है; कुल बहत्तर हजार नाड़ियाँ बतायी गयी हैं । जाग्रत् [ अवस्था] को नेत्र में स्थित जानना चाहिये और स्वप्न को कण्ठ में स्थित जानना चाहिये। इसी प्रकार सुषुप्त को हृदय में स्थित तथा तुरीय को सिर में स्थित जानना चाहिये । क्रम के अनुसार जाग्रत्-अवस्था में ब्रह्मा, स्वप्नावस्था में विष्णु, सुषुप्तावस्था में ईश्वर (शिव) तथा तुरीयावस्था में महेश्वर प्रतिष्ठित रहते हैं । अन्य लोग ऐसा भी कहते हैं कि जब मनुष्य सभी इन्द्रियों के द्वारा संयमित रहता है, तब उसकी जाग्रत्-अवस्था कही जाती है। मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त — यह अन्तःकरणचतुष्टय है; इनके द्वारा जब मनुष्य व्यवस्थित रहता है, तब उसकी स्वप्नावस्था कही जाती है। हे सुव्रतो ! जब मनुष्य की इन्द्रियाँ उसकी आत्मा में विलीन हो जाती हैं, तब उसकी सुषुप्तावस्था कही जाती है । इन्द्रियों से अतीत मनुष्य तुरीय- अवस्था वाला कहा जाता है। [जगत् के] परम कारण तथा परस्वरूप ये शिव तुरीय से भी अतीत हैं ॥ ६५-७१ ॥ हे विप्रेन्द्रो ! जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय के पश्चात् अब मैं आधिभौतिक, आध्यात्मिक तथा आधिदैविक स्वरूप का वर्णन करूँगा; यह सब मैं ही हूँ — ऐसा बुद्धिमान् को जानना चाहिये। मन-बुद्धि-अहंकार-चित्त – यह चतुर्वर्ग, [पाँच ] ज्ञानेन्द्रियाँ और [पाँच] कर्मेन्द्रियाँ — ये पृथक् रूप से चौदह आध्यात्मिक पदार्थ कहे गये हैं । हे मुनिश्रेष्ठ ! हे मुनिपुंगवो ! जो भी देखने योग्य, सुनने योग्य, सूँघने योग्य, स्वाद लेने योग्य, स्पर्श करने योग्य, चिन्तन करने योग्य, जानने योग्य, गर्व करने योग्य, चेतना के योग्य, बोलने योग्य, ग्रहण करने योग्य, गमन करने योग्य, छोड़ने योग्य तथा आनन्द के योग्य हैं — ये सब क्रम से आधिभौतिक हैं। सूर्य, दिशाएँ, पृथ्वी, वरुण, वायु, चन्द्र, ब्रह्मा, रुद्र, क्षेत्रज्ञ, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और देव प्रजापति — ये चौदह क्रम से आधिदैविक हैं ॥ ७२–७९ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! राज्ञी, सुदर्शना, जिता, सौम्या, मोघा, रुद्रा, अमृता, सत्या, मध्यमा, नाड़ी, राशिशुका, असुरा, कृत्तिका और भास्वती — ये चौदह निबन्धन नाड़ियाँ हैं। नाड़ियों के मध्य चौदह वाहक वायु स्थित हैं। प्राण, व्यान, अपान, उदान, समान, वैरम्भ, मुख्य अन्तर्याम, प्रभंजन, कूर्म, श्येन, श्वेत, कृष्ण, अनिल तथा नाग — ये चौदह वायु कहे गये हैं ॥ ८०-८३१/२ ॥ हे सुव्रतो ! नेत्रों में, द्रष्टव्य पदार्थों में, सूर्य में, नाड़ी में, प्राण में, विज्ञान में, आनन्द में, हृदयाकाश में तथा इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जो एकमात्र आत्मा के रूप में संचरण करता है, उस मुझ अजर, अनन्त, शोकरहित, अमृतस्वरूप तथा अटल प्रभु की उपासना करनी चाहिये । एकमात्र वह ही चौदहों प्रकार की नाड़ियों में संचरण करता है और हे द्विजो ! वे सब उसी में लीन हो जाते हैं; क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। एकमात्र वह ही सर्वज्ञ है और एकमात्र वह ही सर्वेश्वर है । वह सबका स्वामी, देवता, अन्तर्यामी तथा महाज्योति से युक्त है। हे उत्तम द्विजो ! सभी प्रकार का सुख देने वाले सनातन परमात्मा सभी के द्वारा उपासना किये जाने पर स्वयं सर्वसौख्य की अपेक्षा नहीं करते । वेदों तथा नानाविध शास्त्रों से उपासित होकर उन सर्वज्ञ प्रभु को वेद-शास्त्र आदि की अपेक्षा नहीं रहती ॥ ८४–९० ॥ यह सारा जगत् इस आत्मा का भोग्य है और वह आत्मा स्वयं भोग्य नहीं होता है अर्थात् वह भोक्ता है। अपने द्वारा रक्षित अन्न (भोग)-को वह भोगता है और जीवों के भोग्य को कभी नहीं भोगता । मैं सभी प्राणियों का अन्न हूँ, मैं प्राणियों की [प्राणापानरूप] ग्रन्थि हूँ, मैं ही सब पर शासन करने वाला, सबको ले जाने वाला और विभागपूर्वक [पंचकोशरूप] पंचात्मा हूँ। जो ग्रहण किया जाता है, वह अन्न कहा जाता है। वह भूतात्मा अन्नमयकोश है, इन्द्रियात्मा प्राणमयकोश है, संकल्पात्मा मनोमयकोश है और सोमस्वरूप कालात्मा विज्ञानमयकोश कहा जाता है । सर्वदा आनन्दमग्न होकर महेश परमेश्वर आनन्दमयकोश के रूप में विद्यमान हैं। वह पंचकोश मैं ही हूँ; विचारपूर्वक देखा जाय, तो उस जगत् के अभाव के कारण परतन्त्ररूप सम्पूर्ण जगत् मुझ स्वतन्त्र में ही स्थित है ॥ ९१-९५ ॥ एकत्व भी नहीं है, तब द्वैत कैसे हो सकता है ? इसी प्रकार कोई मर्त्य नहीं है । तब वे अजोद्भव भी अमर कैसे होंगे ? इस प्रकार वह न अन्तः प्रज्ञ है, न बहि: प्रज्ञ है, न दोनों प्रकार की प्रज्ञा वाला है, न प्रज्ञानघन है और न तो ज्ञानसम्पन्न प्राज्ञ ही है। वस्तुत: वह ब्रह्म न विदित है, न वेद्य ( जानने योग्य ) है और न तो निर्वाणस्वरूप है। निर्वाण, कैवल्य, निःश्रेयस, अनामय, अमृत, अक्षर, ब्रह्म, परमात्मा, परापर, निर्विकल्प, निराभास और ज्ञान — ये पर्यायवाची हैं। जिसके अन्तःकरण में एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म स्थित है तथा जो समरस है, जब वह प्रसन्न तथा एकाग्र होता है, वह ज्ञानस्वरूप कहा जाता है, इसके अतिरिक्त सब कुछ अज्ञान है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ९६–१०० ॥ इस प्रकार पूर्ण ज्ञान निश्चित रूपसे गुरुके सान्निध्य से उत्पन्न होता है । यह राग, द्वेष, मिथ्या, क्रोध, काम, तृष्णा आदि सदा रहित होता है; इसे मुक्ति देने वाला जानना चाहिये । अज्ञान- मल से युक्त रहने के कारण पुरुष मलिन कहा गया है; उस [ अज्ञानमल]-के नाश से ही मुक्ति होती है, अन्यथा करोड़ों जन्मों में भी मुक्ति नहीं मिल सकती ॥ १०१-१०२१/२ ॥ एकमात्र ज्ञान के बिना पाप तथा पुण्य का क्षय नहीं होता है, अतः हे श्रेष्ठ ब्रह्मवादियो ! मुक्ति के लिये ज्ञान का [निरन्तर] अभ्यास करना चाहिये। ज्ञान के अभ्यास से ही मनुष्यों की बुद्धि निर्मल होती है, अतः उसके प्रति निष्ठावान् तथा तत्पर होकर सदा ज्ञान का अभ्यास करना चाहिये। हे श्रेष्ठ विप्रो ! एकमात्र ज्ञान से सन्तुष्ट मुक्तसंग (आसक्तिरहित) योगी के लिये कुछ भी करणीय नहीं रह जाता है; यदि है तो वह तत्त्वज्ञानी नहीं है। इस लोक में तथा परलोक में उसके लिये कुछ भी करने योग्य नहीं रहता है। चूँकि वह जीवन्मुक्त है, अतः वास्तविक रूप से ब्रह्मवेत्ता है। ज्ञान के अभ्यास में संलग्न तथा ज्ञानतत्त्वार्थविद् स्वयं कर्तव्यों के अभ्यास का त्याग करके ज्ञान को ही प्राप्त होता है ॥ १०३–१०७१/२ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! जो अपने वर्णाश्रम पर गर्व करने वाला है तथा क्रोध का त्याग कर चुका है, किंतु मूढ़ होकर ज्ञानातिरिक्त अन्य साधनों में सुख का अनुभव करता है । वह अज्ञानी है; इसमें सन्देह नहीं है। अज्ञान ही संसार का कारण है; शरीर धारण करना ही संसार है। ज्ञान मोक्ष का हेतु है; मुक्त [ व्यक्ति] अपने में ही अवस्थित रहता है ॥ १०८-१०९१/२ ॥ हे श्रेष्ठ विप्रो ! अज्ञान रहने पर क्रोध आदि उत्पन्न होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। हे उत्तम द्विजो ! क्रोध, हर्ष, लोभ, मोह, दम्भ, धर्म, अधर्म लोगों को होता है और उनके कारण शरीर धारण करना पड़ता है और शरीर रहने पर क्लेश अवश्य होता है, अतः बुद्धिमान् को चाहिये कि अज्ञान का त्याग कर दे। हे द्विजो ! विद्या (ज्ञान) – के द्वारा अविद्या ( अज्ञान ) – को नष्ट करके स्थित हुए योगी के क्रोध आदि तथा धर्म-अधर्म [ स्वयं] नष्ट हो जाते हैं। उनका नाश हो जाने से पुनः शरीर से प्राणी का संयोग नहीं होता है, वह संसार से मुक्त हो जाता है और तीनों प्रकार के तापों से रहित हो जाता है ॥ ११०–११३१/२ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! इस प्रकार ज्ञान के बिना ध्यान करने वाले का ध्यान सिद्ध नहीं होता है, वास्तव में ज्ञान गुरु के सम्पर्क से ही होता है, केवल शब्द से नहीं। चतुर्व्यूह (तैजस, विश्व, प्राज्ञ, तुरीय) – का ज्ञान करके ध्यान करने वाले को ध्यान का अभ्यास करना चाहिये। ज्ञानरूपी अग्नि सहज, आगन्तुक और अस्थि (शरीर) तथा वाणी से होने वाले पाप को उसी प्रकार शीघ्र जला डालती है, जैसे अग्नि सूखे ईंधन को जला डालती है ॥ ११४—११६ ॥ ज्ञान से बढ़कर पाप का नाश करने वाला अन्य कुछ भी नहीं है, अतः संसार से आसक्तिरहित होकर ज्ञान का अभ्यास करना चाहिये। ज्ञानी के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है । आमोद-प्रमोद करता हुआ भी ज्ञानी व्यक्ति नानाविध पापों से लिप्त नहीं होता है ॥ ११७-११८ ॥ जैसा ज्ञान है, वैसा ही ध्यान भी है, अतः ध्यान का अभ्यास करना चाहिये । ध्यान निर्विषय बताया गया है; जो आदि में सविषय होता है। चार, छः, दस, बारह तथा सोलह और पुनः दो प्रकार से – इन छः रूपों में क्रमशः अभ्यास करके श्रेष्ठ योगी मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। साधक को विशुद्ध सुवर्ण के आकार वाले, धूमरहित अंगार के सदृश, पीले-लाल या श्वेत वर्णवाले, करोड़ों विद्युत् के समान कान्तिवाले आकार में ध्यान लगाना चाहिये, अथवा चित्त को प्रयत्नपूर्वक ब्रह्मरन्ध्र में स्थित करके श्वेत, कृष्ण अथवा पीतवर्ण से रहित ब्रह्म का स्मरण करे; ऐसा ध्यान करने वाला ब्रह्मवेत्ता होता है ॥ ११९–१२२१/२ ॥ पूर्ण प्रयत्न के साथ अहिंसक, सत्यवादी, चौरवृत्ति से रहित, परिग्रहरहित, ब्रह्मचारी, दृढ़ व्रत वाला, सन्तुष्ट, शुद्धि से युक्त, सर्वदा स्वाध्यायपरायण और मेरी भक्ति से युक्त होकर गुरु के सान्निध्य में ध्यान का अविचल अभ्यास करना चाहिये। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! ध्यान-साधना करने वाला योगी अपने चित्त को स्थिर करके किसी अन्य वस्तु का बोध नहीं करता, उसे कुछ भी भान नहीं होता, वह अपने चारों ओर कुछ नहीं देखता, वह न सूँघता है, न सुनता है और न स्पर्श का ही अनुभव करता है; जिसने स्वयं को पूर्णतः अपनी आत्मा में लीन कर दिया है, वह समरस कहा गया ॥ १२३–१२६१/२ ॥ पार्थिव पटल ब्रह्मा, जलतत्त्व में स्वयं विष्णु, अग्नितत्त्व में कालरुद्र, वायुतत्त्व में महेश्वर और आकाश तत्त्व में वे साक्षात् शिव विद्यमान हैं – ऐसा क्रम से चिन्तन करना चाहिये । शर्व पृथ्वी में विद्यमान कहे गये हैं । भव देवता जल में विद्यमान कहे गये हैं । रुद्र अग्नि में और उग्र वायु में प्रतिष्ठित हैं। भीम आकाश में और ईशान सूर्य के मण्डल में स्थित हैं। महादेवजी चन्द्रमण्डल में स्थित कहे गये हैं। पुरुषों में भगवान् पशुपति विद्यमान हैं। इस प्रकार मैं आठ रूपों में व्यवस्थित हूँ ॥ १२७–१३०१/२ ॥ शरीर में जो सम्पूर्ण कठोरता है, वह पृथ्वीतत्त्वमय कही जाती है, आप्य (तरल) पदार्थ को जलतत्त्व से सम्बन्धित कहा गया है। वर्ण (रंग) – को अग्नि से सम्बन्धित कहा जाता है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! जो शरीर में संचरण करता है, वह वायु से सम्बन्धित है। जो शरीर में अवकाश (रिक्त स्थान) है, वह आकाशतत्त्व है । शब्द से होने वाला ज्ञान आकाश से उत्पन्न होता है; उसी प्रकार हे विप्रो ! स्पर्श से होने वाला ज्ञान वायु से उत्पन्न होता है। हे द्विजो ! रूप का ज्ञान अग्नि से और रस का ज्ञान जल से उत्पन्न कहा गया है; गन्ध का ज्ञान पृथ्वी से उत्पन्न होता है। पुन: हे विप्रो ! दाहिने नेत्र में सूर्य, बायें नेत्र में सोम तथा हृदय में सर्वव्यापक पुरुष का चिन्तन करना चाहिये। हे द्विजोत्तमो ! [देह में] घुटनों तक पृथ्वीतत्त्व, नाभिपर्यन्त जल-तत्त्व, कण्ठपर्यन्त वह्नितत्त्व, ललाटपर्यन्त वायुतत्त्व, ललाटाग्र अथवा शिखाग्र में आकाशतत्त्व, तदनन्तर आकाश से ऊपर हंससंज्ञक ब्रह्म और व्योम के मध्य में व्योमसंज्ञक ये शिव स्थित हैं – प्राथमिक ध्याता को इनका ध्यान करना चाहिये ॥ १३१–१३७ ॥ जीव, प्रकृति, सत्त्व, रज, तम, महान् (बुद्धि), अहंकार, पंच तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, आकाश आदि पंच भूत — ये सब यथार्थ रूप में नहीं हैं। चूँकि विश्व को व्याप्त करके वे शिव स्थित हैं, अतः उन्हें स्थाणु कहा जाता है। उन्हीं की आज्ञा से डरकर सूर्य उगता है, हवा बहती है, चन्द्रमा प्रकाशित होता है, अग्नि जलती है, जल प्रवाहित होता है, भूमि [ सबको] धारण करती है। और आकाश स्थान देता है; सब कुछ उन्हीं से व्याप्त है, अतः हे द्विजो ! उन्हीं का चिन्तन करना चाहिये । हे द्विजोत्तमो ! उन्हीं से यह सम्पूर्ण जगत् अधिष्ठित है, अतः शर्व सर्वरूपमय हैं — ऐसा मानकर [ महेश्वर ] भव का स्मरण करना चाहिये ॥ १३८-१४२ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! ज्ञान- ध्यानरूपी अमृत से ही संसाररूपी विष से संतप्त लोगों का प्रतीकार बताया गया है; अन्यथा नहीं। धर्म से ज्ञान उत्पन्न होता है, साक्षात् ज्ञान से वैराग्य उत्पन्न होता है और वैराग्य से परमार्थप्रकाशक परम ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थात् ज्ञान के अनुसार व्यवहार में प्रवृत्ति होने लगती है ॥ १४३-१४४ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! ज्ञान-वैराग्य से युक्त [ साधक ] – को ही योगकी सिद्धि होती है, पुनः योगसिद्धि के द्वारा उस सत्त्वनिष्ठ की मुक्ति हो जाती है; अन्यथा नहीं । हे द्विजो ! तम तथा अविद्या पद से आच्छादित, अद्भुत एवं अविनाशी जो शिवपद है, सत्त्वशक्ति का आश्रय लेकर उसका अर्चन करना चाहिये ॥ १४५-१४६ ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! जो मेरा भक्त सत्त्वनिष्ठ, मेरी पूजा में लीन रहने वाला, सब प्रकार से धर्म में निष्ठा रखने वाला, सदा उत्साह से सम्पन्न, एकाग्रचित्त, सभी द्वन्द्वों को सहने वाला, धैर्यशाली, सभी प्राणियों के हित में रत, सरल स्वभाव वाला, सदा स्वस्थ मन वाला, कोमल चित्त वाला, मानरहित, बुद्धिमान्, शान्त, प्रतिद्वन्द्विता से रहित, सदा मुक्ति की इच्छा रखने वाला, धर्मज्ञ, आत्मा के लक्षणों को जानने वाला, तीनों प्रकार के ऋणों से मुक्त तथा पूर्वजन्म में पुण्यशाली होता है; वह द्विज श्रद्धा के साथ पाखण्डरहित होकर गुरु की सेवा करके वृद्ध होने पर स्वर्गलोक प्राप्त करके वहाँ क्रम से सुखों का भोग करके पुनः भारतवर्ष में जन्म लेकर ब्रह्मवेत्ता होता है और हे द्विजो ! ज्ञानी सम्पर्क से ज्ञान प्राप्त करके योगवेत्ता होता श्रेष्ठ द्विजो ! अज्ञानी के लिये ज्ञानप्राप्ति की यही विधि है; अतः हे श्रेष्ठ मुनियो ! इसी मार्ग के द्वारा आसक्तिरहित तथा दृढ़ व्रत वाला व्यक्ति संसाररूपी कालकूट (विष) – से मुक्त हो जाता है ॥ १४७–१५३१/२ ॥ इस प्रकार मैंने आप लोगों को संक्षेप में प्रसंगवश ज्ञान का अचल तथा उत्तम माहात्म्य बता दिया। इस पाशुपत योग को [ स्वयं] महेश्वर ने कहा है । हे श्रेष्ठ मुनियो ! शिव के द्वारा कहे गये इस योग को जिस किसी को भी नहीं बताना चाहिये, अपितु भस्मनिष्ठ अर्थात् शिवतत्त्वनिष्ठ योगी को ही इस अत्यन्त प्रिय योग का सदा उपदेश करना चाहिये। जो मनुष्य इस संसाररूपी विष का नाश करने वाले आख्यान को पढ़ता अथवा सुनता है, वह ब्रह्मसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १५४–१५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘संसारविषकथन’ नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८६ ॥ [^1]: अष्टगुणयुक्त पार्थिव आदि सुखभोग (ऐश्वर्य)-से लेकर चौंसठ प्रकारके सुखभोग (ऐश्वर्य) इसी लिङ्गपुराणके पूर्वभाग अध्याय ९ में विस्तार से बताये गये हैं। [^2]: ये सद्योजातादि पाँच मन्त्र इस प्रकार हैं — ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः । भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ ॐ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बल-प्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ ॐ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणो ब्रह्मा शिवो मेऽस्तु सदा शिवोम् ॥ Content is available only for registered users. 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