अग्निपुराण – अध्याय 129 June 20, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 129 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय अर्घकाण्ड का प्रतिपादन अर्घकाण्डम् शंकरजी कहते हैं — अब मैं वस्तुओं की मँहगी तथा सस्ती के सम्बन्ध में विचार प्रकट कर रहा हूँ। जब कभी भूतल पर उल्कापात, भूकम्प, निर्घात (वज्रापात), चन्द्र और सूर्य के ग्रहण… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 128 June 20, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 128 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय कोटचक्र का वर्णन कोटचक्रम् शंकरजी कहते हैं — अब मैं ‘कोटचक्र’ का वर्णन करता हूँ — पहले चतुर्भुज लिखे, उसके भीतर दूसरा चतुर्भुज, उसके भीतर तीसरा चतुर्भुज और उसके भीतर चौथा चतुर्भुज लिखे। इस तरह लिख… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 127 June 20, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 127 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय विभिन्न बलों का वर्णन नानाबलानि शंकरजी कहते हैं — ‘विष्कुम्भ योग’ की तीन घड़ियाँ, ‘शूल योग’ की पाँच ‘गण्ड’ तथा ‘अतिगण्ड योग’ की छः ‘व्याघात’ तथा ‘वज्र योग’ की नौ घड़ियों को सभी शुभ कार्यों में… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 126 June 20, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 126 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय नक्षत्र सम्बन्धी पिण्ड का वर्णन नक्षत्रनिर्णयः शंकरजी कहते हैं — देवि! अब मैं प्राणियों के शुभाशुभ फल की जानकारी के लिये नाक्षत्रिक पिण्ड का वर्णन करूँगा। (जिस राजा या मनुष्य के लिये शुभाशुभ फल का ज्ञान… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 125 June 19, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 125 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ पचीसवाँ अध्याय युद्धजयार्णव-सम्बन्धी अनेक प्रकार के चक्रों का वर्णन युद्धजयार्णवीयनानाचक्राणि शंकरजी ने कहा — ‘ॐ ह्रीं कर्णमोटनि बहुरूपे बहुदंष्ट्रे ह्रूं फट्, ॐ हः, ॐ ग्रस ग्रस, कृन्त कृन्तच्छक च्छक ह्रूं फट् नमः ।’ इस मन्त्र का नाम ‘कर्णमोटी… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 124 June 19, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 124 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ चौबीसवाँ अध्याय युद्धजयार्णवीय ज्यौतिषशास्त्र का सार युद्धजयार्णवीयज्योतिःशास्त्रसारः अग्निदेव कहते हैं — अब मैं युद्धजयार्णव- प्रकरण में ज्योतिषशास्त्र की सारभूत वेला (समय), मन्त्र और औषध आदि वस्तुओं का उसी प्रकार वर्णन करूँगा, जिस तरह शंकरजी ने पार्वतीजी से कहा… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 123 June 19, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 123 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ तेईसवाँ अध्याय युद्धजयार्णव-सम्बन्धी विविध योगों का वर्णन युद्धजयार्णवीयनानायोगाः अग्निदेव कहते हैं — ( अब स्वर के द्वारा विजय- साधन कह रहे हैं -) मैं इस पुराण के युद्धजयार्णव प्रकरण में विजय आदि शुभ कार्यों की सिद्धि के लिये… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 122 June 19, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 122 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ बाईसवाँ अध्याय कालगणना – पञ्चाङ्गमान-साधन कालगणनं अग्निदेव कहते हैं — मुने! (अब मैं) वर्षों के समुदायस्वरूप ‘काल’ का वर्णन कर रहा हूँ और उस काल को समझने के लिये मैं गणित बतला रहा हूँ। (ब्रह्म-दिनादिकाल से अथवा सृष्ट्यारम्भकाल… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 121 June 19, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 121 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय ज्योतिःशास्त्र का कथन [ वर-वधू के गुण और विवाहादि संस्कारों के काल का विचार; शत्रु के वशीकरण एवं स्तम्भन-सम्बन्धी मन्त्र; ग्रहण-दान; सूर्य संक्रान्ति एवं ग्रहों की महादशा ] ज्योतिःशास्त्रं अग्निदेव कहते हैं — मुने! अब मैं… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 120 June 18, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 120 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ बीसवाँ अध्याय भुवनकोश का वर्णन भुवनकोषः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! भूमि का विस्तार सत्तर हजार योजन बताया गया है। उसकी ऊँचाई दस हजार योजन है। पृथ्वी के भीतर सात पाताल हैं। एक-एक पाताल दस-दस हजार योजन… Read More