अग्निपुराण – अध्याय 260
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ साठवाँ अध्याय
यजुर्विधान-यजुर्वेद के विभिन्न मन्त्रों का विभिन्न कार्यों के लिये प्रयोग
यजुर्विधानं

पुष्कर कहते हैं — परशुराम! अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले  ‘यजुर्विधान’ का वर्णन करता हूँ, सुनो। कार-संयुक्त महाव्याहृतियाँ समस्त पापों का विनाश करने वाली और सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली मानी गयी हैं। विद्वान् पुरुष इनके द्वारा एक हजार घृताहुतियाँ देकर देवताओं की आराधना करे। परशुराम। इससे मनोवाञ्छित कामना की सिद्धि होती है; क्योंकि यह कर्म अभीष्ट मनोरथ देने  वाला है। शान्ति की इच्छा  वाला पुरुष प्रणवयुक्त व्याहृति-मन्त्र से जौ की आहुति दे और जो पापों से मुक्ति चाहता हो, वह उक्त मन्त्र से तिलों द्वारा हवन करे। धान्य एवं पीली सरसों के हवन से समस्त कामनाओं की सिद्धि होती है। परधन की कामना  वाले  के लिये गूलर की समिधाओं द्वारा होम प्रशस्त माना गया है। अन्न चाहने वाले के लिये दधि से, शान्ति की इच्छा करने वाले के लिये दुग्ध से एवं प्रचुर सुवर्ण की कामना करने वाले के लिये अपामार्ग की समिधाओं से हवन करना उत्तम माना गया है। कन्या चाहने वाला एक सूत्र में ग्रथित दो-दो जातीपुष्पों को घी में डुबोकर उनकी आहुति दे।’

ग्रामाभिलाषी तिल एवं चावलों का हवन करे। वशीकरण कर्म में शाखोट (सिंहोर), वासा (अडूसा) और अपामार्ग (चिचिड़ा या ऊँगा) की समिधाओं का होम करना चाहिये। भृगुनन्दन। रोग का नाश करने के लिये विष एवं रक्त से सिक्त समिधाओं का हवन प्रशस्त है। शत्रुओं के वध की इच्छा से उक्त समिधाओं का क्रोधपूर्वक भलीभाँति हवन करे। द्विज सभी धान्यों से राजा की प्रतिमा का निर्माण करे और उसका हजार बार हवन करे। इससे राजा वश में हो जाता है। वस्त्राभिलाषी को पुष्पों से हवन करना चाहिये। दूर्वा का होम व्याधि का विनाश करने वाला है। ब्रह्मतेज की इच्छा करने वाले  पुरुष के लिये भगवत्प्रीत्यर्थ वासोग्य (उत्तम वस्त्र) अर्पण करने का विधान है। विद्वेषण-कर्म के लिये प्रत्यङ्गिराप्रोक्त विधि के अनुसार स्थापित अग्नि में धान की भूसी, कण्टक और भस्म के साथ काक और उलूक के पंखों का हवन करे। ब्रह्मन् । चन्द्रग्रहण के समय कपिला गाय के घी से गायत्री मन्त्र द्वारा आहुति देकर उस घी में वचा का चूर्ण मिलाकर ‘सम्पात’ नामक आहुति दे और अवशिष्ट वचा को लेकर उसे गायत्री मन्त्र से एक सहस्र बार अभिमन्त्रित करे। फिर उस वचा को खाने से मनुष्य मेधावी होता है।

