January 31, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -092 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ बानबेवाँ अध्याय अविमुक्तक्षेत्र वाराणसी का माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वर पूजा विधि वर्णन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे द्विनवतितमोऽध्यायः वाराणसी श्रीशैल माहात्म्य कथनं ऋषिगण बोले — हे महाबुद्धिमान् सूतजी ! यदि वाराणसी ऐसी पुण्यदायिनी है, तो अब हम लोगों को उसका प्रभाव कृपापूर्वक बताइये; हम लोगों को इस अविमुक्तक्षेत्र के उत्तम माहात्म्य को विस्तारपूर्वक विधि के अनुसार सुनने की बड़ी उत्सुकता है ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले — वाराणसीके अविमुक्तक्षेत्र के अति उत्तम माहात्म्य को मैं भली-भाँति संक्षेप में बता रहा हूँ, जैसा कि भगवान् शिव ने कहा था । हे विप्रेन्द्रो ! मेरे तथा महात्मा ब्रह्मा के द्वारा सौ करोड़ वर्षों में भी विस्तार से इसका वर्णन नहीं किया जा सकता है ॥ ३-४ ॥ प्राचीन काल में विवाह करने के पश्चात् नीललोहित भगवान् शंकर ने हिमालय के शिखर से देवी पार्वती तथा गणेश्वरों के साथ वाराणसी में पहुँचकर [अपने] अविमुक्तेश्वर लिङ्ग का दर्शन कराया और वे वहीं रहने लगे। वाराणसी, कुरुक्षेत्र, श्रीपर्वत, महालय, तुंगेश्वर और केदार — इन स्थानों में जो यति होता है; वह दूसरे जन्म में पाशुपतयोग सिद्ध हो जाने पर एक ही दिन में सम्यक् (ब्रह्मज्ञान सम्पन्न ) यति हो जाता है । अतः सब कुछ छोड़कर पाशुपतव्रत करना चाहिये और वहाँ देवोद्यान में वास करना चाहिये । शिवजी का उद्यान अत्यन्त उत्तम है। रुद्र ने मन से एक परम सुन्दर भवन का निर्माण किया है। तब नन्दीसहित देव परमेश्वर ने स्वयं पार्वती को उस अत्युत्तम देवोद्यान (आनन्दकानन) – को दिखाया। भगवान् परमेश्वर शंकर ने पार्वती की प्रसन्नता के लिये इस अविमुक्तक्षेत्र के माहात्म्य का वर्णन किया ॥ ५–११ ॥ वह उद्यान अनेक प्रकार के विकसित गुल्मों से सुशोभित था, बाहर से लता- शाखाओं आदि से अत्यन्त मनोहर था और विरूढ़ पुष्पों वाले प्रियंगु से तथा पूर्ण रूप से खिले हुए काँटेदार केतकी वृक्षों से युक्त था । वह सुगन्ध से युक्त तमाल के गुच्छों से घिरा हुआ था, अत्यधिक पुष्पों वाले बकुल के वृक्षों से सभी ओर से सुशोभित था और भौरों की पंक्तियों से शोभायमान तथा खिले हुए पुष्पों वाले सैकड़ों अशोक एवं पुन्नाग के वृक्षों से युक्त था ॥ १२-१३ ॥ वह उद्यान कहीं विकसित कमलों के पराग से भूषित पक्षियों सारस, चक्रवाक तथा उन्मत्त श्रेष्ठ पपीहा नामक पक्षियों की मधुर ध्वनियों से सभी ओर विशेष रूप से गुंजित था ॥ १४ ॥ वह सुन्दर उद्यान कहीं-कहीं मयूरों की ध्वनि से निनादित था, कहीं-कहीं कारण्डव पक्षी की ध्वनि से शब्दायमान था और कहीं-कहीं मत्त भ्रमर – समूहों से तथा मद से आकुल भ्रमरांगनाओं से गुंजायमान था ॥ १५ ॥ वह उद्यान कहीं-कहीं अति सुगन्धित पुष्पों से युक्त था, कहीं-कहीं सुन्दर पुष्पों से लदे हुए आम के वृक्षों से सुशोभित था, लताओं से परिपूर्ण तिलक वृक्षों से समन्वित था और विद्याधरों – सिद्धों तथा चारणों के गायन से युक्त था ॥ १६ ॥ वहाँ अप्सराओं का समूह नृत्य करने में लीन था, अनेक प्रकार के प्रसन्न पक्षी वहाँ निवास करते थे, वह उद्यान नृत्य करते हुए हारीत पक्षियों के समुदायों से निनादित था। वह कहीं-कहीं सिंहों के नाद से आकुल तथा मत मन वाले कस्तूरीमृग समुदायों से चरे गये दर्भांकुरों तथा पुष्पों से सुशोभित था और कहीं-कहीं अनेकविध विकसित सुन्दर कमलों से युक्त सरोवरों तथा तड़ागों से सुशोभित था ॥ १७-१८ ॥ वह उद्यान वृक्षों के समुदायों से सम्पन्न था, नीलकण्ठ पक्षियों के द्वारा सुन्दर प्रतीत होता था, प्रसन्न मन वाले पक्षियों से युक्त था, [सभी ओर ] ध्वनि होने से यह अति सुन्दर था, खिले हुए पुष्पों वाले वृक्षों की शाखाओं में विद्यमान मस्त भौरों से सुशोभित था, नूतन कलियों की सुन्दरता से सुशोभित था और ऊँची-ऊँची शाखाओं से युक्त था ॥ १९ ॥ वह उद्यान कहीं-कहीं दाँतों से क्षत की गयी सुन्दर लताओं से सुशोभित था, कहीं-कहीं लताओं से वेष्टित वृक्षों से मण्डित था और कहीं-कहीं विलास के कारण मन्थर गति वाली किंपुरुष अंगनाओं से सेवित था ॥ २० ॥ वह उद्यान पारावत पक्षियों की ध्वनि से निनादित तथा गगनचुम्बी शृंगों वाले वृक्षों से, बिखरे हुए पुष्पसमूहों को विभक्त कर देने वाले श्वेत वर्ण के मनोहर तथा सुन्दर रूप वाले हंसों से और अनेक देवताओं के दिव्य कुलों से सुशोभित है। वह विकसित नीलकमल के हजारों वितानों से युक्त है, जलाशयों से सुशोभित देवमार्ग वाला है और मार्ग के मध्य में खिले हुए विचित्र पुष्पों की पंक्ति से सम्बद्ध विविध गुल्मों तथा विटपों से समन्वित है ॥ २१-२२ ॥ उस वन का प्रान्तभाग तुंग अग्रभाग वाले, नीलपुष्प- गुच्छों के भार से झुकी हुई ऊँची शाखाओं वाले, वायु के द्वारा आन्दोलित होने पर कानों को सुख देने वाली ध्वनि से भासित अन्तर्भाग वाले मनोहर अशोक वृक्षों से युक्त है। वह रात्रि में चन्द्र की किरणों से कुसुमित तिलक वृक्षों के साथ एकता को प्राप्त है और छाया में सोकर उठे हुए हरिण के समुदाय के द्वारा चरे गये दूर्वांकुरों के अग्रभागों से युक्त है। वह हंसों के पंखों की वायु से हिले हुए कमल तथा स्वच्छ और विस्तीर्ण जल से समन्वित है, सरोवरों के तट पर उत्पन्न तथा चकित कर देने वाले कदलीपत्रों की चाटुकारिता में नाचते हुए मयूरों से युक्त है, कहीं पृथ्वी पर मयूरों के पंख में स्थित चन्दा से अलंकृत भूभाग से सुशोभित है और स्थान-स्थान पर छिपे हुए प्रमुदित, मत्त तथा क्रीड़ा करते हुए हारीत पक्षि समूहों से सुशोभित है ॥ २३-२४ ॥ वह उद्यान सारंग हरिणों से कहीं-कहीं सुशोभित भाग वाला है, कहीं-कहीं विकसित पुष्पों से आच्छादित है । कहीं-कहीं प्रसन्नचित्त किन्नरांगनाओं के द्वारा बजायी गयी वीणाओं की मधुर ध्वनि-गान-नृत्य से सुशोभित है। वह कहीं लीपी हुई, परस्पर सटी हुई तथा बिखरे पुष्पों से सुशोभित मुनियों की कुटियों से घिरे हुए वृक्षों से समन्वित है । वह कहीं जड़ से ही फलों से लदे हुए, विशाल तथा ऊँचे कटहल के वृक्षों से व्याप्त है ॥ २५-२६ ॥ वह उद्यान पूर्णतः पुष्पित लतागृहों में ले जायी गयी सिद्धों की सिद्धांगनाओं के सुवर्णमय नूपुर की ध्वनि से रमणीय है, प्रियंगु वृक्षों की मंजरियों पर मँडराते हुए भौंरों से सुशोभित है और भौंरों की पंक्तियों से आस्वादित आम्र तथा कदम्ब के पुष्पों से समन्वित है ॥ २७ ॥ वह उद्यान पुष्पसमूहों से सुवासित वायु से आन्दोलित जलाशयों से सुशोभित है, भौंरों के द्वारा गिराये गये सुन्दर पुष्पों के गुच्छों से युक्त है, वृक्षकुंजों में अत्यधिक डरी हुई हिरणियों के झुण्डों से मण्डित है और वायु से प्रेरित है। वह उद्यान मनुष्यों को मोक्ष देने वाला है ॥ २८ ॥ वह चन्द्रमा की किरणों के जाल से विविध रंगों वाले मनोहर तिलकवृक्षों से युक्त है, सिन्दूर – कुंकुम तथा कुसुम्भ रंग की आभा वाले अशोक वृक्षों से युक्त है और सुवर्ण की कान्ति वाले, विशाल शाखाओं वाले तथा पुष्पों से लदे हुए कनेर वृक्षों से युक्त है ॥ २९ ॥ उस उद्यान की भूमि कहीं-कहीं अंजन के चूर्ण के समान आभा वाले, कहीं विद्रुम के समान कान्ति वाले और कहीं सुवर्णसदृश प्रभा वाले पुष्पों से आच्छादित रहती थी ॥ ३० ॥ उस उद्यान में पुन्नाग के वृक्षों पर सैकड़ों पक्षियों की ध्वनि होती रहती थी, गुच्छों के भार से रक्त अशोकवृक्ष झुके रहते थे, रम्य सीमास्थल पर थकान को हरने वाले भवन थे और खिले हुए कमलों पर भौंरे मँडराते रहते थे ॥ ३१ ॥ उस समय हिमालयपुत्री [पार्वती ] और मत्त, प्रसन्न तथा शरीर से पुष्ट प्रिय गणेश्वरों के साथ विद्यमान सम्पूर्ण भवनों के भर्ता शिव ने अनेकविध विशाल वृक्षों वाले अत्यन्त रम्य उपवन को देवी को दिखाया ॥ ३२ ॥ शिवजी ने अत्यन्त सुन्दर वन्य पुष्पों से बनाये गये दिव्य आभूषणों से उपवन में गयी हुई दिव्य देवी को सजाया और उन पार्वती ने भी अत्यन्त सुन्दर दिव्य पुष्पों से इन देवदेव शंकर को भक्तिपूर्वक अलंकृत किया ॥ ३३ ॥ तदनन्तर उस अत्यन्त रम्य उद्यान को देखकर नन्दी आदि गणेश्वरों के साथ देवताओं के लिये पूज्य देव [शंकर]- की पूजा करके और उन्हें प्रणामकर देवी [पार्वती] कहने लगीं ॥ ३४ ॥ श्रीदेवी बोलीं — हे देव! आपने परम शोभा से युक्त उद्यान को मुझे दिखाया; अब आप इस क्षेत्र के समस्त गुणों को मुझे बताने की कृपा करें। हे देवेश ! हे देवदेव ! हे वृषभध्वज ! आप इस अविमुक्तक्षेत्र का माहात्म्य पूर्णरूप से बतायें ॥ ३५-३६ ॥ सूतजी बोले — [हे ऋषियो !] तब देवी का वह वचन सुनकर देवदेव श्रेष्ठ प्रभु उनके मुखकमल को सूँघकर हँसते हुए पार्वती से कहने लगे ॥ ३७ ॥ श्रीभगवान् बोले — वाराणसी नामक यह मेरा नित्य गुह्यतम क्षेत्र है; यह सर्वदा सभी प्राणियों के मोक्ष का हेतु है । हे देवि ! इस [ क्षेत्र ] – में सिद्ध लोग सदा मेरे व्रत में स्थित रहते हैं और मेरे लोक की अभिलाषा करने वाले लोग नित्य अनेक विध लिङ्गों को धारण किये रहते हैं। अनेक प्रकार के वृक्षों से युक्त, अनेक प्रकार के पक्षियों से सुशोभित, कमल तथा उत्पल के पुष्पों से सम्पन्न सरोवरों से अलंकृत और अप्सराओं तथा गन्धर्वों से सेवित इस शुभ क्षेत्र में युक्तात्मा जितेन्द्रिय लोग श्रेष्ठ योग का अभ्यास करते हैं ॥ ३८-४१ ॥ [हे देवि!] जिस कारण से मुझे यहाँ निवास करना अच्छा लगता है, उसे सुनो। मुझमें अपने मन को स्थिर रखने वाला तथा मुझमें सदा सभी क्रियाएँ अर्पित करने वाला मेरा भक्त जिस प्रकार का मोक्ष यहाँ प्राप्त करता है, वैसा अन्यत्र कहीं भी नहीं। हे देवि ! यहाँ मरने वाला प्राणी मोक्ष प्राप्त करता है। मेरा यह पुर दिव्य, गुह्य से भी गुह्यतम तथा महान् है — इसे ब्रह्मा आदि, सिद्धगण तथा मुक्ति के इच्छुक लोग जानते हैं। अतः यह परम क्षेत्र मेरी परम गति है। मैंने कभी भी इसका त्याग नहीं किया है और न तो कभी इसका त्याग करूँगा, अतः मेरा यह क्षेत्र अविमुक्त कहा गया है ॥ ४२-४५१/२ ॥ नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार तथा पुष्कर में स्नान करने तथा वहाँ निवास करने से मोक्ष नहीं प्राप्त होता है, बल्कि यहाँ प्राप्त हो जाता है, अतः यह [ अन्य तीर्थ से] विशिष्ट है। प्रयाग में अथवा यहाँ पर मेरे परिग्रह के कारण मुक्ति होती है; तीर्थों में अग्रणी (श्रेष्ठ) प्रयाग से भी शुभ यह अविमुक्त [क्षेत्र] है ॥ ४६–४८१/२ ॥ धर्म का सारतत्त्व सत्य है, मोक्ष का सारतत्त्व शम है; किंतु क्षेत्रतीर्थ के सारतत्त्व को ऋषिगण भी नहीं जानते हैं ॥ ४९ ॥ इच्छानुसार खाता हुआ, सोता हुआ, क्रीड़ा करता हुआ तथा अनेक क्रियाएँ करता हुआ भी प्राणी इस अविमुक्तक्षेत्र में प्राणत्याग करे, तो वह मोक्ष प्राप्त करता है ॥ ५० ॥ यहाँ हजारों पाप करके पिशाचत्व को प्राप्त होना मनुष्यों के लिये अच्छा है, किंतु काशीपुरी को छोड़कर स्वर्ग में हजार बार इन्द्र होना अच्छा नहीं है। अतएव मुक्ति लिये इस अविमुक्तक्षेत्र में निवास करना चाहिये । महातपस्वी महर्षि जैगीषव्य ने इस क्षेत्र के माहात्म्य से तथा मेरी भक्ति से युक्त होकर परम सिद्धि प्राप्त की थी । महर्षि जैगीषव्य की श्रेष्ठ गुफा योगियों की स्थली मानी जाती है। योगी लोग वहाँ सदा मेरा ध्यान करते हैं और वहाँ योग की अग्नि तीव्रता से प्रज्वलित होती रहती है। मनुष्य [यहाँ] परम कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त करता है, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है ॥ ५१-५४ ॥ अव्यक्त लिङ्गों वाले तथा सभी सिद्धान्तों को जानने वाले मुनिगण यहाँ मोक्ष प्राप्त करते हैं, जो अन्यत्र कहीं भी दुर्लभ है। मैं उनके लिये अत्युत्तम योगैश्वर्य तथा अपने सायुज्यरूप अभीष्ट स्थान को बताऊँगा। मेरे क्षेत्र में अपनी सभी क्रियाएँ मुझमें समर्पित करने वाले कुबेर ने क्षेत्र के सेवनसे ही गणेशत्व को प्राप्त किया था । हे देवि! जो ऋषि संवर्त नामक मेरे भक्त जन्म लेंगे, वे भी यहाँ मेरी आराधना करके उत्तम सिद्धि प्राप्त करेंगे। हे कमलनयने! महातपस्वी पराशरपुत्र योगी ऋषि व्यास मेरे भक्त होंगे; वेदसंहिताओं का प्रवर्तन करने वाले वे मुनिश्रेष्ठ भी इस क्षेत्र में विहार करेंगे। हे सुव्रते! देवर्षियों के साथ ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, देवराज इन्द्र अन्य देवता लोग तथा महात्मा – ये सब यहाँ पर मेरी उपासना करते हैं ॥ ५५–६१ ॥ अन्य दिव्य योगी तथा महात्मा लोग भी प्रच्छन्न [गुप्त ] रूप धारण कर एकाग्रचित्त होकर यहाँ पर सदा मेरी उपासना करते रहते हैं। विषयों में आसक्त मन वाला तथा धर्म का त्याग किया हुआ मनुष्य भी यदि इस क्षेत्र में मृत हो जाय, तो वह भी संसार में पुनः जन्म नहीं प्राप्त करता है; तो फिर हे सुव्रते ! जो ममतारहित, धीर, सत्त्वगुण में स्थित, जितेन्द्रिय, व्रती, कर्मप्रवृत्ति से रहित, मुझमें ध्यानरत, बुद्धिमान् तथा संगरहित हैं – वे सब [मुझ] देवदेव को प्राप्त करके मेरी कृपा से यहाँ श्रेष्ठ मोक्ष अवश्य प्राप्त करते हैं । हे सुव्रते ! हजारों जन्मों में भी योगी जिस [ मोक्ष] – को प्राप्त नहीं कर पाता उस उत्तम मोक्ष को वह यहाँ पर मेरी कृपा से प्राप्त कर लेता है ॥ ६२–६६ ॥ हे वरानने! पूर्वकाल में यहाँ ब्रह्मा के द्वारा स्थापित किये गये कैलास भवन नामक इस गोप्रेक्षक क्षेत्र को देखो। इस गोप्रेक्षक [ क्षेत्र] में आकर मेरा दर्शन करके मनुष्य दुर्गति नहीं प्राप्त करता है और पापों से छूट जाता है । इसी प्रकार यहाँ पर ब्रह्मा ने गायों के दूध से कपिलाहद नामक विशाल तथा पुण्यतम तीर्थ का निर्माण किया है। यहाँ भी मैं स्वयं वृषध्वज – इस नाम से विख्यात हूँ । हे देवि! मैंने सदा से यहाँ निवास किया है; ऐसा आप देखती भी हैं ॥ ६७–७० ॥ यहाँ ब्रह्मा के द्वारा निर्मित किये गये भद्रतोय नामक सरोवर को देखो। हे देवि ! सभी देवताओं ने ‘हे ईश ! शान्त हो जाइए’ – ऐसा कहकर इस स्थान पर मुझ शिव को प्रसन्न किया था, तब मैं शान्त हो गया था । परमेष्ठी ब्रह्मा ने यहाँ लाकर मुझे स्थापित किया । ब्रह्माजी से प्राप्त करके विष्णु ने पुनः स्थापित किया। तब दुः खी चित्तवाले ब्रह्मा ने विष्णु से कहा — आपने मेरे द्वारा लाये गये इस लिङ्ग को क्यों स्थापित किया ? तत्पश्चात् विष्णु कुपितमुख वाले उन ब्रह्मा से पुनः बोले — रुद्र देवता में मेरी अत्यधिक श्रेष्ठ तथा महत्तर भक्ति है; मेरे द्वारा स्थापित किया गया यह लिङ्ग आपके ही नाम से प्रसिद्ध होगा ॥ ७१–७५ ॥ [हे देवि ! ] मैं तभी से यहाँ हिरण्यगर्भ – इस नाम से स्थित हूँ। इन देवेश्वर का दर्शन करके मनुष्य मेरा लोक प्राप्त करता है। तत्पश्चात् ब्रह्मा ने परम भक्ति से युक्त होकर मेरे इस पवित्र लिङ्ग को विधिपूर्वक पुनः स्थापित किया। मैं यहाँ स्वर्लीनेश्वर नाम से स्वयं विद्यमान हूँ; यहाँ प्राणत्याग करने पर मनुष्य कभी जन्म नहीं लेता है। जो गति योगियों की कही गयी है, वह अनन्य गति उसकी भी होती है ॥ ७६–७८१/२ ॥ इसी स्थान पर मैंने व्याघ्र का रूप धारण करके देवताओं के लिये कंटकस्वरूप एक अभिमानी तथा बलवान् दैत्य का वध किया था; [ तभी से] व्याघ्रेश्वर इस नाम से प्रसिद्ध होकर मैं यहाँ सदा स्थित हूँ । इन व्याघ्रेश्वर का दर्शन करके मनुष्य पुनः दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है। पूर्वकाल में उत्पल तथा विदल[^1] नामक जिन दो दैत्यों के लिये ब्रह्मा ने स्त्री के द्वारा वध्य होने का विधान किया था, उन्हें अभिमानयुक्त देखकर आपने ही रण में अवज्ञापूर्वक एक कन्दुक से मार डाला था; आपके उसी कन्दुक का यह देह यहाँ स्थापित हो गया अर्थात् वह कन्दुक लिङ्गरूप में परिणत होकर स्थापित हो गया ॥ ७९-८२ ॥ प्रारम्भ में गणपों के साथ आकर मैं यहाँ स्थित हो गया, अतः यह ज्येष्ठस्थान है; यहाँ मेरा दर्शन पुण्यप्रद है। देवताओं ने यहाँ सभी ओर इन लिङ्गों को स्थापित किया है; अतः भक्तियुक्त होकर इन लिङ्गों का केवल दर्शन करके मनुष्य मृत्यु होने पर [शिव का] गण हो जाता है ॥ ८३-८४ ॥ [हे देवि!] पूर्वकाल में स्वयं तुम्हारे पिता पर्वत-राज हिमालय ने इसे मेरा प्रिय तथा हितकर स्थान समझकर यहाँ लिङ्ग की स्थापना की थी। शैलेश्वर नाम से प्रसिद्ध इस लिङ्ग को तुम आदरपूर्वक देखो। हे देवि ! इसका दर्शन करके मनुष्य दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है ॥ ८५-८६ ॥ हे देवि ! पुण्यमयी तथा पाप को नष्ट करने वाली यह वरुणा नदी इस क्षेत्र को अलंकृत करके गंगा के साथ मिल जाती है। इनके संगम पर भी ब्रह्मा के द्वारा उत्तम लिङ्ग स्थापित किया गया है; यह संगमेश्वर — इस नाम से जगत् में प्रसिद्ध है, तुम इसका दर्शन करो । देवनदी के संगम पर स्नान करके शुद्ध होकर जो मनुष्य संगमेश्वर की पूजा करता है, उसे जन्मभय कहाँ से हो सकता है ! ॥ ८७–८९ ॥ [हे देवि ! ] मैं इसे महाक्षेत्र मानता हूँ; यह योगियों का परम निवास स्थान है। इस श्रेष्ठ क्षेत्र के मध्य में मैं स्वयं प्रकट होकर अधिष्ठित हूँ। सभी सुर तथा असुर [यहाँ ] मुझे मध्यमेश्वर —इस नाम से कहते हैं। मेरा व्रत धारण करने वाले सिद्धों और मोक्ष की अभिलाषा वाले तथा ज्ञानयोग में परायण मन वाले योगियों का यह निवास स्थान है। इन मध्यमेश्वर का दर्शन कर लेने पर मनुष्य अपने जन्म के विषय में चिन्ता नहीं करता ॥ ९०-९२ ॥ भृगुपुत्र शुक्राचार्य ने भी यहाँ लिङ्ग को स्थापित किया है; शुक्रेश्वर नाम से विख्यात यह लिङ्ग सभी सिद्धों तथा देवताओं से पूजित है। नियमित होकर इनका दर्शन करके मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और मरने पर पुनः संसारी जीव नहीं होता है ॥ ९३-९४ ॥ पूर्वकाल में देवताओं के लिये कंटकस्वरूप एक दैत्य सियार के रूप में विद्यमान था। अपने बन्धन से सशंकित उस दैत्य ने ब्रह्मा से वर प्राप्त करके गोमायु (सियार) का रूप धारण कर लिया था । हे पार्वति ! मैंने उसका वध किया और तब मैं जम्बुकेश कहा जाने लगा; आज भी लोक में प्रसिद्ध तथा देवताओं और असुरों से नमस्कृत इन देवेश्वर का दर्शन करके मनुष्य समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है । [हे देवि!] शुक्र आदि प्रधान ग्रहों के द्वारा स्थापित किये गये इन पुण्यमय तथा सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले लिङ्गों का दर्शन करो। हे पार्वति ! इस प्रकार मैंने अपने निवासस्वरूप इन पवित्र लिङ्गों का वर्णन किया; मेरे क्षेत्र में एक अन्य गुप्त रहस्य भी है, इसे सुनो ॥ ९५–९८१/२ ॥ यह क्षेत्र चारों दिशाओं में चार कोस अतएव एक योजन में कहा गया है; हे सुन्दर अंगों वाली ! मृत्युकाल में इसे अमरता प्रदान करने वाला जानो । महालय गिरि में विराजमान और केदार पर स्थित मेरा दर्शन करके मनुष्य गणत्व प्राप्त करता है, किंतु इस क्षेत्र में मोक्ष की प्राप्ति होती है। उन स्थानों में गणपति पद प्राप्त होता है और यहाँ पर उत्तम मुक्ति प्राप्त होती है, अतः हे वरानने! उस महालय, केदार तथा मध्यम क्षेत्र – इन सबसे पुण्यप्रद यह अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है। केदार, मध्यमक्षेत्र तथा महालय स्थान — ये तीनों पृथ्वीलोक में मेरे पवित्र क्षेत्र हैं, किंतु यह [अविमुक्तक्षेत्र ] उनसे भी अधिक श्रेष्ठ है ॥ ९९–१०३ ॥ जबसे इन लोकों की सृष्टि की गयी है, तबसे मैंने इस पवित्र क्षेत्र का परित्याग कभी नहीं किया, इसलिये यह अविमुक्त [क्षेत्र] हो गया । यहाँ मेरे अविमुक्तेश्वर लिङ्ग का दर्शन करके मनुष्य शीघ्र ही पापों से मुक्त होकर पशुपाशों (जीवबन्धन) – से छूट जाता है। शैलेश्वर, संगमेश्वर, स्वर्लीनेश्वर, मध्यमेश्वर, हिरण्यगर्भ, ईशान, गोप्रेक्ष, वृषभध्वज, उपशान्त, ज्येष्ठस्थान में निवास करने वाले शिव, शुक्रेश्वर, प्रसिद्ध व्याघ्रेश्वर तथा जम्बुकेश्वर का दर्शन करके मनुष्य दुःख के सागररूप संसार में [पुनः] जन्म नहीं लेता है ॥ १०४-१०७१/२ ॥ सूतजी बोले — [ हे ऋषियो !] ऐसा कहकर महादेव ने सभी दिशाओं की ओर देखा । [ दिशाओं की ओर] देखकर देवदेव महेश्वर के बैठ जाने के अनन्तर वह सम्पूर्ण स्थान सहसा देदीप्यमान हो गया। तत्पश्चात् भस्म लगाने से श्वेत प्रभावाले, नियम-व्रत धारण करने वाले, पशुपति के भक्त और महेश्वर के प्रति समर्पित बहुत-से सैकड़ों सिद्ध तथा महात्माओं ने वहाँ आ महेश्वर को प्रणाम किया; पुनः वे ध्यानयोग में स्थित योगेश्वर [शिव]-को बार-बार देखकर अपने मन को स्थिर करके उन ईश्वर में लीन होते हुए-से स्थित हो गये । उनके इस प्रकार स्थित होने पर वे देवदेव उमापति परम मूर्ति धारण करते हुए विराट् पुरुष के रूप में हो गये; वे सम्पूर्ण जगत् को एक स्थान पर एकत्र करने के लिये प्रलयकाल के समान खड़े हो गये ॥ १०८-११३ ॥ तब पुलकित रोमों वाली पार्वती वहाँ स्थित उन जगत् प्रभु की उस परम मूर्ति को पुनः देखने में समर्थ न हो सकीं। तदनन्तर पहले कभी न देखे गये उस स्वरूप को प्रकृति में स्थित समझकर वे परमेश्वरी योग के द्वारा प्रकृति का रूप धारणकर महात्मा शिव के उस स्वरूप को पुनः देखने में समर्थ हो गयीं ॥ ११४-११५१/२ ॥ तब अत्यन्त सुन्दर पंचाक्षर मन्त्र का स्मरण करते हुए दग्ध लिङ्ग वाले वे सभी योगी शिव के ध्यान में लीन होकर उन [ विराट् ] पुरुष के हृदय में प्रविष्ट हुए । तदनन्तर शिवजी ने सभी पापों का हरण करने वाले, दिव्य तथा पूर्व में प्रकट किये गये नीललोहितमूर्तिस्थ रूप को पुनः धारण किया ॥ ११६–११८ ॥ उस रूप को देखकर पुलकित समस्त रोमों वाली पार्वती स्तुति करते हुए तथा उनके चरणों में प्रणाम करके कहा — ‘हे भगवन्! ये कौन हैं ?’ तब सुरश्रेष्ठ [शिव] पर्वतराज की उन पुत्री से कहने लगे ॥ ११९१/२ ॥ श्रीभगवान् बोले — हे भामिनि ! मेरे व्रत का आश्रय लेकर जिन-जिन भक्तियुक्त श्रेष्ठ द्विजों ने यहाँ योग का अभ्यास किया है, उनके एक जन्म में ही इस क्षेत्र के प्रभाव तथा उनकी भक्ति के कारण मैं स्वयं विग्रहरूप से इस प्रकार का अनुग्रह करता हूँ । अतः यह महान् क्षेत्र ब्रह्मा आदि [ देवताओं], वेदज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों, सिद्धों तथा तपस्वियों के द्वारा सेवित है । हे देवि ! प्रत्येक महीने में दोनों पक्षों की अष्टमी तथा चतुर्दशी को वाराणसी में शिव की पूजा की जाती है । सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण के अवसर पर विशेषकर कार्तिक महीने में, पुण्यप्रद सभी पर्वों में, विषुवत् एवं अयन संक्रान्तियों में पृथ्वी पर स्थित सभी तीर्थ वाराणसी में विद्यमान उत्तरवाहिनी, पुण्यमयी, मेरे सिर से निकली हुई, तुम्हारे पिता गिरिराज हिमालय की पुत्री, पुण्यमय स्थान में विराजमान और सदा पुण्य दिशा की ओर प्रवाहित होने वाली पवित्र गंगा का सेवन करते हैं । हे वरानने! सभी ओर से आकर जो उन भागीरथी का सेवन करते हैं, उन्हें सुनो ॥ १२०-१२७ ॥ हे देवि! हे सुव्रते! कुरुक्षेत्र, पुष्कर, निमिष, प्रयाग, पृथूदक, द्रुमक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, तीर्थमय नैमिष, सभी क्षेत्र, देवता, ऋषिगण, सन्ध्या, ऋतुएँ, सभी नदियाँ, सभी सरोवर, सातों समुद्र तथा समस्त देवतीर्थ एकीभूत होकर सैकड़ों तीर्थोंसहित सभी पर्वों के अवसर पर भागीरथी में आकर मिल जाते हैं और हे सुरेशानि! सभी पर्वों पर अविमुक्तेश्वर तथा त्रिविष्टप का दर्शन करके पुनः कालभैरव पहुँचकर पूर्णरूप से पापमुक्त हो जाते हैं। पृथ्वी पर जो भी पवित्र तथा महान् आयतन (देवालय) हैं, वे समस्त पर्वों के अवसर पर महापापों का नाश करने वाले क्षेत्र श्रेष्ठ पुण्यमय अविमुक्त में आकर प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ १२८-१३३ ॥ [ खण्ड ] में स्थित लिङ्ग, महालय में स्थित लिङ्ग, मध्यमेश्वर नामक लिङ्ग, पाशुपतेश्वर, शंकु- कर्णेश्वर, दोनों गोकर्णेश्वर, द्रुमचण्डेश्वर, अत्युत्तम भद्रेश्वर, स्थानेश्वर, एकाग्रेश्वर, कालेश्वर, अजेश्वर, भैरवेश्वर, ईशान, ओंकारेश्वर, अमरेश्वर, महाकालेश्वर, ज्योतिष, भस्मगात्र आदि तथा अन्य जो प्रसिद्ध अरसठ मेरे पवित्र स्थान इस भूतल पर हैं एवं जो अन्य सभी लोकप्रसिद्ध स्थान हैं; वे सब वाराणसी में मेरे पास सभी पुण्यप्रद पर्वों पर आ जाते हैं । [ हे देवि ! ] इसी कारण से यहाँ पर मृत्यु को प्राप्त प्राणी दिव्य अमृत ( अमर ) पद प्राप्त करता है; मैंने यह रहस्यमय बात कही है ॥ १३४–१३९१/२ ॥ हे शुभे! [वाराणसी में] गंगा में स्नान करके मेरा दर्शन करने से मनुष्य सैकड़ों-हजारों समस्त यज्ञों के अभीष्ट फलों के समान फल शीघ्र ही प्राप्त करता है, इससे बढ़कर आश्चर्य क्या हो सकता है ? हे देवि ! स्वर्ग में, पृथ्वी पर तथा पर्वतों पर जो भी सभी प्रधान देवस्थान हैं, उनमें मेरे द्वारा बताये गये इस वाराणसी क्षेत्र को सबसे श्रेष्ठ जानो। ब्राह्मणों ने वेदों मे वर्णित पाप को ‘अवि’ शब्द से कहा है; यह क्षेत्र उस [ पाप] – से मुक्त है तथा मेरे द्वारा सेवित है, अतः इसे ‘अविमुक्त’ कहा जाता है ॥ १४०–१४३ ॥ ऐसा कहकर सभी लोकों के स्वामी भगवान् रुद्र पुनः बोले — ‘देवेशि ! मेरे इस अविमुक्त निवास स्थान को भली-भाँति देखो।‘ ऐसा कहने के बाद उन देवी को साथ लेकर भगवान् उमापति ने उन्हें अत्युत्तम श्रीपर्वत दिखाया और वे वहाँ अविमुक्तेश्वर में उनके साथ नित्य रहने लगे। सर्वत्र गमन की शक्ति से युक्त होने तथा सर्वव्यापी होने के कारण सर्वात्मा, सत्-असत्स्वरूप वाले, देवताओं के स्वामी तथा सभी प्राणियों के स्वामी भगवान् शिव उन देवी के साथ श्रीपर्वत पर पहुँचकर वहाँ के [पवित्र ] क्षेत्र दिखाने लगे ॥ १४४–१४७ ॥ यहाँ कुण्डिप्रभ, परम दिव्य वैश्रवणेश्वर, आशालिङ्ग, देवेश्वर, दिव्य बिलेश्वर, विष्णु के द्वारा स्थापित महान् रामेश्वर, दक्षिण द्वार के पार्श्वभाग में भगवान् कुण्डलेश्वर, पूर्व द्वार के समीप स्थित और पर्वत के साथ वृद्धि को प्राप्त सर्वदेवनमस्कृत उत्तम त्रिपुरान्तक, तीनों लोकों में प्रसिद्ध मध्यमेश्वर, पूर्वकाल में देवताओं के द्वारा स्थापित वरप्रद अमरेश्वर, गोचर्मेश्वर, ईशान, अद्भुत इन्द्रेश्वर और अपने कार्य के लिये ब्रह्मा के द्वारा स्थापित विशाल कर्मेश्वर लिङ्ग हैं । हे अव्यये ! श्रीमत्सिद्धवट सदा मेरा निवासस्थान है। साक्षात् ब्रह्मा के द्वारा निर्मित यह दिव्य तथा पवित्र अजबिल नामक स्थान है; वहीं बिलेश्वर में मेरी दिव्य पादुकाएँ भी हैं। वहाँ शृंगाटक पर्वत के मध्य शिखर पर शृंगाटक के आकार वाला (त्रिकोण) श्रृंगाटकेश्वर नामक लिङ्ग है, जो श्रीदेवी (लक्ष्मी) के द्वारा स्थापित किया गया है। यह मल्लिकार्जुन [लिङ्ग ] मेरा शुभ निवासस्थान है। हे देवि ! युगादि के परिवर्तित होने पर ब्रह्मा के द्वारा स्थापित रजेश्वर को स्कन्द के द्वारा स्थापित गजेश्वर को, अविनाशी कपोतेश्वर को तथा सबसे अधिक शुभ और करोड़ों रुद्रगणों के द्वारा सेवित कोटीश्वर नामक महातीर्थ को इस समय देखो ॥ १४८-१५७ ॥ दक्षिण में ब्रह्मा के द्वारा तथा उत्तर में विष्णु के द्वारा स्थापित किये गये पाषाणनिर्मित सुन्दर द्विजदेवकुल नामक लिङ्ग को, पूर्व में मेरे द्वारा स्थापित महाप्रमाण लिङ्ग तथा पश्चिम में पर्वत पर स्थित ब्रह्मेश्वर अलेश्वर नामक लिङ्ग को देखो । महादेव ने ब्रह्मा से कहा था — ‘हे ब्रह्मन् ! आपने मुनियों के साथ इसे अलंकृत किया है’ – ऐसा कहकर वे रुद्र उस गृह में स्थित हो गये, अतः उसे अलंगृह कहा गया है ॥ १५८–१६० ॥ हे तीर्थज्ञे! वहाँ पर स्थित मेरे व्योमलिङ्ग तीर्थ को भी देखो; कदम्बेश्वर नाम वाला यह तीर्थ स्कन्द के द्वारा स्थापित किया गया है। नन्द आदि के द्वारा विधिवत् स्थापित गोमण्डलेश्वर को भी देखो। हे वरानने! शोभासम्पन्न देव-ह्रद (सरोवर)-के तट पर इन्द्र आदि सभी देवताओं के द्वारा स्थापित किये गये मेरे इन स्थानों का अवलोकन करो। हे देवि! हारपुर में तुम्हारे हार के गिर जाने पर तुमने जगत् के हित के लिये इसे हारकुण्ड बना दिया था । हे सुव्रते! शिवरुद्रपुर में उस पर्वत पर तुम्हारे पिता सुशैल ने अचलेश्वर की स्थापना की थी, जिसे मैंने ब्रह्मा आदि ऋषियों के साथ सुशोभित किया था । हे देवि! तुम्हारी पुत्री चण्डिकेशा ने चण्डिकेश्वर को स्थापित किया है; चण्डिका के द्वारा स्थापित यह स्थान उत्तम अम्बिकातीर्थ है । यह रुचिकेश्वर तीर्थ है; यह पवित्र कपिलधारा [तीर्थ] है ॥ १६१-१६६१/२ ॥ हे देवि ! जो इन विविध स्थानों तथा तीर्थों में भक्तिपूर्वक सदा मेरी पूजा करता है, वह मेरे साथ आनन्द करता है। जो ब्राह्मण श्रीशैल पर शरीरत्याग करता है, वह पापरहित होकर मुक्त हो जाता है, जिस प्रकार अविमुक्तक्षेत्र में शुभ फल होता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रते! जो इन स्थानों में विधिपूर्वक घृत से महास्नान कराता है, वह मेरा सायुज्य प्राप्त करता है। पचीस पल [^2] [ घृत] – का ‘अभ्यंग ‘ तथा सौ पल का ‘स्नान’ जानना चाहिये। दो हजार पलों से स्नान कराने को ‘महास्नान’ कहा गया है ॥ १६७–१७०१/२ ॥ जो मेरे लिङ्ग को गाय के घी से स्नान कराकर सभी पूजाद्रव्यों से विशुद्ध करके जल से मेरा अभिषेक करता है — इस प्रकार मार्जन करने से सौ यज्ञों का, स्नान कराने से तथा पूजा कराने से लाख-लाख यज्ञों का, गीतवाद्य आदि से अर्चन करने पर अनन्त यज्ञों का फल प्राप्त होता है। महास्नान में रुचि रखने वाले भक्तों को स्नान का आठ गुना (आठ लाख यज्ञों का) फल बताया गया है। केवल जल से अथवा भक्ति- पूर्वक गन्धयुक्त जल से अभ्यंग पचीस पल से करना चाहिये ॥ १७१-१७४ ॥ विधिपूर्वक शमीपुष्प, बिल्वपत्र, कमल तथा अन्य पुष्प अर्पित करना चाहिये; बिल्वपत्र का त्याग [कभी नहीं ] करना चाहिये। महादेव की पूजा चार अथवा आठ द्रोण पुष्पों से करनी चाहिये और दस अथवा आठ द्रोण नैवेद्य अर्पित करना चाहिये । धनहीन ब्राह्मण के लिये एक आढक नैवेद्य का पुण्य सौ द्रोण नैवेद्य पुण्य के समान बताया गया है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १७५–१७७ ॥ भेरी, मृदंग, मुरज, तिमिर, पटह आदि विविध वाद्य यन्त्रों और अन्य प्रकार के निनादों के द्वारा [रात्रि में] जो जागरण करे, उसे अपने सेवकों, पुत्रों, पत्नी, सम्बन्धियों तथा बन्धुओं के साथ प्रदक्षिणा करके उत्तम लिङ्ग से इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये — ‘हे सुरेश्वर ! हे शंकर! मैंने जो भी द्रव्यहीन, क्रियाहीन तथा श्रद्धाहीन [पूजन] किया है अथवा जो नहीं भी किया गया है, उसे आप कृपा करके क्षमा करें’ — यह प्रार्थना करके त्वरित रुद्र [^3] तथा शान्तिमन्त्र का जप करना चाहिये। पंचाक्षर के महाबीज का जप करके वह सभी तीर्थों में जाने तथा सभी यज्ञों को करने से जो फल होता है, उस फल को प्राप्त कर लेता है और वाराणसी में मरने पर जो सायुज्य गति होती है, मेरे उस सायुज्य को प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है । [हे देवि !] मेरे भक्तों को चाहिये कि मेरी प्रसन्नता के लिये विधिपूर्वक यह सब करें। जो ऐसा नहीं करते, वे मेरे भक्त नहीं होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १७८-१८४ ॥ सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] यह वचन सुनकर वाराणसीपुरी जाकर देवी ने दूध तथा घी से अविमुक्तेश्वर लिङ्ग को स्नान कराकर भुवननायक देवेश रुद्र का अर्चन किया और अविमुक्त [ काशी] में तपस्या के द्वारा मन्दर – पर्वत पर एक सुन्दर कन्दरा में महात्मा मन्दर का क्षेत्र निर्मित किया; वहाँ प्रभु [शिव ] ने हिरण्याक्ष के पुत्र महादैत्य अन्धक पर अनुग्रह करके लीलापूर्वक उसे गणत्व प्राप्त कराया था। [हे ऋषियों!] इस प्रकार मैंने आप लोगों से आदरपूर्वक सम्पूर्ण कथासार कहा। जो मनुष्य इस क्षेत्र के उत्तम माहात्म्य को पढ़ता अथवा सुनता है, वह सभी क्षेत्रों में वास का जो पुण्य होता है, वह सब तत्काल प्राप्त कर लेता है अथवा जो सभी पवित्र तथा जितेन्द्रिय द्विजों को सुनाता है, वह भी समस्त यज्ञों का फल प्राप्त कर लेता है । १८५ – १९० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘वाराणसी श्रीशैलमाहात्म्यकथन’ नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९२ ॥ [^1]: काशी के कन्दुकेश्वर शिवलिंग के प्रादुर्भाव में पार्वती द्वारा विदल एवं उत्पल दैत्यों के वध की कथा, रुद्रसंहिता का उपसंहार तथा इसका माहात्म्य [^2]: 1 पल का वज़न 48 मिलीग्राम होता है, लेकिन यह वज़न की एक प्राचीन इकाई है और इसका उपयोग अलग-अलग संदर्भों में भिन्न हो सकता है। [^3]: मन्त्रोयथा – ॐ यो रुद्रो ऽग्नौ योऽप्सुय ओषधीषु यो रुद्रो विश्वाभुवनाविवेश तस्मै रुद्राय नमोऽस्तु । Content is available only for registered users. 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