अग्निपुराण — अध्याय 359 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनसठवाँ अध्याय कृदन्त शब्दों के सिद्ध रूप व्याकरणे कृत्‌सिद्धरूपं कुमार कार्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! यह जानना चाहिये कि ‘कृत्’ प्रत्यय भाव, कर्म तथा कर्ता — तीनों में होते हैं । वे इस प्रकार हैं — ‘अच्’,… Read More


अग्निपुराण — अध्याय 358 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय तिविभक्त्यन्त सिद्धरूपों का वर्णन तिङ्‌विभक्तिसिद्धरूपं कुमार कार्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! अब मैं ‘तिङ् — विभक्ति’ तथा ‘आदेश’ का संक्षेप से वर्णन करूँगा। तिङ्—प्रत्यय भाव, कर्म और कर्ता — तीनों में होते हैं । सकर्मक… Read More


अग्निपुराण — अध्याय 357 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय उणादिसिद्ध शब्दरूपों का दिग्दर्शन व्याकरणे उणादिसिद्धरूपं कुमार स्कन्द कहते हैं — कात्यायन ! अब ‘उणादि’ प्रत्यय बताये जाते हैं, जो धातु से परे होते हैं। ‘कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण्।’ (१) — इस सूत्र के अनुसार ‘कृ’ आदि धातुओं… Read More


अग्निपुराण — अध्याय 356 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय त्रिविध तद्धित—प्रत्यय तद्धितसिद्दरूपं कुमार स्कन्ध कहते हैं — कात्यायन ! अब त्रिविध ‘तद्धित’ का वर्णन करूँगा । ‘तद्धित ‘के तीन भेद हैं — सामान्यावृत्ति तद्धित, अव्यय तद्धित तथा भाववाचक तद्धित । ‘सामान्यावृत्ति—तद्धित’ इस प्रकार है —… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 355 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पचपनवाँ अध्याय समास-निरूपण समासः भगवान् कार्त्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! मैं छः [^1]  प्रकार के ‘समास’ बताऊँगा । फिर अवान्तर- भेदों से ‘समास’ के अट्ठाईस भेद हो जाते हैं । समास ‘नित्य’ और ‘अनित्य’ के भेद से… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 354 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौवनवाँ अध्याय कारकप्रकरण व्याकरणे कारकं भगवान् स्कन्द कहते हैं — अब मैं विभक्त्यर्थों से युक्त ‘कारक’ का वर्णन करूँगा [^1]  । ‘ग्रामोऽस्ति’ ( ग्राम है) – यहाँ प्रातिपदिकार्थ मात्र में प्रथमा विभक्ति हुई है । विभक्त्यर्थ में प्रथमा… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 353 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय नपुंसकलिङ्ग शब्दों के सिद्ध रूप व्याकरणे नपुंसकशब्दसिद्धरूपं भगवान् स्कन्द कहते हैं — नपुंसकलिङ्ग में ‘किम्’ शब्द के ये रूप होते हैं — (प्रथमा) किम्, के, कानि । (द्वितीया) किम्, के, कानि । शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् हैं।… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 352 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बावनवाँ अध्याय स्त्रीलिङ्ग शब्दों के सिद्ध रूप व्याकरणे स्त्रीलिङ्गशब्दसिद्धरूपं भगवान् स्कन्द कहते हैं — आकारान्त स्त्रीलिङ्ग ‘रमा’ शब्द के रूप इस प्रकार होते हैं, — रमा (प्र० ए०), रमे (प्र०-द्वि०), रमाः (प्र० ब०), ‘रमाः शुभाः’ (रमाएँ शुभस्वरूपा है)।… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 351 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ इक्यावनवाँ अध्याय सुबन्त-सिद्ध रूप व्याकरणे पुंलिङ्गशब्दसिद्धरूपं स्कन्द कहते हैं — कात्यायन ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख विभक्ति-सिद्ध रूपों का वर्णन करता है। विभक्तियाँ दो हैं— ‘सुप्’ और ‘तिङ्’। ‘सुप्’ विभक्तियाँ सात हैं। ‘सु औ जस्’ — यह प्रथमा… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 350 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पचासवाँ अध्याय संधि के [^1]  सिद्ध रूप सन्धिसिद्धरूपम् कुमार कार्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! अब सिद्ध संधि का वर्णन करूँगा। पहले ‘स्वरसंधि’ [^2]  बतलायी जाती है — दण्डाग्रम्, साऽऽगता, दधीदम्, नदीहते, मधूदकम्, पितृषभः, लृकारः [^3] , तवेदम्,… Read More