July 19, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 333 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय अर्धसम वृत्तों का वर्णन अर्द्धसमनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — जिसके प्रथम चरण में तीन सगण, एक लघु और एक गुरु (कुल ग्यारह अक्षर) हों, दूसरे चरण में तीन भगण एवं दो गुरु हों तथा पूर्वार्ध के समान ही उत्तरार्ध भी हो, वह ‘उपचित्रक’ 1 नामक छन्द है। जिसके प्रथम पाद में तीन भगण एवं दो गुरु हों और द्वितीय पाद में एक नगण (।।।), दो जगण (।ऽ।) एवं एक जगण हो, वह ‘द्रुतमध्या’ 2 नामक छन्द होता है। [यहाँ भी प्रथम पाद के समान तृतीय पाद और द्वितीय पाद के समान चतुर्थ पाद जानना चाहिये। यही बात आगे के छन्दों में भी स्मरण रखने योग्य है। जिसके प्रथम चरण में तीन सगण और एक गुरु तथा द्वितीय चरण में तीन भगण एवं दो गुरु हों, उस छन्द का नाम ‘वेगवती’ 3 है। ‘ जिसके पहले पाद में तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) और एक गुरु तथा दूसरे चरणमें मगण (ऽऽऽ), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) एवं दो गुरु हों, वह ‘भद्रविराट् 4 नामक छन्द है। जिसके प्रथम पाद में सगण, जगण, सगण और एक गुरु तथा द्वितीय पाद में भगण, रगण, नगण और दो गुरु हों, उसका नाम ‘केतुमती’5 है। जिसके पहले चरण में दो तगण, एक जगण और दो गुरु हों तथा दूसरे चरण में जगण, तगण, जगण एवं दो गुरु हों, उसे ‘आख्यानिकी’ 6 कहते हैं। इसके विपरीत यदि प्रथम चरण में जगण, तगण, जगण एवं दो गुरु हों और द्वितीय चरण में दो तगण, एक जगण तथा दो गुरु हों तो उसकी ‘विपरीताख्यानकी’ 7 संज्ञा होती है। जिसके पहले पाद में तीन सगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा दूसरे में नगण, भगण, भगण एवं रगण मौजूद हों, उस छन्द का नाम ‘हरिणप्लुता’ 8 है। जिसके प्रथम चरण में दो नगण, एक रगण, एक लघु और एक गुरु हो तथा दूसरे चरण में एक नगण, दो जगण और एक रगण हो, वह ‘अपरवक्त्र’ 9 नामक छन्द है। जिसके प्रथम पाद में दो नगण, एक रगण और एक यगण हो तथा दूसरे में एक नगण, दो जगण, एक रगण और एक गुरु हो, उसका नाम ‘पुष्पिताग्रा’ 10 है। जिसके पहले चरण में रगण, जगण, रगण, जगण हो तथा दूसरे में जगण, रगण, जगण, रगण और एक गुरु हो उसे ‘यवमती’ 11 कहते हैं। जिसके प्रथम और तृतीय चरणों में अट्ठाईस लघु और अन्त में एक गुरु हो तथा दूसरे एवं चौथे चरणों में तीस लघु एवं एक गुरु हो तो उसका नाम ‘शिखा’ 12 होता है। इसके विपरीत यदि प्रथम और तृतीय चरणों में तीस लघु और एक गुरु हो तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरणों में अट्ठाईस लघुके साथ एक गुरु हो तो उसे ‘खञ्जा 13 कहते हैं। अब ‘समवृत्त ‘का दिग्दर्शन कराया जाता है ॥ १-६ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘अर्थसमवृत्तका वर्णन’ नामक तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३३ ॥ 1. उपचित्रकमत्र विराजते चूतवनं कुसुमैर्विकसद्भिः । परपुष्टविघुष्टमनोहरं मन्मथकेलिनिकेतनमेतत् ॥ 2. यद्यपि शीघ्रगतिर्मृदुगामी बहुधनवानपि दुःखमुपैति । नातिशयत्वरिता न च मृद्वी नृपतिगतिः कथिता द्रुतमध्या ॥ 3. तव मुञ्ज नराधिपसेनां वेगवतीं सहते समरेषु । प्रलयोर्मिमिवाभिमुखीं तां कः सकलक्षितिभृन्निवहेषु ॥ 4. यत्पादतले चकास्ति चक्रं हस्ते वा कुलिशं सरोरुहं वा । राजा जगदेकचक्रवर्ती स्याच्छं भद्रविराट् समश्रुतेऽसौ ॥ 5. हृतभूरिभूमिपतिचिह्नां युद्धसहस्रलब्धजयलक्ष्मीम् । सहते न कोऽपि वसुधायां केतुमतीं नरेन्द्र तव सेनाम् ॥ 6. भृङ्गावलीमङ्गलगीतनादैर्जनस्य चित्ते मुदमादधाति । आख्यानिकी च स्मरजन्मपाशमहोत्सवस्याश्रवणे क्वणन्ती ॥ 7. अलं तवालीकवचोभिरेभिः स्वार्थं प्रिये साधय कार्यमन्यत् । कथं कथावर्णनकौतुकं स्यादाख्यानिकी चेद् विपरीतवृत्तिः ॥ आख्यानिकी के दोनों भेद उपजाति के अन्तर्गत हैं । यहाँ विशेष संज्ञा – विधान के लिये पढ़े गये हैं । 8. तव मुञ्ज नराधिप विद्विषां भयविवर्जितकेतुलघीयसाम् । रणभूमिपराङ्मुखवर्त्मनां भवति शीघ्रगतिर्हरिणीप्लुता || 9. ‘ अपरवक्त्र’ नामक छन्द ‘वैतालीय’ छन्द के अन्तर्गत है; फिर भी विशेष संज्ञा – विधान के लिये यहाँ पढ़ा गया है । उदाहरण — सकृदपि कृपणेन चक्षुषा नरवर पश्यति यस्तवाननम् । न पुनरपरवक्त्रमीक्षते स हि सुखितोऽर्थिजनस्तथाविधः ॥ 10. यह छन्द ‘औपच्छन्दसक के अन्तर्गत है, तो भी विशेष संज्ञा देने के लिये इस प्रकरण में इसका पाठ किया गया है। उदाहरण — समसितदशना मृगायताक्षी स्मितसुभगा प्रियवादिनी विदग्धा । अपहरति नृणां मनांसि रामा भ्रमरकुलानि लतेव पुष्पिताग्रा ॥ 11. पद्मकं तु कोमले करे विभाति प्रशस्तमत्स्यलाञ्छनं च पदे यस्याः । सा यवान्विता भवेद्धनाधिका च समस्तबन्धुपूजिता प्रिया च पत्युः ॥ 12. अभिमतबकुलकुसुमघनपरिमलमिलदलिमुखरितहरिति मधौ सहचरमलयपवनरयतरलितसरसिजरजसि शयतरणि वितते । विकसित विविधकुसुमसुलभसुरभिशरमदननिहतसकलजने ज्वलयति मम हृदयमविरतमिह सुतनु तव विरहदहनविषमशिखा ॥ 13. ‘शिखा’ छन्द के ही समान ‘खञ्जा का भी उदाहरण होगा। उसका सम इसका विषम होगा और उसका विषम इसका सम होगा। Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe