श्रीमद्भागवतमहापुराण – अष्टम स्कन्ध – अध्याय ७ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सातवाँ अध्याय समुद्रमन्थन का आरम्भ और भगवान् शङ्कर का विषपान श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! देवताओं और असुरों ने नागराज वासुकि को यह वचन देकर कि समुद्रमन्थन से प्राप्त होनेवाले अमृत में तुम्हारा भी हिस्सा रहेगा, उन्हें… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – अष्टम स्कन्ध – अध्याय ६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय छठा अध्याय देवताओं और दैत्यों का मिलकर समुद्रमन्थन के लिये उद्योग करना श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! जब देवताओं ने सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि की इस प्रकार स्तुति की, तब वे उनके बीच में ही प्रकट हो गये… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – अष्टम स्कन्ध – अध्याय ५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पाँचवाँ अध्याय देवताओं का ब्रह्माजी के पास जाना और ब्रह्माकृत भगवान् की स्तुति श्री शुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! भगवान् की यह गजेन्द्रमोक्ष की पवित्र लीला समस्त पापों का नाश करनेवाली है । इसे मैंने तुम्हें सुना… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – अष्टम स्कन्ध – अध्याय ४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौथा अध्याय गज और ग्राह का पूर्वचरित्र तथा उनका उद्धार श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! उस समय ब्रह्मा, शङ्कर आदि देवता, ऋषि और गन्धर्व श्रीहरि भगवान् के इस कर्म की प्रशंसा करने लगे तथा उनके ऊपर फूलों… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – अष्टम स्कन्ध – अध्याय ३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तीसरा अध्याय गजेन्द्र के द्वारा भगवान् की स्तुति और उसका संकट से मुक्त होना श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! अपनी बुद्धि से ऐसा निश्चय करके गजेन्द्र ने अपने मन को हृदय में एकाग्र किया और फिर पूर्वजन्म… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – अष्टम स्कन्ध – अध्याय २ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दूसरा अध्याय ग्राह के द्वारा गजेन्द्र का पकड़ा जाना श्रीशुकदेवजी ने कहा — परीक्षित् ! क्षीरसागर त्रिकूट नाम का एक प्रसिद्ध सुन्दर एवं श्रेष्ठ पर्वत था । वह दस हजार योजन ऊँचा था ।। १ ।। उसकी लंबाई-चौड़ाई… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – अष्टम स्कन्ध – अध्याय १ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पहला अध्याय मन्वन्तरों का वर्णन राजा परीक्षित् ने पूछा — गुरुदेव ! स्वायम्भुव मनु का वंश-विस्तार मैंने सुन लिया । इसी वंश में उनकी कन्याओं के द्वारा मरीचि आदि प्रजापतियों ने अपनी वंश-परम्परा चलायी थी । अब आप… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय १५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पंद्रहवाँ अध्याय गृहस्थों के लिये मोक्षधर्म का वर्णन नारदजी कहते हैं — युधिष्ठिर ! कुछ ब्राह्मणों की निष्ठा कर्म में, कुछ की तपस्या में, कुछ की वेदों के स्वाध्याय और प्रवचन में, कुछ आत्मज्ञान के सम्पादन तथा कुछ… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय १४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौदहवाँ अध्याय गृहस्थ सम्बन्धी सदाचार राजा युधिष्ठिर ने पूछा — देवर्षि नारदजी ! मेरे जैसा गृहासक्त गृहस्थ बिना विशेष परिश्रम के इस पद को किस साधन से प्राप्त कर सकता है, आप कृपा करके मुझे बतलाइये ॥ १… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय १३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तेरहवाँ अध्याय यतिधर्म का निरूपण और अवधूत-प्रह्लाद-संवाद नारदजी कहते हैं — धर्मराज ! यदि वानप्रस्थी में ब्रह्मविचार का सामर्थ्य हो, तो शरीर के अतिरिक्त और सब कुछ छोड़कर वह संन्यास ले ले; तथा किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थान… Read More