लोहे या खदिर काष्ठ की ग्यारह अङ्गुल लंबी कील ‘द्विषतो वधोऽसि०’ (१ । २८) आदि मन्त्र का जप करते हुए शत्रु के घर में गाड़ दे। यह मैंने तुमसे शत्रुओं का नाश और उच्चाटन करने वाला कर्म बतलाया है। ‘चक्षुष्पा०’ (२ । १६) इत्यादि मन्त्र अथवा चाक्षुषी-जप से मनुष्य अपनी खोयी हुई नेत्रज्योति को पुनः पा लेता है। ‘उपयुञ्जत०’ इत्यादि अनुवाक अन्न की प्राप्ति कराने वाला है। ‘तनूपा अग्नेऽसि० (३ । १७) इत्यादि मन्त्र द्वारा दूर्वा का होम करने से मनुष्य का संकट दूर हो जाता है। ‘ भेषजमसि० (३ । ५९) इत्यादि मन्त्र से दधि एवं घृत का हवन किया जाय तो वह पशुओं पर आने वाली महामारी रोगों को दूर कर देता है। ‘त्र्यम्बकं यजामहे० (३ । ६०) इस मन्त्र से किया हुआ होम सौभाग्य की वृद्धि करने वाला है। कन्या का नाम लेकर अथवा कन्या के उद्देश्य से यदि उक्त मन्त्र का जप और होम किया जाय तो वह कन्या की प्राप्ति कराने वाला उत्तम साधन है। भय उपस्थित होने पर ‘त्र्यम्बकं०’ (३ । ६०) मन्त्र का नित्य जप करने वाला पुरुष सब प्रकार के भयों से छुटकारा पा जाता है।

परशुराम। घृतसहित धतूरे के फूल की उक्त मन्त्र से आहुति देकर साधक अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। जो ‘त्र्यम्बक’ मन्त्र से गुग्गुल की आहुति देता है, वह स्वप्न में भगवान् शंकर का दर्शन पाता है। ‘युञ्जते मनः०’ (५ । १४) – इस अनुवाक का जप करने से दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है। ‘विष्णो रराटमसि०’ (५।२१) आदि मन्त्र सम्पूर्ण बाधाओं का निवारण करने वाला है। यह मन्त्र राक्षसों का नाशक, कीर्तिवर्द्धक एवं विजयप्रद है। ‘ अयं नो अग्निः०’ (५ । ३७) इत्यादि मन्त्र संग्राम में विजय दिलाने वाला है। स्नानकाल में ‘इदमापः प्रवहत०’ इत्यादि (६ । १७) मन्त्र का जप पापनाशक है। दस अङ्गुल लंबी लोहे की सुई को ‘विश्वकर्मन् हविषा०’ (१७ । २२)- इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करके जिस कन्या के द्वार पर गाड़ दे, वह कन्या दूसरे किसी को नहीं दी जा सकती। ‘देव सवितः०’ (११ । ७)- इस मन्त्र से होम करने पर मनुष्य प्रचुर अन्न- राशि से सम्पन्न होता है ॥ १-२२ ॥

धर्मज्ञ जमदग्निनन्दन ! बल की इच्छा रखने वाला श्रेष्ट द्विज ‘अग्नौ स्वाहा’ मन्त्र से तिल, यव, अपामार्ग एवं तण्डुलों से युक्त हवन सामग्री द्वारा होम करे। विप्रवर ! इसी मन्त्र से गोरोचन को सहस्र बार अभिमन्त्रित करके उसका तिलक करने से मनुष्य लोकप्रिय हो जाता है। रुद्र-मन्त्रों का जप सम्पूर्ण पापों का विनाश करने वाला है। उनके द्वारा किया गया होम सम्पूर्ण कर्मों का साधक और सर्वत्र शान्ति प्रदान करने वाला है। धर्मज्ञ भृगुनन्दन ! बकरी, भेड़, घोड़े, हाथी, गौ, मनुष्य, राजा, बालक, नारी, ग्राम, नगर और देश यदि विविध उपद्रवों से पीड़ित एवं रोगग्रस्त हो गये हो, अथवा महामारी या शत्रुओं का भय उपस्थित हो गया हो तो घृतमिश्रित खीर से रुद्रदेवता के लिये किया गया होम परम शान्तिदायक होता है। रुद्रमन्त्रों से कूष्माण्ड एवं घृत का होम सम्पूर्ण पापों का विनाश करता है। नरश्रेष्ठ! जो मानव केवल रात में सत्तु, जौ की लप्सी एवं भिक्षान्न भोजन करते हुए एक मास तक बाहर नदी या जलाशय में स्नान करता है, वह ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। ‘मधुवाता०’ (१३ । २७) इत्यादि मन्त्र से होम आदि का अनुष्ठान करने पर सब कुछ मिलता है। ‘दधिक्राव्णो०’ (२३।३२)- इस मन्त्र से हवन करके गृहस्थ पुत्रों को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है। इसी प्रकार ‘घृतवती भुवनानामभि०’ (३४ । ४५) – इस मन्त्र से किया गया घृत का होम आयु को बढ़ाने वाला है। ‘स्वस्ति न इन्द्रो० (२५ । १९)- यह मन्त्र समस्त बाधाओं का निवारण करने वाला है।

