श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-19 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-एकोनविंशोऽध्यायः उनीसवाँ अध्याय अतल, वितल तथा सुतललोक का वर्णन अतलवितलसुतललोकवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे विप्र ! अतल नाम से विख्यात पहले परम सुन्दर विवर में मय दानव का पुत्र ‘बल’ नामक अति अभिमानी दैत्य रहता है ॥ १ ॥ जिसने… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-18 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-अष्टादशोऽध्यायः अठारहवाँ अध्याय राहुमण्डल का वर्णन राहुमण्डलाद्यवस्थानवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] सूर्य से दस हजार योजन नीचे राहुमण्डल कहा गया है। यह सिंहिकापुत्र राहु योग्य न होने पर भी नक्षत्र की भाँति विचरण करता रहता है । चन्द्रमा… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-17 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-सप्तदशोऽध्यायः सत्रहवाँ अध्याय शिशुमारचक्र तथा ध्रुवमण्डल का वर्णन ध्रुवमण्डलसंस्थानवर्णनम् श्रीनारायण बोले — इस सप्तर्षिमण्डलसे तेरह लाख योजन दूरीपर वह परम वैष्णवपद स्थित है ॥ १ ॥ परम भागवत तथा लोकपूजित उत्तानपादपुत्र श्रीमान् ध्रुव यहींपर विराजमान हैं । इन्द्र, अग्नि, कश्यप,… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-16 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-षोडशोऽध्यायः सोलहवाँ अध्याय चन्द्रमा तथा ग्रहों की गति का वर्णन सोमादिगतिवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] अब आप चन्द्रमा आदि की अद्भुत गति का वर्णन सुनिये। उसकी गति के द्वारा ही मनुष्यों को शुभ तथा अशुभ का परिज्ञान होता… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-15 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-पञ्चदशोऽध्यायः सोलहवाँ अध्याय सूर्य की गति का वर्णन भुवनकोशवर्णने सूर्यगतिवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे नारद! अब मैं सूर्य की उत्तम गति का वर्णन करूँगा । शीघ्र, मन्द गतियों के द्वारा सूर्य का गमन होता है ॥ १ ॥ हे सुरश्रेष्ठ!… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-14 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-चतुर्दशोऽध्यायः चौदहवाँ अध्याय लोकालोक पर्वत का वर्णन सूर्यगतिवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] उसके आगे लोकालोक नामक पर्वत है, जो प्रकाशित तथा अप्रकाशित — दो प्रकार के लोकों का विभाग करने के लिये उनके मध्य में स्थित है ॥… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-13 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-त्रयोदशोऽध्यायः तेरहवाँ अध्याय क्रौंच, शाक और पुष्करद्वीप का वर्णन भुवनकोशवर्णने क्रौञ्चशाकपुष्करद्वीपवर्णनम् नारदजी बोले — हे सर्वार्थदर्शन ! अब आप शेष द्वीपों के परिमाण बतलाइये, जिन्हें जाननेमात्र से मनुष्य परम आनन्दमय हो जाता है ॥ १ ॥ श्रीनारायण बोले — [… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-12 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-द्वादशोऽध्यायः बारहवाँ अध्याय प्लक्ष, शाल्मलि और कुशद्वीप का वर्णन भुवनकोशवर्णने प्लक्षद्वीपकुशद्वीपवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [हे नारद!] यह जम्बूद्वीप जैसा और जितने परिमाण वाला बताया गया है, वह उतने ही परिमाण वाले क्षारसमुद्र से चारों ओर से उसी प्रकार घिरा है,… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-11 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-एकादशोऽध्यायः ग्यारहवाँ अध्याय जम्बूद्वीप स्थित भारतवर्ष में श्रीनारदजी के द्वारा नारायणरूप की स्तुति-उपासना तथा भारतवर्ष की महिमा का कथन भुवनकोशवर्णने भारतवर्षवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] भारत नामक इस वर्ष में आदिपुरुष मैं सदा विराजमान रहता हूँ और यहाँ… Read More


श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-10 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-दशमोऽध्यायः दसवाँ अध्याय हिरण्मयवर्ष में अर्यमा के द्वारा कच्छपरूप की आराधना, उत्तरकुरुवर्ष में पृथ्वी द्वारा वाराहरूप की एवं किम्पुरुषवर्ष में श्रीहनुमान् जी के द्वारा श्रीरामचन्द्ररूप की स्तुति-उपासना भुवनकोशवर्णने हिरण्मयकिम्पुरुषवर्षवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] हिरण्मय नामक वर्ष में भगवान्… Read More