अग्निपुराण – अध्याय 333 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय अर्धसम वृत्तों का वर्णन अर्द्धसमनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — जिसके प्रथम चरण में तीन सगण, एक लघु और एक गुरु (कुल ग्यारह अक्षर) हों, दूसरे चरण में तीन भगण एवं दो गुरु हों तथा पूर्वार्ध के… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 332 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय विषमवृत्त का वर्णन विषम कथनम् अग्निदेव कहते हैं — [छन्द या पद्य दो प्रकार के हैं — ‘जाति’ और ‘वृत्त’। यहाँ तक ‘जाति’ छन्दों का निरूपण किया गया, अब ‘वृत्त’ का वर्णन करते हैं] वृत्त के… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 331 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय उत्कृति आदि छन्द, गण छन्द और मात्रा-छन्दों का निरूपण छन्दोजातिनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठजी! एक सौ चार अक्षरों का ‘उत्कृति’ छन्द होता है। [जैसे यजुर्वेद में — ‘होता यक्षदश्विनौ छागस्य०’ इत्यादि (२१।४१)] ‘उत्कृति’ छन्द में… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 330 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तीसवाँ अध्याय ‘गायत्री’ से लेकर ‘जगती’ तक छन्दों के भेद तथा उनके देवता, स्वर, वर्ण और गोत्र का वर्णन छन्दःसारः अग्निदेव कहते हैं — इस प्रकरण की पूर्ति होने तक ‘पादः’ पद का अधिकार (अनुवर्तन) है। जहाँ गायत्री… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 329 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनतीसवाँ अध्याय गायत्री आदि छन्दों का वर्णन छन्दःसारः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ (गायत्री छन्द के आठ भेद हैं — आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी, साम्नी, आर्ची तथा ब्राह्मी) ‘छन्द’ शब्द अधिकार में प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् इस… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 328 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय छन्दों के गण और गुरु-लघु की व्यवस्था छन्दःसारः अग्नि कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं वेद के मूलमन्त्रों के अनुसार पिङ्गलोक्त छन्दों का क्रमशः वर्णन करूँगा। मगण, नगण, भगण, यगण, जगण, रगण, सगण और तगण… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 327 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय विभिन्न कर्मों में उपयुक्त माला, अनेकानेक मन्त्र, लिङ्ग-पूजा तथा देवालय की महत्ता का विचार देवालयमाहात्म्यम् महादेवजी कहते हैं — कार्तिकेय ! व्रतेश्वर और सत्य आदि देवताओं का पूजन करके उनको व्रत का समर्पण करना चाहिये। अरिष्ट… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 326 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय गौरी आदि देवियों तथा मृत्युञ्जय की पूजा का विधान गौर्य्यादिपूजा महादेवजी कहते हैं — स्कन्द! अब मैं सौभाग्य आदि के निमित्त उमा की पूजा का विधान बताऊँगा। उनके मन्त्र, ध्यान, आवरणमण्डल, मुद्रा तथा होमविधि का भी… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 325 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पचीसवाँ अध्याय रुद्राक्ष-धारण, मन्त्रों की सिद्धादि संज्ञा तथा अंश आदि का विचार अंशकादिः महादेवजी कहते हैं — स्कन्द! शैव साधक को रुद्राक्ष का कड़ा धारण करना चाहिये। रुद्राक्षों की संख्या विषम हो। उसका प्रत्येक मनका सब ओर से… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 324 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौबीसवाँ अध्याय कल्पाघोर रुद्रशान्ति रुद्रशान्तिः महादेवजी कहते हैं — अब मैं ‘कल्पाघोर-शिवशान्ति ‘ का वर्णन करता हूँ। भगवान् अघोर शिव सात करोड़ गणों के अधिपति हैं तथा ब्रह्महत्या आदि पापों को नष्ट करने वाले हैं। उत्तम और अधम-सभी… Read More