श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय उनतीसवाँ अध्याय पुरञ्जनोपाख्यान का तात्पर्य राजा प्राचीनबर्हि ने कहा — भगवन् ! मेरो समझ में आपके वचनों का अभिप्राय पूरा-पूरा नहीं आ रहा है । विवेकी पुरुष ही इनका तात्पर्य समझ सकते हैं, हम कर्ममोहित जीव नहीं ॥… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अठ्ठाईसवाँ अध्याय पुरंजन को स्त्री योनि की प्राप्ति और अविज्ञात के उपदेश से उसका मुक्त होना श्रीनारदजी कहते हैं — राजन् ! फिर भय नामक यवनराज के आज्ञाकारी सैनिक प्रज्वार और कालकन्या के साथ इस पृथ्वीतल पर सर्वत्र… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २७ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सत्ताईसवाँ अध्याय पुरञ्जनपुरी पर चण्डवेग की चढ़ाई तथा कालकन्या का चरित्र श्रीनारदजी कहते हैं — महाराज ! इस प्रकार वह सुन्दरी अनेकों नखरों से पुरञ्जन को पूरी तरह अपने वश में कर उसे आनन्दित करती हुई विहार करने… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय छब्बीसवाँ अध्याय राजा पुरञ्जन का शिकार खेलने वन में जाना और रानी का कुपित होना श्रीनारदजी कहते हैं — राजन् ! एक दिन राजा पुरञ्जन अपना विशाल धनुष, सोने का कवच और अक्षय तरकस धारणकर अपने ग्यारहवें सेनापति… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पचीसवाँ अध्याय पुरञ्जनोपाख्यान का प्रारम्भ श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! इस प्रकार भगवान् शङ्कर ने प्रचेताओं को उपदेश दिया । फिर प्रचेताओं ने शङ्करजी की बड़े भक्तिभाव से पूजा की । इसके पश्चात् वे उन राजकुमारों के… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौबीसवाँ अध्याय पृथु की वंशपरम्परा और प्रचेताओं को भगवान् रुद्र का उपदेश श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुजी ! महाराज पृथु के बाद उनके पुत्र परम यशस्वी विजिताश्व राजा हुए । उनका अपने छोटे भाइयों पर बड़ा स्नेह था,… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तेईसवाँ अध्याय राजा पृथु की तपस्या और परलोकगमन श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — इस प्रकार महामनस्वी प्रजापति पृथु ने स्वयमेव अन्नादि तथा पुर-ग्रामादि सर्ग की व्यवस्था करके स्थावर-जङ्गम सभी की आजीविका का सुभीता कर दिया तथा साधुजनोचित धर्मों का… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २२ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बाईसवाँ अध्याय महाराज पृथु को सनकादि का उपदेश श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — जिस समय प्रजाजन परमपराक्रमी पृथ्वीपाल पृथु की इस प्रकार प्रार्थना कर रहे थे, उसी समय वहाँ सूर्य के समान तेजस्वी चार मुनीश्वर आये ॥ १ ॥… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २१ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इक्कीसवाँ अध्याय महाराज पृथु का अपनी प्रजा को उपदेश श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! उस समय महाराज पृथु का नगर सर्वत्र मोतियों की लड़ियों, फूलों की मालाओं, रंग-बिरंगे वस्त्रों, सोने के दरवाजों और अत्यन्त सुगन्धित धूपों से… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २० ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बीसवाँ अध्याय महाराज पृथु की यज्ञशाला में श्रीविष्णु भगवान् का प्रादुर्भाव श्रीमैत्रेयजी कहते हैं —विदुरजी ! महाराज पृथु के निन्यानवे यज्ञों से यज्ञभोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् विष्णु को भी बड़ा सन्तोष हुआ । उन्होने इन्द्र के सहित वहाँ उपस्थित… Read More