॥ भगवती दुर्गा ॥ एकाक्षर:- भगवती दुर्गा का एकाक्षरी बीजमंत्र “दुं” है । दां दीं दूं दें दौं दः से अङ्गन्यास करे । ॥ अथ अष्टाक्षर मंत्र प्रयोगः ॥ भगवती दुर्गा का अष्टाक्षर मंत्र प्रधान हैं ।… Read More


॥ भगवती गौरी ॥ चतुरक्षर मन्त्रः- “ह्रीं भवान्यै नमः” मंत्र के अज ऋषि, छन्द अनुष्टप, देवता गौरी हैं । बालार्काऽभां त्रिनयनां खड्गखेटवराभयान् । दोर्भिदधानां सिंहस्थां भवानीं भावयेत् सदा ॥… Read More


॥ दुर्गाभुवनवर्णनम् ॥ ॥ श्री भैरव उवाच ॥ तंत्रादौ देवि वक्ष्येऽहं दुर्गाभुवनमद्भुतम् । जयं नाम महादिव्यं बहुविस्तारविस्तृतम् । नानारत्न समाकीर्णं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ १७ ॥ इन्द्रगोपकवर्णं च चन्द्रकोटिमनोहरम् । अप्रमेयमसंख्यैयमगम्यं सर्ववादिनाम् ॥ १८ ॥… Read More


शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 49 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः उनचासवाँ अध्याय शुक्राचार्य द्वारा शिव के उदर में जपे गये मन्त्र का वर्णन, अन्धक द्वारा भगवान् शिव की नामरूपी स्तुति-प्रार्थना, भगवान् शिव द्वारा अन्धकासुर को जीवनदानपूर्वक गाणपत्य पद प्रदान करना ॥ सनत्कुमार उवाच ॥ ॐ नमस्ते देवेशाय सुरासुरनमस्कृताय भूतभव्यमहादेवाय हरितपिगललोचनाय बलाय… Read More


शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 48 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः अड़तालीसवाँ अध्याय शुक्राचार्य की अनुपस्थिति से अन्धकादि दैत्यों का दुखी होना, शिव के उदर में शुक्राचार्य द्वारा सभी लोकों तथा अन्धकासुर के युद्ध को देखना और फिर शिव के शुक्ररूप में बाहर निकलना, शिव-पार्वती का उन्हें पुत्ररूप में स्वीकार कर विदा… Read More


शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 47 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः सैंतालीसवाँ अध्याय शुक्राचार्य द्वारा युद्ध में मरे हुए दैत्यों को संजीवनी-विद्या से जीवित करना, दैत्यों का युद्ध के लिये पुनः उद्योग, नन्दीश्वर द्वारा शिव को यह वृत्तान्त बतलाना, शिव की आज्ञा से नन्दी द्वारा युद्ध स्थल से शुक्राचार्य को शिव के… Read More


शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 46 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः छियालीसवाँ अध्याय भगवान् शिव एवं अन्धकासुर का युद्ध, अन्धक की माया से उसके रक्त से अनेक अन्धकगणों की उत्पत्ति, शिव की प्रेरणा से विष्णु का कालीरूप धारणकर दानवों के रक्त का पान करना, शिव द्वारा अन्धक को अपने त्रिशूल में लटका… Read More


शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 45 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः पैंतालीसवाँ अध्याय अन्धकासुर का शिव की सेना के साथ युद्ध सनत्कुमार बोले — [हे व्यास!] तदनन्तर मदिरा पानकर नेत्रों को घुमाता हुआ मदमत्त गज के समान गतिवाला तथा श्रेष्ठ वीरों के साथ चलनेवाला वह प्रचण्ड वीर बहुत-सी सेना से युक्त हो… Read More


शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 44 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः चौवालीसवाँ अध्याय अन्धकासुर की तपस्या, ब्रह्मा द्वारा उसे अनेक वरों की प्राप्ति, त्रिलोकी को जीतकर उसका स्वेच्छाचार में प्रवृत्त होना, मन्त्रियों द्वारा पार्वती के सौन्दर्य को सुनकर मुग्ध हो शिव के पास सन्देश भेजना और शिव का उत्तर सुनकर क्रुद्ध हो… Read More


शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 43 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः तैंतालीसवाँ अध्याय हिरण्यकशिपु की तपस्या, ब्रह्मा से वरदान पाकर उसका अत्याचार, भगवान् नृसिंह द्वारा उसका वध और प्रह्लाद को राज्यप्राप्ति व्यासजी बोले — हे सर्वज्ञ ! हे सनत्कुमार ! देवताओं से द्रोह करनेवाले उस हिरण्याक्ष के मार दिये जाने पर उसके… Read More