पृथ्वीसूक्त अथर्ववेद के बारहवें काण्ड के प्रथम सूक्त का नाम पृथ्वीसूक्त है। इसके द्रष्टा ऋषि अथर्वा हैं। इस सूक्त में कुल ६३ मन्त्र हैं। इन मन्त्रों में मातृभूमि के प्रति अपनी प्रगाढ़ भक्ति का परिचय ऋषि ने दिया है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक जडतत्त्व चेतन से अधिष्ठित है। चेतन ही उसका नियन्ता और संचालक… Read More


यमसूक्त ऋग्वेद के दशम मण्डल का चौदहवाँ सूक्त ‘यमसूक्त’ है। इसके ऋषि वैवस्वत यम हैं। ‘यमसूक्त’ तीन भागों में विभक्त है। ऋचा १ से ६ तक के पहले भाग में यम एवं उनके सहयोगियों की सराहना की गयी है और यज्ञ में उपस्थित होने के लिये उनका आवाहन किया गया है। ऋचा ७ से १२… Read More


गोसूक्त अथर्ववेद के चौथे काण्डके २१वें सूक्तको ‘गोसूक्त’ कहते हैं। इस सूक्त के ऋषि ब्रह्मा तथा देवता गौ हैं। इस सूक्तमें गौओंकी अभ्यर्थना की गयी है। गायें हमारी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नतिका प्रधान साधन हैं। इनसे हमारी भौतिक पक्षसे कहीं अधिक आस्तिकता जुड़ी हुई है। वेदोंमें गायका महत्त्व अतुलनीय है। यह ‘गोसूक्त” अत्यन्त सुन्दर काव्य… Read More


गोष्ठसूक्त अथर्ववेद के तीसरे काण्ड के १४वें सूक्त में गौओं को गोष्ठ (गोशाला) -में आकर सुखपूर्वक दीर्घकाल तक अपनी बहुत-सी संतति के साथ रहने की प्रार्थना की गयी है। इस सूक्त के ऋषि ब्रह्मा तथा प्रधान देवता गोष्ठदेवता हैं। गौओं के लिये उत्तम गोशाला, दाना-पानी एवं चारा का प्रबन्ध करना चाहिये। गौओं को प्रेमपूर्वक रखना… Read More


उषासूक्त ऋग्वेद प्रथम मण्डल का ११३वाँ सूक्त उषासूक्त कहलाता है। इस सूक्त में २० मन्त्र हैं, जिनमें कालाभिमानी उषाकाल का उषादेवता के रूप में निरूपण कर कुत्स आंगिरस ऋषि ने उनकी सुन्दर स्तुति और महिमा का चित्रण किया है। त्रिष्टुप् छन्दमयी इस स्तुति में उषा को एक श्रेष्ठ ज्योति के रूप में स्थिर किया गया… Read More


इन्द्रसूक्त / अप्रतिरथसूक्त इस सूक्त के ऋषि अप्रतिरथ, देवता इन्द्र तथा आर्षी त्रिष्टुप् छन्द है। इसकी ‘अप्रतिरथसूक्त’ के नाम से भी प्रसिद्धि है। इन्द्र वेद के प्रमुख देवता हैं। इन्द्र के विषय में अन्य देवताओं की अपेक्षा अधिक कथाएँ प्रचलित हैं। इनका समस्त स्वरूप स्वर्णिम तथा अरुण है। ये सर्वाधिक सुन्दर रूपों को धारण करते… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखण्ड-अध्याय 133 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ (उत्तरार्द्ध) एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पुराणों के लक्षण और उनकी श्लोक संख्या का निरूपण, ब्रह्मवैवर्तपुराण के पठन-श्रवण के माहात्म्य का वर्णन करके सूतजी का सिद्धाश्रम को प्रयाण शौनकजी ने कहा — वत्स ! ब्रह्मवैवर्त-पुराण में जिस फल का निरूपण हुआ है, वह निर्विघ्नतापूर्वक… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखण्ड-अध्याय 132 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ (उत्तरार्द्ध) एक सौ बतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण कथा का संक्षेप तथा अनुक्रमणिका शौनक बोले — हे धर्मेश ! मैंने सब कुछ सुन लिया। कुछ अवशिष्ट नहीं है । हे महाभाग ! मुझ ब्राह्मण से पुनः पुराण का कथन करें । जन्म से ही मैंने… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखण्ड-अध्याय 131 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ (उत्तरार्द्ध) एक सौ इकतीसवाँ अध्याय अग्नि तथा स्वर्ण की उत्पत्ति का प्रसङ्ग शौनक बोले — मैंने परम अद्भुत, अति गोपनीय, अत्यन्त रम्य एवं परम नवीन यह अपूर्व उपाख्यान सुना । पुराणों में क्या ही अनिर्वचनीय, कमनीय एवं मनोहर, प्राचीन तथा अति दुर्लभ कथा… Read More


ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखण्ड-अध्याय 130 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ (उत्तरार्द्ध) एक सौ तीसवाँ अध्याय नारायण के आदेश से नारद का विवाह के लिये उद्यत हो ब्रह्मलोक में जाना, ब्रह्मा का दल-बल के साथ राजा संजय के पास आना, संजय-कन्या और नारद का विवाह, सनत्कुमार द्वारा नारद को श्रीकृष्ण-मन्त्रोपदेश, महादेवजी का उन्हें श्रीकृष्ण… Read More