अग्निपुराण – अध्याय 339 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनतालीसवाँ अध्याय शृङ्गारादि रस, भाव तथा नायक आदि का निरूपण शृङ्गारादिरसनिरूपणं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! वेदान्तशास्त्र में जिस अक्षर (अविनाशी), सनातन, अजन्मा और व्यापक परब्रह्म परमेश्वर को अद्वितीय, चैतन्यस्वरूप और ज्योतिर्मय कहते हैं, उसका सहज (स्वरूपभूत) आनन्द… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 338 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय नाटकनिरूपण नाटकनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! ‘रूपक ‘के सत्ताईस भेद माने गये हैं [^1]  — नाटक, प्रकरण, डिम, ईहामृग, समवकार, प्रहसन, व्यायोग, भाण, वीथी, अङ्क, त्रोटक, नाटिका, सट्टक, शिल्पक, कर्णा, दुर्मल्लिका, प्रस्थान, भाणिका, भाणी, गोष्ठी,… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 337 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय काव्य आदि के लक्षण काव्यादिलक्षणं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं ‘काव्य’ और ‘नाटक’ आदि के स्वरूप तथा ‘अलंकारों का वर्णन करता हूँ। ध्वनि, वर्ण, पद और वाक्य यही सम्पूर्ण वाङ्मय माना गया है।[^1]… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 336 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय शिक्षानिरूपणम् शिक्षानिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ। अब मैं ‘शिक्षा’ का वर्णन करता हूँ। वर्णों की संख्या तिरसठ अथवा चौंसठ भी मानी गयी है। इनमें इक्कीस स्वर [^1] , पचीस स्पर्श [^2] , आठ यादि [^3]… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 335 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पैंतीसवाँ अध्याय प्रस्तारनिरूपणम् प्रस्तारनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! इस छन्दः शास्त्र में जिन छन्दों का नामतः निर्देश नहीं किया गया है, किंतु जो प्रयोग में देखे जाते हैं, वे सभी ‘गाथा’ नामक छन्द के अन्तर्गत हैं।… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 334 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय समवृत्त का वर्णन समवृत्तनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — ‘यति’ नाम है विच्छेद या विराम का। [ पाद के अन्त में श्लोकार्थ पूरा होने पर तथा कहीं-कहीं पाद के मध्य में भी ‘यति’ होती है। जिसके प्रत्येक… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 333 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय अर्धसम वृत्तों का वर्णन अर्द्धसमनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — जिसके प्रथम चरण में तीन सगण, एक लघु और एक गुरु (कुल ग्यारह अक्षर) हों, दूसरे चरण में तीन भगण एवं दो गुरु हों तथा पूर्वार्ध के… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 332 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय विषमवृत्त का वर्णन विषम कथनम् अग्निदेव कहते हैं — [छन्द या पद्य दो प्रकार के हैं — ‘जाति’ और ‘वृत्त’। यहाँ तक ‘जाति’ छन्दों का निरूपण किया गया, अब ‘वृत्त’ का वर्णन करते हैं] वृत्त के… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 331 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय उत्कृति आदि छन्द, गण छन्द और मात्रा-छन्दों का निरूपण छन्दोजातिनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठजी! एक सौ चार अक्षरों का ‘उत्कृति’ छन्द होता है। [जैसे यजुर्वेद में — ‘होता यक्षदश्विनौ छागस्य०’ इत्यादि (२१।४१)] ‘उत्कृति’ छन्द में… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 330 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तीसवाँ अध्याय ‘गायत्री’ से लेकर ‘जगती’ तक छन्दों के भेद तथा उनके देवता, स्वर, वर्ण और गोत्र का वर्णन छन्दःसारः अग्निदेव कहते हैं — इस प्रकरण की पूर्ति होने तक ‘पादः’ पद का अधिकार (अनुवर्तन) है। जहाँ गायत्री… Read More