January 30, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -088 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ अट्ठासीवाँ अध्याय पाशुपतयोग से प्राप्त होने वाली अष्टसिद्धियों का वर्णन तथा प्राणाग्निहोम का स्वरूप श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अष्टाशीतितमोऽध्यायः अणिमाद्यष्टसिद्धित्रिगुणसंसारप्राग्नौ होमादिवर्णनं ऋषिगण बोले — हे सूतजी ! किस योग से सज्जनों को इस लोक में मोक्ष की प्राप्ति होती है और योगिजन अणिमा आदि गुणों से युक्त होते हैं ? हे सूतजी ! इस समय आप विस्तारपूर्वक यह सब बतायें ॥ १ ॥ सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] अब मैं परम दुर्लभ योग का वर्णन करूँगा। सबसे पहले चित्त में सनातन शिव को स्थापित करके उनके [सद्योजात आदि] पाँच रूपों का स्मरण करना चाहिये और हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! चन्द्र-सूर्य-अग्नि से युक्त तथा छब्बीस शक्तियों से समन्वित अष्टदलकमल, उसके ऊपर षोडशदल- कमल, पुनः उसके ऊपर द्वादशदलकमलरूप आसन की भावना करनी चाहिये । तदनन्तर हे द्विजो ! उसके मध्य में देवी के साथ आठ शक्तियों सहित अष्टमूर्ति, अजन्मा, ऐश्वर्यमय भगवान् उमापति का स्मरण करना चाहिये । उन शक्तियों के साथ आठ रुद्र और आठों सिद्धियों से सम्पन्न सभी चौंसठ शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं — ऐसा क्रम से स्मरण करना चाहिये। हे विप्रो ! इस प्रकार उत्तम ज्ञान प्राप्त करके जो मोक्षसिद्धि प्रदान करने वाले पाशुपतयोग को करता है, उसे अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं; अन्यथा करोड़ों उपाय करने पर भी नहीं मिल सकतीं ॥ २-७ ॥ मुनियो ! योगियों का आठ गुणों से युक्त ऐश्वर्य कहा गया है। उन सबको क्रम से बता रहा हूँ; [आप लोग ] सुनिये । अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व तथा कामावसायिता — ये आठ सिद्धियाँ हैं। सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले उस ऐश्वर्य को भी तीन प्रकार का जानना चाहिये; सावद्य, निरवद्य तथा सूक्ष्म — ये तीन प्रकार होते हैं। उनमें जो सावद्य है, वह पंचभूतात्मक कहा गया है। इन्द्रियाँ, मन तथा जो अहंकार कहा गया है— ये निरवद्य ऐश्वर्य हैं। आत्मा में पंचभूतों की तन्मात्रारूपा सूक्ष्म प्रवृत्ति ही सूक्ष्म ऐश्वर्य है । इस प्रकार इन्द्रियाँ, मन, चित्त, बुद्धि तथा अहंकार निरवद्य ऐश्वर्य हैं; पंचभूतमय ऐश्वर्य सावद्य नाम वाला है और शब्द आदि विषयरूप ऐश्वर्य सूक्ष्म है। तीन प्रकार का यह भेद [ अणिमा आदि ] सूक्ष्म ऐश्वर्यों में प्रवृत्त होता है । पुनः आठ गुणों का भेद भी सूक्ष्म ऐश्वर्यों में होता है। तीनों लोकों के सभी प्राणियों में सर्वत्र यह अणिमादि अव्यक्त ऐश्वर्य जिस प्रकार से प्रतिष्ठित है और जैसा इसका नियम बताया गया है — भगवान् प्रभु ने इस विषय में जैसा कहा है, उसके स्वरूप को मैं बताऊँगा । जो ऐश्वर्य त्रिलोकी में सभी प्राणियों के लिये दुर्लभ बताया गया है, वह योगियों के लिये प्राप्त होने वाला अणिमारूप पहला बल होता है; इसका स्वरूप संसार में कहीं भी, कभी भी लंघन तथा प्लवन करने का होता है ॥ ८-१७ ॥ सभी प्राणियों की अपेक्षा शीघ्रत्व गुण से सम्पन्न होना लघिमा नामक दूसरी सिद्धि कही गयी है। तीनों लोकों में सभी प्राणियों में माहात्म्यबल से वन्दित तथा पूजित होना इस लोक में महिमारूप तीसरी सिद्धि कही जाती है । त्रिलोकी में सभी प्राणियों के भीतर स्वेच्छा से प्रवेश करना प्राप्ति नामक सिद्धि कही गयी है ॥ १८-१९ ॥ प्राकाम्य ऐश्वर्य से युक्त व्यक्ति तीनों लोकों में कहीं भी बाधारहित होकर विषयों का भोग करता है और सभी प्राणियों को सुख-दुःख में प्रवृत्त कर सकता है । ईशित्व ऐश्वर्य द्वारा वह योगवेत्ता यथेष्ट देहधारण के द्वारा सभी जगह स्वामी बन जाता है । वशित्व से चराचरसहित त्रिलोकी में सभी प्राणी उसके वश में हो जाते हैं। जिसके पास कामावसित्व [ ऐश्वर्य] होता है, चराचरसहित तीनों लोकों में उसके रूप इच्छा के अनुसार बन सकते हैं और नहीं भी बन सकते हैं। शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध, रूप तथा मन उसकी इच्छासे होते हैं और उसकी इच्छाके अनुसार नहीं भी होते हैं। वह कभी भी न उत्पन्न होता है, न मरता कट सकता है, न भेदा जा सकता है, न जलाया जा सकता है, न मूर्च्छित होता है, न आकर्षित होता है, न लिप्त (आसक्त) होता है, न उसका क्षय होता है, वह नष्ट नहीं होता है और न तो खिन्न होता है। वह सर्वत्र न तो कुछ करता है और न तो विकृत ही होता है । वह शब्द, स्पर्श, गन्ध, रस तथा रूप से रहित होता है। वह सदा अवर्ण, स्वररहित तथा असवर्ण होता है। वह विषयों का भोग करता है, किन्तु उनसे लिप्त नहीं होता है ॥ २०-२६ ॥ अणुभाव वाला होने के कारण जीव सूक्ष्म है और सूक्ष्म होने के कारण मुक्ति के योग्य है। मुक्त होने के कारण व्यापक है और व्यापक होने के कारण वह पुरुष कहा गया सूक्ष्म भाव होने के कारण वह पुरुष परम ऐश्वर्य में स्थित होता है। ऐश्वर्यों का गुण क्रमशः सूक्ष्म होता जाता है — ऐसा कहा गया है। अबाधित ऐश्वर्य तथा उत्तम योग प्राप्त साधक मुक्ति प्राप्त करता है; वही सूक्ष्म परम पद है ॥ २७–२९१/२ ॥ श्रेष्ठ मुनियो ! इस प्रकार पाशुपतयोग को जानना चाहिये, जो स्वर्ग तथा मोक्ष का फल प्रदान करने वाला और शिव-सायुज्य का कारण है। विज्ञानरहित व्यक्ति राग के कारण कर्म करता है और राजस अथवा तामस भोग करके वहीं पर मुक्त हो जाता है। पुण्यकर्म करनेवाला स्वर्ग में फल प्राप्त करता है; तत्पश्चात् वह श्रेष्ठ प्राणी [ पुण्य के क्षीण होने पर ] पुनः मनुष्यलोक में वापस आता है। अतः ब्रह्म ही परम सुख है और ब्रह्म ही परम शाश्वत है। ब्रह्म की ही उपासना करनी चाहिये; क्योंकि ब्रह्म ही परम आनन्दस्वरूप है ॥ 30-33१/२ ॥ यज्ञों में बहुत धन के व्यय के साथ ही परिश्रम होता है; उसके बाद भी मनुष्य को मृत्यु के वश में होना पड़ता है, अतः मोक्ष ही परम आनन्द है । विश्व नाम वाले, सभी ओर मुख – पैर-सिर – ग्रीवा वाले, विश्व के स्वामी, सभी रूपों वाले, सभी गन्धों से युक्त, सम्पूर्ण विश्व को माला तथा वस्त्र के रूप में धारण करने वाले (सर्वव्यापक) भगवान् दिव्य पुरुष का दर्शन करके ध्यानयुक्त तथा ब्रह्मतत्त्वपरायण व्यक्ति को सैकड़ों मन्वन्तरों में भी [ उसके पद से] च्युत नहीं किया जा सकता है ॥ ३४–३७ ॥ पुरुषरूप ईश्वर सूर्य की किरणों के माध्यम से पृथ्वी पर पहुँचता है और निरन्तर ही पूर्वसदृश जगत् को उत्पन्न करता है; किंतु प्रलयकाल में उत्पन्न नहीं करता। योगी उस कवि, पुरातन, सभी पर शासन करने वाले, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, महान् से भी महान् इन्द्रियों से रहित, स्वर्ण के रंग वाले, सर्वरूपमय, निर्गुण, चैतन्यस्वरूप, नित्य सर्वत्र गमन करने वाले (सर्वव्यापी) तथा सर्वसारस्वरूप पुरुष को योग से देख सकता है न कि चक्षु से । उसी ब्रह्म में लीन रहने वाले साधक उस अचल प्रकाश वाले तथा अपने तेज से प्रकाशित प्रभु को योग से देखते हैं। वह [ब्रह्म] हाथ-पैर- उदर – पार्श्व-जिह्वा से रहित है, इन्द्रियों से अतीत है, अत्यन्त सूक्ष्म है तथा अद्वितीय है। वह नेत्ररहित होता हुआ भी देखता है, कानों से रहित होता हुआ भी सुनता है और बुद्धिरहित होता हुआ भी सब कुछ जानता है। वह सबको जानता है, किंतु सबके द्वारा वेद्य नहीं है । उसे आदि महान् पुरुष कहा गया है ॥ ३८-४१ ॥ उनसे युक्त योगिजन सभी प्राणियों की प्रकृति को अचेतन, सर्वव्यापिनी, सूक्ष्म तथा प्रसवधर्मिणी (सृष्टि- उत्पादनकर्त्री) – के रूप में देखते हैं ॥ ४२ ॥ वह [ब्रह्म] सभी ओर हाथ तथा पैर वाला है। वह सभी ओर नेत्र, सिर तथा मुख वाला है। वह सभी ओर कान वाला है तथा संसार में सभी को व्याप्त करके स्थित है। योग से युक्त विद्वान् [व्यक्ति ] ईशान, सनातन तथा सभी प्राणियों के परम पुरुष उन ब्रह्म के विषय में मोहित नहीं होता है । जो व्यक्ति सभी प्राणियों की आत्मा, महात्मा, परमात्मा, अविनाशी तथा सर्वात्मा परब्रह्म का ध्यान करने वाला है, वह मोह को प्राप्त नहीं होता है ॥ ४३–४५ ॥ जिस प्रकार सभी प्राणियों के भीतर विचरण करता हुआ भी वायु अग्राह्य है, ठीक उसी तरह देह में स्थित होते. हुए भी परमात्मा सुदुर्ग्राह्य है । वह देहरूपी पुर में शयन करता है, अतः पुरुष कहा जाता है ॥ ४६ ॥ पुण्यफल के भोग के अनन्तर लुप्त धर्म वाला जीव अपने अवशिष्ट कर्मों के साथ पुनः ब्राह्मणयोनि में जन्म लेता है। स्त्री-पुरुष के संयोग होने के अनन्तर शुक्र तथा रक्त के मिलने पर गर्भ की उत्पत्ति होती है, पुन: वह कलल के रूप में हो जाता है और कुछ समय बाद वह कलल भी बुलबुला बन जाता है। जिस प्रकार मिट्टी का पिण्ड घूमते हुए चाक पर कुम्हार के हाथों से आकार प्राप्त करता है, वैसे ही यह जीव पंचमहाभूतों से युक्त होकर तथा वायु से पूरित होकर आकार प्राप्त करता है ॥ ४७-५० ॥ गर्भ में जीव सोचता है कि यदि मैं गर्भ से निकलूँगा, तो महेश्वर की शरण में जाऊँगा और उत्पन्न होने पर जबतक वैष्णव वायु अर्थात् माया मेरा स्पर्श नहीं करेगी, तबतक मैं महादेव का अर्चन करूँगा । इस प्रकार जीव अपने रूप तथा वय के अनुसार अर्थात् अपने प्रारब्ध के अनुसार मनुष्य बनता है ॥ ५१-५२ ॥ आकाश से वायु उत्पन्न होता है, वायु से जल उत्पन्न होता है, जल से प्राण होता है और प्राण से शुक्र बढ़ता है। रक्त के तैंतीस भाग तथा शुक्र के चौदह भाग मिश्रित होते हैं; उन दोनों के भाग से आधे जातीफल के सदृश देह प्राप्त करके गर्भ की वृद्धि होती है। तत्पश्चात् गर्भ से युक्त जीव पाँच वायुओं से घिर जाता है । पिता के शरीर से इसके अंग- प्रत्यंग तथा रूप का विकास होता है और माता के आहार से नाभिदेश से पीये गये तथा चूसे गये रस आदि के प्रवेश से जीव का पोषण होता है । वे प्राण (वायु) देहधारियों के आधार हैं ॥ ५३-५६ ॥ नौ महीने तक शिशु बहुत कष्ट में रहता है, उसकी गर्दन नाभिनाल से लिपटी रहती है, उसका सम्पूर्ण शरीर संकुचित रहता है, वह गर्भ में अपर्याप्त (सीमित) स्थान में पड़ा रहता है। नौ महीने तक गर्भ में रहने के बाद वह शिशु नीचे की ओर मुख किये हुए योनिमार्ग से बाहर निकलता है। इसके पश्चात् अपने पापमय कर्मों के कारण नरक में गिरता है; असिपत्रवन तथा शाल्म- लिछेदन नामक नरक में उसका ताड़न तथा भक्षण किया जाता है और उसे पीव तथा रक्त का भक्षण करना पड़ता है। जैसे गर्म किये जाने पर जल श्लेष्मायुक्त (बुलबुला- युक्त) हो जाता है, वैसे ही जीव यातनास्थान को प्राप्त करके छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। इस प्रकार जीव अपने द्वारा किये गये उन पापों से तप्त होते हैं; वे अपने अवशिष्ट कर्मों के अनुसार दुःख या सुख प्राप्त करते हैं ॥ ५७–६१ ॥ सभीलोगों को छोड़कर जीव को अकेला ही जाना पड़ता है और अकेला ही भोगना पड़ता है; अतः उत्तम आचरण करना चाहिये। [मृत्यु के पश्चात् ] प्रस्थान करने वाले इस जीव के पीछे-पीछे कोई भी नहीं जाता है; इस जीव के द्वारा जो कर्म किया गया होता है, वही इसके साथ जाता ॥ ६२-६३ ॥ वे जीव [यमलोक में] निरन्तर अनिष्ट दण्डों के द्वारा कराहते हुए नित्य यमविषयों में प्रवृत्त रहते हैं; अनेक प्रकार की बड़ी-बड़ी अनन्त यातनाओं के द्वारा वेदनाओं से घिरे हुए शरीर वाले वे जीव शोकसन्तप्त रहते हैं ॥ ६४ ॥ व्यक्ति मन, वाणी तथा कर्म द्वारा बार-बार जो भी आचरण करता है, वही अभ्यास बनकर इसे उधर ही ले जाता है, अतः [सर्वदा] शुभाचरण करना चाहिये । जीवात्मा का पूर्वकर्म में अनादि दृढ़बन्धन है, उसी से जीव घोर तामसिक षड्विध संसार को प्राप्त होता है । जीव मनुष्ययोनि से पशुभाव को प्राप्त होता है और पशुभाव से वह मृग होता है, पुनः वह मृगजन्म से पक्षी का जन्म और पक्षी से सरीसृप ( रेंगने वाला जन्तु) होता है, इसके बाद वह सरीसृप से स्थावरत्व को प्राप्त होता है; इसमें सन्देह नहीं है। पुनः स्थावररूप प्राप्त होने पर जबतक जीव पुनः मनुष्ययोनि नहीं प्राप्त कर लेता, तबतक कुम्हार के चाक की भाँति वह एक ही स्थान पर चक्कर लगाता रहता है। इस प्रकार मनुष्ययोनि से प्रारम्भ होकर स्थावरयोनि तक के इस संसार को तामस जानना चाहिये। ब्रह्मा से प्रारम्भ करके पिशाच तक के संसार को सात्त्विक कहा गया है; इसे देहधारियों के लिये स्वर्गस्थान में जानना चाहिये। ब्राह्म जीवन में केवल सत्त्व, स्थावर में केवल तम और चौदह स्थानों के मध्य में वेदना से व्याकुल प्राणी के मर्मस्थानों का वेध करने वाला रज विद्यमान है। ऐसी स्थिति में विप्र उस परम ब्रह्म को कैसे याद कर सकेगा। पूर्व धर्म की भावनाओं से प्रेरित होकर यह संसार सदा मनुष्य- योनि से युक्त रहता है; अतः ध्यान [ अवश्य ] करना चाहिये ॥ ६५-७३१/२ ॥ इस संसारमण्डल को चौदह भुवनस्वरूप जानकर संसार भय से पीड़ित प्राणी को सदा धर्म का आचरण करना चाहिये; तब वह क्रम से परिवर्तित होकर इस संसार को पार कर लेता है। अतएव निरन्तर ध्यानमग्न होकर योगी को योग का आचरण करना चाहिये, जिससे वह आत्म-साक्षात्कार कर ले ॥ ७४-७६ ॥ सभी जीवों में सम्भेद तथा पार्थक्य होने पर भी ये [शिव] परम ज्योति (सर्वात्मस्वरूप ) हैं, ये ही संसारसागर के जलस्वरूप हैं और ये ही उत्तम तथा शाश्वत सेतु भी हैं । अतः सभी प्राणियों के हृदय में स्थित इन आत्मस्वरूप, सेतुस्वरूप तथा सभी ओर मुख वाले अग्निस्वरूप महेश्वर की उपासना करनी चाहिये। अपनी शक्ति के साथ अन्तःकरण में स्थित, [ पृथ्वी आदि] आठ प्रकार से, [भव आदि] आठ रूपों में तथा वामदेव आदि आठ विग्रहों के रूप में विद्यमान रहने वाले और सृष्टि के लिये अग्नि को संक्षिप्त करके हृदय में विराजमान देवदेवेश लोकनायक भगवान् रुद्र का ध्यान करके उनके चित्त में मन को लगाकर हृदय में स्थित वैश्वानर को भली-भाँति क्रमशः पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। शान्तचित्त होकर बैठ करके एक बार पवित्र जल से आचमन करके आहुति देनी चाहिये। ‘प्राणाय स्वाहा’ पहली आहुति कही गयी है। दूसरी आहुति ‘अपानाय स्वाहा’, तीसरी ‘व्यानाय स्वाहा’, चौथी ‘उदानाय स्वाहा’ और पाँचवीं आहुति ‘समानाय स्वाहा’ है । इस प्रकार स्वाहाकार के द्वारा पृथक् पृथक् आहुति देकर शेषान्न को यथेष्ट ग्रहण करना चाहिये, तत्पश्चात् एक बार जल से प्राशन तथा पुनः आचमन करके हृदय का स्पर्श करना चाहिये ॥ ७७–८४ ॥ आप रुद्र ही प्राणों की ग्रन्थि हैं, रुद्र ही आत्मा हैं, अहंकार-देवतारूप आप ही दुःख का नाश करने वाले हैं और रुद्र ही जीव के प्राण हैं- इस प्रकार [कहकर ] स्वयं को तृप्त करना चाहिये । रुद्र प्राण में निविष्ट हैं, अतः रुद्र स्वयं प्राणस्वरूप हैं । प्राण को तथा रुद्र को उत्तम अमृत समर्पित करना चाहिये; हे शिव ! हे ईश ! आप मुझमें प्रवेश करें, साक्षात् ब्रह्मात्मा को स्वाहा – इस प्रकार श्राद्ध के अवसर पर शास्त्रानुसार पाँच आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये ॥ ८५-८७ ॥ आप पुरुष हैं; आप शरीर में अँगूठे के परिमाण में विराजमान हैं। अँगूठे के बराबर होते हुए भी आप ईश्वर परम कारणस्वरूप हैं। सम्पूर्ण जगत् के स्वामी तथा सनातन प्रभु प्रसन्न हों। आप देवताओं में ज्येष्ठ हैं, आप रुद्र हैं, आप प्रथम इन्द्र थे, आप हमारे लिये कल्याणकारी हों और [ हमारे द्वारा ] ग्रहण किया गया यह अन्न आपके लिये आहुतिस्वरूप हो ॥ ८८-८९२ ॥ [ हे ऋषियो ! ] इस प्रकार मैंने विशेषरूप से अणिमादि-गुणप्राप्ति-सम्बन्धी सब कुछ कह दिया । पूर्वकाल में स्वयं ब्रह्मा ने इस योगविद्या को कहा था । इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक पाशुपतविद्या का ज्ञान करना चाहिये, नित्य भस्म – स्नान करना चाहिये और सदा भस्म लगाना चाहिये। जो [व्यक्ति] देवपूजन या पितृकर्म ( श्राद्ध) – के अवसर पर इसे पढ़ता है या सुनता है या श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सुनाता है, वह परमगति प्राप्त करता है ॥ ९०-९३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘अणिमा आदि आठ सिद्धि-त्रिगुणसंसारप्राणाग्नि में ‘होमादि का वर्णन’ नामक अट्ठासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८८ ॥ Content is available only for registered users. 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