July 20, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 350 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पचासवाँ अध्याय संधि के [^1] सिद्ध रूप सन्धिसिद्धरूपम् कुमार कार्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! अब सिद्ध संधि का वर्णन करूँगा। पहले ‘स्वरसंधि’ [^2] बतलायी जाती है — दण्डाग्रम्, साऽऽगता, दधीदम्, नदीहते, मधूदकम्, पितृषभः, लृकारः [^3] , तवेदम्, सकलोदकम्, अर्धर्चोऽयम्, तवल्कारः [^4] , सैषा, सैन्द्री, तवौदनम्, खट्वौघोऽभवत् [^5] , इत्येवम्, व्यसुधीः, वस्वलंकृतम्, पित्रर्थोपवनम्, दात्री[^6] , नायकः, लावकः, नयः, [^7] त इह, तयिह इत्यादि [^8] । तेऽत्र, योऽत्र जलेऽकजम् [^9] । जहाँ संधि न होकर प्रकृत रूप ही रह जाता है, उसे ‘प्रकृतिभाव’ कहते हैं। उसके उदाहरण — नो अहो, ऐहि, अ अवेहि, इ इन्द्रकम्, उ उत्तिष्ठ, कवी एतौ, वायु एतौ, वने इमे, अमी एते, यज्ञभूते एहि देव इमं नय [^10] ॥ १-५ ॥ ‘ अब ‘व्यञ्जनसंधि’ [^11] का वर्णन करूँगा — वाग्यतः । अजेकमातृकः। षडेते। तदिमे। अबादि । वाङ्नीतिः । षण्मुखः। वाङ्मनसम् । इत्यादि। वाग्भावादिः। वाक्श्लक्ष्णम्। तच्छरीरकम्। तल्लुनाति। तच्चरेत्। क्रुङ्ङास्ते। सुगण्णिह। भवांश्चरन्। भवांश्छात्रः । भवांष्टीका। भवांष्ठकः । भवांस्तीर्थम्। भवांस्थेत्याह। भवाँल्लेखा। भवाञ्जयः। भवाञ्छेते, भवाञ्चशेते, भवाञ्शेते। भवाण्डीनः। सम्भर्त्ता। त्वङ्करिष्यसि [^12] इत्यादि ॥ ६-९ ॥ इसके बाद की पदावलियों में विसर्ग- संधि [^13] जाननी चाहिये कश्छिन्द्यात् [^14] । कचरेत् । कष्टः [^15] । कष्ठः [^16] । कः स्थः [^17] । कश्चलेत् [^18] । क खनेत् [^19] । क करोति [^20] । क पठेत् [^21] । क फलेत् [^22] । कश्श्वशुरः [^23] , कः श्वशुरः [^24] । कस्स्वरः [^25] , कः स्वरः । कः फलेत् [^26] । कः शयिता [^27] । कोऽत्रयोधः [^28] । क उत्तमः [^29] । देवाएते [^30] । भो इह [^31] । स्वदेवा यान्ति [^32] । भगो व्रज [^33] । सु पूः [^34] । सुदूरात्रिरत्र [^35] । वायुर्याति [^36] । पुनर्नहि [^37] । पुना [^38] राति । स यातीह [^39] । सैष [^40] याति । क ईश्वरः । ज्योतीरूपम् [^41] । तवच्छत्रम् [^42] । म्लेच्छ धीः [^43] । छिद्रमोच्छिदत् ॥ १०-१३ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘संधिसिद्धरूपकथन’ नामक तीन सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५० ॥ [^1]: अक्षरों के मेलन को ‘संधि’ कहते हैं, संधि के साधारणतया पाँच भेद माने जाते हैं — (१) स्वरसंधि, (२) व्यञ्जनसंधि, (३) अनुस्वारसंधि, (४) विसर्गसंधि और (५) स्वादिसंधि । अनुस्वारसंधि में व्यञ्जन का ‘अनुस्वार’ और अनुस्वार का ‘व्यञ्जन’ बनता है; अतः उसका व्यञ्जनसंधि में ही अन्तर्भाव हो सकता है। ऐसे ही स्वादिसंधि भी उसी के अन्तर्गत है; क्योंकि ‘शिवोऽर्च्यः’ इत्यादि में विभक्ति- सकार आदि हल्-रुप ही हैं। इस प्रकार मुख्यतः तीन ही संधियाँ हैं — स्वर, व्यञ्जन और विसर्ग । कौमार – व्याकरण में इन्हीं तीनों का नामतः उल्लेख हुआ है। पाणिनि-व्याकरण तथा कौमार – व्याकरण — दोनों ही माहेश्वर सूत्रों को आधार मानकर प्रवृत्त हुए हैं, अतः दोनों की