‘इह गावः प्रजायध्वम्०’ – यह मन्त्र पुष्टिवर्धक है। इससे घृत की एक हजार आहुतियाँ देने पर दरिद्रता का विनाश होता है। ‘देवस्य त्वा०’ इस मन्त्र से स्रुवा द्वारा अपामार्ग और तण्डुल का हवन करने पर मनुष्य विकृत अभिचार से शीघ्र छुटकारा पा जाता है, इसमें संशय नहीं है। ‘रुद्र यत्ते०’ (१० । २०) मन्त्र से पलाश की समिधाओं का हवन करने से सुवर्ण की उपलब्धि होती है। अग्नि के उत्पात में मनुष्य ‘शिवो भव०’ (११ । ४५) मन्त्र से धान्य की आहुति दे। ‘या सेनाः० (११ । ७७)- इस मन्त्र से किया गया हवन चोरों से प्राप्त होने वाले भय को दूर करता है। ब्रह्मन्। जो मनुष्य ‘यो अस्मभ्यमरातीयात्० (११ । ८०)- इस मन्त्र से काले तिलों की एक हजार आहुति देता है, वह विकृत अभिचार से मुक्त हो जाता है। ‘अन्नपते०’ (११ । ८३) – इस मन्त्र से अन्न का हवन करने से मनुष्य को प्रचुर अन्न प्राप्त होता है। ‘हंसः शुचिषत्० (१० । २४) इत्यादि मन्त्र का जल में किया गया जप समस्त पापों का नाश करता है। ‘चत्वारि शृङ्गा०’ (१७ । ९१) इत्यादि मन्त्र का जल में किया गया जप समस्त पापों का अपहरण करने वाला है। ‘देवा यज्ञमतन्वत०’ (१९ । १२) इसका जप करके साधक ब्रह्मलोक में पूजित होता है। ‘वसन्तो स्यासीद्’ (३१ । १४) इत्यादि मन्त्र से घृत की आहुति देने पर भगवान् सूर्य से अभीष्ट वर की प्राप्ति होती है। ‘सुपर्णोऽसि०’ (१७ । ७२) इत्यादि मन्त्र से साध्यकर्म व्याहृति-मन्त्रों से साध्यकर्म के समान ही होता है । ‘नमः स्वाहा०’ आदि मन्त्र का तीन बार जप करके मनुष्य बन्धन से मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

जल के भीतर ‘द्रुपदादिव मुमुचानः०’ (२० । २०) इत्यादि मन्त्र की तीन आवृत्तियाँ करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। ‘इह गावः प्रजायध्वम्०’ इस मन्त्र से घृत, दधि, दुग्ध अथवा खीर का हवन करने पर बुद्धि को वृद्धि होती है। ‘शं नो देवीः० (३६ । १२)- इस मन्त्र से पलाश के फलों की आहुति देने से मनुष्य आरोग्य, लक्ष्मी और दीर्घ जीवन प्राप्त करता है। ‘ओषधीः प्रतिमोदध्वम्० (१२ । ७७)- इस मन्त्र से बीज बोने और फसल काटने के समय होम करने पर अर्थ की प्राप्ति होती है। ‘अश्वावतीर्गोमतीर्न उषासो० (३४ । ४०) मन्त्र से पायस का होम करने से शान्ति की प्राप्ति होती है। ‘तस्मा अरं गमाम०’ (३६ । १६) इत्यादि मन्त्र से होम करने पर बन्धनग्रस्त मनुष्य मुक्त हो जाता है। ‘युवा सुवासा०’ (तै० ब्रा० ३ । ६ । १३) इत्यादि मन्त्र से हवन करने पर उत्तम वस्त्रों की प्राप्ति होती है। ‘मुञ्चन्तु मा शपथ्यात्०’ (१२ । ९०) इत्यादि मन्त्र से हवन करने पर शाप या शपथ आदि समस्त किल्बिषों का नाश होता है। ‘मा मा हिंसीज्जनिताः (१२ । १०२) इत्यादि मन्त्र से घृतमिश्रित तिलों का होम शत्रुओं का विनाश करने वाला होता है। ‘नमोऽस्तु सर्वेभ्यो०’ (१३।६) इत्यादि मन्त्र से घृत का होम एवं ‘कृणुष्व पाजः०’ (१३ । ९) इत्यादि मन्त्र से खीर का होम अभिचार का उपसंहार करने वाला है। ‘काण्डात् काण्डात्०’ (१३ । २०) इत्यादि मन्त्र से दूर्वाकाण्ड की दस हजार आहुतियाँ देकर होता ग्राम या जनपद में फैली हुई महामारी को शान्त करे। इससे रोगपीड़ित मनुष्य रोग से और दुःखग्रस्त मानव दुःख से छुटकारा पाता है।

परशुराम ! ‘मधुमान्नो वनस्पतिः०’ (१३। २९) इत्यादि मन्त्र से उदुम्बर की एक हजार समिधाओं का हवन करके मनुष्य धन प्राप्त करता है तथा महान् सौभाग्य एवं व्यवहार में विजय लाभ करता है। ‘अपां गम्भन्सीद मा त्वा०’ (वा० १३ । ३०) इत्यादि मन्त्र से हवन करके मनुष्य निश्चय ही पर्जन्यदेव से वर्षा करवा सकता है। धर्मज्ञ परशुराम ! ‘अपः पिवन् वौषधीः०’ (१४ । ८) इत्यादि मन्त्र से दधि, घृत एवं मधु का हवन करके यजमान तत्काल महावृष्टि करवाता है। ‘नमस्ते रुद्र०’ (१६ । १) इत्यादि मन्त्र से आहुति दी जाय तो यह कर्म समस्त उपद्रवों का नाशक, सर्वशान्तिदायक तथा महापातकों का निवारक कहा गया है। ‘अध्यवोचदधिवक्ता०’ (१६ । ५) इत्यादि मन्त्र से आहुति देने पर व्याधिग्रस्त मनुष्य की रक्षा होती है। इस मन्त्र से किया गया हवन राक्षसों का नाशक, कीर्तिकारक तथा दीर्घायु एवं पुष्टि का वर्धक है। मार्ग में सफेद सरसों फेंकते हुए इसका जप करने वाला राहगीर सुखी होता है। धर्मज्ञ भृगुनन्दन ! ‘असौ यस्ताम्रः० (१६ । ६) इसका पाठ करते हुए नित्य प्रातःकाल एवं सायंकाल आलस्यरहित होकर भगवान् सूर्य का उपस्थान करे। इससे वह अक्षय अन्न एवं दीर्घ आयु प्राप्त करता है। ‘प्रमुञ्च धन्वन्० (१६ । ९-१४) इत्यादि छः मन्त्रों से किया गया आयुधों का अभिमन्त्रण युद्ध में शत्रुओं के लिये भयदायक है, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। ‘मा नो महान्तम्०’ (१६ । १५) इत्यादि मन्त्र का जप एवं होम बालकों के लिये शान्तिकारक होता है। ‘नमो हिरण्यबाहवे०’ (१६ । १७) इत्यादि सात अनुवाकों से कड़ुए तेल में मिलायी गयी राई की आहुति दे तो वह शत्रुओं का नाश करने वाली होती है।

