अग्निपुराण – अध्याय 139 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय साठ संवत्सरों में मुख्य-मुख्य के नाम एवं उनके फल-भेद का कथन षष्टिसंवत्सराः भगवान् महेश्वर कहते हैं — पार्वति! अब मैं साठ संवत्सरों (में से कुछ) के शुभाशुभ फल को कहता हूँ, ध्यान देकर सुनो। ‘प्रभव’ संवत्सर… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 138 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय तन्त्रविषयक छः कर्मों का वर्णन षट्कर्माणि महादेवजी कहते हैं — पार्वती! सभी मन्त्रों के साध्यरूप से जो छः कर्म कहे गये हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो। शान्ति, वश्य, स्तम्भन, द्वेष, उच्चाटन और मारण — ये… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 137 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय महामारी विद्या का वर्णन युद्धजयार्णवे महामारी महेश्वर कहते हैं — देवि ! अब मैं महामारी-विद्या का वर्णन करूँगा, जो शत्रुओं का मर्दन करनेवाली है ॥ १ ॥ महामारीविद्या मंत्र ॐ ह्रीं महामारि रक्ताक्षि कृष्णवर्णे यमस्याज्ञाकारिणि सर्वभूतसंहारकारिणि… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 136 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय नक्षत्रों के त्रिनाडी-चक्र या फणीश्वर-चक्र का वर्णन नक्षत्रचक्रं महेश्वर कहते हैं — देवि ! अब मैं नक्षत्र-सम्बन्धी त्रिनाडी-चक्र का वर्णन करूँगा, जो यात्रा आदि में फलदायक होता है। अश्विनी आदि नक्षत्रों में तीन नाडियों से भूषित… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 135 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय संग्रामविजय विद्या युद्धार्णवे सङ्ग्रामविजयविद्या महेश्वर कहते हैं — देवि! अब मैं संग्राम में विजय दिलानेवाली विद्या (मन्त्र) का वर्णन करता हूँ, जो पदमाला के रूप में है ॥ १ ॥ अथ संग्राम विजय विद्या (मन्त्र) ॐ… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 134 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय त्रैलोक्यविजया विद्या त्रैलोक्यविजया विद्या भगवान् महेश्वर कहते हैं — देवि ! अब मैं समस्त यन्त्र-मन्त्रों को नष्ट करनेवाली ‘त्रैलोक्यविजया- विद्या’का वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ अथ त्रैलोक्य विजय विद्या मन्त्र ॐ ह्रूं क्षूं ह्रूं, ॐ… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 133 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय नाना प्रकार के बलों का विचार नानाबलानि शंकरजी कहते हैं — अब सूर्यादि ग्रहों की राशियों में पैदा हुए नवजात शिशु का जन्म-फल क्षेत्राधिप के अनुसार वर्णन करूँगा। सूर्य के गृह में अर्थात् सिंह लग्न में… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 132 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय सेवाचक्र आदि का निरूपण सेवाचक्रम् शंकरजी कहते हैं — अब मैं ‘सेवाचक्र’ का प्रतिपादन कर रहा हूँ, जिससे सेवक को सेव्य से लाभ तथा हानि का ज्ञान होता है। पिता, माता तथा भाई एवं स्त्री-पुरुष —… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 131 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ इकतीसवाँ अध्याय घातचक्र आदि का वर्णन घातचक्रादि शंकरजी कहते हैं — पूर्वादि दिशाओं में प्रदक्षिणक्रम से अकारादि स्वरों को लिखे। उसमें शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, पूर्णिमा, त्रयोदशी, चतुर्दशी, केवल शुक्लपक्ष की एक अष्टमी (कृष्णपक्ष की अष्टमी नहीं), सप्तमी, कृष्णपक्ष… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 130 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ तीसवाँ अध्याय विविध मण्डलों का वर्णन मण्डलं शंकरजी कहते हैं — भद्रे ! अब मैं विजय के लिये चार प्रकार के मण्डल का वर्णन करता हूँ। कृत्तिका, मघा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा, भरणी, पूर्वाभाद्रपदा — इन नक्षत्रों का ‘आग्नेय… Read More