June 22, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 139 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय साठ संवत्सरों में मुख्य-मुख्य के नाम एवं उनके फल-भेद का कथन षष्टिसंवत्सराः भगवान् महेश्वर कहते हैं — पार्वति! अब मैं साठ संवत्सरों (में से कुछ) के शुभाशुभ फल को कहता हूँ, ध्यान देकर सुनो। ‘प्रभव’ संवत्सर में यज्ञकर्म की बहुलता होती है। ‘विभव’ में प्रजा सुखी होती है। ‘शुक्ल’ में समस्त धान्य प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होते हैं। ‘प्रमोद’ से सभी प्रमुदित होते हैं। ‘प्रजापति’ नामक संवत्सर में वृद्धि होती है । ‘अङ्गिरा’ संवत्सर भोगों की वृद्धि करनेवाला है। ‘श्रीमुख’ संवत्सर में जनसंख्या को वृद्धि होती है और ‘भाव’ संज्ञक संवत्सर में प्राणियों में सद्भाव की वृद्धि होती है। ‘युवा’ संवत्सर में मेघ प्रचुर वृष्टि करते हैं। ‘धाता’ संवत्सर में समस्त ओषधियाँ बहुलता से उत्पन्न होती हैं। ‘ईश्वर’ संवत्सर में क्षेम और आरोग्य की प्राप्ति होती है। ‘बहुधान्य’ में प्रचुर अन्न उत्पन्न होता है। ‘प्रमाथी ‘ वर्ष मध्यम होता है। ‘विक्रम ‘में अन्न सम्पदा की अधिकता होती है। ‘वृष’ संवत्सर सम्पूर्ण प्रजाओं का पोषण करता है। ‘चित्रभानु’ विचित्रता और ‘सुभानु’ कल्याण एवं आरोग्य को उपस्थित करता है। ‘तारण’ संवत्सर में मेघ शुभकारक होते हैं ॥ १-५ ॥’ ‘पार्थिव’ में सस्य- सम्पत्ति, ‘अव्यय’ में अति-वृष्टि, ‘सर्वजित्’ में उत्तम वृष्टि और ‘सर्वधारी’ नामक संवत्सर में धान्यादि की अधिकता होती है। ‘विरोधी’ मेघों का नाश करता है अर्थात् अनावृष्टिकारक होता है। ‘विकृति’ भय प्रदान करनेवाला है। ‘खर’ नामक संवत्सर पुरुषों में शौर्य का संचार करता है। ‘नन्दन’ में प्रजा आनन्दित होती है। ‘विजय’ संवत्सर शत्रुनाशक और ‘जय’ रोगों का मर्दन करनेवाला है। ‘मन्मथ’ में विश्व ज्वर से पीड़ित होता है। ‘दुष्कर’ में प्रजा दुष्कर्म में प्रवृत्त होती है। ‘दुर्मुख’ संवत्सर में मनुष्य कटुभाषी हो जाते हैं। ‘हेमलम्ब’ से सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। महादेवि! ‘विलम्ब’ नामक संवत्सर में अन्न की प्रचुरता होती है। ‘विकारी’ शत्रुओं को कुपित करता है और ‘शार्वरी’ कहीं-कहीं सर्वप्रदा होती है। ‘प्लव’ संवत्सर में जलाशयों में बाढ़ आती है। ‘शोभन’ और ‘शुभकृत्’ में प्रजा संवत्सर के नामानुकूल गुण से युक्त होती है ॥ ६-१० ॥ ‘राक्षस’ वर्ष में लोक निष्ठुर हो जाता है। ‘आनल’ संवत्सर में विविध धान्यों की उत्पत्ति होती है। ‘पिङ्गल’ में कहीं-कहीं उत्तम वृष्टि और ‘कालयुक्त’ में धनहानि होती है। ‘सिद्धार्थ’ में सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि होती है। ‘रौद्र’ वर्ष में विश्व में रौद्रभावों की प्रवृत्ति होती है। ‘दुर्मति’ संवत्सर में मध्यम वर्षा और ‘दुन्दुभि’ में मङ्गल एवं धन-धान्य की उपलब्धि होती है। ‘रुधिरोद्गारी’ और ‘रक्ताक्ष’ नामक संवत्सर रक्तपान करनेवाले हैं। ‘क्रोधन’ वर्ष विजयप्रद है। ‘क्षय’ संवत्सर में प्रजा का धन क्षीण होता है। इस प्रकार साठ संवत्सरों (में से कुछ) का वर्णन किया गया है ॥ ११-१३ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘साठ संवत्सरों (में से कुछ) के नाम एवं उनके फल-भेद का कथन’ नामक एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३९ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe