॥ अथ चौरगणपति मंत्र प्रयोगः ॥ ‘भूत शुद्धि’ के बाद “चौरमन्त्रन्यास” करना चाहिए, क्योंकि ‘वर्णविलास तन्त्र’ में कहा है कि — चौरमन्त्रं महामन्त्रं, पञ्चाशत्गणतोषणं । चौरमन्त्रं विना भद्रे ! शान्तिस्वस्त्ययनं कुतः ॥ चौर गणपति की साधना करने वाला स्वयं के जपफल की तो रक्षा करता ही है दूसरों की सिद्धि को भी हरण कर सकता… Read More


॥ वक्रतुण्डगणेश विधानम् ॥ विनियोगः- ॐ अस्य श्रीवक्रतुण्डगणेश मंत्रस्य भार्गव ऋषिः, अनुष्टप् छन्दः, विघ्नेशो देवता, वं बीजं, यं शक्तिरात्मनोऽभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यासः – ॐ भार्गव ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टप् छन्दसे नमः मुखे, विघ्नेश देवता नमः हृदि, वं बीजाय नमः, गुह्ये यं शक्त्यै नमः नाभौ विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे । करन्यासः- ॐ वं नमः अंगुष्ठाभ्यां नमः… Read More


हनुमान-शाबर-मन्त्र ‘कल्याण’ के हनुमान अङ्क’ से उद्धृत १. सिर – पीड़ाः— पीड़ित व्यक्ति को दक्षिणाभिमुख – मुख बैठा कर उसके सिर को अपने हाथ से पकड़े । फिर निम्न ‘शाबर मन्त्र’ का उच्चारण करते हुए झाड़े — मन्त्रः— “लङ्का में बैठ के माथ हिलावे हनुमन्त । सो देखि के राक्षस-गण पाय दुरन्त ॥ बैठी सीता… Read More


॥ पाण्डवकृत कात्यायनी स्तुति ॥ शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिये नित्य पाठ करें – ततो धर्मसुतो राजा गुरून्युद्धे व्यवस्थितान् । भीष्मद्रोणमुखान्सर्वान्प्रणिपत्य पृथक् पृथक् । युद्धाय तैरनुज्ञात स्वरथ पुनरागमत् ॥ १ ॥ ततस्ते पाण्डवा सर्वे अवप्लुत्य रथोत्तमात् । संग्रामे जयलाभाय तुष्टुवुर्जगदम्विकाम् ॥ २ ॥ ॥ पाण्डवा ऊचु ॥… Read More


॥ अथ श्रीराधिका सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥ इस सहस्रनाम स्तोत्र में पूर्णाभिषेक दीक्षा से मन्त्र व कर्म के ज्ञान हेतु कहा गया है । ॥ ईश्वरोवाच ॥ इति ते कथितं देवि किमन्यत् कथयामि ते । श्रोत्री त्वं परमेशानि अहं वक्ता च शाश्वतः ॥ ॥ देव्युवाच ॥ कियदन्यन्महादेव पृच्छामि यदिहोच्यते । हृदये तव देवेश नानातन्त्राणि सन्ति वै… Read More


॥ श्रीराधिकासहस्रनामस्तोत्रम् ॥ ॥ श्रीपार्वत्युवाच ॥ देवदेव जगन्नाथ भक्तानुग्रहकारक । यद्यस्ति मयि कारुण्यं मयि यद्यस्ति ते दया ॥ १ ॥ यद्यत् त्वया निगदितं तत्सर्वं मे श्रुतं प्रभो । गुह्याद् गुह्यतरं यत्तु यत्ते मनसि काशते ॥ २ ॥ त्वया न गदितं यत्तु यस्मै कस्मै कदचन । तस्मात् कथय देवेश सहस्रं नाम चोत्तमम् ॥ ३ ॥ श्रीराधाया… Read More


॥ श्रीराधा अष्टादशशतीनाम स्तोत्र ॥ राधा ने वृन्दा से कहा कि तुम मेरे जन्म एवं समागम के बारे में कुछ नहीं जानती और न ही तुम मेरे नाम प्रभाव को जानती हो । वृन्दा ने जब उनके नाम प्रभाव को जानना चाहा तो राधा ने अपने १८०० नाम बताये । श्रीराधा के ये १८०० नाम… Read More


॥ अथ भुवनेश्वरीकृत राधास्तुतिः॥ राधा ने भुवनेश्वरी को स्मरण कर वृन्दावन को गोलोकमय बनाने को कहा तब भुवनेश्वरी ने राधा की महिमा वर्णन करते हुए प्रशंसापूर्वक कहा कि राधा आप त्रिभुवन की स्वयं लक्ष्मी हो । उसका यथा वर्णन — ॥ ब्राह्मणी उवाच ॥ ततः किमभवत् पश्चाद् देवगन्धर्व कथ्यताम् । पुनीहि मे श्रुतिपुटौ नानादोषकुलाकुलौ ॥… Read More


॥ त्रिपुरसुन्दर्यादूती वशिनीकृत राधा स्तुतिः ॥ राधा ने त्रिपुर सुन्दरी की उपासना की कि हे मां मेरी सहायता करो तथा त्रिपुरसुन्दरी ने अपनी वशिन्यादि दूतियों को सहायता करने को कहा तब वशिन्यादि ने राधा की प्रशंसा व स्तुति की । यथा — जय जय राधे कृतनतराधे जगदभिवन्द्ये सुरवरवन्द्ये । धृतबहुरूपे स्मरमखरूपे सरसिजवक्त्रे सुमदिरनेत्रे ॥ जय… Read More


॥ अथ श्रीराधा कृपाकटाक्ष स्तोत्र ॥ मुनीन्द्र-वृन्द-वन्दिते त्रिलोक-शोकहारिणि, प्रसन्न-वक्त्र-पङ्कजे निकुञ्ज-भूविलासिनि । व्रजेन्द्र-भानुनन्दनि व्रजेन्द्र सूनुसङ्गते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम् ॥ १ ॥ अशोक-वृक्ष-वल्लरी-वितान-मण्डप-स्थिते, प्रवाल-बाल)-पल्लव-प्रभारुणाङ्घ्रिकोमले । वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम् ॥ २ ॥… Read More