श्रीमद्देवीभागवत की पाठविधि देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम् । त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती ॥ श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि । श्लोकार्थं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम् ॥ श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणों में अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकों की जननी साक्षात् सनातनी भगवती की महिमा गायी गयी है। जो श्रीमद्देवीभागवत के आधे श्लोक या चौथाई… Read More


दुर्गासहस्रनाम स्तोत्रम् / नामावली ॥ श्रीः ॥ ॥ श्री दुर्गायै नमः ॥ ॥ अथ श्री दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम् ॥ ॥ नारद उवाच ॥ कुमार गुणगम्भीर देवसेनापते प्रभो । सर्वाभीष्टप्रदं पुंसां सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १॥ गुह्याद्गुह्यतरं स्तोत्रं भक्तिवर्धकमञ्जसा । मङ्गलं ग्रहपीडादिशान्तिदं वक्तुमर्हसि ॥ २॥ ॥ स्कन्द उवाच ॥ शृणु नारद देवर्षे लोकानुग्रहकाम्यया । यत्पृच्छसि परं पुण्यं तत्ते वक्ष्यामि कौतुकात्… Read More


शिवसंकल्पसूक्त (कल्याणसूक्त ) मनुष्य शरीर में प्रत्येक इन्द्रिय का अपना विशिष्ट महत्त्व है, परंतु मन का महत्त्व सर्वोपरि है; क्योंकि मन सभी को नियन्त्रित करने वाला, विलक्षण शक्तिसम्पन्न तथा सर्वाधिक प्रभावशाली है। इसकी गति सर्वत्र है, सभी कर्मेन्द्रियाँ – ज्ञानेन्द्रियाँ, सुख-दुःख मन के ही अधीन हैं। स्पष्ट है कि व्यक्ति का अभ्युदय मन के शुभ… Read More


श्रद्धासूक्त ऋग्वेद के दशम मण्डल के १५१वें सूक्त को ‘श्रद्धासूक्त’ कहते हैं। इसकी ऋषि का श्रद्धा कामायनी, देवता श्रद्धा तथा छन्द अनुष्टुप् है । प्रस्तुत सूक्त में श्रद्धा की महिमा वर्णित है। अग्नि, इन्द्र, वरुण-जैसे बड़े देवताओं तथा अन्य छोटे देवों में भेद नहीं है – यह इस सूक्त में बतलाया गया है। सभी यज्ञ-कर्म,… Read More


सौमनस्यसूक्त [ संज्ञानसूक्त ( क ) ] ऋग्वेद १० वें मण्डल का यह १९१ वाँ सूक्त ऋग्वेद का अन्तिम सूक्त है। इस सूक्त के ऋषि आङ्गिरस, पहले मन्त्र के देवता अग्नि तथा शेष तीनों मन्त्रों के संज्ञान देवता हैं। पहले, दूसरे तथा चौथे मन्त्रों का छन्द अनुष्टुप् तथा तीसरे मन्त्र का छन्द त्रिष्टुप् है। प्रस्तुत… Read More


विवाहसूक्त [ सोमसूर्यासूक्त ] ऋग्वेद के दशम मण्डल का ८५ वाँ सूक्त विवाहसूक्त कहलाता है। यह सोमसूर्यासूक्त भी कहलाता है। यह सूक्त बड़ा है और इसमें ४७ ऋचाएँ पठित हैं। इन ऋचाओं की द्रष्टा ऋषि का सावित्री सूर्या हैं। इस सूक्त में सूर्य, चन्द्र आदि देवों की भी स्तुतियाँ हैं । विवाहादि संस्कारों में इसके… Read More


अभयप्राप्तिसूक्त जीवन में सर्वाधिक प्रिय वस्तु अपने प्राण ही होते हैं और सबसे बड़ा भय भी प्राणों से रहित होने का-मृत्यु का ही होता है। इसी दृष्टि से मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने सब प्रकार से भयमुक्त रहने के लिये प्राणों की प्रार्थना की है और कहा है-जिस प्रकार द्यौ, पृथिवी, अन्तरिक्ष, सूर्य, चन्द्रमा आदि सभी भयमुक्त… Read More


हिरण्यगर्भसूक्त हिरण्य को अग्नि का रेत कहते हैं। हिरण्यगर्भ अर्थात् सुवर्णगर्भ सृष्टि के आदि में स्वयं प्रकट होने वाला बृहदाकार- अण्डाकार तत्त्व है। यह सृष्टि का आदि अग्नि तत्त्व माना गया है। महासलिल में प्रकट हुए हिरण्यगर्भ की तीन गतियाँ बतायी गयी हैं- १- आपः (सलिल) में ऊर्मियों के उत्पन्न होने से समेषण हुआ। २-आगे… Read More


नासदीयसूक्त ऋग्वेद के १०वें मण्डल के १२९वें सूक्त के १ से ७ तक के मन्त्र ‘नासदीयसूक्त’ के नाम से सुविदित हैं। इस सूक्त के द्रष्टा ऋषि प्रजापति परमेष्ठी, देवता भाववृत्त तथा छन्द त्रिष्टुप् है। इस सूक्त में ऋषि ने बताया है कि सृष्टि का निर्माण कब, कहाँ और किससे हुआ। यह बड़ा ही रहस्यपूर्ण और… Read More


ऋतसूक्त ऋग्वेद के १० वें मण्डल का १९० वाँ सूक्त ‘ऋतसूक्त’ है। यह अघमर्षणसूक्त भी कहलाता है। इसके ऋषि माधुच्छन्द अघमर्षण, देवता भाववृत्त तथा छन्द अनुष्टुप् है। यह सूक्त सृष्टि विषयक है। ऋषि ने परमपिता परमेश्वर की स्तुति करते हुए कहा है कि महान तप से सर्वप्रथम ऋत और सत्य प्रकट हुए। परम ब्रह्म की… Read More