अग्निपुराण – अध्याय 315
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय
स्तम्भन आदि के मन्त्रों का कथन
स्तम्भनादिमन्त्रः

अग्निदेव कहते हैं — मुने ! अब मैं स्तम्भन, मोहन, वशीकरण, विद्वेषण तथा उच्चाटन के प्रयोग बताता हूँ। विषव्याधि, आरोग्य, मारण तथा उसके शमन के प्रयोग भी बता रहा हूँ। भोजपत्र पर ताड़ की कलम से ‘कूर्मचक्र’ लिखे। वह छः अङ्गुल के माप का होना चाहिये। तदनन्तर द्विज उसके मुख तथा चारों पैरों में मन्त्र का न्यास करे। चारों पैरों में ‘क्रीं’ तथा मुख में ‘ह्रीं’ लिखे। गर्भस्थान में त्वरिता-विद्या का उल्लेख करके पृष्ठभाग में साध्य नाम लिखे। फिर मालामन्त्रों से वेष्टित करके उस यन्त्र को ईंट के ऊपर स्थापित करे। तत्पश्चात् उसे ढककर कूर्मपीठगत ‘करालमन्त्र’ से अभिमन्त्रित करे। महाकूर्म का पूजन करके चरणोदक को शत्रु के उद्देश्य से फेंके तथा शत्रु का स्मरण करके उसे सात बार बायें पैर से ताड़ित करे। इससे मुखभाग से शत्रु का स्तम्भन होता ॥ १-५१/२ ॥’

भैरव की मूर्ति लिखकर उसके चारों ओर निम्नाङ्कित मालामन्त्र लिखे —

‘ॐ शत्रुमुखस्तम्भनी कामरूपा आलीढकरी। ह्रीं फें फेत्कारिणी मम शत्रूणां देवदत्तानां मुखं स्तम्भय स्तम्भय मम सर्वविद्वेषिणां मुखस्तम्भनं कुरु कुरु कुरु ॐ हूं फें फेत्कारिणि स्वाहा।’

इसके बाद ‘फट्’ और हेतु (प्रयोग का उद्देश्य) लिखकर उक्त मन्त्र का जप करते हुए उस महाबली भैरव के वाम हाथ में ‘नग’ (पर्वत या वृक्ष) और दाहिने हाथ में ‘शूल’ लिखे। तदनन्तर ‘अघोरमन्त्र’ लिखे। इससे वह संग्राम में शत्रुओं को स्तम्भित कर देता है ॥ ६-९ ॥

‘ॐ नमो भगवत्यै भगमालिनि विस्फुर विस्फुर, स्पन्द स्पन्द, नित्यक्लिन्ने द्रव द्रव हूं सः क्रींकाराक्षरे स्वाहा।’

— इस मन्त्र का जप करते हुए रोचना आदि से तिलक करने पर मनुष्य सारे जगत्‌ को मोहित कर सकता है ॥ १०-११ ॥

‘ॐ फें हुं फट् फेत्कारिणि ह्रीं ज्वल ज्वल, त्रैलोक्यं मोहय मोहय, गुह्यकालिके स्वाहा।’

— इससे तिलक करके मनुष्य राजा आदिको भी वशमें कर लेता है ॥ १२ ॥

जहाँ गधा बैठा हो उस स्थान की धूल, शव के ऊपर चढ़ा हुआ फूल तथा स्त्री के रज में संलग्न वस्त्र का टुकड़ा लेकर रात में शत्रु की शय्या आदि पर फेंक दे। इससे उसके स्वजनों में विद्वेष उत्पन्न हो जाता है। गाय का खुर और शृङ्ग, घोड़े की टाप का कटा हुआ टुकड़ा तथा साँप का सिर — इन सबको कूटकर एक में मिला दे और द्वेषपात्र के घरों पर फेंक दे। इससे शत्रुवर्ग का उच्चाटन होता है। कनेर की पीली शिफा (मूल या जड़) मारण के प्रयोग में संसिद्ध (सफल) है। साँप और छछूँदर का रक्त तथा कनेर का बीज भी मारणरूपी प्रयोजन का साधक है। मरे हुए गिरगिट, भ्रमर, केकड़ा और बिच्छू का चूरन बनाकर तेल में डाल दे। उस तेल को अपने शरीर में लगाने वाला मनुष्य कोढ़ी हो जायगा ॥ १३-१६ ॥

‘ॐ नवग्रहाय सर्वशत्रून् मम साधय साधय, मारय मारय आं सों मं बुं गुं शुं शं रां कें ॐ स्वाहा।’ इस मन्त्र को भोजपत्र या नवग्रह- प्रतिमा पर लिखकर आक (मदार) के सौ फूलों से पूजा करके शत्रु-मारण के उद्देश्य से उस यन्त्र या प्रतिमा को श्मशानभूमि में गाड़ दे। इससे समस्त ग्रह साधक के शत्रु को मार डालते हैं ॥ १७-१८ ॥

‘ॐ कुञ्जरी ब्रह्माणी, ॐ मञ्जरी माहेश्वरी, ॐ वेताली कौमारी, ॐ काली वैष्णवी, ॐ अघोरा वाराही, ॐ वेतालीन्द्राणी, ॐ उर्वशी चामुण्डा, ॐ वेताली चण्डिका, ॐ जयाली यक्षिणी, नवमातरो हे मम शत्रु गृह्णत गृह्णत।’

भोजपत्र पर इस मन्त्र को लिखे। ‘शत्रु’ पद के स्थान में शत्रु के नाम का निर्देश करे। फिर श्मशान- भूमि में उस यन्त्र की पूजा करे तो शत्रु की मृत्यु हो जाती है ॥ १९ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘स्तम्भन आदि के मन्त्र का कथन’ नामक तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१५ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.