प्रक्रिया में बहुत कुछ साम्य है । [^2]: जहाँ स्वर अक्षर विकृत हो वर्णान्तर से मिले, वह ‘स्वर-संधि’ है; इसके मुख्यतः पाँच भेद हैं — यणादेश, अयाद्यादेश, य् – व्- लोपादेश, अवङ्ङादेश तथा एकादेश । ‘यणादेश’ के भी चार भेद हैं — य् व् र् ल् । ये क्रमशः इ उ ऋ लृ के स्थान में कोई स्वर परे रहने पर होते हैं। अयाद्यादेश के छः भेद हैं — अय्, अव्, आय्, आव्, यान्तादेश और वान्तादेश । पहलेवाले चार आदेश क्रमशः ए, ओ, ऐ, औ के स्थान में कोई स्वर परे रहने पर होते हैं। ‘यान्तादेश’ ऐ, औ के स्थान में ‘यादि’ प्रत्यय परे रहने पर होते हैं और ‘वान्तादेश’ ओ, औ के स्थान में यकारादि प्रत्यय परे होने पर होते हैं । ‘य् – व् लोपादेश’, में अवर्णपूर्वक पदान्त ‘य् व्’ का लोप होता है । ‘अश्’ प्रत्याहार परे होने पर एड्न्त ‘गो’ शब्द को ‘अवङ्’ आदेश होता है; ‘अच्’ परे रहने पर तथा ‘इन्द्र’ शब्द परे रहने पर भी यह आदेश होता है । जहाँ दो अक्षरों के स्थान में एक आदेश हो, वह ‘एकादेश’ है। एकादेश – संधि के भी पाँच भेद हैं — गुण, वृद्धि, पूर्वरूप, पररूप और दीर्घ । ‘गुण – एकादेश’ चार हैं — ए, ओ, अर, अल् । ये क्रमशः अ+इ, अ+उ, अ+ऋ, तथा अ+ऌ के स्थान में होते हैं । वृद्धि संधि के भेद तीन ही हैं — ऐ, औ, आर् । इनमें पहला अ, आ, ए, ऐ के स्थान में; दूसरा अ, आ, ओ, औ के स्थान में, तथा तीसरा अ, आ, ऋ, ॠ के स्थान में होता है। पदान्त ए, ओ से परे ‘अ’ हो तो ‘पूर्वरूप’ होता है; यह ‘अयादेश’ का अपवाद है । अ से परे ए, ओ और ‘अ’ के स्थान में ‘पररूप’ होता है, यह वृद्धि तथा दीर्घ का अपवाद है; अतः इसकी प्रवृत्ति के स्थल परिगणित होते हैं । अ-आ+अ-आ, इ-ई+इ- ई, उ-ऊ+उ-ऊ, ऋ-ऋ + ऋ ॠ तथा लृ-लृ + लृ-लृ के स्थान में ‘दीर्घ एकादेश’ होता है। जैसे अ+ अ आ इत्यादि । [^3]: ‘दण्डाग्रम्’ से लेकर ‘लृकारः ‘ तक ऊपर बताये अनुसार ‘दीर्घ एकादेश’ हुआ है। यहाँ ‘ अकः सवर्णे दीर्घः ।’ (६ । १ । १०१) — इस पाणिनि-सूत्र की प्रवृत्ति होती है। इस स्थल में सबका पदच्छेदमात्र दिया जाता है। दण्ड + अग्रम् दण्डाग्रम् । इसमें ‘दण्ड’ के ‘ड’ में जो ‘अ’ है, वह और ‘अग्रम्’ का ‘अ’ मिलकर ‘आ’ हुआ; इसलिये ‘दण्डाग्रम्’ बना। इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिये । सा+आगता=साऽऽगता । दधि + इदम् = दधीदम्, नदी + ईहते = नदीहते। मधु+उदकम् = मधूदकम् । पितृ+ऋषभः = पितृषभः । लृ+लृकार = लृकारः [^4]: अब गुण – एकादेश (‘आद्गुणः । ‘ — पा० सू० ६ । १ । ८७ ) के उदाहरण दिये जाते हैं — तव+इदम् = तवेदम्। यहाँ ‘ तव’ के अन्तिम ‘अ’ और ‘इदम्’ के ‘इ’ के स्थान में ‘ए’ हो गया है। इसी तरह अन्यत्र समझना चाहिये । सकल + उदकम् = सकलोदकम् । अर्ध+ऋचोऽयम् = अर्धर्चोऽयम् । तव + लृकारः-तवल्कारः । [^5]: वृद्धिसंधि (‘वृद्धिरेचि । ‘ — पा० सू० ६ । १ । ८८), के उदाहरण – सा + एषा = सैषा । यहाँ आ + ए के स्थान में ‘ऐ’ हुआ है। एवमन्यत्र । सा+ऐन्द्री = सैन्द्री । तव + ओदनम् = तवौदनम् । खट्वा + औघः = खट्वौघः । [^6]: अब ‘यणादेश’ (‘इको यणचि । ‘ — पा० सू० ६ । १ । ७७ ) के उदाहरण दिये जाते हैं । इति + एवम् = इत्येवम् । यहाँ ‘इति’ के अन्तिम ‘इकार’ के स्थान में ‘य्’ हुआ है । वि + असुधीः = व्यसुधीः । वसु + अलंकृतम् = वस्वलंकृतम्। यहाँ ‘उ’ के स्थान में ‘व्’ हुआ है। पितृ + अर्थोपवनम् = पित्रर्थोपवनम् । दातृ + ई = दात्री । यहाँ ‘ऋ’ के स्थान में ‘र्’ हुआ है । अन्यत्र चौथे ‘यण् ‘ के उदाहरण में ‘लाकृतिः ‘ पद आता है, उसका पदच्छेद है — ल + आकृतिः = लाकृतिः । [^7]: यह ‘अयादेश – संधि’ (‘एचोऽयवायावः । ‘ — पा० सू० ६ । १ । ७८) है। नै + अकः = नायकः । यहाँ ‘नै ‘ के ‘ऐ’ के स्थान में ‘आय्’ हुआ है। लौ + अकः = लावकः (‘औ’ की जगह ‘आव्’) । ने+अः = नयः (‘ए’ के स्थान में ‘अय्’); अन्यत्र ‘लवः’, ‘विष्णवे’ आदि उदाहरण भी मिलते हैं। लो+अः = ल् अव् अः=लवः । विष्णो + ए = विष्णवे । [^8]: यह ‘लोपादेश – संधि’ (‘लोपः शाकल्यस्य । ‘ — पा० सू० ८ । ३ । १९ ) है । ते + इह — इस अवस्था में ‘ए’ की जगह हुआ — त् + अय + इह बना । फिर ‘लोपादेश’ के नियमानुसार ‘य्’ का लोप हो गया — ‘ त इह’ बना । लोप न होने पर ‘तयिह’ बना । [^9]: यहाँ ‘पूर्वरूप – संधि’ (‘एङः पदान्तादति । ‘ — पा० सू० ६ । १ । १०९) है । ते+अत्र, यो + अत्र, जले + अकजम् — इन तीनों ही पदों में ‘अ’ अपने पहले अक्षर में मिल गया है। [^10]: अब ‘प्रकृतिभाव’ के उदाहरण देते हैं । ‘नो अहो’ – इस अवस्था में (‘एङः पदान्तादति’ के अनुसार) ‘पूर्वरूप एकादेश’ प्राप्त था; किन्तु यहाँ प्रकृतिभाव का विधान है; यह पद ज्यों-का-त्यों रहेगा; इसमें संधिजनित विकृति नहीं होगी । प्रकृतिभाव के लिये पाणिनि ने कई नियम बनाये हैं । (‘नो अहो’ – जैसे स्थलों के नियम इस प्रकार हैं— ‘प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् ।’ (पा० सू० ६ । १ । १२५ ) ‘प्लुत’ तथा ‘प्रगृह्य’ संज्ञा वाले पदों का ‘प्रकृतिभाव’ होता है, उनमें संधि नहीं होती । ‘दूराद्भूते च ।’ (पा० सू० ८ । २ । ८४) दूर से किसी को बुलाते समय जिस वाक्य का प्रयोग होता है, उसके अन्तिम स्वर की ‘प्लुत’ संज्ञा होती है; क्योंकि उसका उच्चारण दीर्घतर स्वर में होता है । ‘प्रगृह्य’ संज्ञा के अनेक भेद हैं — ( १ ) ईकारान्त, ऊकारान्त और एकारान्त द्विवचन । (२) ‘अदस्’ शब्द- सम्बन्धी मकार के बाद होने वाले ई और ऊ । (३) एक स्वर वाला आङ्वर्जित निपात। (४) ओकारान्त निपात । (द्रव्यार्थ भिन्न ‘च’ आदि अव्यय तथा ‘प्र’ आदि उपसर्ग भी ‘निपात’ कहलाते हैं ।) (५) सम्बोधन — निमित्तक ओकार ‘वैकल्पिक प्रगृह्य’ होता है; किंतु उसके बाद अवैदिक ‘इति’ शब्द का रहना आवश्यक है । (६) ‘मय्’ प्रत्याहार से परे जो ‘उकार’ हो, वह भी ‘वैकल्पिक प्रगृह्य’ है; किंतु उसके बाद कोई भी स्वर रहना चाहिये। (इनके सिवा और भी कई नियम हैं, जो विस्तारभय से नहीं दिये जाते ।) ‘अहो+ एहि’ में ‘अयाद्यादेश’ के नियमानुसार ‘ओ’ की जगह ‘अव्’ प्राप्त था, किंतु ‘अहो’ पद ‘ ओकारान्त निपात’ होने से ‘प्रगृह्य है; अतएव वह प्रकृतरूप में रह गया । ‘ अ + अवेहि’, इ + इन्द्रकम्, उ + उत्तिष्ठ – इनमें दीर्घ एकादेश प्राप्त था; किंतु नंबर ३ नियम के अनुसार ‘प्रगृह्य’ होने से यहाँ प्रकृतिभाव होता है । ‘कवी + एतौ’, वायू + एतौ इनमें ‘ यणादेश’ प्राप्त था और ‘वने इमे’ में ‘अय्’ आदेश की प्राप्ति