श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १८ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अठारहवाँ अध्याय भिन्न-भिन्न वर्षों का वर्णन श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! भद्राश्ववर्ष में धर्मपुत्र भद्रश्रवा और उनके मुख्य-मुख्य सेवक भगवान् वासुदेव की हयग्रीवसंज्ञक धर्ममयी प्रिय मूर्ति को अत्यन्त समाधिनिष्ठा के द्वारा हृदय में स्थापित कर इस मन्त्र… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १७ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १७ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सत्रहवाँ अध्याय गङ्गाजी का विवरण और भगवान् शङ्करकृत संकर्षणदेव की स्तुति श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! जब राजा बलि की यज्ञशाला में साक्षात् यज्ञमूर्ति भगवान् विष्णु ने त्रिलोकी को नापने के लिये अपना पैर फैलाया, तब उनके… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १६ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सोलहवाँ अध्याय भुवनकोश का वर्णन राजा परीक्षित् ने कहा — मुनिवर ! जहाँ तक सूर्य का प्रकाश है और जहाँ तक तारागण के सहित चन्द्रदेव दीख पड़ते हैं, वहाँ तक आपने भूमण्डल का विस्तार बतलाया है ॥ १… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १५ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पंद्रहवाँ अध्याय भरत के वंश का वर्णन श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! भरतजी का पुत्र सुमति था, यह पहले कहा जा चुका है । उसने ऋषभदेवजी के मार्ग का अनुसरण किया । इसीलिये कलियुग में बहुत-से पाखण्डी… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १४ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौदहवाँ अध्याय भवाटवी का स्पष्टीकरण श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! देहाभिमानी जीवों के द्वारा सत्त्वादि गुणों के भेद से शुभ, अशुभ और मिश्र–तीन प्रकार के कर्म होते रहते हैं । उन कर्मों के द्वारा ही निर्मित नाना… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १३ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तेरहवाँ अध्याय भवाटवी का वर्णन और रहूगण का संशयनाश जडभरत ने कहा — राजन् ! यह जीवसमूह सुखरूप धन में आसक्त देश-देशान्तर में घूम-फिरकर व्यापार करनेवाले व्यापारियों के दल के समान हैं । इसे माया ने दुस्तर प्रवृत्तिमार्ग… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १२ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १२ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बारहवाँ अध्याय रहूगणका प्रश्न और भरतजीका समाधान राजा रहूगण ने कहा — भगवन् ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आपने जगत् का उद्धार करने के लिये ही यह देह धारण की है । योगेश्वर ! अपने परमानन्दमय… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय ११ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय ११ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ग्यारहवाँ अध्याय राजा रहूगण को भरतजी का उपदेश जड़भरत ने कहा — राजन् ! तुम अज्ञानी होने पर भी पण्डितों के समान ऊपर-ऊपर की तर्क-वितर्कयुक्त बात कह रहे हो । इसलिये श्रेष्ठ ज्ञानियों में तुम्हारी गणना नहीं हो… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १० श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १० ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दसवाँ अध्याय जड़भरत और राजा रहूगण की भेंट श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! एक बार सिन्धुसौवीर देश का स्वामी राजा रहूगण पालकी पर चढ़कर जा रहा था । जब वह इक्षुमती नदी के किनारे पहुँचा तब उसकी… Read More
श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय ९ श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय ९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नवाँ अध्याय भरतजी का ब्राह्मणकुल में जन्म श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! आङ्गिरस गोत्र में शम, दम, तप, स्वाध्याय, वेदाध्ययन, त्याग (अतिथि आदि को अन्न देना), सन्तोष, तितिक्षा, विनय, विद्या (कर्मविद्या), अनसूया (दूसरों के गुणों में दोष… Read More