February 2, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -098 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ अट्ठानबेवाँ अध्याय भगवान् विष्णु द्वारा एक सहस्र नामों से भगवान् शिव की स्तुति करना तथा प्रसन्न होकर महेश्वर द्वारा उन्हें सुदर्शनचक्र प्रदान करना श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अष्टनवतितमोऽध्यायः सहस्रनामभिः पूजनाद्विष्णुचक्रलाभं ऋषिगण बोले — हे सूतजी! भगवान् विष्णु ने देवदेव महेश्वर से सुदर्शन नामक चक्र कैसे प्राप्त किया; इसे आप बताने की कृपा करें ॥ १ ॥ सूतजी बोले — [हे ऋषियो ! ] देवताओं तथा महान् असुरों के बीच सभी प्राणियों के लिये विनाशकारी अति भयंकर तथा महान् युद्ध हुआ । शक्ति, मुसलों, झुके पर्वों वाले बाणों तथा भालों से प्रहार किये जाने पर वे देवतागण भय से व्याकुल होकर भाग गये ॥ २-३ ॥ तदनन्तर पराजित होकर शोकसंतप्त मन वाले देवताओं ने देवदेवेश्वर सुरेशान विष्णु के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ४ ॥ प्रणाम करके स्थित हुए उन देवताओं की ओर देखकर देवदेवेश्वर भगवान् विष्णु ने यह वचन कहा — हे वत्स देवतागण ! हे सुव्रतो! अलंकार तथा पराक्रम से विहीन आप लोग दुःखी होकर यहाँ पर किसलिये आये हैं; इसे बताइये ॥ ५-६ ॥ उनके उस वचन को सुनकर वैसी दशा को प्राप्त श्रेष्ठ देवतागण प्रणाम करके जैसा घटित हुआ था, वह सब उन देवदेव विष्णु से कहने लगे ॥ ७ ॥ हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे विष्णो! हे जिष्णो! हे जनार्दन ! दानवों से पीड़ित होकर हम सभी आपकी शरण में आये हैं। हे देवदेवेश! हे पुरुषोत्तम! आप ही हम लोगों की गति हैं, आप ही परमात्मा हैं और आप ही सभी लोकों के पिता भी हैं। हे जनार्दन ! आप ही भर्ता (भरण करने वाले), हर्ता (संहार करने वाले), भोक्ता तथा दाता हैं; अतः हे दैत्यमर्दन! आप दानवों का वध करने की कृपा कीजिये ॥ ८-१० ॥ हे कमलनयन! वे सभी दैत्य वर प्राप्त कर लेने के कारण विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, यम, कुबेर, चन्द्र, निर्ऋति, वरुण, वायु, अग्नि, ईशान, पर्जन्य तथा सूर्य के अत्यन्त दृढ़-दारुण-भयानक-कँपा देने वाले तथा शक्तिरहित कर देने वाले अस्त्रों से भी अवध्य हो गये हैं । हे जगद्गुरो ! च्यवनपुत्र दधीच ने सूर्यमण्डल से उत्पन्न आपके उठे हुए चक्र को कुण्ठित कर दिया था। आपकी कृपा से दैत्यों ने आपके दण्ड, धनुष तथा अस्त्र को प्राप्त कर लिया है। पूर्वकाल में त्रिपुरशत्रु [शिव] के द्वारा जलन्धर का संहार करने के लिये एक भयानक तथा तेज धार वाले चक्र का निर्माण किया गया था; उसी से आप उन [ दानवों] का वध कर सकते हैं। उसी अस्त्र से ये दानव मारे जा सकते हैं, अन्य सैकड़ों अस्त्रों से नहीं ॥ ११–१५१/२ ॥ तदनन्तर उनका वचन सुनकर कमल के समान नेवाले चक्रधारी वे विष्णु वाचस्पति आदि प्रधान देवताओंसे स्वयं कहने लगे ॥ १६१/२ ॥ श्रीविष्णु बोले — हे देवताओ ! मैं इस समय सभी सनातन देवताओं के साथ महादेव के पास पहुँचकर [ आप] देवताओं का सम्पूर्ण कार्य करूँगा। हे देवताओं ! जलन्धर का वध करने के लिये शिवजी के द्वारा बनाये गये चक्र को प्राप्त करके उसी के द्वारा सभी महान् असुरों, धुन्धु आदि दैत्यों तथा अरसठ सौ अन्य असुरों को बान्धवोंसहित क्षणभर में मारकर मैं आप देवताओं का उद्धार करूँगा ॥ १७–१९१/२ ॥ सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] श्रेष्ठ देवताओं से यह कहकर देवताओं में श्रेष्ठ विष्णु ने सुरश्रेष्ठ शिव का स्मरण करते हुए उन श्रेष्ठ शंकर की पूजा की। विश्वकर्मा द्वारा निर्मित मेरुपर्वत सदृश लिङ्ग को हिमवान् के उत्तम शिखर पर विधिपूर्वक स्थापित करके त्वरितरुद्र [^1] तथा रुद्रसूक्त [^2] के द्वारा अभिषेक करके गन्ध आदिके द्वारा पूजा करके जनार्दन ज्योतिरूप मनोरम शिवकी स्तुति की। पुनः अग्निमें देव रुद्रकी पूजा करके और उन्हें प्रणाम करके आदि में भव नाम वाले सहस्रनाम के द्वारा क्रम से आदि में प्रणव तथा अन्त में नमः लगाकर शिव की पूजा की। प्रारम्भ में भव नाम वाले सहस्रनाम के द्वारा प्रत्येक नाम का उच्चारण करते हुए उन्होंने कमलपुष्प से महेश्वर भगवान् शंकर की पूजा की। तदनन्तर उन्होंने अन्त में स्वाहा वाले भव आदि नामों से समिधा आदि के द्वारा विधिपूर्वक अग्नि में प्रत्येक नाम की दस हजार आहुति देकर पुनः भव आदि नामों से [ उन] प्रभु भव ईश्वर शम्भु की इस प्रकार स्तुति की — ॥ २०-२६१/२ ॥ श्रीविष्णु बोले — भव-शिव, हर-रुद्र, पुरुष, पद्मलोचन, अर्थितव्य, सदाचार, सर्वशम्भुमहेश्वर, ईश्वर, स्थाणु, ईशान, सहस्राक्ष-सहस्रपात् ॥ २७-२८ ॥ वरीयान् वरद-वन्द्य, शङ्कर, परमेश्वर, गंगाधर, शूलधर, परार्थैकप्रयोजन ॥ २९ ॥ सर्वज्ञ, सर्वदेवादिगिरिधन्वा, जटाधर, चन्द्रापीड, चन्द्रमौलि, विद्वान्, विश्वामरेश्वर ॥ ३० ॥ वेदान्तसारसन्दोह, कपालीनीललोहित, ध्यानाधार, अपरिच्छेद्य, गौरीभर्ता, गणेश्वर ॥ ३१ ॥ अष्टमूर्ति-विश्वमूर्ति, त्रिवर्ग, स्वर्गसाधन, ज्ञानगम्य, दृढ़प्रज्ञ, देवदेव, त्रिलोचन ॥ ३२ ॥ वामदेव, महादेव, पाण्डु, परिदृढ, अदृढ, विश्वरूप, विरूपाक्ष, वागीश, शुचि, अन्तर ॥ ३३ ॥ सर्वप्रणयसंवादी, वृषांक, वृषवाहन, ईश-पिनाकी, खट्वाङ्गी, चित्रवेष, चिरन्तन ॥ ३४ ॥ तमोहर, महायोगी-गोप्ता, ब्रह्मांगहृज्जटी, कालकाल, कृत्तिवासा, सुभग, प्रणवात्मक ॥ ३५ ॥ उन्मत्तवेष, चक्षुष्य, दुर्वासा, स्मरशासन, दृढायुध-स्कन्दगुरु, परमेष्ठीपरायण ॥ ३६ ॥ अनादिमध्यनिधन, गिरिश-गिरिबान्धव, कुबेरबन्धु-श्रीकण्ठ, लोकवर्णोत्तमोत्तम ॥ ३७ ॥ सामान्यदेव, कोदण्डी, नीलकण्ठ, परश्वधी, विशालाक्ष, मृगव्याध, सुरेश, सूर्यतापन ॥ ३८ ॥ धर्मकर्माक्षम, क्षेत्र- भगवान्, भगनेत्रभिद्-उग्र, पशुपति, तार्क्ष्यप्रियभक्त, प्रियंवद ॥ ३९ ॥ दान्तोदयाकर, दक्ष, कपर्दी, कामशासन, श्मशाननिलय- सूक्ष्म, श्मशानस्थ, महेश्वर ॥ ४० ॥ लोककर्ता, भूतपति, महाकर्ता, महौषधी, उत्तर, गोपति, गोप्ता, ज्ञानगम्य, पुरातन ॥ ४१ ॥ 101 नीति, सुनीति, शुद्धात्मा, सोमसोमरत, सुखी, सोमप, अमृतप, सोम, महानीति, महामति ॥ ४२ ॥ अजातशत्रु, आलोक, सम्भाव्य, हव्यवाहन, लोककार, वेदकार, सूत्रकार, सनातन ॥ ४३ ॥ महर्षि कपिलाचार्य, विश्वदीप्ति, त्रिलोचन, पिनाकपाणिभूदेव, स्वस्तिद, सदास्वस्तिकृत् ॥ ४४ ॥ त्रिधामा, सौभग, शर्व- सर्वज्ञ, सर्वगोचर, ब्रह्मधृग्विश्वसृक्स्वर्ग, कर्णिकार, प्रिय, कवि ॥ ४५ ॥ शाख-विशाख, गोशाख, शिव, नैक, क्रतु, सम, गंगाप्लवोदक, भाव, सकल, स्थपतिस्थिर ॥ ४६ ॥ विजितात्मा, विधेयात्मा, भूतवाहनसारथि, सगण, गणकार्य, सुकीर्ति, छिन्नसंशय ॥ ४७ ॥ 150 कामदेव, कामपाल, भस्मोद्धूलितविग्रह, भस्मप्रिय, भस्मशायी, कामी-कान्त कृतागम ॥ ४८ ॥ समायुक्त, निवृत्तात्मा, धर्मयुक्त, सदाशिव, चतुर्मुखचतुर्बाहु, दुरावास, दुरासद ॥ ४९ ॥ दुर्गमदुर्लभ, दुर्ग, सर्वायुधविशारद, अध्यात्म-योगनिलय, सुतन्तु, तन्तुवर्धन ॥ ५० ॥ शुभाङ्ग, लोकसारंग, जगदीश, अमृताशन, भस्मशुद्धिकर, मेरु, ओजस्वी, शुद्धविग्रह ॥ ५१ ॥ हिरण्यरेता, तरणि- मरीचि, महिमालय, महाह्रद, महागर्भ, सिद्धवृन्दारवन्दित ॥ ५२ ॥ व्याघ्रचर्मधर, व्याली, महाभूत, महानिधि, अमृतांग, अमृतवपु, पंचयज्ञ, प्रभंजन ॥ ५३ ॥ पंचविंशतितत्त्वज्ञ, पारिजात, परावर, सुलभ, सुव्रतशूर, वाङ्मयैकनिधि, निधि ॥ ५४ ॥ वर्णाश्रमगुरु, वर्णी, शत्रुजिच्छत्रुतापन, आश्रम, क्षपण, क्षाम, ज्ञानवान्, अचलाचल ॥ ५५ ॥ 207 प्रमाणभूत, दुर्ज्ञेय, सुपर्ण, वायुवाहन, धनुर्धरधनुर्वेद, गुणराशि, गुणाकर ॥ ५६ ॥ अनन्तदृष्टि, आनन्द, दण्डदमयिता, दम, अभिवाद्य, महाचार्य, विश्वकर्मा, विशारद ॥ ५७ ॥ वीतराग, विनीतात्मा, तपस्वी, भूतभावन, उन्मत्तवेषप्रच्छन्न, जितकाम, अजितप्रिय ॥ ५८ ॥ कल्याणप्रकृति, कल्प, सर्वलोकप्रजापति, तपस्वीतारक, धीमान्, प्रधानप्रभु, अव्यय ॥ ५९ ॥ लोकपाल, अन्तर्हितात्मा, कल्पादि, कमलेक्षण, वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ, नियम, नियमाश्रय ॥ ६० ॥ चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, विराम, विद्रुमच्छवि, भक्तिगम्य, परं-ब्रह्ममृगबाणार्पण, अनघ ॥ ६१ ॥ 252 अद्रिराजालय, कान्त, परमात्मा, जगद्गुरु, सर्वकर्माचल, त्वष्टा, मंगल्यमंगलावृत ॥ ६२ ॥ महातपा, दीर्घतपा, स्थविष्ठ, स्थविर, ध्रुव, अहः संवत्सर, व्याप्ति, प्रमाण, परम, तप ॥ ६३ ॥ संवत्सरकर, मन्त्र-प्रत्यय, सर्वदर्शन, अज, सर्वेश्वर, स्निग्ध, महारेतामहाबलः ॥ ६४ ॥ योगी, योग्य, महारेता, सिद्ध, सर्वादि, अग्निदः, वसु, वसुमना, सत्यसर्वपापहर, हर ॥ ६५ ॥ अमृतशाश्वत, शान्त, बाणहस्तप्रतापवान्, कमण्डलुधर, धन्वी, वेदाङ्ग, वेदविद्, मुनि ॥ ६६ ॥ भ्राजिष्णु, भोजनभोक्ता, लोकनेता, दुराधर, अतीन्द्रिय, महामाय, सर्वावास, चतुष्पथ ॥ ६७ ॥ 303 कालयोगी, महानाद, महोत्साह, महाबल, महाबुद्धि, महावीर्य, भूतचारी, पुरन्दर ॥ ६८ ॥ निशाचर, प्रेतचारिमहाशक्ति, महाद्युति, अनिर्देश्यवपु, श्रीमान्, सर्वहार्यमित, गति ॥ ६९ ॥ बहुश्रुत, बहुमय, नियतात्मा, भवोद्भव, ओजस्तेजोद्युतिकर, नर्तक, सर्वकामक ॥ ७० ॥ नृत्यप्रिय, नृत्यनृत्य, प्रकाशात्माप्रतापन, बुद्धस्पष्टाक्षर, मन्त्र, सन्मान, सारसंप्लव ॥ ७१ ॥ 332 युगादिकृद्युगावर्त, गम्भीर, वृषवाहन, इष्ट, विशिष्ट-शिष्टेष्ट, शरभ, शरभधनुः ॥ ७२ ॥ अपांनिधि, अधिष्ठानविजय, जयकालवित्, प्रतिष्ठित, प्रमाणज्ञ, हिरण्यकवच, हरि ॥ ७३ ॥ विरोचन, सुरगण, विद्येशविबुधाश्रय, बालरूप, बलोन्माथी, विवर्त, गहनगुरु ॥ ७४ ॥ करण, कारण, कर्ता, सर्वबन्धविमोचन, विद्वत्तमवीतभय, विश्वभर्ता, निशाकर ॥ ७५ ॥ व्यवसाय, व्यवस्थान, स्थानद, जगदादिज, दुन्दुभ, ललित, विश्व, भवात्मात्मनिसंस्थित ॥ ७६ ॥ वीरेश्वरवीरभद्र, वीरहा, वीरभृद्विराट् वीरचूड़ामणि, वेत्ता, तीव्रनाद, नदीधर ॥ ७७ ॥ आज्ञाधार, त्रिशूली, शिपिविष्ट शिवालय, वालखिल्य, महाचाप, तिग्मांशु, निधि-अव्यय ॥ ७८ ॥ अभिराम, सुशरण, सुब्रह्मण्य, सुधापति, मघवान्कौशिक, गोमान्, विश्राम, सर्वशासन ॥ ७९ ॥ ललाटाक्ष, विश्वदेह, सार, संसारचक्रभृत्, अमोघदण्डी, मध्यस्थ, हिरण्य, ब्रह्मवर्चसी ॥ ८० ॥ 398 परमार्थ, परमय, शम्बर, व्याघ्रक, अनल, रुचि, वररुचि, वन्द्य, वाचस्पति, अहर्पति ॥ ८१ ॥ रविविरोचन, स्कन्ध, शास्तावैवस्वत, अजन, युक्ति, उन्नतकीर्ति, शान्तराग, पराजय ॥ ८२ ॥ कैलासपतिकामारि, सविता, रविलोचन, विद्वत्तम, वीतभय, विश्वहर्तानिवारित ॥ ८३ ॥ नित्य, नियतकल्याण, पुण्यश्रवणकीर्तन, दूरश्रवा, विश्वसह, ध्येय, दुःस्वप्ननाशन ॥ ८४ ॥ उत्तारक, दुष्कृतिहा, दुर्धर्ष, दुःसह, अभय, अनादि, भू, भुवोलक्ष्मी, किरीटित्रिदशाधिप ॥ ८५ ॥ विश्वगोप्ता, विश्वभर्ता, सुधीर, रुचिरांगद, जनन, जनजन्मादि, प्रीतिमान्, नीतिमान्, नय ॥ ८६ ॥ विशिष्ट, काश्यप, भानु, भीम, भीमपराक्रम, प्रणव, सप्तधाचार, महाकायमहाधनु ॥ ८७ ॥ जन्माधिप, महादेव, सकलागमपारग, तत्त्वातत्त्वविवेकात्मा विभूष्णु, भूतिभूषण ॥ ८८ ॥ ऋषि, ब्राह्मणविज्जिष्णु, जन्ममृत्युजरातिग, यज्ञयज्ञपति, यज्वा यज्ञान्त, अमोघविक्रम ॥ ८९ ॥ महेन्द्र, दुर्भर, सेनी, यज्ञांगयज्ञवाहन, पंचब्रह्मसमुत्पत्ति, विश्वेश, विमलोदय ॥ ९० ॥ आत्मयोनि, अनाद्यन्त, षड्विंशत्सप्तलोकधृक्, गायत्रीवल्लभ, प्रांशु, विश्वावास, प्रभाकर ॥ ९१ ॥ शिशु, गिरिरत, सम्राट्सुषेण, सुरशत्रुहा, अमोघ, अरिष्टमथन, मुकुन्द, विगतज्वर ॥ ९२ ॥ स्वयंज्योति, अनुज्योति, आत्मज्योति, अचंचल, पिंगल, कपिलश्मश्रु, शास्त्रनेत्रत्रयीतनु ॥ ९३ ॥ ज्ञानस्कन्ध, महाज्ञानी, निरुत्पत्ति, उपप्लव, भग, विवस्वान्-आदित्य, योगाचार्य, बृहस्पति ॥ ९४ ॥ 505 उदारकीर्ति, उद्योगी, सद्योगी, सदसन्मय, नक्षत्रमालीराकेश, साधिष्ठान, षडाश्रय ॥ ९५ ॥ पवित्रपाणि, पापारि, मणिपूर, मनोगति, हृत्पुण्डरीकमासीन, शुक्ल, शान्तवृषाकपि ॥ ९६ ॥ विष्णु, ग्रहपति, कृष्ण, समर्थ, अनर्थनाशन, अधर्मशत्रु, अक्षय्य, पुरुहूतपुरुष्टुत ॥ ९७ ॥ ब्रह्मगर्भ, बृहद्गर्भ, धर्मधेनु, धनागम, जगद्धितैषिसुगत, कुमार, कुशलागम ॥ ९८ ॥ हिरण्यवर्ण, ज्योतिष्मान्, नानाभूतधर, ध्वनि, अरोग, नियमाध्यक्ष, विश्वामित्रद्विजोत्तम ॥ ९९ ॥ बृहज्ज्योति, सुधामा, महाज्योति, अनुत्तम, मातामह, मातरिश्वा, नभस्वान्, नागहारधृक् ॥ १०० ॥ पुलस्त्य, पुलह, अगस्त्य, जातूकर्ण्य, पराशर, निरावरणधर्मज्ञ, विरिंच, विष्टरश्रवा ॥ १०१ ॥ आत्मभू, अनिरुद्ध, अत्रिज्ञानमूर्ति, महायशा, लोकचूड़ामणि, वीर, चण्डसत्यपराक्रम ॥ १०२ ॥ व्यालकल्प, महाकल्प, महावृक्ष, कलाधर, अलंकरिष्णु, अचल, रोचिष्णु, विक्रमोत्तम ॥ १०३ ॥ आशुशब्दपति, वेगी, प्लवन, शिखिसारथि, असंसृष्ट, अतिथि, शक्रप्रमाथी, पापनाशन ॥ १०४ ॥ वसुश्रवा, कव्यवाह, प्रतप्त, विश्वभोजन, जर्य, जराधिशमन, लोहित, तनूनपात् ॥ १०५ ॥ पृषदश्व, नभ, योनि, सुप्रतीक, तमिस्रहा, निदाघतपन, मेघपक्ष, परपुरंजय ॥ १०६ ॥ मुखानिल, सुनिष्पन्न, सुरभि, शिशिरात्मक, वसन्तमाधव, ग्रीष्म, नभस्य, बीजवाहन ॥ १०७ ॥ 604 अंगिरा, मुनिआत्रेय, विमल, विश्ववाहन, पावन, पुरुजित्, शक्र, त्रिविद्य, नरवाहन ॥ १०८ ॥ मनोबुद्धि, अहंकार, क्षेत्रज्ञ, क्षेत्रपालक, तेजोनिधि, ज्ञाननिधि, विपाक, विघ्नकारक ॥ १०९ ॥ अधर, अनुत्तर, ज्ञेय, ज्येष्ठ, निःश्रेयसालय, शैल, नग, तनु, दोह, दानवारि, अरिन्दम ॥ ११० ॥ चारुधीर्जनक, चारुविशल्य, लोकशल्यकृत्, चतुर्वेद, चतुर्भाव, चतुरचतुरप्रिय ॥ १११ ॥ आम्नाय, समाम्नाय, तीर्थदेवशिवालय, बहुरूप, महारूप, सर्वरूप, चराचर ॥ ११२ ॥ न्यायनिर्वाहक, न्याय, न्यायगम्य, निरंजन, सहस्रमूर्धा, देवेन्द्र, सर्वशस्त्रप्रभंजन ॥ ११३ ॥ मुण्ड, विरूप, विकृत, दण्डी, दान्त, गुणोत्तम, पिङ्गलाक्ष, हर्यक्ष, नीलग्रीव, निरामय ॥ ११४ ॥ सहस्रबाहुसर्वेश, शरण्य, सर्वलोकभृत्, पद्मासन, परंज्योति, परावरपरंफल ॥ ११५ ॥ पद्मगर्भ, महागर्भ, विश्वगर्भ, विचक्षण, परावरज्ञ, बीजेश, सुमुखसुमहास्वन ॥ ११६ ॥ देवासुरगुरुदेव, देवासुरनमस्कृत, देवासुरमहामात्र, देवासुरमहाश्रय ॥ ११७ ॥ देवादिदेव, देवर्षिदेवासुरवरप्रद, देवासुरेश्वर, दिव्य, देवासुरमहेश्वर ॥ ११८ ॥ सर्वदेवमय, अचिन्त्य, देवतात्मा, आत्मसम्भव, ईड्य, अनीश, सुरव्याघ्र, देवसिंह, दिवाकर ॥ ११९ ॥ विबुधाग्रवर श्रेष्ठ, सर्वदेवोत्तमोत्तम, शिवज्ञानरत, श्रीमान्, शिखि श्रीपर्वतप्रिय ॥ १२० ॥ 700 जयस्तम्भ, विशिष्टम्भ, नरसिंहनिपातन, ब्रह्मचारी, लोकचारी, धर्मचारी, धनाधिप ॥ १२१ ॥ नन्दी, नन्दीश्वर, नग्न, नग्नव्रतधर शुचि, लिङ्गाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, युगाध्यक्ष, युगावह ॥ १२२ ॥ स्ववश, सवश, स्वर्गस्वर, स्वरमयस्वन, बीजाध्यक्ष, बीजकर्ता, धनकृद्धर्मवर्धन ॥ १२३ ॥ दम्भ, अदम्भ, महादम्भ, सर्वभूतमहेश्वर, श्मशाननिलय, तिष्य, सेतु, अप्रतिमाकृति ॥ १२४ ॥ लोकोत्तरस्फुटालोक, त्र्यम्बक, नागभूषण, अन्धकारि, मखद्वेषी, विष्णुकन्धरपातन ॥ १२५ ॥ वीतदोष, अक्षयगुण, दक्षारि, पूषदन्तहृत्, धूर्जटि, खण्डपरशु, सकल, निष्कल, अनघ ॥ १२६ ॥ आधार, सकलाधार, पाण्डुराभ, मृड, नट, पूर्ण, पूरयिता, पुण्य, सुकुमार, सुलोचन ॥ १२७ ॥ 756 सामगेय, प्रियकर, पुण्यकीर्ति, अनामय, मनोजव, तीर्थकर, जटिल, जीवितेश्वर ॥ १२८ ॥ जीवितान्तकर, नित्य, वसुरेता, वसुप्रिय, सद्गति, सत्कृति, सक्त, कालकण्ठ, कलाधर ॥ १२९ ॥ मानी, मान्य, महाकाल, सद्भूति, सत्परायण, चन्द्रसंजीवन, शास्तालोकगूढ़, अमराधिप ॥ १३० ॥ लोकबन्धु, लोकनाथ, कृतज्ञ-कृतिभूषण, अनपाय्यक्षर, कान्त, सर्वशास्त्रभृतांवर ॥ १३१ ॥ तेजोमद्युतिधर, लोकमाय, अग्रणी, अणु, शुचिस्मित, प्रसन्नात्मा, दुर्जय, दुरतिक्रम ॥ १३२ ॥ ज्योतिर्मय, निराकार, जगन्नाथ, जलेश्वर, तुम्बवीणी, महाकाय, विशोक, शोकनाशन ॥ १३३ ॥ 803 त्रिलोकात्मा, त्रिलोकेश, शुद्ध, शुद्धि, रथाक्षज, अव्यक्तलक्षण, अव्यक्त, व्यक्ताव्यक्तविशाम्पति ॥ १३४ ॥ वरशील, वरतुल, मान, मानधनमय, ब्रह्मा, विष्णुप्रजापाल, हंस, हंसगति, यम ॥ १३५ ॥ वेधा, धाता, विधाता, अत्ताहर्ता, चतुर्मुख, कैलासशिखरावासी, सर्वावासी, सतांगति ॥ १३६ ॥ हिरण्यगर्भ, हरिण, पुरुष, पूर्वजपिता, भूतालय, भूतपति, भूतिद, भुवनेश्वर ॥ १३७ ॥ संयोगी, योगविद्ब्रह्मा, ब्रह्मण्य, ब्राह्मणप्रिय, देवप्रिय, देवनाथ, देवज्ञ, देवचिन्तक ॥ १३८ ॥ विषमाक्ष, कलाध्यक्ष, वृषांक, वृषवर्धन, निर्मद-निरहंकार, निर्मोह, निरुपद्रव ॥ १३९ ॥ दर्पहा, दर्पित, दृप्त, सर्वऋतुपरिवर्तक, सप्तजिह्व, सहस्रार्चि, स्निग्ध, प्रकृतिदक्षिण ॥ १४० ॥ भूतभव्यभवन्नाथ, प्रभव, भ्रान्तिनाशन, अर्थ, अनर्थ, महाकोश, परकार्यैकपण्डित ॥ १४१ ॥ निष्कण्टक, कृतानन्द, निर्व्याज, व्याजमर्दन, सत्त्ववान्, सात्त्विक, सत्यकीर्तिस्तम्भकृतागम ॥ १४२ ॥ अकम्पित, गुणग्राही, नैकात्मा-नैककर्मकृत्, सुप्रीत, सुमुख, सूक्ष्म, सुकर, दक्षिण, अनल ॥ १४३ ॥ स्कन्ध, स्कन्धधर, धुर्य, प्रकट, प्रीतिवर्धन, अपराजित, सर्वसह, विदग्ध सर्ववाहन ॥ १४४ ॥ अधृत, स्वधृत, साध्य, पूर्तमूर्ति, यशोधर, वराहशृङ्गधृक्, वायु, बलवान्, एकनायक ॥ १४५ ॥ 900 श्रुतिप्रकाश, श्रुतिमान्, एकबन्धु, अनेकधृक्, श्रीवल्लभशिवारम्भ, शान्तभद्र, समंजस ॥ १४६ ॥ भूशय, भूतिकृद्भूति, भूषण, भूतवाहन, अकाय, भक्तकायस्थ, कालज्ञानी, कलावपु ॥ १४७ ॥ सत्यव्रतमहात्यागी, निष्ठाशान्तिपरायण, परार्थवृत्ति, वरद, विविक्त, श्रुतिसागर ॥ १४८ ॥ अनिर्विण्ण, गुणग्राही, कलंकांक, कलंकहा, स्वभावरुद्र, मध्यस्थ, शत्रुघ्न, मध्यनाशक ॥ १४९ ॥ शिखण्डी, कवची, शूली, चण्डी, मुण्डी, कुण्डली, मेखली, कवची, खड्गी, मायीसंसारसारथि ॥ १५० ॥ अमृत्युसर्वदृक्, सिंह, तेजोराशि-महामणि, असंख्येय, अप्रमेयात्मा, वीर्यवान्, कार्यकोविद ॥ १५१ ॥ वेद्य, वेदार्थविद्गोप्ता, सर्वाचार, मुनीश्वर, अनुत्तम, दुराधर्ष, मधुर, प्रियदर्शन ॥ १५२ ॥ सुरेश, शरण, सर्व, शब्दब्रह्मसतांगति, कालभक्ष, कलंकारि, कंकणीकृतवासुकि ॥ १५३ ॥ महेष्वास, महीभर्ता, निष्कलंक, विश्रृंखल, मणितरणि, धन्य, सिद्धिद सिद्धिसाधन ॥ १५४ ॥ निवृत्त, संवृत, शिल्प, व्यूढोरस्क, महाभुज, एकज्योति, निरातंक, नरनारायणप्रिय ॥ १५५ ॥ निर्लेप, निष्प्रपंचात्मा, निर्व्यग्र, व्यग्रनाशन, स्तव्यस्तवप्रिय, स्तोताव्यासमूर्ति, अनाकुल ॥ १५६ ॥ निरवद्यपदोपाय, विद्याराशि, अविक्रम, प्रशान्तबुद्धिअक्षुद्र, क्षुद्रहा, नित्यसुन्दर ॥ १५७ ॥ धैर्याधुर्य, धात्रीश, शाकल्य, शर्वरीपति, परमार्थगुरुदृष्टि, गुरु, आश्रितवत्सल, रस, रसज्ञ, सर्वज्ञ, सर्वसत्त्वावलम्बन ॥ १५८१/२ ॥ 1001 सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] इस प्रकार विष्णु ने एक हजार नामों से वृषभध्वज की स्तुति की; पुनः उन्हें स्नान कराया और कमलों से उनका पूजन किया। उस समय विष्णु की परीक्षा लेने के लिये जगत् के स्वामी महेश्वर ने पूजा के कमलों में से एक कमल को छिपा लिया ॥ १५९-१६०१/२ ॥ तब हतपुष्प वाले विष्णु ने ‘यह क्या’ – ऐसा सोचते हुए बाद में वास्तविकता समझकर अपने नेत्र को निकाल करके सर्वसत्त्वावलम्बन (सभी प्राणियों को अवलम्ब देने वाले) जगद्गुरु [ शिव] – की पूजा प्रेमपूर्वक उस [अन्तिम सर्वसत्त्वावलम्बन] नाम से की ॥ १६१-१६२ ॥ तत्पश्चात् समर्पित नेत्र वाले विष्णु को देखकर भगवान् शिव उस लिङ्ग से तथा अग्नि-मण्डल से शीघ्र उतरे। तब करोड़ों सूर्यों के समान तेजसम्पन्न, जटारूपी मुकुट से मण्डित, ज्वालासमूह से घिरे हुए दिव्य, तीक्ष्ण दाँतों वाले, भयंकर, शूल- टंक-गदा- चक्र – भाला-पाश धारण किये हुए, वर तथा अभय मुद्रा युक्त हाथ वाले, बाघ के चर्म को उत्तरीय के रूप में धारण किये हुए तथा भस्म से विभूषित — इस प्रकार के रूपवाले हर भव को देखकर प्रसन्न हुए जनार्दन ने उन देवदेव [शिव] – को शीघ्र प्रणाम किया ॥ १६३-१६६ ॥ इन्द्र सहित देवतागण त्रिलोचन की परिक्रमा करके भागने लगे, ब्रह्मलोक हिल उठा और पृथ्वी काँपने लगी । शिव का वह तेज नीचे से तथा ऊपर से सौ योजन स्थान को जलाने लगा; इससे पृथ्वीतल पर हाहाकार मच गया ॥ १६७-१६८ ॥ तदनन्तर महादेव शंकर ने हाथ जोड़कर [सामने] खड़े विष्णु की ओर प्रेमपूर्वक देखकर हँसते हुए कहा — हे जनार्दन ! अब मैं देवताओं के इस कार्य को जान गया और आपको सुदर्शन नामक उत्तम चक्र प्रदान करता हूँ ॥ १६९-१७० ॥ हे सुव्रत ! आपने सभी लोकों के लिये भयंकर मेरे जिस रूप को देखा है, वह पूर्णरूप से आपके हित तथा भक्तिभाव के लिये है । हे विष्णो ! युद्धभूमि में सौम्यरूप धारण करना देवताओं के लिये दुःखदायक है। शान्त व्यक्तिका अस्त्र यदि शान्त हो, तो उस शान्त अस्त्र से कोई फल नहीं होता है । [ केवल ] तपस्वी के प्रति युद्ध में शान्त व्यक्ति का अस्त्र शान्त होता है। योद्धा की शान्ति से उसकी बलहीनता शत्रु के बल को बढ़ाने वाली होती है। हे देवशत्रुनाशक ! अशान्त देवताओं के साथ आप मेरे अव्यय स्वरूप का ध्यान कीजिये; युद्ध करने के लिये अस्त्र से क्या प्रयोजन ? हे देवारिसूदन! युद्ध में क्षमा नहीं करनी चाहिये। युद्ध के लिये अनुपस्थित शत्रु तथा बलशाली स्वजनों के प्रति और अधर्म – अनर्थ की स्थिति में अनुपयुक्त समय में भी क्षमा का आश्रय नहीं लेना चाहिये ॥ १७१-१७५१/२ ॥ ऐसा कहकर लोकनायक प्रभु [ शिव] – ने उन्हें दस हजार सूर्य के समान तेजस्वी [सुदर्शन] चक्र तथा कमलसदृश एक नेत्र भी प्रदान किया; उसी समय से उन सुव्रत [ विष्णु ] – को पद्माक्ष ( कमलनयन) कहा जाता है ॥ १७६-१७७ ॥ विष्णु को चक्र तथा नेत्र प्रदान करके नीललोहित [शिव] ने अपने परम पवित्र हाथों से उनका स्पर्श किया और कहा — ‘हे वरश्रेष्ठ! मैं वरदाता हूँ, आप अभीष्ट वरों को माँगिये। हे पुरुषोत्तम ! आपने निश्चित रूप से अपनी भक्ति से मुझे वश में कर लिया है ‘ ॥ १७८-१७९ ॥ देवाधिदेव के इस प्रकार कहने पर विष्णु ने उन देवदेवेश्वर को प्रणाम करके कहा — ‘हे महादेव ! आपमें मेरी [पूर्ण] भक्ति हो, आप मुझ पर प्रसन्न होइये। हे प्रभो ! मैं अन्य उत्तम वर नहीं चाहता; क्योंकि भक्तों की अन्य कामनाएँ नहीं होती हैं ‘ ॥ १८०१/२ ॥ उनका वचन सुनकर परम दयालु शिव ने उनका स्पर्श किया और उन्हें [ अपनी] भक्ति प्रदान की । तत्पश्चात् चन्द्रमा को भूषण के रूप में धारण करने वाले महादेव ने परमात्मा अच्युत (विष्णु) – से कहा — ‘हे सुरोत्तम! मेरी कृपा से आप मुझमें भक्ति रखने वाले और देवताओं तथा असुरों के वन्दनीय तथा पूजनीय होंगे; इसमें सन्देह नहीं है। हे विष्णो! हे सुव्रत ! जब सुन्दर नेत्रों वाली दक्षपुत्री सती अपनी माता तथा पिता दक्ष की निन्दा करके सुरेश्वरी के रूप में हिमवान् की दिव्य कन्या होकर उत्पन्न होंगी; उस समय आप ब्रह्मा के आदेश से अपनी भगिनीरूपा उन हिमवान् की पुत्री कल्याणी साध्वी देवी उमा को मुझे प्रदान करेंगे। तब लोकों के बीच मेरे सम्बन्धी के रूप में आप पूज्य होंगे। उस समय से आप दिव्य भाव से तथा प्रसन्न मन से मुझ शंकर को मित्र की भाँति देखेंगे’ — ऐसा कहकर नीललोहित भगवान् रुद्र अन्तर्धान हो गये ॥ १८१–१८७१/२ ॥ भगवान् जनार्दन ने भी देवताओं की उपस्थिति में मुनियों के साथ महान् देवता ब्रह्मा से प्रार्थना की — हे पद्मयोने ! जो मेरे द्वारा कहे गये दिव्य तथा परम सुन्दर स्तव (सहस्रनाम स्तोत्र ) – को पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजों को सुनाता है; वह प्रत्येक नाम के उच्चारण पर सुवर्ण के दान का फल प्राप्त करता है और उसे हजार अश्वमेध यज्ञ करने से होने वाला फल मिलता है। जो घृत आदि से परिपूर्ण स्थाली अथवा शुभ कलशों से इस सहस्रनाम के द्वारा भगवान् रुद्र शिव को श्रद्धापूर्वक स्नान कराता है, वह भी हजार यज्ञों का फल प्राप्त करके सुरेश्वरी के द्वारा पूजित होता है और उसके प्रति रुद्र की प्रीति होती है ॥ १८८–१९२१/२ ॥ तब ब्रह्मा ने विष्णु से कहा — ‘ऐसा ही हो।’ इसके बाद इन जगद्गुरु देवदेव [शिव] – को प्रणाम करके वे दोनों (ब्रह्मा-विष्णु) चले गये। अतः हे द्विजो! जो निष्पाप व्यक्ति [इस] हजार नामों से शिव की पूजा करता है और हजार नामों का जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है ॥ १९३-१९५ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सहस्रनामभिः पूजनाद्विष्णुचक्रलाभो नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘सहस्रनामों द्वारा पूजन से विष्णु को चक्रलाभ’ नामक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९८ ॥ [^1]: त्वरित रुद्रमन्त्र प्रयोगः [^2]: रुद्रसूक्त ( नीलसूक्त) Content is available only for registered users. 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