अग्निपुराण – अध्याय 143 अग्निपुराण – अध्याय 143 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय कुब्जिका सम्बन्धी न्यास एवं पूजन की विधि कुब्जिकापूजा महादेवजी कहते हैं — स्कन्द ! अब मैं कुब्जिका की क्रमिक पूजा का वर्णन करूँगा, जो समस्त मनोरथों को सिद्ध करने वाली है। ‘कुब्जिका’ वह शक्ति है, जिसकी… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 142 अग्निपुराण – अध्याय 142 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ बयालीसवाँ अध्याय चोर और जातक का निर्णय, शनि दृष्टि, दिन-राहु, फणि-राहु, तिथि-राहु तथा विष्टि-राहु के फल और अपराजिता-मन्त्र एवं ओषधि का वर्णन मन्त्रौषधादिः भगवान् महेश्वर कहते हैं — स्कन्द ! अब मैं मन्त्र- चक्र तथा औषध चक्रों का… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 141 अग्निपुराण – अध्याय 141 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय छत्तीस कोष्ठों में निर्दिष्ट ओषधियों के वैज्ञानिक प्रभाव का वर्णन षट्त्रिंशत्पदकज्ञानम् महादेवजी कहते हैं — स्कन्द ! अब मैं छत्तीस पदों (कोष्ठकों) में स्थापित की हुई ओषधियों का फल बताता हूँ। इन ओषधियों के सेवन से… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 140 अग्निपुराण – अध्याय 140 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ चालीसवाँ अध्याय वश्य आदि योगों का वर्णन वश्यादियोगाः भगवान् महेश्वर कहते हैं — स्कन्द ! अब मैं वशीकरण आदि के योगों का वर्णन करूँगा। निम्नाङ्कित ओषधियों को सोलह कोष्ठवाले चक्र में अङ्कित करे — भृङ्गराज (भँगरैया), सहदेवी (सहदेइया),… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 139 अग्निपुराण – अध्याय 139 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय साठ संवत्सरों में मुख्य-मुख्य के नाम एवं उनके फल-भेद का कथन षष्टिसंवत्सराः भगवान् महेश्वर कहते हैं — पार्वति! अब मैं साठ संवत्सरों (में से कुछ) के शुभाशुभ फल को कहता हूँ, ध्यान देकर सुनो। ‘प्रभव’ संवत्सर… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 138 अग्निपुराण – अध्याय 138 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय तन्त्रविषयक छः कर्मों का वर्णन षट्कर्माणि महादेवजी कहते हैं — पार्वती! सभी मन्त्रों के साध्यरूप से जो छः कर्म कहे गये हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो। शान्ति, वश्य, स्तम्भन, द्वेष, उच्चाटन और मारण — ये… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 137 अग्निपुराण – अध्याय 137 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय महामारी विद्या का वर्णन युद्धजयार्णवे महामारी महेश्वर कहते हैं — देवि ! अब मैं महामारी-विद्या का वर्णन करूँगा, जो शत्रुओं का मर्दन करनेवाली है ॥ १ ॥ महामारीविद्या मंत्र ॐ ह्रीं महामारि रक्ताक्षि कृष्णवर्णे यमस्याज्ञाकारिणि सर्वभूतसंहारकारिणि… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 136 अग्निपुराण – अध्याय 136 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय नक्षत्रों के त्रिनाडी-चक्र या फणीश्वर-चक्र का वर्णन नक्षत्रचक्रं महेश्वर कहते हैं — देवि ! अब मैं नक्षत्र-सम्बन्धी त्रिनाडी-चक्र का वर्णन करूँगा, जो यात्रा आदि में फलदायक होता है। अश्विनी आदि नक्षत्रों में तीन नाडियों से भूषित… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 135 अग्निपुराण – अध्याय 135 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय संग्रामविजय विद्या युद्धार्णवे सङ्ग्रामविजयविद्या महेश्वर कहते हैं — देवि! अब मैं संग्राम में विजय दिलानेवाली विद्या (मन्त्र) का वर्णन करता हूँ, जो पदमाला के रूप में है ॥ १ ॥ अथ संग्राम विजय विद्या (मन्त्र) ॐ… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 134 अग्निपुराण – अध्याय 134 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय त्रैलोक्यविजया विद्या त्रैलोक्यविजया विद्या भगवान् महेश्वर कहते हैं — देवि ! अब मैं समस्त यन्त्र-मन्त्रों को नष्ट करनेवाली ‘त्रैलोक्यविजया- विद्या’का वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ अथ त्रैलोक्य विजय विद्या मन्त्र ॐ ह्रूं क्षूं ह्रूं, ॐ… Read More