‘नमो वः किरिकेभ्यो०’ (१६ । ४६) – इस अर्धमन्त्र से एक लाख कमल- पुष्पों का हवन करके मनुष्य राज्यलक्ष्मी प्राप्त कर लेता है तथा बिल्वफलों से उतनी ही आहुतियाँ देने पर उसे सुवर्णराशि की उपलब्धि होती है। ‘इमा रुद्राय०’ (१६।४८) मन्त्र से तिलों का होम करने पर धन की प्राप्ति होती है। एवं इसी मन्त्र से घृतसिक्त दूर्वा का हवन करने पर मनुष्य समस्त व्याधियों से मुक्त होता है। परशुराम ! ‘आशुः शिशानः०’ (१७ । ३३) यह मन्त्र आयुधों की रक्षा एवं संग्राम में सम्पूर्ण शत्रुओं का विनाश करने वाला है। धर्मज्ञ द्विजश्रेष्ठ! ‘वाजश्च मे०’ (१८ । १५-१९) इत्यादि पाँच मन्त्रों से घृत की एक हजार आहुतियाँ दे। इससे मनुष्य नेत्ररोग से मुक्त हो जाता है। ‘शं नो वनस्पते०’ (१९ । ३८) इस मन्त्र से घर में आहुति देने पर वास्तुदोष का नाश होता है। ‘अग्न आयूंषि०’ (१९ । ३८) इत्यादि मन्त्र से घृत का हवन करके मनुष्य किसी का द्वेषपात्र नहीं होता। ‘अपां फेनेन०’ (१९ । ७१) मन्त्र से लाजा का होम करके योद्धा विजय प्राप्त करता है। ‘भद्रा उत प्रशस्तयो०’ (१४ । ३९) इत्यादि मन्त्र के जप से इन्द्रियहीन अथवा दुर्बलेन्द्रिय मनुष्य समस्त इन्द्रियों की शक्ति से सम्पन्न हो जाता है। ‘अग्निश्च पृथिवी च०’ (२६ । १) इत्यादि मन्त्र उत्तम वशीकरण है।  अध्वना० (५ । ३३) आदि मन्त्र का जप करने वाला मनुष्य व्यवहार (मुकदमे) में विजयी होता है। कार्य के आरम्भ में ‘ब्रह्य क्षत्रं पवते०’ (१९ । ५) इत्यादि मन्त्र का जप सिद्धि प्रदान करता है। ‘संवत्सरोऽसि०’ (२७ । ४५) इत्यादि मन्त्र से घृत की एक लाख आहुतियाँ देने वाला रोगमुक्त हो जाता है। ‘केतुं कृण्वन्०’ (२९ । ३७) इत्यादि मन्त्र संग्राम में विजय दिलाने वाला है। ‘इन्द्रोऽग्निर्धर्मः’ मन्त्र युद्ध में धर्मसंगत विजय को प्राप्ति कराता है।

‘धन्वना गा०’ (२९ । ३९) मन्त्र का धनुष ग्रहण करने के समय जप करना उत्तम माना गया है। ‘यजीतयह मन्त्र धनुष की प्रत्यञ्चा को अभिमन्त्रित करने के लिये है, ऐसा जानना चाहिये। ‘अहिरिव भोगैः (२९ । ५१) मन्त्र का बाणों को अभिमन्त्रित करने में प्रयोग करे। ‘वह्नीनां पिता०’ (२९ । ४२)- यह तूणीर को अभिमन्त्रित करने का मन्त्र बतलाया गया है। ‘युञ्जन्त्यस्य०’ (२३ । ६) इत्यादि मन्त्र अश्वों को रथ में जोतने के लिये उपयोगी बताया गया है। ‘आशुः शिशानः०’ (१७ । ३३) यह मन्त्र यात्रारम्भ के समय मङ्गल के रूप में पठनीय कहा जाता है। ‘विष्णोः क्रमोऽसि०’ (१२ । ५) मन्त्र का पाठ रथारोहण के समय करना उत्तम है। ‘आजङ्घन्ति०’ (२९ । ५०) इस मन्त्र से अश्व को प्रेरित करने के लिये प्रथम बार चाबुक से हाँके। ‘वाः सेना अभित्वरीः० (११ । ७७) इत्यादि मन्त्र का शत्रुसेना के सम्मुख जप करे। ‘दुन्दुभ्यः०’ इत्यादि मन्त्र से दुन्दुभि या नगारे को पीटे। इन मन्त्रों से पहले हवन करके तब उपर्युक्त कर्म करने पर योद्धा को संग्राम में विजय प्राप्त होती है। विद्वान् पुरुष ‘यमेन दत्तं० (२९ । १३) इस मन्त्र से एक करोड़ आहुतियाँ देकर संग्राम के लिये शीघ्र ही विजयप्रद रथ उत्पन्न कर सकता है। ‘आकृष्णेन० (३४ । ३१) इत्यादि मन्त्र से साध्यकर्म व्याहृतियों के समान ही होता है।

