अग्निपुराण – अध्याय 329 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनतीसवाँ अध्याय गायत्री आदि छन्दों का वर्णन छन्दःसारः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ (गायत्री छन्द के आठ भेद हैं — आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी, साम्नी, आर्ची तथा ब्राह्मी) ‘छन्द’ शब्द अधिकार में प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् इस… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 328 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय छन्दों के गण और गुरु-लघु की व्यवस्था छन्दःसारः अग्नि कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं वेद के मूलमन्त्रों के अनुसार पिङ्गलोक्त छन्दों का क्रमशः वर्णन करूँगा। मगण, नगण, भगण, यगण, जगण, रगण, सगण और तगण… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 327 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय विभिन्न कर्मों में उपयुक्त माला, अनेकानेक मन्त्र, लिङ्ग-पूजा तथा देवालय की महत्ता का विचार देवालयमाहात्म्यम् महादेवजी कहते हैं — कार्तिकेय ! व्रतेश्वर और सत्य आदि देवताओं का पूजन करके उनको व्रत का समर्पण करना चाहिये। अरिष्ट… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 326 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय गौरी आदि देवियों तथा मृत्युञ्जय की पूजा का विधान गौर्य्यादिपूजा महादेवजी कहते हैं — स्कन्द! अब मैं सौभाग्य आदि के निमित्त उमा की पूजा का विधान बताऊँगा। उनके मन्त्र, ध्यान, आवरणमण्डल, मुद्रा तथा होमविधि का भी… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 325 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पचीसवाँ अध्याय रुद्राक्ष-धारण, मन्त्रों की सिद्धादि संज्ञा तथा अंश आदि का विचार अंशकादिः महादेवजी कहते हैं — स्कन्द! शैव साधक को रुद्राक्ष का कड़ा धारण करना चाहिये। रुद्राक्षों की संख्या विषम हो। उसका प्रत्येक मनका सब ओर से… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 324 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौबीसवाँ अध्याय कल्पाघोर रुद्रशान्ति रुद्रशान्तिः महादेवजी कहते हैं — अब मैं ‘कल्पाघोर-शिवशान्ति ‘ का वर्णन करता हूँ। भगवान् अघोर शिव सात करोड़ गणों के अधिपति हैं तथा ब्रह्महत्या आदि पापों को नष्ट करने वाले हैं। उत्तम और अधम-सभी… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 323 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तेईसवाँ अध्याय गङ्गा-मन्त्र, शिवमन्त्रराज, चण्डकपालिनी-मन्त्र, क्षेत्रपाल-बीजमन्त्र, सिद्धविद्या, महामृत्युंजय, मृतसंजीवनी, ईशानादि मन्त्र तथा इनके छः अङ्ग एवं अघोरास्त्र का कथन षडङ्गान्यघोरास्त्राणि महादेवजी कहते हैं — स्कन्द ! ‘ॐ ह्रूं हं सः‘ इस मन्त्र से मृत्युरोग आदि शान्त हो जाते… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 322 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बाईसवाँ अध्याय पाशुपतास्त्र-मन्त्रद्वारा शान्ति का कथन पाशुपतशान्तिः महादेवजी कहते हैं — स्कन्द ! अब में पाशुपतास्त्र-मन्त्र से शान्ति तथा पूजा आदि की बात बताऊँगा। शान्ति और जप आदि पूर्ववत् (पूर्व अध्याय में कहे अनुसार) कर्तव्य हैं। इस मन्त्र… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 321 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ इक्कीसवाँ अध्याय अघोरास्त्र आदि शान्ति-विधान का कथन अघोरास्त्रादिशान्तिकल्पः महादेवजी कहते हैं — स्कन्द ! पहले समस्त कर्मों में ‘अस्त्रयाग’ करना चाहिये। यह सिद्धि प्रदान करने वाला है। मध्यभाग में शिव, विष्णु आदि के अस्त्र की पूजा करनी चाहिये… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 320 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बीसवाँ अध्याय सर्वतोभद्र आदि मण्डलों का वर्णन मण्डलविधान का वर्णन भगवान् शिव कहते हैं — स्कन्द। अब मैं ‘सर्वतोभद्र’ नामक आठ प्रकार के मण्डलों का वर्णन करता हूँ। पहले शङ्कु या कील से प्राचीदिशा का साधन करे। इस… Read More