अग्निपुराण – अध्याय 345
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय
शब्दार्थोभयालंकार निरुपण
शब्दार्थालङ्काराः

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! ‘शब्दार्थालंकार’ शब्द और अर्थ दोनों को समानरूप से अलंकृत करता है; जैसे एक ही अङ्ग में धारण किया हुआ हार कामिनी के कण्ठ एवं कुचमण्डल की कान्ति को बढ़ा देता है। ‘शब्दार्थालंकार’ के छः भेद काव्य में उपलब्ध होते हैं — प्रशस्ति, कान्ति, औचित्य, संक्षेप, यावदर्थता तथा अभिव्यक्ति । दूसरों के मर्मस्थल को द्रवीभूत करने वाले वाक् कौशल को ‘प्रशस्ति’ कहते हैं। वह प्रशस्ति ‘प्रेमोक्ति’ एवं ‘स्तुति’ के भेद से दो प्रकार की मानी गयी है। प्रेमोक्ति और स्तुति के पर्यायवाचक शब्द क्रमशः ‘प्रियोक्ति’ एवं ‘गुण-कीर्तन’ हैं। वाच्य वाचक की सर्वसम्मत एवं रुचिकर संगति को ‘कान्ति’ कहते हैं। यदि ओज एवं माधुर्ययुक्त संदर्भ में — वस्तु के अनुसार रीति एवं वृत्ति के अनुसार रस का प्रयोग हो तो औचित्य का प्रादुर्भाव होता है।’

अल्पसंख्यक शब्दों से अर्थ-बाहुल्य का संग्रह ‘संक्षेप’ तथा शब्द एवं वस्तु का अन्यूनाधिक्य ‘यावदर्थता’ कहा जाता है। अर्थ-प्राकट्य को ‘अभिव्यक्ति’ कहते हैं। उसके दो भेद हैं — ‘ श्रुति’ और ‘आक्षेप’। शब्द के द्वारा अपने अर्थ का उ‌द्घाटन ‘श्रुति’ कहा जाता है। श्रुति के दो भेद हैं — ‘नैमित्तिकी’ और ‘पारिभाषिकी’। ‘संकेत’ को परिभाषा कहते हैं। परिभाषा के सम्बन्ध से ही वह पारिभाषिकी है। पारिभाषिकी को ‘मुख्या’ और नैमित्तिकी को ‘औपचारिकी’ कहते हैं। [ये ही क्रमशः ‘अभिधा’ और ‘लक्षणा’ हैं।] उस औपचारिकी के भी दो भेद हैं। जिसके द्वारा अभिधेय अर्थ से स्खलित हुआ शब्द किसी निमित्तवश अमुख्य अर्थ का बोधक होता है, वह वृत्ति ‘औपचारिकी’ है। ये ही दोनों भेद नैमित्तिकी के भी होते हैं। वह लक्षणायोग से ‘लाक्षणिकी’ और गुणयोग से ‘गौणी’ कहलाती है। अभिधेय अर्थ के साथ सम्बद्ध रहकर जो अन्यार्थ की प्रतीति होती है, उसको ‘लक्षणा’ कहते हैं। अभिधेय के साथ सम्बन्ध, सामीप्य, समवाय, वैपरीत्य एवं क्रियायोग से लक्षणा पाँच प्रकार की मानी जाती है। गुणों की अनन्तता होने से उनकी विवक्षा के कारण गौणी के अनन्त भेद हो जाते हैं।

लोकसीमा के पालन में तत्पर कवि द्वारा जब अप्रस्तुत वस्तु के धर्म प्रस्तुत वस्तु पर सम्यग्रूप से आहित — आरोपित किये जाते हैं, तब उसे ‘समाधि’ 1  कहते हैं। जिसके द्वारा श्रुति से अनुपलब्ध अर्थ चैतन्ययुक्त होकर भासित होता है, वह ‘आक्षेप’ 2 कहा जाता है। इसको ‘ध्वनि’ भी माना गया है; क्योंकि वह ध्वनि से ही व्यक्त होता है। इसमें ध्वनि के आश्रय से शब्द और अर्थ के द्वारा स्वतः संकलित अर्थ ही व्यञ्जित होता है। अभीष्ट कथन का विशेष विवक्षा से अर्थात् उसमें और भी उत्कर्ष की प्रतीति कराने के लिये जो प्रतिषेध-सा होता है, उसको ‘आक्षेप’ 3  कहते हैं। अधिकार (प्रकरण) से पृथक्, अर्थात् अप्रकृत या अप्रस्तुत अन्य वस्तु की जो स्तुति की जाती है, उसे ‘अस्तुतस्तोत्र’ 4  (अप्रस्तुतप्रशंसा) कहते हैं। जहाँ किसी एक वस्तु के कहने पर उसके समान विशेषण वाले दूसरे अर्थ की प्रतीति हो, उसे विद्वान् पुरुष अर्थ की संक्षिप्तता के कारण ‘समासोक्ति’ 5 कहते हैं। वास्तविक पदार्थ का अपलाप या निषेध करके किसी अन्य पदार्थ को सूचित करना ‘अपह्नुति’ 6  है। जो अभिधेय दूसरे प्रकार से कहा जाता है अर्थात् सीधे न कहकर प्रकारान्तर से घुमा-फिराकर प्रस्तुत किया जाता है, उसको ‘पर्यायोक्ति’ 7  कहते हैं। इनमें से किसी भी एक का नाम ‘ध्वनि’ 8  है ॥ १-१८ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘शब्दार्थोभयालंकारों का कथन’ नामक तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४५ ॥

1. अग्निपुराण में ‘समाधि’ का जो लक्षण किया गया है, वह भरतमुनि के निम्नाङ्कित श्लोक पर आधारित है —
अभियुक्तैर्विशेषस्तु योऽर्थस्यैवोपलभ्यते । तेन चार्थेन सम्पन्नः समाधिः परिकीर्त्यते ॥ (नाट्य० १६ । १०२ )
दण्डी ने अग्निपुराणोक्त लक्षण को अविकलरूप से अपने ग्रन्थ में ले लिया है । वामन ने आरोहावरोहक्रमरूप ‘समाधि’ को शब्दगुण स्वीकार किया है, किंतु भोजराज ने अग्निपुराण और दण्डी के ही भाव को लेकर — ‘ समाधिः सोऽन्यधर्माणां यदन्यत्राधिरोपणम् ।’ — यह लक्षण लिखा है । वाग्भट्ट ने भी यही बात कही है — ‘ अन्यस्य धर्मो यत्रान्यत्रारोप्यते स समाधिः ‘ ।
2. यहाँ आक्षेप को ध्वनिरूप बताया गया है; क्योंकि उससे अर्थविशेष का ध्वनन होता है ।
3. यह ‘ आक्षेपालंकार’ का लक्षण है। आचार्य मम्मट ने भी इसी भाव का आश्रय लेकर कहा है कि —
निषेधो वक्तुमिष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया । वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः ॥
इस लक्षण में उक्त विषय और वक्ष्यमाण विषय के भेद से आक्षेप के दो प्रकार बताये गये हैं ।
4. इस ‘अस्तुत-स्तोत्र को ही परवर्ती आलंकारिकों ने ‘अप्रस्तुतप्रशंसा’ नाम दिया है; इसी को ‘अन्योक्ति’ भी कहते हैं । अग्निपुराण में जो लक्षण दिया गया है, उसी को भामह ने अविकलरूप से उद्धृत किया है । अन्तर इतना ही है कि वे ‘अस्तुतस्तोत्र के स्थान में ‘अप्रस्तुतप्रशंसा’ लिखते हैं । उनका लक्षण इस प्रकार है —
अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः । अप्रस्तुतप्रशंसेति सा चैवं कथ्यते यथा ॥ (३ ।२९)
दण्डी ने इसी भाव को संक्षिप्त शब्दों में व्यक्त किया है — ‘अप्रस्तुतप्रशंसा स्यादप्रक्रान्तेषु या स्तुतिः । ‘ (२ । ३४०) वामन ने उपमेय की अनुक्ति में ‘समासोक्ति’ और किंचिद् उक्ति में ‘अप्रस्तुतप्रशंसा’ मानी है ।
5. आचार्य भामह ने अपने ग्रन्थ में अग्निपुराणोक्त लक्षण को ज्यों-का-त्यों ले लिया है । अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराण में ‘उदिता’ है और भामह के ग्रन्थ में ‘उद्दिष्टा’ । वहाँ अन्त में ‘बुधैः ‘ पद का प्रयोग है और यहाँ ‘यथा’ का । दण्डी ने इसी भाव को कुछ अधिक स्पष्टता के साथ इस प्रकार लिखा है —
वस्तु किंचिदभिप्रेत्य तत्तुल्यस्यान्यवस्तुनः । उक्तिः संक्षेपरूपत्वात् सा समासोक्तिरुच्यते ॥ (२ । २०५)
‘समासोक्ति’ की गणना व्यङ्ग्य अलंकारों में होती है, इस दृष्टि से अग्निपुराणोक्त लक्षण में ‘गम्यते ‘ – इस क्रियापद का प्रयोग अधिक महत्त्व का है। अर्वाचीन आलंकारिक ‘समासोक्ति’ के लक्षणों में अप्रकृत व्यवहार के समारोप का भी उल्लेख करते हैं ।
6. काव्यादर्शकार दण्डी ने अग्निपुराणोक्त लक्षण की आनुपूर्वी को ही उद्धृत कर लिया है । अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराण में ‘किंचिदन्यार्थसूचनम् ‘ — पाठ है और काव्यादर्श में ‘सूचनम् ‘ के स्थान में ‘दर्शनम्’ कर दिया गया है। भामह ने शब्दान्तर से इसी भाव को प्रकट किया है —-
अपह्नुतिरभीष्टा च किंचिदन्तर्गतोपमा । भृतार्थापह्नवादस्याः क्रियते चाभिधा यथा ॥ (२।२१)
इस लक्षण में ‘किंचिदन्तर्गतोपमा’ यह अंश विशेष है । वामन ने तुल्य वस्तु के द्वारा वाक्यार्थ के अपलाप को ‘अपह्नुति’ कहा है — ‘समानवस्तुनान्यापलापोऽपह्नुतिः ।’ (३ । ५) परवर्ती आलंकारिकों ने प्रकृत वस्तु का निषेध करके अन्य वस्तु की स्थापना को ‘अपह्नुति’ कहा है।
7. भामह ने भी ‘ पर्यायोक्ति’ का यही लक्षण लिखा है ।
8. प्राचीनों ने आक्षेप, अप्रस्तुतप्रशंसा, समासोक्ति तथा पर्यायोक्ति को ‘ध्वनि’ कहकर जो उसे अलंकारों में अन्तर्भूत करने की चेष्टा की है, उसका ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धन ने बड़ी प्रौढ़ि के साथ खण्डन किया है।

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