July 20, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 348 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अड़तालीसवाँ अध्याय एकाक्षर कोष एकाक्षराभिधानम् अग्निदेव कहते हैं — अब मैं तुम्हें ‘एकाक्षराभिधान’ तथा मातृकाओं के नाम एवं मन्त्र बतलाता हूँ। सुनो ‘अ’ नाम है भगवान् विष्णु का। ‘अ’ निषेध अर्थ में भी आता है। ‘आ’ ब्रह्माजी का बोध कराता है। वाक्य प्रयोग में भी उसका उपयोग होता है। ‘सीमा’ अर्थ में ‘आ’ अव्ययपद है। क्रोध और पीड़ा अर्थ में भी उसका प्रयोग किया जाता है। ‘इ’ काम-अर्थ में प्रयुक्त होता है। ‘ई’ रति और लक्ष्मी के अर्थ में आता है। ‘उ’ शिव का वाचक है। ‘ऊ’ रक्षक आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। ‘ऋ’ शब्द का बोधक है। ‘ॠ’ अदिति के अर्थ में प्रयुक्त होता है। ‘लृ’, ‘ॡ’ — ये दोनों अक्षर दिति एवं कुमार कार्तिकेय के बोधक हैं। ‘ए’ का अर्थ है — देवी। ‘ऐ’ योगिनी का वाचक है। ‘ओ’ ब्रह्माजी का और ‘औ’ महादेव जी का बोध कराने वाला है। ‘अं’ का प्रयोग काम अर्थ में होता है। ‘अः’ प्रशस्त (श्रेष्ठ) का वाचक है। ‘क’ ब्रह्मा आदि के अर्थ में आता है। ‘कु’ कुत्सित (निन्दित) अर्थ में प्रयुक्त होता है। ‘खं’ — यह पद शून्य, इन्द्रिय और मुख का वाचक है ।’ ‘ग’ अक्षर यदि पुल्लिङ्ग में हो तो गन्धर्व, गणेश तथा गायक का वाचक होता है। नपुंसकलिङ्ग ‘ग’ गीत अर्थ में प्रयुक्त होता है। ‘घ’ घण्टा तथा करधनी के अग्रभाग के अर्थ में आता है। ‘ताडन’ अर्थ में भी ‘घ’ आता है। ‘ङ’ अक्षर विषय, स्पृहा तथा भैरव का वाचक है। ‘च’ दुर्जन तथा निर्मल-अर्थ में प्रयुक्त होता है। ‘छ’ का अर्थ छेदन है। ‘जि’ विजेय के अर्थ में आता है। ‘ज’ पद गीत का वाचक है। ‘झ’ का अर्थ प्रशस्त, ‘ञ’ का बल तथा ‘ट’ का गायन है। ‘ठ’ का अर्थ चन्द्रमण्डल, शून्य, शिव तथा उद्बन्धन है। ‘ड’ अक्षर रुद्र, ध्वनि एवं त्रास के अर्थ में आता है। ढक्का और उसकी आवाज के अर्थ में ‘ढ’ का प्रयोग होता है। ‘ण’ निष्कर्ष एवं निश्चय के अर्थ में आता है। ‘त’ का अर्थ है तस्कर (चोर) और सूअर की पूँछ। ‘थ’ भक्षण के और ‘द’ छेदन, धारण तथा शोभन के अर्थ में आता है। ‘ध’ धाता (धारण करने वाले या ब्रह्माजी) तथा धूस्तूर (धतूरे) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। ‘न’ का अर्थ समूह और सुगत (बुद्ध) है। ‘प’ उपवन का और ‘पूः’ झंझावात का बोधक है। ‘फु’ फूँकने तथा निष्फल होने के अर्थ में आता है। ‘बि’ पक्षी तथा ‘भ’ ताराओं का बोधक है। ‘मा’ का अर्थ है — लक्ष्मी, मान और माता। ‘य’ योग, याता (यात्री अथवा दयादिन) तथा ‘ईरिण’ नामक वृक्ष के अर्थ में आता है ॥ १-१० ॥ ‘र’ का अर्थ है — अग्नि, बल और इन्द्र। ‘ल’ का विधाता, ‘व’ का विश्लेषण (वियोग या बिलगाव) और वरुण तथा ‘श’ का अर्थ शयन एवं सुख है। ‘ष’ का अर्थ श्रेष्ठ, ‘स’ का परोक्ष, ‘सा’ का लक्ष्मी, ‘स’ का बाल, ‘ह’ का धारण तथा रुद्र और ‘क्ष’ का क्षेत्र, अक्षर, नृसिंह, हरि, क्षेत्र तथा पालक है। एकाक्षरमन्त्र देवतारूप होता है। वह भोग और मोक्ष देने वाला है। ‘क्षौं हयशिरसे नमः’ यह सब विद्याओं को देने वाला मन्त्र है। अकार आदि नौ अक्षर भी मन्त्र हैं; उन्हें उत्तम ‘मातृका मन्त्र’ कहते हैं। इन मन्त्रों को एक कमल के दल में स्थापित करके इनकी पूजा करे। इनमें नौ दुर्गाओं की भी पूजा की जाती है। भगवती, कात्यायनी, कौशिकी, चण्डिका, प्रचण्डा, सुरनायिका, उग्रा, पार्वती तथा दुर्गा का पूजन करना चाहिये। ‘ॐ चण्डिकायै विद्महे भगवत्यै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्’ — यह दुर्गा-मन्त्र है। षडङ्ग आदि के क्रम से पूजन करना उचित है। अजिता, अपराजिता, जया, विजया, कात्यायनी, भद्रकाली, मङ्गला, सिद्धि, रेवती, सिद्ध आदि वटुक तथा एकपाद, भीमरूप, हेतुक, कापालिक का पूजन करे। मध्यभाग में नौ दिक्पालों की पूजा करनी चाहिये। मन्त्रार्थ की सिद्धि के लिये ‘ह्रीं दुर्गे रक्षिणि स्वाहा’ — इस मन्त्र का जप करे। गौरी की पूजा करे; धर्म आदि का, स्कन्द आदि का तथा शक्तियों का यजन करे। प्रज्ञा, ज्ञानक्रिया, वाचा, वागीशी, ज्वालिनी, वामा, ज्येष्ठा, रौद्रा, गौरी, ह्री तथा पुरस्सरा देवी का ‘ह्रीं सः महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा’ — इस मन्त्र से महागौरी का तथा ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, सुभगा, ललिता, कामिनी, काममाला और इन्द्रादि शक्तियों का पूजन भी एकाक्षर मन्त्रों से होता है। गणेश- पूजन के लिये ‘ॐ गं स्वाहा’ — यह मूलमन्त्र है। अथवा ‘गं गणपतये नमः।’ से भी उनकी पूजा होती है। रक्त, शुक्ल, दन्त, नेत्र, परशु और मोदक — यह ‘षडङ्ग’ कहा गया है। ‘गन्धोल्काय नमः।’ से क्रमशः गन्ध आदि निवेदन करे। गज, महागणपति तथा महोल्क भी पूजन के योग्य हैं। ‘कूष्माण्डाय, एकदन्ताय, त्रिपुरान्तकाय, श्यामदन्तविकटहरहासाय, लम्बनासाननाय, पद्मद्रंष्ट्राय, मेघोल्काय, धूमोल्काय, वक्रतुण्डाय, विघ्नेश्वराय, विकटोत्कटाय, गजेन्द्रगमनाय, भुजगेन्द्रहाराय, शशाङ्कधराय, गणाधिपतये स्वाहा।’ — इन मन्त्रों के आदि में ‘क’ आदि एकाक्षर बीज मन्त्र लगाये और अन्त में ‘नमः’ एवं ‘स्वाहा’ शब्द का प्रयोग करे। फिर इन्हीं मन्त्रों द्वारा तिलों से होम आदि करके मन्त्रार्थभूत देवता का पूजन करे। अथवा द्विरेफ, द्विर्मुख एवं द्वयक्ष आदि पृथक् पृथक् मन्त्र हो सकते हैं। अब कुमार कार्तिकेयजी ने कात्यायन को जिसका उपदेश किया था, वह व्याकरण बतलाऊँगा ॥ ११-२८ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘एकाक्षराधिधान’ नामक तीन सी अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४८ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe