अग्निपुराण – अध्याय 353 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय नपुंसकलिङ्ग शब्दों के सिद्ध रूप व्याकरणे नपुंसकशब्दसिद्धरूपं भगवान् स्कन्द कहते हैं — नपुंसकलिङ्ग में ‘किम्’ शब्द के ये रूप होते हैं — (प्रथमा) किम्, के, कानि । (द्वितीया) किम्, के, कानि । शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् हैं।… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 352 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बावनवाँ अध्याय स्त्रीलिङ्ग शब्दों के सिद्ध रूप व्याकरणे स्त्रीलिङ्गशब्दसिद्धरूपं भगवान् स्कन्द कहते हैं — आकारान्त स्त्रीलिङ्ग ‘रमा’ शब्द के रूप इस प्रकार होते हैं, — रमा (प्र० ए०), रमे (प्र०-द्वि०), रमाः (प्र० ब०), ‘रमाः शुभाः’ (रमाएँ शुभस्वरूपा है)।… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 351 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ इक्यावनवाँ अध्याय सुबन्त-सिद्ध रूप व्याकरणे पुंलिङ्गशब्दसिद्धरूपं स्कन्द कहते हैं — कात्यायन ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख विभक्ति-सिद्ध रूपों का वर्णन करता है। विभक्तियाँ दो हैं— ‘सुप्’ और ‘तिङ्’। ‘सुप्’ विभक्तियाँ सात हैं। ‘सु औ जस्’ — यह प्रथमा… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 350 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पचासवाँ अध्याय संधि के [^1]  सिद्ध रूप सन्धिसिद्धरूपम् कुमार कार्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! अब सिद्ध संधि का वर्णन करूँगा। पहले ‘स्वरसंधि’ [^2]  बतलायी जाती है — दण्डाग्रम्, साऽऽगता, दधीदम्, नदीहते, मधूदकम्, पितृषभः, लृकारः [^3] , तवेदम्,… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 349 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनचासवाँ अध्याय व्याकरण-सार व्याकरणम् स्कन्द बोले — कात्यायन। अब मैं बोध के लिये तथा बालकों को व्याकरण का ज्ञान कराने के लिये सिद्ध शब्द रूप सारभूत व्याकरण का वर्णन करता हूँ; सुनो। पहले प्रत्याहार आदि संज्ञाएँ बतलायी जाती… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 348 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अड़तालीसवाँ अध्याय एकाक्षर कोष एकाक्षराभिधानम् अग्निदेव कहते हैं — अब मैं तुम्हें ‘एकाक्षराभिधान’ तथा मातृकाओं के नाम एवं मन्त्र बतलाता हूँ। सुनो ‘अ’ नाम है भगवान् विष्णु का। ‘अ’ निषेध अर्थ में भी आता है। ‘आ’ ब्रह्माजी का… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 347 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय काव्य दोष विवेक काव्य दोष विवेकः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ। ‘दृश्य’ और ‘श्रव्य’ काव्य में यदि ‘दोष’ [^1]  हो तो वह सहृदय सभ्यों (दर्शकों और पाठकों) के लिये उद्वेगजनक होता है। वक्ता, वाचक एवं वाच्य… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 346 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय काव्य गुण-विवेक काव्यगुणविवेकः अग्निदेव कहते हैं — द्विजश्रेष्ठ ! गुणहीन काव्य अलंकारयुक्त होने पर भी सहृदय के लिये प्रीतिकारक नहीं होता, जैसे नारी के यौवनजनित लालित्य से [^1]  रहित शरीर पर हार भी भारस्वरूप हो जाता… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 345 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय शब्दार्थोभयालंकार निरुपण शब्दार्थालङ्काराः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! ‘शब्दार्थालंकार’ शब्द और अर्थ दोनों को समानरूप से अलंकृत करता है; जैसे एक ही अङ्ग में धारण किया हुआ हार कामिनी के कण्ठ एवं कुचमण्डल की कान्ति… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 344 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय अर्थालंकारों का निरूपण अर्थालङ्कारनिरूपणं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अर्थों का अलंकरण [^1] अर्थालंकार’ कहा जाता है। उसके बिना शब्द-सौन्दर्य भी मन को आकर्षित नहीं करता है। अर्थालंकार से हीन सरस्वती विधवा के समान शोभाहीन… Read More