श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -093 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -093 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ तिरानबेवाँ अध्याय हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुर का आख्यान तथा शिवानुग्रह से उसे गाणपत्यपद की प्राप्ति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रिनवतितमोऽध्यायः अन्धकगाणपत्यात्मक ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी!] अन्धक नामक दैत्यराज ने मन्दरपर्वत की सुन्दर गुफा में दमित होकर किस प्रकार महेश्वर से गाणपत्य (गणपतिपद ) प्राप्त किया; जिस प्रकार यह घटित हुआ… Read More
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -092 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -092 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ बानबेवाँ अध्याय अविमुक्तक्षेत्र वाराणसी का माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वर पूजा विधि वर्णन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे द्विनवतितमोऽध्यायः वाराणसी श्रीशैल माहात्म्य कथनं ऋषिगण बोले — हे महाबुद्धिमान् सूतजी ! यदि वाराणसी ऐसी पुण्यदायिनी है, तो अब हम लोगों को उसका प्रभाव कृपापूर्वक बताइये; हम लोगों को इस अविमुक्तक्षेत्र के उत्तम माहात्म्य को… Read More
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -091 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -091 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ इक्यानबेवाँ अध्याय आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधना में प्रणव का माहात्म्य तथा शिवोपासना निरूपण श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकनवतितमोऽध्यायः अरिष्टकथनं सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] इसके बाद मैं अरिष्टों (मृत्यु को सूचित करने वाले चिह्नों)-को बताऊँगा, जिस ज्ञानविशेष से योगी लोग मृत्यु को देखते हैं; आपलोग उन्हें जानिये ॥ १ ॥… Read More
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -090 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -090 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ नब्बेवाँ अध्याय यतियों के लिये प्रायश्चित्त निरूपण श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नवतितमोऽध्यायः यति प्रायश्चित्तं सूतजी बोले — [हे ऋषियो !] इसके बाद मैं यतियों के लिये निश्चित किये गये प्रायश्चित्त का वर्णन करूँगा; शिव के द्वारा कहा गया यह [प्रायश्चित्त] यतियों के मन, पाप का शोधन करने वाला है ॥… Read More
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -089 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -089 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ नवासीवाँ अध्याय सदाचार तथा शौचाचार का निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्म विवेचन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकोननवतितमोऽध्यायः सदाचार कथनं सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] अब मैं इसके बाद शौचाचार का लक्षण बताऊँगा, जिसे करके शुद्ध अन्तःकरण वाला [व्यक्ति] परलोक में जाकर [उत्तम ] गति प्राप्त करता है। पूर्वकाल में ब्रह्मा… Read More
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -088 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -088 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ अट्ठासीवाँ अध्याय पाशुपतयोग से प्राप्त होने वाली अष्टसिद्धियों का वर्णन तथा प्राणाग्निहोम का स्वरूप श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अष्टाशीतितमोऽध्यायः अणिमाद्यष्टसिद्धित्रिगुणसंसारप्राग्नौ होमादिवर्णनं ऋषिगण बोले — हे सूतजी ! किस योग से सज्जनों को इस लोक में मोक्ष की प्राप्ति होती है और योगिजन अणिमा आदि गुणों से युक्त होते हैं ?… Read More
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -087 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -087 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ अध्याय सत्तासीवाँ सनकादि मुनीश्वरों को शिवज्ञान का उपदेश श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्ताशीतितमोऽध्यायः मुनिमोहशमनं ऋषिगण बोले — यह सुनकर कुमार आदि उन महाबुद्धिमान् मुनियों ने भयभीत होकर प्रसन्न पिनाकधारी परमेश्वर को प्रणाम करके उनसे कहा — ‘हे महेश्वर ! यदि ऐसा है, तो आप इन देवी पार्वती के साथ अनेकविध… Read More
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -086 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -086 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ छियासीवाँ अध्याय पाशुपतयोग ज्ञान का स्वरूप तथा उसकी महिमा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षडशीतितमोऽध्यायः संसारविषकथनं ऋषिगण बोले — दग्ध पापवाले ब्राह्मणों ने विरक्त ज्ञानियों के उत्तम ध्यानयज्ञ को जप से श्रेष्ठ कहा है; अतः हे सूतजी ! अब आप विरक्त महात्माओं के ध्यानयज्ञ के विषय में पूर्णरूप से विस्तारपूर्वक पूर्णप्रयत्न… Read More
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -085 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -085 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ पचासीवाँ अध्याय पंचाक्षरी विद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः पञ्चाक्षरमाहात्म्यं सूतजी बोले — हे श्रेष्ठ द्विजो ! समस्त व्रतों में देवदेव उमापति की पूजा करके विधिपूर्वक पंचाक्षरीविद्या (मन्त्र) – का जप करना चाहिये। जप से ही विशेषकर व्रतों की पूर्णता होती है, अन्यथा नहीं; इसमें… Read More
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -084 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -084 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ चौरासीवाँ अध्याय उमामहेश्वरव्रत का वर्णन तथा पूजाविधान श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुरशीतितमोऽध्याय उमामहेश्वरव्रतं सूतजी बोले — हे श्रेष्ठ मुनियो ! अब मैं नर, नारी आदि प्राणियों के हित के लिये [ स्वयं ] शिवजी द्वारा कहे गये उमामहेश्वर व्रत को बताऊँगा । वर्षभर अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा को रात… Read More