अग्निपुराण — अध्याय 363 अग्निपुराण — अध्याय 363 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय भूमि, वनौषधि आदि वर्ग भूमिवनौषध्यादिवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — अब मैं भूमि, पुर, पर्वत, वनौषधि तथा सिंह आदि वर्गों का वर्णन करूँगा । भू, अनन्ता, क्षमा, धात्री, क्ष्मा, कु तथा धरित्री — ये भूमि के नाम… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 362 अग्निपुराण — अध्याय 362 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बासठवाँ अध्याय नानार्थ-वर्ग नानार्थवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — ‘नाक’ शब्द आकाश और स्वर्ग के अर्थ में तथा ‘लोक’ शब्द संसार, जन-समुदाय के अर्थ में आता है । ‘श्लोक’ शब्द अनुष्टुप् छन्द और सुयश अर्थ में तथा ‘सायक’ शब्द… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 361 अग्निपुराण — अध्याय 361 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ एकसठवाँ अध्याय अव्यय—वर्ग अव्ययवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठजी ! ‘आङ्’ अव्यय ईषत् (स्वल्प), अभिव्याप्ति तथा मर्यादा (सीमा) अर्थ में प्रयुक्त होता है। साथ ही धातु से उसका संयोग होने पर जो विभिन्न अर्थ प्रकाशित होते हैं, उन… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 360 अग्निपुराण — अध्याय 360 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ साठवाँ अध्याय स्वर्ग-पाताल आदि वर्ग स्वर्गपातालादिवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — कात्यायन ! स्वर्ग आदि के नाम और लिङ्ग जिनके स्वरूप हैं, उन शुद्ध स्वरूप श्रीहरि का मैं वर्णन करता हूँ — स्वः [अव्यय ], स्वर्ग, नाक, त्रिदिव [… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 359 अग्निपुराण — अध्याय 359 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनसठवाँ अध्याय कृदन्त शब्दों के सिद्ध रूप व्याकरणे कृत्सिद्धरूपं कुमार कार्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! यह जानना चाहिये कि ‘कृत्’ प्रत्यय भाव, कर्म तथा कर्ता — तीनों में होते हैं । वे इस प्रकार हैं — ‘अच्’,… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 358 अग्निपुराण — अध्याय 358 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय तिविभक्त्यन्त सिद्धरूपों का वर्णन तिङ्विभक्तिसिद्धरूपं कुमार कार्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! अब मैं ‘तिङ् — विभक्ति’ तथा ‘आदेश’ का संक्षेप से वर्णन करूँगा। तिङ्—प्रत्यय भाव, कर्म और कर्ता — तीनों में होते हैं । सकर्मक… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 357 अग्निपुराण — अध्याय 357 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय उणादिसिद्ध शब्दरूपों का दिग्दर्शन व्याकरणे उणादिसिद्धरूपं कुमार स्कन्द कहते हैं — कात्यायन ! अब ‘उणादि’ प्रत्यय बताये जाते हैं, जो धातु से परे होते हैं। ‘कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण्।’ (१) — इस सूत्र के अनुसार ‘कृ’ आदि धातुओं… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 356 अग्निपुराण — अध्याय 356 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय त्रिविध तद्धित—प्रत्यय तद्धितसिद्दरूपं कुमार स्कन्ध कहते हैं — कात्यायन ! अब त्रिविध ‘तद्धित’ का वर्णन करूँगा । ‘तद्धित ‘के तीन भेद हैं — सामान्यावृत्ति तद्धित, अव्यय तद्धित तथा भाववाचक तद्धित । ‘सामान्यावृत्ति—तद्धित’ इस प्रकार है —… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 355 अग्निपुराण – अध्याय 355 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पचपनवाँ अध्याय समास-निरूपण समासः भगवान् कार्त्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! मैं छः [^1] प्रकार के ‘समास’ बताऊँगा । फिर अवान्तर- भेदों से ‘समास’ के अट्ठाईस भेद हो जाते हैं । समास ‘नित्य’ और ‘अनित्य’ के भेद से… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 354 अग्निपुराण – अध्याय 354 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौवनवाँ अध्याय कारकप्रकरण व्याकरणे कारकं भगवान् स्कन्द कहते हैं — अब मैं विभक्त्यर्थों से युक्त ‘कारक’ का वर्णन करूँगा [^1] । ‘ग्रामोऽस्ति’ ( ग्राम है) – यहाँ प्रातिपदिकार्थ मात्र में प्रथमा विभक्ति हुई है । विभक्त्यर्थ में प्रथमा… Read More