थी; किंतु नं० १ नियम के अनुसार प्रगृह्य होने से यहाँ भी प्रकृतरूप ही रह जाता है । ‘कवी’, ‘वायू’ और ‘वने’ – ये तीनों पद द्विवचनान्त हैं। ‘अमी एते’ में ‘यण्’ प्राप्त था; नं० २ नियम के अनुसार प्रगृह्य होने से प्रकृतिभाव हो गया। ‘यज्ञभूते ! एहि ‘ इसमें अयादेश और ‘देव ! इमं नय’ में गुण एकादेश प्राप्त था; किंतु प्लुत होने से यहाँ प्रकृतिभाव हुआ । दूरसे सम्बोधन का वाक्य है ‘यज्ञभूते ! एहि ‘ ‘देव ! इमं नय ।’ [^11]: व्यञ्जनसंधि के बहुत-से प्रकार या भेद पाणिनिसूत्रों में वर्णित हैं । परंतु अग्निपुराण में उल्लिखित इस कौमार – व्याकरण में व्यञ्जनसंधि के सिद्ध रूपों का जो उल्लेख मिलता है, उसके अनुसार व्यञ्जनसंधि के ग्यारह प्रकार निर्दिष्ट हुए हैं ( १ ) — जश्त्वविधान [ जो ‘झलां जशोऽन्ते’ – इस पाणिनिसूत्र (८ । २ । ३९) में निर्दिष्ट है ] । (२) — अनुनासिकविधान [जो ‘यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा’ — इस पाणिनिसूत्र (८ । ४ । ४५) तथा ‘प्रत्यये भाषायां च नित्यम् ।’ इस कात्यायन — वार्तिक द्वारा प्रतिपादित है ] । ( ३ ) — छत्वविधान [जो ‘शश्छोऽटि’ — (८ । ४ । ६३) ‘छत्वममीति वाच्यम् ।’ – इन सूत्र — वार्तिकों द्वारा निर्दिष्ट है ] । ( ४ ) — श्चुत्वविधान [जो ‘स्तोः चुना श्रुः ‘ — इस पा० सू० (८।४।४०) में कहा गया है ] । (५) — छ्रुत्वविधान [ जो ‘ष्टुना ष्टुः ‘ — इस पा० सू० (८ । ४ । ४१ ) में वर्णित है ] । ( ६ ) — लकारात्मक परसवर्णविधान [जो ‘तोर्लि’ – इस पा० सू० (८ । ४ । ६०) के नियम से आबद्ध है ] । ( ७ ) —ङमुडागमविधान [ जो ‘ङमो ह्रस्वादचि डमुण् नित्यम्’ – इस पा० सू० (८ । ३ । ३२) द्वारा कथित है ] । ( ८ ) — नकारसत्वविधान [ जो ‘नश्छव्यप्रशान् । ‘ — इस पा० सू० (८ । ३ । ७) के नियमानुसार सम्पादित होता है ] । ( ९ ) — परसवर्णविधान [जो ‘अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः । ‘ — पा० सू० (८ ।४ । ५८) तथा ‘वा पदान्तस्य।’ (८ । ४ । ५९ ) — इन पा० सूत्रों द्वारा कथित है ] । (१०) — तुगागमविधान [ जो ‘शि तुक् ।’, ( ८ । ३ । ३१) ‘छे च ।’, (६ । १ । ७३) ‘दीर्घात् ( ६ । १ । ७५) तथा ‘पदान्ताद्वा’ ( ६ । १ । ७६ ) — इन सूत्रों के नियमों से सम्बद्ध है ] । ११ — परसवर्णविधान [ जो ‘अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः।’ (८ । ४ । ५८ ) ] ‘वा पदान्तस्य ‘ ( ८ । ४ । ५९ ) — इन पा० सूत्रों द्वारा प्रतिपादित है । [^12]: वाक् यतः = वाग्यतः । (‘झलां जशोऽन्ते । ‘ पा० सू० ८ । २ । ३९) ‘पदान्त में ‘झल्’ के स्थान में ‘जश्’ होता है ‘ — इस नियम के अनुसार ‘वाक्’के ‘क्’ का ‘ग्’ हो गया है । यद्यपि जश् में ज् ब् ग् ड् द् — ये पाँच अक्षर हैं, तथापि ‘क्’ के स्थान में ‘ग्’ होने का कारण है स्थान की समानता । ‘क्’ और ‘ग्’ का स्थान एक है। दोनों ही कण्ठ स्थान से निकलते हैं । आगे के चार उदाहरणों में भी यही नियम है — अच्+एकमातृकः = अजेकमातृकः । यहाँ ‘ च्’ के स्थान में ‘ज्’ हो गया है । स्वरहीन अक्षर अपने बाद वाले अक्षर से मिल जाते हैं, अतः ‘ज्’ ‘ए’ में मिलकर ‘जे’ बन गया । ‘ षट् + एते’ – इसमें ‘ट्’ के स्थान में ‘ड्’ हुआ है। इसी तरह ‘तत् + इमे’ में ‘त् ‘के स्थानमें ‘द्’ तथा अप् + आदि’ में ‘प्’ के स्थानमें ‘ब्’ हुआ है । ये पूर्वनिर्दिष्ट जश्त्वविधान के उदाहरण हैं । अब अनुनासिक विधान के उदाहरण दिये जाते हैं – वाक्+नीतिः= वाङ्नीतिः । पदान्त ‘ यर्’ प्रत्याहार के अक्षरों का विकल्प से अनुनासिक होता है, कोई अनुनासिक अक्षर परे हो तब । यदि प्रत्यय अनुनासिक परे हो तो ‘यर्’ के स्थान में नित्य अनुनासिक होता है । इस नियम के अनुसार ‘क्’ के स्थान में उसी वर्ग का अनुनासिक अक्षर ‘ङ्’ हो गया। अनुनासिक न होने की स्थिति में पूर्वनियमानुसार ‘ जश्त्व’ होता है । उस दशा में ‘वाग्नीतिः ‘ रूप होता है। षट्+मुखः = षण्मुखः (षड्मुखः) । उक्त नियम से ‘ट्’ की जगह उसी के स्थान (मूर्धा ) — का अनुनासिक ‘ण्’ हुआ। जश्त्व होने पर ‘ड्’ होता है। निम्नाङ्कित पदों का पदच्छेद इस प्रकार है — वाक् + मनसम् — वाङ्मनसम् । वाक् + मात्रम् = वाङ्मात्रम् । अब छत्वविधान के उदाहरण देते हैं — वाक् + श्लक्ष्णम् = वाक्छ्लक्ष्णम्, वाक्श्लक्ष्णम् । यहाँ ‘ श् ‘ के स्थान में विकल्पेन ‘छ्’ हुआ है। नियम इस प्रकार है — ‘झय्’ से परे ‘श्’ का ‘छ्’ हो जाता है, ‘अम्’ प्रत्याहार परे रहने पर । श्चुत्वविधान – सकार — तवर्ग के स्थान में ‘शकार’ ‘चवर्ग’ होते हैं, शकार- चवर्ग का योग होने पर। ‘तत्+शरीरम्’-‘ तच्छरीरम्’ । यहाँ ‘ शरीरम् ‘ के शकार का योग होने से ‘तत्’ के ‘त्’ की जगह ‘ च्’ हो गया । इसके बाद छत्व-विधान के नियमानुसार ‘शकार’ के स्थान में ‘छकार’ हो गया । ‘तल्लुनाति’ यह लकारात्मक परसवर्ण का उदाहरण है । नियम यह है कि ‘तवर्ग से परे लकार हो तो उस तवर्ग का ‘परसवर्ण’ होता है।’ इसके अनुसार ‘ तत् + लुनाति’ इस अवस्था में ‘त्’ के स्थान में ‘ल्’ हो गया । तत्+चरेत् = तच्चरेत् । यहाँ श्चुत्वविधान के नियमानुसार पूर्ववत् ‘त्’ की जगह ‘च्’ हो गया है। क्रुङ् + आस्ते = क्रुङ्ङास्ते । यह ङ्मुडागम- विधान का उदाहरण है । नियम है कि ह्रस्व अक्षर से परे यदि ‘ङ् ण् न्’ – ये व्यञ्जन हों और इनके बाद स्वर अक्षर हों तो उक्त ‘ङ्’ आदि की जगह एक और ‘ङ्’ आदि बढ़ जाते हैं । अर्थात् वे ङ् ङ् ण् ण् और न् न् हो जाते हैं । इस नियम से उक्त उदाहरण में एक ‘ङ्’ की जगह दो ‘ङ् ङ्’ हो गये हैं । इसी तरह ‘सुगण् + इह’ की जगह ‘सुगणह’ बनता है । भवान् + चरन् = ‘ भवांश्चरन् ‘ — यह नकाररुत्वविधान का उदाहरण है। नियम यह है — ‘ प्रशान्’ से भिन्न जो नकारान्त पद है, उनके ‘न्’ की जगह ‘र्’ हो जाता है, यदि बाद में ‘छ् ठ् थ् च् ट् त्’ – इनमें से कोई अक्षर विद्यमान हो, तब । इस नियम से उक्त उदाहरण में ‘न्’ के स्थान में ‘र्’ हुआ । ‘र्’ का विसर्ग, विसर्ग के स्थान में ‘स्’ हुआ। ‘स्’ का श्चुत्व – विधान के अनुसार ‘श्’ हो गया। उसके पूर्व अनुस्वार का आगम होता है। कहीं-कहीं ‘चिरम् ‘ पाठ मिलता है। उस दशा में ‘भवांश्चिरम् ‘ रूप सिद्ध होगा । यदि ‘चिरम्’ के साथ परवर्ती ‘ भवान्’ शब्द ले लिया जाय तो निम्नाङ्कितरूप सिद्ध होगा । चिरम्+ भवान् = चिरंभवान्, चिरम्भवान् — यहाँ मकार के स्थान में अनुस्वार हुआ है । अनुस्वार का वैकल्पिक परसवर्ण होने पर ‘चिरम्भवान्’ रूप बनता है । ‘मोऽनुस्वारः । ‘ — इस पा० सूत्र ( ८ । ३ । २३) के अनुसार मकारानुस्वारविधान का नियम इस प्रकार है — पदान्त में ‘म्’ का अनुस्वार होता है, ‘हल्’ परे रहने पर । (‘नश्चापदान्तस्य झलि ।’ पा० सू० ८ । ३ । २४) के अनुसार ‘झल्’ परे रहने पर अपदान्त ‘न् म्’ के स्थान में भी अनुस्वार होता है। ‘न्’ के अनुस्वार का उदाहरण है — ‘ यशांसि’ । ‘म्’ के अनुस्वार का उदाहरण है ‘आक्रंस्यते ‘ । भवान्+छात्रः = भवांश्छात्रः । यहाँ पूर्ववत् नकाररुत्व-विधान के अनुसार नकार का रुत्व, विसर्ग, सकार तथा अनुस्वारागम होकर — श्चुत्वविधान के अनुसार ‘स्’ के स्थान में ‘श्’ हो गया है। भवान् + टीका = भवाँष्टीका। यहाँ भी ‘न्’ की जगह रुत्व, विसर्ग और सकार होकर अनुस्वारागम हुआ और टुत्व-विधान के अनुसार ‘स्’ के स्थान में ‘ष् ‘ हो गया। यही बात ‘भवाँष्ठकः ‘ के साधन में भी समझनी चाहिये — भवान् + ठकः । भवान्+तीर्थम्—भवाँस्तीर्थम् । यहाँ भी नकार का रुत्व, विसर्ग, सकार और अनुस्वारागम समझना चाहिये । ‘ भवान् + था + इत्याह — इसमें भी पूर्ववत् सब कार्य होंगे और था + इत्याह में गुण एकादेश होने पर ‘भवांस्थेत्याह ‘ — ऐसा रूप सिद्ध होगा। ‘भवान् + लेखाः = भवाँल्लेखाः ।’ यहाँ लकारात्मक परसवर्ण सानुनासिक हुआ है । ‘भवान् + जयः’ इसमें श्चुत्वविधान के अनुसार चवर्ग- योग के कारण तवर्गीय ‘न्’ की जगह चवर्गीय ‘ञ्’ हो गया है । ‘ भवान् + शेते’ इस पदच्छेद में ‘ भवाञ्च्छेते, भवाञ्छेते, भवाञ्च शेते, भवाञ् शेते । ‘ — ये रूप बनते हैं । पहले में ‘शि तुक् ।’ पा० सू० (८ । ३ । ३१ ) के अनुसार ‘शकार’ परे रहते नान्त पद को ‘तुक्’ का आगम होता है । इसे ‘नान्ततुगागम’ कहा जा सकता है। इसी तरह ह्रस्व दीर्घ और पदान्त से परे भी तगागम होते हैं । यहाँ ‘नान्ततगागम’ के अनुसार ‘तक’ हआ। ‘उक्’ की इत्संज्ञा ‘भवाञ्छेते’ रह जाता है। ‘लोप’ और ‘छत्व’ वैकल्पिक हैं, अतः इनके अभाव में ‘ भवाञ्च्शेते’ बना । तुगागम भी वैकल्पिक है; उसके न होने पर ‘भवाञ् शेते’ बना। भवान् + डीनः भवाण्डीनः । यहाँ श्चुत्वविधान के अनुसार ‘न्’ की जगह ‘ण्’ हो गया है। ‘त्वं+भर्ता = त्वम्भर्ता’, ‘ त्वं करिष्यसि = त्वङ्करिष्यसि ‘ — ये दोनों वैकल्पिक परसवर्ण के उदाहरण हैं । यहाँ अनुस्वार की जगह ‘वा पदान्तस्य ।’ (पा० सू० ८।४।५९ ) के नियमानुसार परसवर्ण क्रमशः ‘ भ्’ और ‘ङ्’ हो गये है । ‘व्यञ्जनसंधि’ के कुछ और भी भेद हैं, जो यहाँ कौमार व्याकरण में निर्दिष्ट नहीं हैं — जैसे ‘पूर्वसवर्ण – संधि’ । इसके दो प्रकार के स्थल हैं । ‘झयो हो ऽन्यतरस्याम्’ (८ । ४ । ६२ ) – इस सूत्र के अनुसार ‘झय्’ से परे हकार के स्थान में पूर्वसवर्ण होता है । इसके ‘वाग्घरिः’ इत्यादि उदाहरण हैं। यहाँ ‘वाक्+हरिः ‘ इस अवस्था में ‘ह’ की जगह पूर्वसवर्ण — ‘घ’ हो गया है । ‘उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य । ‘ — इस पा० सूत्र ( ८ । ४ । ६१ ) के अनुसार ‘उद्’ उपसर्ग से परे ‘स्थ’ और ‘स्तम्भ’ के आदि वर्ण की जगह पूर्व सवर्ण होता है। इसके उदाहरण हैं— उत्थानम्, उत्तम्भनम्। ‘सम्’ के मकार का भी रुत्वविधान होता है, ‘सुट’ परे रहने पर। इसके ‘संस्कर्ता’ आदि उदाहरण हैं । [^13]: विसर्गसंधि के भी अनेक प्रकार-भेद हैं— यहाँ लगभग दस प्रकार की कार्य-विधि वर्णित हुई है — (१) विसर्गस्थाने सत्वविधान (इसका विधायक है—’विसर्जनीयस्य सः । ‘ पा० सू० ८ । ३ । ३४) । (२) वैकल्पिकविसर्गत्वविधान ( इसका निर्देशक है — ‘वा शरि’- यह पा० सूत्र ८ । ३ । ३६) । (३) कप – विधान ( यह ‘कुप्वोः पौ च । ‘ — इस पाणिनिसूत्र ८ । ३ । ३७ पर आधारित है ) । क । (४) रुत्वविधान (इसका आधार है — ‘ ससजुषो रुः । ‘ यह पा० सूत्र ८ । २ । ६६) । (५) रोरुत्वविधान ( यह ‘ अतो रोरप्लुतादप्लुते । ‘ ६ । १ । ११३, ‘हशि च ।’ ६ । १ । ११४ इत्यादि सूत्रोंपर अवलम्बित है) । (६) रोर्यत्वविधान ( जो ‘भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि । ‘ इस पा० सूत्र ८।३।१७ तथा अतो रोरप्लुतादप्लुते ६ । १ । ११३ पर आधारित है) । (७) यलोपविधान ( इसका आधार ‘हलि सर्वेषाम्’ यह पा० सूत्र ८ । ३ । २२ है) । (८) रकार – विसर्गविधान ( इसका विधायक ‘खरवसानयोर्विसर्जनीयः । ‘ — यह पा० सूत्र ८ । ३ । १५ है) । (९) सुलोपविधान ( इसके आधार हैं — ‘ एतत्तदोः सुलोपो कोरनञ् समासे हलि ।’, ‘सोऽचि लोपे चेत् पादपूरणम् ।’ इत्यादि ६ । १ । १३२, ३४ सूत्र) । (१०) ढ्रलोपदीर्घविधान ( इसके आधारभूत पा० सूत्र है — ‘ रोरि । ‘, ‘ढो ढे लोपः । ‘, ‘ठूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः । ‘ ८ । ३ । १४, १३; ६ । ३ । १११) । [^14]: ‘कः+छिन्द्यात्’ = कश्छिन्द्यात्। यहाँ विसर्ग के स्थान में ‘स’ और श्चुत्वविधान के अनुसार ‘स्’ के स्थान में ‘श्’ हुआ है। कः+चरेत् = कश्चरेत् । यहाँ भी पूर्ववत् विसर्ग के स्थान में ‘स्’ और श्चुत्वेन ‘श्’ हुआ है । [^15]: कः +टः = कष्टः । [^16]: कः + ठः = कष्ठः – इन दोनों उदाहरणों में विसर्ग के स्थान में सकार होकर ष्टुत्वविधान के अनुसार ‘सकार’ के स्थान में ‘ षकार’ हो गया है । [^17]: कः + स्थः = कः स्थः, कस्स्थः । यहाँ वैकल्पिक विसर्गता का विधान है। ‘वा शरि’ (पा० सूत्र ८ । ३ । ३६) — के नियमानुसार यदि विसर्ग से परे ‘श’, ‘ष’ और ‘स’ – ये अक्षर हों तो एक पक्ष के मतानुसार उस विसर्ग के स्थान में ‘स्’ न होकर विसर्ग ही रह जाता है। पक्षान्तर से ‘सकार’ हो जाता है । उक्त उदाहरणों में पहले विसर्गरूप, फिर सकाररूप का साक्षात्कार कराया गया है । [^18]: ‘कः + चलेत्-कश्चलेत् । ‘ यहाँ भी सब बातें ‘कश्चरेत्’ के अनुसार समझनी चाहिये । [^19]: -[^20]: . ‘कः + खनेत्’ = क खनेत्। कः + करोति = कॉ करोति – इन दोनों उदाहरणों में क प विधान के अनुसार विसर्ग के स्थानमें क ख हो गये हैं । कवर्ग और पवर्ग के प्रथम – द्वितीय अक्षर परे हों तो विसर्ग के स्थान में क्रमशः क प होते हैं — ऐसा नियम है । [^21]: -[^22]: ‘कः + पठेत्’, ‘कः + फलेत्’ – इस अवस्था में अभी बताये ‘ – इस अवस्था में अभी बताये हुए नियम के अनुसार विसर्ग की जगह प फ’ — हो गये हैं । [^23]: -[^24]: इन उदाहरणों में ‘ वा शारि’ ( पा० सू० ८ । ३ । ३६ ) के नियमानुसार एक पक्ष में विसर्ग का विसर्ग ही रह गया है; पक्षान्तर में ‘विसर्ग’ की जगह ‘स्’ होकर ‘ श्वशुरः’ के शकार का योग मिलने से श्चुत्वेन ‘स्’ की जगह ‘श्’ हो गया है । ‘स्वरः ‘ के साथ विसर्ग का सकार उसी रूपमें दृष्टिगोचर होता है । [^25]: ‘कः + फलेत्’ – इस जगह फ प्राप्त था; परंतु वह वैकल्पिक है, अतः पक्षान्तर के अनुसार विसर्ग के स्थान में विसर्ग ही रह गया है । [^26]: यहाँ भी वही बात है । विसर्ग की जगह ‘स्’ या ‘श्’ नहीं हुआ है । [^27]: ‘कस् अत्र योधः ।’ यह पदच्छेद है । यहाँ ‘कस्’ के सकार की जगह ‘रु’ तथा ‘रु’ के स्थान में ‘उ’ हुआ है; फिर गुण और पूर्वरूप होकर ‘कोऽत्र योधः ‘ बना है। रोरुत्वविधान का नियम यह है — अप्लुत ‘अ’ से परे ‘रु’ हो तो उसकी जगह ‘उ’ होता है, अप्लुत अकार परे विद्यमान हो तब । [^28]: कस् उत्तमः — इस अवस्था में ‘स्’ के स्थान में ‘रु’ हुआ। फिर ‘रोर्यत्वविधान’ के अनुसार ‘रु’ के स्थान में ‘य’ हो गया। फिर य- लोपविधान से ‘य्’ का लोप हो गया । ‘लोपः शाकल्यस्य ।’ (८ । ३ । १९ ) – इस पा० सूत्र के अनुसार यहाँ ‘य्’ लोप हुआ है, अतः ‘क उत्तमः ‘ प्रयोग सिद्ध हुआ है । [^29]: ‘देवास्+एते’ — इस पदच्छेद में ‘स्’ की जगह ‘रु’ और ‘रु’ की जगह ‘य्’ हो गया। फिर पूर्ववत् ‘य’ लोप होने से ‘देवा एते’ — ऐसा प्रयोग सिद्ध हुआ । [^30]: -[^31]: -[^32]: ‘भोस् इह’, ‘भगोस् व्रज’ तथा ‘अघोस् याहि’, ‘स्वदेवास् यान्ति’ — इन वाक्यों में ‘स्’ की जगह रुत्व-यत्व हुआ । फिर पहले में तो ‘लोपः शाकल्यस्य । ‘ — इस सूत्र से और अन्य उदाहरणों में ‘हलि सर्वेषाम् ।’ (पा० सू० ८ । ३ । २२ ) — इस सूत्र से ‘य’ लोप होने पर निर्दिष्ट रूप बनते हैं । [^33]: ‘सुपूः ‘ यहाँ ‘सुपूर्’ — इस अवस्थामें ‘रकार ‘के स्थानमें ‘विसर्ग’ हुआ है । [^34]: ‘सुदुर् + रात्रिरत्र – सुदूरात्रिरत्र । ‘ यहाँ ‘रोरि’ से ‘र्’ लोप होकर पूर्वस्वर को दीर्घत्व प्राप्त हुआ है । [^35]: इस उदाहरण में ‘वायुस् + याति’ — ऐसा पदच्छेद है । यहाँ ‘स्’ के स्थानमें ‘रु’, उकार की इत्संज्ञा और रेफ का यकार से मिलन हुआ है । [^36]: इस उदाहरण में यह दिखाया गया है कि यहाँ ‘ खरवसानयोर्विसर्जनीयः । ‘ (पा० सू० ८ । ३ । १५) से रकार का विसर्ग नहीं हो सकता; क्योंकि न रेफ अवसान में है और न उससे परे ‘खर्’ प्रत्याहार का ही कोई अक्षर है । [^37]: ‘पुनर्+राति’ — इस अवस्था में ‘रो रि । ‘ ( पा० सू० ८ । ३ । १४) से रकार का लोप हुआ और पूर्व ‘ अण्’ को दीर्घत्व प्राप्त हुआ है । [^38]: ‘सस् याति इह ‘ —— इस अवस्था में ‘एतत्तदोः सुलोपो ।’ – इस (पा० सूत्र ६ । १ । १३२ ) के अनुसार ‘तत्’ — शब्दसम्बन्धी ‘सु’ विभक्ति से सकार का लोप हो गया है । [^39]: ‘सस् एषस् याति’, ‘क ईश्वरः ‘ — इस अवस्था में ‘सस्’ के सकार का लोप श्लोक की पादपूर्ति के लिये हुआ है, ‘एषस्’ — के सकार का लोप पूर्ववत् हुआ है । [^40]: ‘ज्योतिर् + रूपम् ‘ — यहाँ रलोप और दीर्घ हुआ है । [^41]: ‘तव + छत्रम् ।’ यहाँ ‘छे च । ‘ — इस ( पा० सू० ६ । १ । ७३) सूत्रसे तुगागम हुआ है, फिर ‘त’ का श्चुत्वेन ‘च’ हो गया है। (यह व्यञ्जनसंधिका उदाहरण है।) [^42]: -[^43]: यहाँ भी ‘दीर्घात्’, ‘पदान्ताद्वा’ (पा०सू० ६ । १ । ७५-७६ ) से तुगागम हुआ है। शेष पूर्ववत् (यहाँ भी व्यञ्जनसंधि ही है ) । Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe