अग्निपुराण – अध्याय 211
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय
नाना प्रकार के दानों का वर्णन
नानादानानि

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! जिसके पास दस गौएँ हों, वह एक गौ; जिसके पास सौ गौएँ हों, वह दस गौएँ; जिसके पास एक हजार गौएँ हों, वह सौ गौओं का दान करे तो उन सबको समान फल प्राप्त होता है। कुबेर की राजधानी अलकापुरी, जहाँ स्वर्णनिर्मित भवन हैं एवं जहाँ गन्धर्व और अप्सराएँ विहार करती हैं, सहस्र गौओं का दान करनेवाले वहीं जाते हैं। मनुष्य सौ गौओं का दान करके नरक समुद्र से मुक्त हो जाता है और बछिया का दान करके स्वर्गलोक में पूजित होता है। गोदान से दीर्घायु, आरोग्य, सौभाग्य और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

इन्द्रादिलोकपालानां या राजमहिषी शुभा ॥
महिषीदानमाहात्म्यादस्तु मे सर्वकामदा ।
धर्मराजस्य साहाय्ये यस्याः पुत्रः प्रतिष्ठितः ॥
महिषासुरस्य जननी या सास्तु वरदा मम ।
महिषीदानाच्च सौभाग्यं वृषदानाद्दिवं व्रजेत् ॥

‘जो इन्द्र आदि लोकपालों की मङ्गलमयी राजमहिषी हैं, वे देवी इस महिषीदान के माहात्म्य से मुझे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करें। जिनका पुत्र धर्मराज की सहायता में नियुक्त है एवं जो महिषासुर की जननी हैं, वे देवी मुझे वर प्रदान करें।”

उपर्युक्त मन्त्र पढ़कर महिषीदान करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। वृषदान से मनुष्य स्वर्गलोक में जाता है ॥ १-६ ॥

‘संयुक्त हलपङ्क्ति’ नामक दान समस्त फलों को प्रदान करता है। काठ के बने हुए दस हलों की पङ्क्ति, जो सुवर्णमय पट्ट से परस्पर जुड़ी हो और प्रत्येक हल के साथ आवश्यक संख्या में बैल भी हों तो उसका दान ‘संयुक्त हलपङ्क्ति’ नामक दान कहा गया है। वह दान करके मनुष्य स्वर्गलोक में पूजित होता है। ज्येष्ठपुष्कर तीर्थ में दस कपिला गौओं का दान किया जाय तो उसका फल अक्षय बतलाया गया है। वृषोत्सर्ग करने से भी अक्षय फल की प्राप्ति होती है। साँड़ को चक्र और त्रिशूल से अङ्कित करके यह मन्त्र पढ़कर छोड़े —

नमो ब्रह्मण्यदेवेश पितृभूतर्षिपोषक ।
त्वयि मुक्तेऽक्षया लोका मम सन्तु निरामयाः ॥
मा मे ऋणोऽस्तु दैवत्यो भौतः पैत्रोऽथ मानुषः ।
धर्मस्त्वं त्वत्प्रपन्नस्य या गतिः सास्तु मे ध्रुवा ॥
अङ्गयेच्चक्रशूलाभ्यां मन्त्रेणानेन चोत्सृजेत् ।

‘देवेश्वर! तुम चार चरणों से युक्त साक्षात् धर्म हो । ये तुम्हारी चार प्रियतमाएँ हैं। पितरों, मनुष्यों और ऋषियों का पोषण करनेवाले वेदमूर्ति वृष! तुम्हारे मोचन से मुझे अमृतमय शाश्वत लोकों की प्राप्ति हो। मैं देवऋण, भूतऋण, पितृऋण एवं मनुष्यऋण से मुक्त हो जाऊँ। तुम साक्षात् धर्म हो; तुम्हारा आश्रय ग्रहण करनेवालों को जो गति प्राप्त होती हो, वह नित्य गति मुझे भी प्राप्त हो ‘ ॥ ७ – १११/२

जिस मृत व्यक्ति के एकादशाह, षाण्मासिक अथवा वार्षिक श्राद्ध में वृषोत्सर्ग किया जाता है, वह प्रेतलोक से मुक्त हो जाता है। दस हाथ के डंडे से तीस डंडे के बराबर की भूमि को ‘निवर्तन’ कहते हैं। दस निवर्तन भूमि की ‘गोचर्म’ संज्ञा है। इतनी भूमि का दान करने वाला मनुष्य अपने समस्त पापों का नाश कर देता है। जो गौ, भूमि और सुवर्णयुक्त कृष्णमृगचर्म का दान करता है, वह सम्पूर्ण पापों के करने पर भी ब्रह्मा का सायुज्य प्राप्त कर लेता है। तिल एवं मधु से भरा पात्र मगधदेशीय मान के अनुसार एक प्रस्थ ( चौसठ पल) कृष्णतिल का दान करे। इसके साथ उत्तम गुणों से युक्त शय्या देने से दाता को भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥ १२-१६ ॥

अपनी स्वर्णमयी प्रतिमा बनवाकर दान करने वाला स्वर्ग में जाता है। विशाल गृह का निर्माण कराके उसका दान देने वाला भोग एवं मोक्ष- दोनों को प्राप्त करता है। गृह, मठ, सभाभवन (धर्मशाला) एवं आवासस्थान का दान करके मनुष्य स्वर्गलोक में जाकर सुख भोगता है। गोशाला बनवाकर दान करनेवाला पापरहित होकर स्वर्ग को प्राप्त होता है। यम देवता- सम्बन्धी महिषदान करने से मनुष्य निष्पाप होकर स्वर्गलोक को जाता है। देवताओं सहित ब्रह्मा, शिव और विष्णु के बीच में पाशधारी यमदूत की (स्वर्णादिमयी) मूर्तियाँ स्थापित करके यमदूत के सिर का छेदन करे; फिर उस मूर्तिमण्डल का ब्राह्मण को दान कर दे। ऐसा करने से दाता तो स्वर्गलोक का भागी होता है, किंतु इस ‘त्रिमुख’ नामक दान को ग्रहण करके द्विज पाप का भागी होता है। चाँदी का चक्र बनवाकर उसे जल में रखकर उसके निमित्त से होम करे पश्चात् वह चक्र ब्राह्मण को दान कर दे। यह महान् ‘कालचक्रदान’ माना गया है ॥ १७-२१ ॥

जो अपने वजन के बराबर लोहे का दान करता है, वह नरक में नहीं गिरता जो पचास पल का लौहदण्ड वस्त्र से ढककर ब्राह्मण को दान करता है, उसे यमदण्ड से भय नहीं होता। दीर्घायु की इच्छा रखनेवाला मृत्युञ्जय के उद्देश्य से फल, मूल एवं द्रव्य को एक साथ अथवा पृथक् पृथक् दान करे । कृष्णतिल का पुरुष निर्मित करे। उसके चाँदी के दाँत और सोने की आँखें हों। वह मालाधारी दीर्घाकार पुरुष दाहिने हाथ में खड्ग उठाये हुए हो। लाल रंग के वस्त्र धारण किये जपापुष्पों से अलंकृत एवं शङ्ख की माला से विभूषित हो। उसके दोनों चरणों में पादुकाएं हों और पार्श्वभाग में काला कम्बल हो। वह कालपुरुष बायें हाथ में मांस-पिण्ड लिये हो। इस प्रकार कालपुरुष का निर्माण कर गन्धादि द्रव्यों से उसकी पूजा करके ब्राह्मण को दान करे। इससे दाता मानव मृत्यु और व्याधि से रहित होकर राजराजेश्वर होता है। ब्राह्मण को दो बैलों का दान देकर मनुष्य भोग और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ॥ २२–२८१/२

जो मनुष्य सुवर्णदान करता है, वह सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं को प्राप्त कर लेता है। सुवर्ण के दान में उसकी प्रतिष्ठा के लिये चाँदी की दक्षिणा विहित है। अन्य दानों की प्रतिष्ठा के लिये सुवर्ण की दक्षिणा प्रशस्त मानी गयी है। सुवर्ण के सिवा, रजत, ताम्र, तण्डुल और धान्य भी दक्षिणा के लिये विहित हैं। नित्य श्राद्ध और नित्य देवपूजन – इन सबमें दक्षिणा की आवश्यकता नहीं है। पितृकार्य में रजत की दक्षिणा धर्म, काम और अर्थ को सिद्ध करनेवाली है। भूमि का दान देनेवाला महाबुद्धिमान् मनुष्य सुवर्ण, रजत, ताम्र, मणि और मुक्ता – इन सबका दान कर लेता है, अर्थात् इन सभी दानों का पुण्यफल पा लेता है। जो पृथ्वीदान करता है, वह शान्त अन्तःकरणवाला पुरुष पितृलोक में स्थित पितरों को और देवलोक में निवास करनेवाले देवताओं को पूर्णरूप से तृप्त कर देता है। शस्यशाली खर्वट, ग्राम और खेटक (छोटा गाँव), सौ निवर्तन से अधिक या उसके आधे विस्तार में बने हुए गृह आदि अथवा गोचर्म (दस निवर्तन) के माप की भूमि का दान करके मनुष्य सब कुछ पा लेता है। जिस प्रकार तैल- बिन्दु जल या भूमि पर गिरकर फैल जाता है, उसी प्रकार सभी दानों का फल एक जन्मतक रहता है। स्वर्ण, भूमि और गौरी कन्या के दान का फल सात जन्मोंतक स्थिर रहता है। कन्यादान करनेवाला अपनी इक्कीस पीढ़ियों का नरक से उद्धार करके ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। दक्षिणासहित हाथी का दान करनेवाला निष्पाप होकर स्वर्गलोक में जाता है। अश्व का दान देकर मनुष्य दीर्घ आयु, आरोग्य, सौभाग्य और स्वर्ग को प्राप्त कर लेता है। श्रेष्ठ ब्राह्मण को दासीदान करनेवाला अप्सराओं के लोक में जाकर सुखोपभोग करता है। जो पाँच सौ पल ताँबे की थाली या ढाई सौ पल, सवा सौ पल अथवा उसके भी आधे (६२१/२) पलों की बनी थाली देता है, वह भोग तथा मोक्ष का भागी होता है ॥ २९–३९१/२

बैलों से युक्त शकटदान करने से मनुष्य विमान द्वारा स्वर्गलोक को जाता है। वस्त्रदान से आयु, आरोग्य और अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है। धान, गेहूँ, अगहनी का चावल और जौ आदि का दान करनेवाला स्वर्गलोक को प्राप्त होता है। आसन, धातुनिर्मित पात्र, लवण, सुगन्धियुक्त चन्दन, धूप-दीप, ताम्बूल, लोहा, चाँदी, रत्न और विविध दिव्य पदार्थों का दान देकर मनुष्य भोग और मोक्ष भी प्राप्त करता है। तिल और तिलपात्र का दान देकर मनुष्य स्वर्ग-सुख का भागी होता है। अन्नदान से बढ़कर कोई दान न तो है, न था और न होगा ही। हाथी, अश्व, रथ, दास-दासी और गृहादि के दान-ये सब अन्नदान की सोलहवीं कला के समान भी नहीं हैं। जो पहले बड़ा से बड़ा पाप करके फिर अन्नदान कर देता है, वह सम्पूर्ण पापों से छूटकर अक्षय लोकों को पा लेता है। जल और प्याऊ का दान देकर मनुष्य भोग और मोक्ष दोनों को सिद्ध कर लेता है। (शीतकाल में) मार्ग आदि में अग्नि और काष्ठ का दान करने से मनुष्य तेजोयुक्त होता है और स्वर्गलोक में देवताओं, गन्धर्वो तथा अप्सराओं द्वारा विमान में सेवित होता है ॥ ४०-४७ ॥

घृत, तैल और लवण का दान देने से सब कुछ मिल जाता है। छत्र, पादुका और काष्ठ आदि का दान करके स्वर्ग में सुखपूर्वक निवास करता है। प्रतिपदा आदि पुण्यमयी तिथियों में, विष्कुम्भ आदि योगों में, चैत्र आदि मासों में, संवत्सरारम्भ में और अश्विनी आदि नक्षत्रों में विष्णु, शिव, ब्रह्मा तथा लोकपाल आदि की अर्चना करके दिया गया दान महान् फलप्रद है। वृक्ष, उद्यान, भोजन, वाहन आदि तथा पैरों में मालिश के लिये तेल आदि देकर मनुष्य भोग और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ॥ ४८-५० ॥

इस लोक में गौ, पृथ्वी और विद्या का दान- ये तीनों समान फल देनेवाले हैं। वेद-विद्या का दान देकर मनुष्य पापरहित हो ब्रह्मलोक में प्रवेश करता है जो (योग्य शिष्य को ) ब्रह्मज्ञान प्रदान करता है, उसने तो मानो सप्तद्वीपवती पृथ्वी का दान कर दिया। जो समस्त प्राणियों को अभयदान देता है, वह मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है। पुराण, महाभारत अथवा रामायण का लेखन करके उस पुस्तक का दान करने से मनुष्य भोग और मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है। जो वेद आदि शास्त्र और नृत्य गीत का अध्यापन करता है, वह स्वर्गगामी होता है। जो उपाध्याय को वृत्ति और छात्रों को भोजन आदि देता है, उस धर्म एवं कामादि पुरुषार्थों के रहस्यदर्शी मनुष्य ने क्या नहीं दे दिया ॥ ५१-५५ ॥

सहस्र वाजपेय यज्ञों में विधिपूर्वक दान देने से जो फल होता है, विद्यादान से मनुष्य वह सम्पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो शिवालय, विष्णुमन्दिर तथा सूर्यमन्दिर में ग्रन्थवाचन करता है, वह सभी दानों का फल प्राप्त करता है। त्रैलोक्य में जो ब्राह्मणादि चार वर्ण और ब्रह्मचर्यादि चार आश्रम हैं, वे तथा ब्रह्मा आदि समस्त देवगण विद्यादान में प्रतिष्ठित हैं। विद्या कामधेनु है और विद्या उत्तम नेत्र है। गान्धर्व आदि उपवेदों का दान करने से मनुष्य गन्धर्वों के साथ प्रमुदित होता है, वेदाङ्गों के दान से स्वर्गलोक को प्राप्त करता है और धर्मशास्त्र के दान से धर्म के सांनिध्य को प्राप्त होकर दाता प्रमुदित होता है। सिद्धान्तों के दान से मनुष्य निस्संदेह मोक्ष प्राप्त करता है। पुस्तक-प्रदान से विद्यादान के फल की प्राप्ति होती है। इसलिये शास्त्रों और पुराणों का दान करनेवाला सब कुछ प्राप्त कर लेता है। जो शिष्यों को शिक्षादान करता है, वह पुण्डरीकयाग का फल प्राप्त करता है ॥ ५६-६२ ॥

जीविका दान के तो फल का अन्त ही नहीं है। जो अपने पितरों को अक्षय लोकों की प्राप्ति कराना चाहें, उन्हें इस लोक के सर्वश्रेष्ठ एवं अपने को प्रिय लगनेवाले समस्त पदार्थों का पितरों के उद्देश्य से दान करना चाहिये। जो विष्णु, शिव, ब्रह्मा, देवी और गणेश आदि देवताओं की पूजा करके पूजा- द्रव्य का ब्राह्मण को दान करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है। देवमन्दिर एवं देवप्रतिमा का निर्माण करानेवाला समस्त अभिलषित वस्तुओं को प्राप्त करता है। मन्दिर में झाड़ू-बुहारी और प्रक्षालन करनेवाला पुरुष पापरहित हो जाता है। देवप्रतिमा के सम्मुख विविध मण्डलों का निर्माण करनेवाला मण्डलाधिपति होता है। देवता को गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, प्रदक्षिणा, घण्टा, ध्वजा, चंदोवा और वस्त्र आदि समर्पित करने से एवं उनके दर्शन और उनके सम्मुख गाने-बजाने से मनुष्य भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है। भगवान्‌ को कस्तूरी, सिंहलदेशीय चन्दन, अगुरु, कपूर तथा मुस्त आदि सुगन्धि-द्रव्य और विजयगुग्गुल समर्पित करे और संक्रान्ति आदि के दिन एक प्रस्थ घृत से स्नान कराके मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है। ‘स्नान’ सौ पल का और पच्चीस पल का ‘अभ्यङ्ग’ मानना चाहिये। ‘महास्नान’ हजार पल का कहा गया है। भगवान्‌ को जलस्रान कराने से दस अपराध, दुग्धस्नान कराने से सौ अपराध, दुग्ध एवं दधि दोनों से स्नान कराने से सहस्र अपराध और घृतस्नान कराने से दस हजार अपराध विनष्ट हो जाते हैं। देवता के उद्देश्य से दास-दासी, अलंकार, गौ, भूमि, हाथी- घोड़े और सौभाग्य- द्रव्य देकर मनुष्य धन और दीर्घायु से युक्त होकर स्वर्गलोक को प्राप्त होता है ॥ ६३-७२ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘नाना प्रकार के दानों की महिमा का वर्णन’ नामक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २११ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.