‘यज्जाग्रतो०’ (३४ । १) इत्यादि शिवसंकल्प- सम्बन्धी सूक्तों के जप से साधक का मन एकाग्र होता है। ‘पञ्चनद्यः० (३४ । ११) इत्यादि मन्त्र से पाँच लाख घी की आहुतियाँ देने पर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। ‘यदाबघ्नन् दाक्षायणाः०’ (३४ । ५२)- इस मन्त्र से हजार बार अभिमन्त्रित करके सुवर्ण को धारण करे। यह प्रयोग शत्रुओं का निवारण करने वाला होता है। ‘इमं जीवेभ्यः०’ (३५ । १५) मन्त्र से शिला अथवा ढेले को अभिमन्त्रित करके घर में चारों ओर फेंक दे। ऐसा करने वाले को रात में चोरों से भय नहीं होता। ‘परीमे गामनेषत्०’ (३५ । १८)- यह उत्तम वशीकरण मन्त्र है। इस मन्त्र के प्रयोग से मारने के लिये आया हुआ मनुष्य भी वश में हो जाता है। धर्मात्मन् । उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित भक्ष्य, ताम्बूल, पुष्प आदि किसी को दे दिया जाय तो वह शीघ्र ही देने वाले के वशीभूत हो जायगा। ‘शं नो मित्रः० (३६ । ९) यह मन्त्र सदैव सभी स्थानों पर शान्ति प्रदान करने वाला है। ‘गणानां त्वा गणपतिं० (२३ । १९) इस मन्त्र से चौराहे पर सप्तधान्य का हवन करके होता सम्पूर्ण जगत्‌ को वशीभूत कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। ‘हिरण्यवर्णाः शुकयः – इस मन्त्र का अभिषेक में प्रयोग करना चाहिये। ‘शं नो देवीरभीष्टये०’ (३६ । १२)- यह मन्त्र परम शान्तिकारक है। ‘एकचक्र०’ इत्यादि मन्त्र से आज्यभागपूर्वक ग्रहों के लिये घी की आहुति देने पर साधक को शान्ति प्राप्त होती है और निस्संदेह उसे ग्रहों का कृपाप्रसाद सुलभ हो जाता है। ‘गाव उपावतावम्० (३३ । २९) एवं ‘भग प्रणेतः०’ (३४ । ३६-३७) इत्यादि दो मन्त्रों से घृत का हवन करके मनुष्य गौओं की प्राप्ति करता है। ‘प्रवादां षः सोपत्०’ इस मन्त्र का ग्रहयज्ञ में प्रयोग होता है। ‘देवेभ्यो वनस्पते०’ इत्यादि मन्त्र का वृक्षयज्ञ में विनियोग होता है। गायत्री को विष्णुरूपा जाने। समस्त पापों का प्रशमन एवं समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला विष्णु का परमपद भी वही है ॥ २३-८४ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘यजुर्वेद-विधान-कथन’ नामक दो सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६० ॥

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